Tuesday, July 14, 2009

उठ जाग मुसाफिर

उठ जाग मुसाफिर


उठ जाग मुसाफिर
सुबह को ना जागा , अब तो जाग
जीवन की दोपहर होने को आई है।

सुन साथी
दुनिया पहुँची मंगल पर
फ़िर क्यूं तू ठहरा पेड़ की छाँव में
देख , परख , चल उठ
उठ जाग मुसाफिर
सुबह को ना जागा , अब तो जाग
जीवन की दोपहर होने को आई है।

सुन साथी
किस गली गुम हो गये तेरे सपने
किस कर टूट गये माँ बाप से किये वादे
किधर खो गई तेरी इन्कलाबी बातें
"किसान है कमजोर, आम जन है बीमार और व्यापारी रहते सदा जवान।
इसलिए नही होती कोई क्रांति अपने देश "
सोच समझ , चल दिल में भर इक जोश
उठ जाग मुसाफिर
सुबह को ना जागा , अब तो जाग
जीवन की दोपहर होने को आई है।

सुन साथी
शरीर क्या है। इक मिटटी
आत्मा क्या है। इक अमर तत्व
तू क्या है ? तू क्या होगा ?
इक मिटटी या इक अमर तत्व
शेष अभी भी दोपहर और शाम
चल बढ़ा फ़िर से एक कदम

नोट- बस यूँ ही एक बार फिर से।

Wednesday, July 8, 2009

चंद मुलाकातों का साया

कुछ यादें, कुछ बातें गुरु की।

एक तगड़ा शरीर, एक कड़क आवाज़ और एक सांवला चेहरा जब कफ लगे हुए सफेद कुर्ता पाजाम पहनकर निकलता था तो छात्र ही क्या, टीचर भी अपनी अपनी क्लास में घुस जाया करते थे। जिस दिन नही आए तो समझो बच्चों और टीचरों की मौजा ही मौजा। कोई भी काम समय पर नही, ना ही समय पर घंटी बजेगी। ना ही समय पर टीचर  कक्षाओं में पहुँचेगे। और ना ही बच्चें पढ़ॆगे। जिसे देखो वही इन्हें कौसता मिलेगा। वो चाहे बच्चें हो, टीचर हो या फिर अभिवाहक। फिर भी हर अभिवाहक अपने बच्चों को इसी स्कूल में पढाना चाहता है। वो भी प्रिंसीपल सर श्री राजबीर सिंह बंसल जी के रहते हुए। वजहें बहुत है। पर सबसे बड़ी वजह है स्कूल में अच्छी पढ़ाई का होना। हर साल स्कूल का बहुत ही अच्छा रिजल्ट आना। और हर साल अपने जोन में शीर्ष पर रहना।


सुबह की प्रार्थना के लिए सभी छात्र और छात्राऐं निकल रहे हैं कक्षाओं से। हम भी निकल रहें हैं बाजुओं को नीचे करके और अपनी घड़ी को छिपाते हुए। स्कूल के स्टेज के उल्टे हाथ की तरफ लड़कियाँ और सीधे हाथ की तरफ लड़के। "तुम ही हो माता पिता भी तुम, तुम ही हो बंधु सखा भी तुम हो......" प्रार्थना के ये शब्द स्कूल में गूंज रहे हैं। प्रार्थना के बाद राष्ट्रगान होता हैं। जिस समय अवधि में ये होना चाहिए उस समय अवधि में ही होना चाहिए ये सर का आदेश है। खैर आज राष्ट्रगान एक ही बार हुआ। सर स्टेज पर आ चुके हैं। सर हमेशा की तरह बिना लिखा भाषण देना शुरु करते हैं। वो भाषण केवल भाषण नही होता है नेताओं के भाषण की तरह, उस पर अमल करना भी जरुरी होता है। इसी अमल के कारण सारे टीचर कुढ़ते रहते हैं इनसे। तभी सर की निगाह दो बच्चों पर पड़ती है जो मेरे पीछे बैठे हैं। भाषण अधूरा छोड़कर उन्हें स्टेज पर बुला लिया जाता है। तूफान से पहले की शाँति चारों फैल चुकी है। एक सवाल की गूँज शांति को भंग करती है। "किस बात पर हँसी आई तुम दोनों को?" जवाब ना मिलने पर एक लड़के को एक थप्पड़ रसीद कर किनारे कर दिया जाता है। फिर दूसरे लड़के से वही सवाल पूछा जाता है? जवाब ना मिलने पर फिर जो थप्पड़ो का सिलसिला चलता है वह कई मिनट तक नही रुकता। दोस्त को पीटता देख अच्छा नही लगता है। पर क्या करुँ वो मेरा दोस्त बाद में हैं, उससे पहले वो उनका लड़का है।

