पागल
ना जाने क्यूँ चिड़चिड़ाने लगा है
बात बात पर वो बड़बड़ाने लगा हैं।
बदलतें इंसानी रिश्तों को देखकर
किताबों में वो साथी तलाशने लगा है।
लोग दो और दो को पाँच बताते हैं
बचपन के कायदे को वो खोजने लगा है।
बढ़ती जिम्मेदारियों की तपिश में
कोयलें सा काला वो होने लगा है।
जिदंग़ी की इन सीधी टेढी राहों पर
मुस्कराना भी वो भूलने लगा है।
अब अपनी ही धुन में घूमने लगा है
कहते हैं कि वो पागल होने लगा है।