पता नहीं किस साल की बात है। पर इतना पता है कि मैंने सरकारी स्कूल से पाँचवी कक्षा पास की थी। पिताजी और अंकल जी मेरा नाम घर के पास के प्राइवेट स्कूल "ज्ञान सरोवर"  में कराने ले जाते है। वहाँ एक व्यक्ति मेरे से कई सवाल पूछता है। मैं सोचता हूँ ये तो टीचर नही हो सकते है फिर क्यों सवाल पूछ रहे हैं? और मैं उनको सही जवाब दे देता हूँ। वो खुश होते है पर मैं खुश नही हूँ क्योंकि मुझे इस स्कूल में दाखिला नही लेना है। मैं कह देता हूँ "मुझे तो "जन-कल्याण स्कूल" में ही दाख़िला लेना।", वो पूछते है "उसी स्कूल में ही क्यों लेना है बेटा?" मैंने तपाक से कहता हूँ  "मैंने सुना है कि उस स्कूल के प्रिंसीपल बहुत सख्त है और वहाँ पढाई भी बहुत अच्छी होती है।", उनका दूसरा सवाल "क्या यहाँ पढ़ाई अच्छी नही होती?", मैंने कहा "मुझे नही पता, पर वहाँ ज्यादा अच्छी होती है इतना पता है।" उन्होने फिर अंकल जी से कहा " भाई इसका दाख़िला वही कराओ जहाँ इसका मन है।" ये व्यक्ति और कोई नहीं प्रिंसीपल सर श्री राजबीर बंसल ही हैं। पर मुझे नही पता था कि ये ही उस स्कूल के प्रिंसीपल है और इस स्कूल के मालिक।

हमारी दसवी क्लास का विदाई समारोह था, समारोह लगभग खत्म हो चुका था। ग्रुप फोटो भी हो चुका। बस सब एक दूसरे से बातें कर रहे है। मैं चाहता था कि एक फोटो याद के लिए प्रिंसीपल सर के साथ हो जाए। पर कहने से हिचक रहा था और एक कोने में खड़ा था। पर तभी एक लड़का आया और बोला कि तेरे को प्रिंसीपल सर बुला रहे है। मैं चौंका कि उन्हें कैसे पता चला कि मैं उनके साथ फोटो खींचवाना चाहता हूँ। खैर मैं उनके पास गया और बोला "जी सर", वो बोले "तुम्हारे को मेरे साथ फोटो खिचानी है।" मैं भला क्यों मना करता जब मन की मुराद पूरी हो रही थी। फोटो खींच लिया गया। पर मैं आज तक ये बात नही जान पाया कि ऐ कैसे हो गया। क्या ये इत्तेफ़ाक था? या फिर कुछ और? मैं आज तक नही समझ सका। साथ ही एक बात और कहना चाहूँगा कि जब से वो स्कूल छूटा है तब से लेकर आज तक मुझे साल में पता नही कितनी बार सपनों में प्रिंसीपल सर नजर आते है। स्कूल बदल जाता है, क्लास बदल जाती है, दीवारे बदल जाती है, घटना का रुप बदल जाता है पर एक चीज नही बदलती है वो है प्रिंसीपल सर। ये क्या है? सर सपने में क्यों आते है? मैं आज तक नही समझ सका।

सामने कुर्सी पर एक सांवले रंग का व्यक्ति बैठा है बनियान पहने। पतला सा चेहरा है। चेहरे की झुर्रीयाँ बुढ़ापे की कहानी कह रही है। हाथ कांप रहे है। दो सहायक खड़े है। मैं चरण स्पर्श करता हूँ। पर एक हाथ जो प्यार से सिर पर या पीठ पर आ जाता था आज वो ना पीठ पर आया ना सिर पर। बस कांपता  रहा हैं। दोस्त(उनका बेटा)   उनसे पूछता है क्या आपने इसे पहचान लिया। मैं उसी आवाज में उत्तर की प्रतीक्षा करता हूँ जो पहले स्कूल में गूंजा करती थी। जिसकी दहाड़ सुनकर टीचरों और बच्चों की घिघी बँध जाया करती थी। पर आज जो आवाज निकली वो बहुत ही धीमी थी। आवाज सुनने के लिए उनके नज़दीक जाना पड़ा और वो बोले "हाँ पहचान लिया, पर ये क्या दाढ़ी बढ़ा रखी है।" वो मुझे छोटी छोटी निगाहों से निहारते रहे और मैं भावुक होते हुए सोचता रहा , जिंदगी तू ऐसी क्यूँ होती है? मैं चला आया। पता चला कि ये आज भी अपने सहायकों के साथ अपने इस स्कूल को चला रहें इस हालत और इस उम्र में भी। उनके होंसले को सलाम करते हुए बस यही कहूँगा।

उठता है, चलता है, रुकता है, फिर से चलता है
कांपते हाथों से वो आज भी बच्चों को पढ़ाया करता हैं।

Monday, June 29, 2009

पागल

पागल

ना जाने क्यूँ चिड़चिड़ाने लगा है
बात बात पर वो बड़बड़ाने लगा हैं।

बदलतें इंसानी रिश्तों को देखकर
किताबों में वो साथी तलाशने लगा है।

लोग दो और दो को पाँच बताते हैं
बचपन के कायदे को वो खोजने लगा है।

बढ़ती जिम्मेदारियों की तपिश में
कोयलें सा काला वो होने लगा है।

जिदंग़ी की इन सीधी टेढी राहों पर
मुस्कराना भी वो भूलने लगा है।

अब अपनी ही धुन में घूमने लगा है
कहते हैं कि वो पागल होने लगा है।

Monday, June 1, 2009

गली गली वह घूमता हैं।

कबाड़ी

चिड़ियों का अलार्म सुनकर
कूड़ॆ के ढेर में से वह उठता है।

डाल कंधे पर प्लास्टिक का बोरा
बिना खाये वह गली-गली घूमता है।

देख उसे कुत्ते भोंकते है
लोग नाक मुँह सिकोड़ते है।

कड़ी धूप हो या ठुठरती ठंड़
बोरे से अपना शरीर वह ढकता फिरता है।

जिन जगहों को देख हम मुँह पर रुमाल रखते है
ऐसी जगहों को देख वह मचल उठता है।

दोपहर बाद अपने घर की राह चलता है
करके बोरे को खाली वह गत्ते, प्लास्टिक और लोहे को छाँटता है।

बेचकर उस कबाड़ को कुछ रुपये कमाता है
घर आकर फिर वह चूल्हा सुलगाता है।

ना वो मोहन, ना वो हुसैन
ना वो बेदी, ना वो जोसफ कहलाता है
वो तो बस एक कबाड़ी पुकारा जाता है।

Monday, May 11, 2009

मंटो का जन्मदिन और उनसे जुड़ॆ किस्सें

मंटो का जन्मदिन
आज मंटो जी का जन्मदिन हैं सोचा आप साथियों के साथ मनाया जाए। कहानियाँ तो आपने पढ़ी ही होगी इसलिए आज कहानी ना देकर उनसे जुड़ॆ किस्से दे रहा हूँ जो कृशन चन्दर जी ने लिखे है। "मंटो: मेरा दुश्मन " किताब में। मैं मंटो के लेखन के लिए बैचेन इसी किताब को पढकर हुआ था। और फिर जब कहानियाँ पढ़ी तो मंटो के मुरीद हो गए हम। तो पेश हैं वो किस्सें। आप भी कमेंट देते वक्त अपने अनुभव लिख सकते है मंटो के बारे में। शायद पोस्ट बडी हो गई है उसके लिए माफ़ी।

पहला किस्सा
मंटो के पास टाइपराईटर था और मंटो अपने तमाम ड्रामे इसी तरह लिखता था कि काग़ज़ को टाइपराईटर पर चढ़ा कर बैठ जाता था और टाइप करना शुरु कर देता था। मंटो का ख्याल है कि टाईपराइटर से बढ़कर प्रेरणा देने वाली दूसरी कोई मशीन दुनिया में नहीं है। शब्द गढ़ॆ-ग़ढाये मोतियों की आब लिए हुए, साफ़-सुथरे मशीन से निकल जाते है। क़लम की तरह नहीं कि निब घिसी हुई है तो रोशनाई कम है या काग़ज़ इतना पतला है कि स्याही उसके आर-पार हो जाती है या खुरदरा है और स्याही फैल जाती है। एक लेखक के लिए टाइपराइटर उतना ही ज़रुरी है जितना पति के लिए पत्नी। और एक उपेन्द्र नाथ अश्क और किशन चन्दर है कि क़लम घिस-घिस किए जा रहे है। " अरे मियाँ, कहीं अज़ीम अंदब की तखलीक़ (महान साहित्य का सृजन) आठ आने के होल्डर से भी हो सकता है। तुम गधे हो, निरे गधे।" मैं तो ख़ैर चुप रहा, पर दो-तीन दिन के बाद हम लोग क्या देखते है कि अश्क साहब अपने बग़ल में उर्दू का टाईपराईटर दबाये चले आ रहे है और अपने मंटो की मेज़ के सामने अपना टाइपराइटर सजा दिया और खट-खट करने लगे। " अरे, उर्दू के टाइपराइटर से क्या होता है? अँग्रेजी टाइपराइटर भी होना चाहिए। किशन, तुमने मेरा अँग्रेज़ी का टाइपराइटर देखा है? दिल्ली भर में ऐसा टाइपराइटर कहीं न होगा। एक दिन लाकर तुम्हें दिखाऊँगा।" अशक ने इस पर न केवल अँग्रेजी का, बल्कि हिन्दी का टाइपराइटर भी ख़रीद लिया। अब जब अशक आता तो अकसर चपरासी एक छोड़ तीन टाइपराइटर उठाये उसके पीछे दाखिल होता और अश्क मंटो के सामने से गुज़र जाता, क्योंकि मंटो के पास सिर्फ दो टाइपराइटर थे। आख़िर मंटो ने ग़ुस्से में आकर अपना अँग्रेजी टाइपराईटर भी बेच दिया और फिर उर्दू टाईपराइटर को भी वह नहीं रखना चाहता था, पर उससे काम में थोड़ी आसानी हो जाती थी, इसलिए उसे पहले पहल नहीं बेचा- पर तीन टाइपराइटर की मार वह कब तक खाता। आख़िर उसने उर्दू का टाइपराइटर भी बेच दिया। कहने लगा, " लाख कहो, वह बात मशीन में नहीं आ सकती जो क़लम में है। काग़ज़, क़लम और दिमाग में जो रिश्ता है वह टाइपराइटर से क़ायम नहीं होता। एक तो कमबख़्त खटाख़ट शोर किए जाता है- मुसलसल, मुतवातिर- और क़लम किस रवानी से चलता है। मालूम होता है रोशनाई सीधी दिमाग़ से निकल कर काग़ज की सतह पर बह रही है। हाय, यह शेफ़र्स का क़लम किस क़दर ख़ूबसूरत है। इस नुकीला स्ट्रीमलाईन हुस्न देखो, जैसे बान्द्रा की क्रिशिचयन छोकरी।" और अश्क ने जल कर कहा, " तुम्हारा भी कोई दीन-ईमान है। कल तक टाइपराइटर की तारीफ़ करते थे। आज अपने पास टाइपराइटर है तो क़लम की तारीफ़ करने लगे। वाह। यह भी कोई बात है। हमारे एक हजार रुपये ख़र्च हो गये।"
मंटो ज़ोर से हँसने लगा।

दूसरा किस्सा
आज से चौदह साल पहले मैंने और मंटो ने मिलकर एक फिल्मी कहानी लिखी थी, "बनजारा" । मंटो ने आज तक किसी दूसरे साहित्यकार के साथ मिलकर कोई कहानी नहीं लिखी- न उसके पहले, न उसके बाद। लेकिन वे दिन बडी सख्त सर्दियों के दिन थे । मेरा सूट पुराना पड़ गया था और मंटो का सूट भी पुराना पड़ गया था। मंटो मेरे पास आया और बोला-" ए किशन । नया सूट चाहता है?" मैंने कहा, हाँ। "तो चल मेरे साथ।" "कहाँ?" "बस, ज़्यादा बकवास न कर, चल मेरे साथ।" हम लोग एक डिस्ट्रीब्यूटर के पास गये। मैं वहाँ अगर कुछ कहता, तो सचमुच बकवास ही होता, इसलिए मैं ख़ामोश रहा। वह डिसृट्रीब्यूटर फ़िल्म प्रोडेक्शन के मैदान में आना चाहता था। मंटो ने पन्द्रह बीस मिनट की बातचीत में उसे कहानी बेच दी और उससे पाँच सौ रुपये नकद ले लिये। बाहर आकर उसने मुझे ढाई सौ दिये , ढाई सौ रुपये खुद रख लिये। फिर हम लोगों ने अपने-अपने सूट के लिए बढिया कपड़ा खरीदा और अब्दुल गनी टेलर मास्टर की दुकान पर गये। उसे सूट जल्दी तैयार करने की ताक़ीद की। फिर सूट तैयार हो गए। पहन भी लिये गए। मगर सूट का कपड़ा दर्ज़ी को देने और सिलने के दौरान में जो समय बीता, उसमें हम काफ़ी रुपये घोल कर पी गये। चुनांचे अब्दुल ग़नी की सिलाई उधार रही और उसने हमें सूट पहनने के लिए दे दिये। मगर कई माह तक हम लोग उसका उधार न चुका सके। एक दिन मंटो और मैं कशमीरी गेट से गुजर रहे थे कि मास्टर ग़नी ने हमें पकड़ लिया। मैंने सोचा, आज साफ-साफ बेइज़्ज़ती होगी। मास्टर ग़नी ने मंटो को गरेबान से पकड़ कर कहा, "वह 'हतक' तुमने लिखी है?" मंटो ने कहा, "लिखी है तो क्या हुआ? अगर तुमसे सूट उधार लिया है तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम मेरी कहानी के अच्छे आलोचक भी हो सकते हो। यह गरेबान छोड़ो।" अब्दुल ग़नी के चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कराहट आयी। उसने मंटो का गरेबान छोड़ दिया और उसकी तरफ अजीब-सी नजरों से देखकर कहने लगा, " जा, तेरे उधार के पैसे माफ़ किये।" वह पलटकर चला गया। चंद लम्हों के लिए मंटो बिल्कुल ख़ामोश खड़ा रहा। वह इस तारीफ़ से बिल्कुल खुश नहीं हुआ। बड़ा संजीदा और दुखी और खफ़ा-ख़फ़ा सा नजर आने लगा, "साला क्या समझता है। मुझे सताता है। मैं उसकी पाई-पाई चुका दूँगा। साला समझता है 'हतक' मेरी अच्छी कहानी है। 'हतक'? 'हतक' तो मेरी सबसे बुरी कहानी है।"

पिछले जन्मदिन पर भी एक पोस्ट की थी आप चाहे तो उसे भी पढ सकते है। नीचे दिये लिंक में।

सआदत हसन मंटो का जन्मदिन और उनकी दो छोटी कहानियाँ

Tuesday, May 5, 2009

आज का एक सच

छोटी सी तनख़्वाह में ............

वक्त की सुईयों ने
सबकी जुबान सील दी है।
बेटी अपने फटे हुए बस्तें को छिपाते हुए
रोज स्कूल जाया करती है।
बूढे पिता चंद पैसे बचाने की ख़ातिर
कड़ी धूप में इकलौता छन्ना हुआ रुमाल सिर पर रखकर
डी.टी.सी बस का इंतजार करते मिलते हैं।
माँ, हाथों की सूखी हडिड्यों पर लटकती खाल के सहारे
दिन हो या रात इस गर्मी में बिजना(पंखा) चलाती रहती है।
पत्नी पतली सी कलाईयों में
बस एक ही रंग की दो चूड़ियाँ डाले देखती है।
इनके चेहरों पर छाई उदासी
मुझे अंदर तक तकलीफ़ देती रहती है।
और मेरी आँखे, इनकी आँखो से
मिलने से कतराती फिरती है।
इस छोटी सी तनख़्वाह में
बस इनके खामोश चंद सवाल ही खरीद पाता हूँ
और जवाब के लिए दिन-भर मारा मारा फिरता हूँ।

Monday, April 27, 2009

गुमशुदा दोस्त की तलाश

दोस्त की यादों की बारात आई हैं।

भीड़ से भरे बस स्टेड़ पर, भीड़ से दूर बस का इंतजार करता कोई लड़का,
हो या ना हो वो मेरा दोस्त ही होगा।
रुकी बस में ना चढ़कर, चलती हुई बस में ही चढ़ता हुआ कोई लड़का
हो या ना हो वो मेरा दोस्त ही होगा।
बस की खाली सीटें होने के बावजूद पीछे खिड़की के पास खड़ा कोई लड़का,
हो या ना हो वो मेरा दोस्त ही होगा।
सड़क की चढ़ाई पर रिक्शे से उतर कर, पीछे से धक्का लगाता कोई लड़का,
हो या ना हो वो मेरा दोस्त ही होगा।

ज़िंदगी की भूलभुलैया सी गलियों में अगर कहीं टकरा जाए तो उसे कहना
"बुढ़िया माई की गली के नुक्कड़ पर एक छोकरा उसका इंतजार करता है।"


ये दोस्त दो साल तक साथ रहा मेरे रुपनगर के स्कूल में। नया स्कूल था, नए टीचर थे, नए साथी थे। पर ये नया नही लगता था। ऐसा लगता था जैसे इसे पहले कहीं देखा है। ना जाने कभी किसी को देखकर लगता है कि इससे तो पिछले जन्म का कोई रिश्ता है। पहली मुलाकात में ही दोस्ती हो गई। जैसे पहली नजर में प्यार होता है। पता लगा ये भी 234 नम्बर बस से आता है। बस फिर क्या था टाईम फ़िक्स कर लिया एक बस स्टेड़ पर मिलने का। जैसे कोई प्यार करने वाले लड़का लड़की मिलने का टाईम फ़िक्स करते है। साथ-साथ जाते थे साथ-साथ आते थे। तब रेड लाईन बसें हुआ करती थी। और उनमें लड़ाकू छात्रों का ( आप चाहे तो पढ़ाकू भी कह सकते है) स्टाफ़ चला करता था। और ये महानुभाव टिकट लिया करते थे। हम इन्हें डरपोक कहा करते थे। पर इसे डरपोक बनने रहना ही पसंद था। पर किसी दिन कडंक्टर की बदतमीजी देख लेता था उस दिन पता नही क्यों स्टाफ़ बोला करता था। अगर कडंक्टर से बहस नही हुई तो जानबूझकर गेट पर जाकर खड़ा हो जाता था। तब कंड्क्टर उससे जरुर लड़ता था क्योंकि उसकी सवारियों को दिक्कत होती थी। तब कडंक्टर से खूब लड़ता था। समझ नही आता था कि वो गाँधी का प्रशंसक था या भगत सिंह का।

एक साउथ इंडियन टीचर थे गणित के। बस पढ़ाने से मतलब, बैशक चार छात्र पढे या तीस। हमारी क्लास में दो गेट हुआ करते थे। एक आगे और एक पीछे। सर ब्लैक बोर्ड पर सवाल हल कर रहे होते थे, और अधिकतर बच्चें पीछे के गेट से बाहर निकल रहे होते थे। बस चार पाँच बच्चे रह जाते थे पढाकू टाइप के, उनमें से एक ये लड़ाकू भी होता था टेन ठीठा बराबर होता है साईन ठीठा / कोस ठीठा, पढ़ते हुए। और हम कमला नगर की मार्किट में घूम रहे होते थे। पर कभी खुद मुझे उठाकर कहता यार मन नही लग रहा चल कमला नगर चलते है छोले बठूरे खाने। फिर साधु बेला में बैठकर खूब बातें करेंगे। अपना खाना बाहर आकर किसी भिखारी को दे देता था। मैं कई बार मना करता था कि सा.. आज जाट ने( हमारे क्लास टीचर) सख्ती कर रखी है। पता नही उसे सख्ती के दिन ही खुजली क्यों होती थी, स्कूल से भागने की? पर वो जिद्दी था जिद करके ले जाया करता था। मैं कहता यार तू जिद बहुत करता है तो कहता था " जिद करता हूँ तो लगता है कि मैं जीव हूँ नही तो दोस्त निर्जीव सा महसूस करता हूँ।"

सुबह चाहे कितनी ही ठंड हो। माल रोड़ से रुपनगर तक पैदल ही खींच कर ले जाया करता था। दोपहर में जब स्कूल की छुट्टी होती थी तो हम कोशिश करते थे कि स्कूल की छुट्टी से एक पिरिअड़ पहले निकले या फिर आधा घंटा बाद, क्योंकि स्टेड पर बहुत भीड़ हो जाती थी। पर कभी स्कूल की सख़्ती की वजह से छुट्टी के समय पर ही निकलना पड़ता तो मुझे रिक्शे से जाना पड़ता था, वो भी उसकी पसंद का रिक्शे वाले से। वो रिक्शे वाले से ये नही पूछता था कि माल रोड के कितने पैसे लेगा। बल्कि ये पूछता था कि आज कितने कमा लिये अगर कोई कहता कि कमा लिये होगे 30 या 40 चालीस रुपये तो वो उसमें नही जाऐगा। जिसने ज्यादा नही कमाए उसके चेहरे को गौर से देखेगा और बोलेगा "चल माल रोड छोड़ दे।" फिर माल रोड़ पहुँच कर जानबूझकर खुले पैसे नही देगा और चार या पाँच रुपये फ्री में देकर चलता बनेगा। मैं कहता था "सा.. तू मूर्ख है" वो कहता था "सा.. जब दुकान वाला दस की चीज बीस में देता है तो झट से दे आते हो और जब मेहनत करने वाले को ज्यादा मिल जाए तो शोर मचाते हो। फिर थोड़ा चुप रहकर बोलता था "लोग अनजाने में मूर्ख बनते है मैं जानबूझकर मूर्ख बनता हूँ।" "

शैतानी करने में, मैं सोचता था कि मैं ही बादशाह हूँ। पर एक दिन तो वो मेरा ही गुरु निकला। हुआ यूँ था कि एक हमारे उपप्रधानाचार्य थे अग्रवाल जी, जिनको बच्चें अक्सर बाऊ कहते थे। क्योंकि सर इस नाम से चिढ़ते थे। अक्सर बच्चें क्लास में कही भी बाऊ लिख दिया करते थे। वो दाँत पीसकर रह जाते थे। एक दिन क्लास खत्म करते ही सर मेरे से बोले "तुम मेरे कमरे में आओ।" मेरी साँसे रुक गई,दिल धड़कने लगा और सोचने लगा कि बेटा आज गया तू। कमरे में पहुँचा तो वो बोले "एक काम दे रहा हूँ तुम्हें, जरा ये पता करो कि क्लास में कौन लिखता है बाऊ।" तब जाकर साँस में साँस आई। मैंने वापिस आकर बताया कि यारों अब लिखना छोड़ दो बाऊ, सी.बी.आई लगा दी बाऊ ने तुम्हारे पीछे। वो बोला मैं कहता था ना कि फँसोगे एक दिन। सा.. मानते कहाँ हो तुम। फिर हमारे ग्रुप ने फैसला कर लिया कि अब नही लिखेंगे। पर अगले ही दिन क्लास में सर ने खलबली मचा दी यह कहकर कि जिस भी लड़के ने उनके गेट पर "बाऊ" लिखा है। पता चलते ही मैं उसका स्कूल से नाम काट दूँगा। हम अचम्भे में कि कौन हमारा भी गुरु निकल आया। जिसने बाऊ के कमरे के गेट पर ही लिखा दिया। सब टीचरों में चर्चा। छुट्टी में स्टेड जाते हुए धीरे से बोला "सुबह आते ही सबसे पहले यही काम किया था आज यार।" उसके चेहरे पर डर था पर फिर बोला "सा.. मजा बड़े बम फोड़ने में आता है नाकि छोटे बम फोड़ने में।" और अगले हफ्ते एक डायरी और एक पेन ले लाया और कहने लगा "यार बाऊ को गिफ़्ट करने जा रहा हूँ।"

दिल का साफ था। उदार विचारों को अपने दिमाग की टोकरी में रखता था। कुछ चीजें पसंद नही थी उसे। जैसे झूठ, पीठ पीछे बुराई........। जब कभी इन्हीं कारणों से किसी से उसकी लड़ाई हो जाती तो वह भी लड़ पड़ता था। लड़ता ऐसे था जैसे बस आज के बाद उसका और उस लड़के का रिश्ता खत्म हो जाऐगा। पर अगले ही दिन वह उस लड़के को Cash Account , Trial Balance, Balance Sheet आदि समझा रहा होता था। या फिर मजे से गप्पे लडा रहा होता था। मैं कहता "कल तो वो तेरे से लड़ रहा था और आज तू उसे पढ़ा रहा है।" वो कहता था " कल उसने अपनी समझ से अपना काम किया, आज मैं अपनी समझ से अपना काम रहा हूँ।" और जाते जाते एक बात जो आज तक मेरी समझ नही आई अगर आपको समझ आए तो लिख देना और नहीं आई तो ये भी पूछना उससे अगर कभी टकरा जाए किसी रास्ते, कि उसकी अधिकतर कापियों के दूसरे पेज पर ये लाइन क्यों लिखी होती थी?

"जा इंसान तेरी उम्मीद तेरा इंतजार करती हैं।"

Tuesday, April 21, 2009

चुनावों के बीच एक बात कहनी है।

नेताजी

चुनावों का शंखनाद हो चुका
नेताजी की नींद अब टूट चुकी।
तैयार हैं सब अब
अपने अपने हथियारों से
कोई वादों से बहका रहा,
कोई भावनाओं को भड़का रहा।

जिसे देखो वही बड़ी-बड़ी बातें करता हैं
पर अपने ऐशो-आराम का पूरा ख्याल भी रखता हैं।
धूल से पैर ना सन जाए
इसलिए मँहगी गाड़ियों और हैलिकाप्टरों से दौरा करता हैं।

बातें गरीबों की खूब करता हैं
फिर ना जाने क्यों ?
करोड़ो रुपये अपने पास भी रखता हैं।
सत्ता के लालच में
दुश्मन को दोस्त
दोस्त को दुश्मन बनाया करता हैं।

मिल जाए जब सत्ता
होकर आम जनता से दूर
आलीशान कोठियों और दफ़्तरों में
सत्ता का रस पीया करता हैं।

आओ फिर भी वोट करें
अपने नेता के काम को
लौकतंत्र की तराजू में तौल चलें।
जिस जिस नेता ने दिखाई हो होशियारी
उनकी तो आँखे खोल ही चलें।

Saturday, April 11, 2009

कुछ बातें और शरारतें बेटी की।



बेटी
का बचपन

यूँ तो अभी बच्ची है
पर बातें दादी माँ सी करती है।
जब कभी कुछ नया देखती है
सवालों की झड़ी लगा देती है।
सूरज बाबा संग मुस्कराती जागती है
उठते ही बस दूध, पापे माँगती है।
जिद करे तो जिददी कहलाए
ना करे तो घर खाने को आए।
गानों की शौकीन
कभी "होले-होले" पर नाचे
कभी "तेरी शादी करुँगा" को गाए।
बच्चों संग खेलने को मचलती है
ना मिले जब कोई
"मेरे साथ खेलो" हमसे कहती है।
टाफ़ी हो, चाकलेट हो या हो फिर पेस्ट्री
याद आने पर दिन-भर माँगती रहती है।
किताबें डाल अपनी मम्मी के बैग में
स्कूल जाने की एक्टिंग करती है।
खुद मेरे साथ जाकर लाई अपनी किताबें नही पढ़ती है
जब तब देखो मेरी मैंगजीनों को देखती, फाड़ती रहती है।
देर रात तक ऊधम मचाए
जब नींद आए तो झट से सो जाए
सोती हुई प्यारी नजर आए
बस यूँ ही देखते रहने को जी चाहे
ऐ ख़ुदा रहम करना
कहीं मेरी ही नजर ना लग जाए।


आजकल बेटी अपनी नानी के यहाँ गई हुई है। घर खाने को दोड़ता है। चुपचाप बैठकर उसकी बातें और शरारतें याद करता हूँ। वही से ये तुकबंदी निकल गई। कोई तुकबंदी लिखूँ और आप साथियों से साझा ना करुँ ऐसा भला हो सकता है। और हाँ आजकल समय नही मिल रहा ब्लोग की दुनिया को देखने का , जब समय होता है तो नेट नही होता है। दस बारह दिन हो गए घर का नेट नही आ रहा। और आफिस में एक आदमी को तीन तीन आदमी का काम करना पड रहा है। खैर पोस्ट डाल रहा हूँ कैफे में बैठकर।

Monday, April 6, 2009

समाजवाद और गौरख पाण्डेय

समाजवाद 

समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई 
समाजवाद उनके धीरे धीरे आई 
हाथी से आई, घोड़ा से आई 
अंग्रेज़ी बाजा बजाई, समाजवाद बबुआ..... 

आंधी से आई, गांधी से आई
बिरला के घर में, समाजवाद बबुआ..... 

नोटवा से आई, वोटवा से आई 
कुर्सी के बदली हो जाई, समाजवाद बबुआ..... 

कांग्रेस से आई, जनता से आई 
झंड़ा के बदली हो आई, समाजवाद बबुआ..... 

रुबल से आई, डालर से आई 
देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद बबुआ..... 

लाठी से आई, गोली से आई 
लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद बबुआ..... 

मंहगी ले आई, गरीबी ले आई 
केतनो मजूर कमाई, समाजवाद बबुआ..... 

छुटवा के छुटहन , बड़्वा के बड़हन 
हिस्सा बराबर लगाई, समाजवाद बबुआ..... 

परसो ले आई, बरसो ले आई 
हरदब अकासे तकाई, समाजवाद बबुआ..... 

धीरे धीरे आई, चुप्पे चुप्पे आई 
अंखियन पे पर्दा लगाई 
समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई ................ 


गोरख पाण्डेय  

कल कमाल खान जी ने एक स्टोरी में गोरख जी की लिखी दो लाईन कहीं तो एकदम मुझे उनकी लिखी पूरी रचना याद हो आई। फिर मन किया क्यों ना आप साथियों के साथ भी बांट दूँ। आप बताए कैसी लगी। वैसे अब तक जितना भी गोरख पाण्डेय जी का लिखा पढा है सब दिल को छुआ है। इसलिए उनको दिल से शुक्रिया। 

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