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Thursday, September 5, 2013

शिक्षक दिवस पर एक सीख गुरु की यह भी...


मेरी घरवाली ने और मैंने पांच बेटियां जन्मी, पाली, पढ़ाई, बिआही। अब वे जोरावर इंसान हैं। बढ़िया नौकरियां कर रही हैं। अपने बच्चे प्यार से पाल रही हैं। इस लिहाज से, थोड़े नानी-नाना होंगे जो हम दोनों जितने खुशकिस्मत होंगे। हमारे पड़ोसी हैरान हैं कि हमारे बच्चे हम बुड्ढों का इतना अच्छा ध्यान रखते हैं। हमारी हर जरुरत को चाव से पूरी करते हैं। पांच बेटियां जन्मने और पालने का हमारा तजुर्बा कैसा रहा? अगर हम ने पांच पुत्र जन्में होते, पाले होते, तो क्या फर्क होता हमारी जिंदगी में? ये सवाल हमसे अक्सर हमारे यार दोस्त पूछते हैं। हमारी हर बेटी ने अपना जीवन साथी अपने आप चुना। बेटे बेटियों ने, कम से कम खर्च करके, खुद बिआह रचाये। दाज-दहेज का धेला नहीं। बरसों पहले हो चुकीं उनकी शादियां कामयाब कही जा सकती हैं। इसलिए लोग ज्ञान कौर को और मुझे महाभाग्यशाली समझते हैं।

लेकिन हम ऐसे मनहूस समाज में बस रहे हैं जहां बेटी के पैदा होने को बहुत बुरा समझा जाता है। यहां लड़का जमाने के वास्ते हर यत्न करते हैं। वैध हकीमों से लेकर, साधु-संतो की, ओझा जादूगरों की, मुट्ठी चापी करते हैं। राजा जन्में चाहे रंक, औरत को मंदा ही बोला जाता है। बेटियां को गर्भ के अंदर ही कत्ल करना हमारे मुल्क में सदियों से चल रहा है। आज भी रोज अखबार के अंदर स्त्रियों के ऊपर हो रहे जुलमों की बाबत पढ़कर रूह कांप जाती है। सदियों पहले किसी मूर्ख ब्राह्म्ण ने लिख दिया- " पुत्र के बगैर हिंदू की गति नहीं होती। उसके पित्रों को पानी नहीं पहुंचता।" इससे बड़ा झूठ और कोई नहीं। कोरा वहम! लोगों को डराकर पूजा-पाठ का पाखंड रचकर, रकमें ठगने का प्रपंच। जूते मारो इस तरह के झूठे पुजारियों के!  आज का कानून मानो। आज लड़का और लड़की बराबर के नागरिक है। हर पहलू से बेटी और पुत्र को एक समान प्यार से, एक जैसे खर्च से, पालो पोसो। हमारी बेटियां-बहनें हर धंधे में मर्दों के बराबर काम कर सकती है। हर प्रकार से पुरुषों की बराबरी कर रही है।

बेटियों का पालन पोषण करते वक्त हमें कोई विशेष कठिनाई नहीं झेलनी पड़ी। हां, मैं एक बात से, रिश्तेदारों से, दोस्तों से, मर्द-प्रधान समाज से, हमेशा दुखी रहा हूं। मुझे अब तक बार-बार लड़के पेश किए जाते रहे हैं कि हम गोद ले लें। हमारे नजदीकी रिश्तेदारों ने चोखी कोशिश की कि हम उनका पुत्र मुतबन्ना बना लें। ताकि इस तरह वे हमारा घर घाट संभाल सकें। मैंने इस तरह के दगाबाज रिश्तेदारों को हमेशा जूती दिखाई है। शेर बनकर, अपनी हर बेटी की रक्षा की है। वहमी मौसियों-फूफियों को, सलाहकार मामा-मामियों को, अपनी बेटियों के दुश्मन समझकर, हमेशा घर बाहर धकेला है। लड़कियों को हीन समझने वालों के सिर सौ जूते!  इस पहलू से, तगड़ा बाप बनने के वास्ते, मुझे कईयों की धुनाई करनी पड़ी। मैंने किसी कंजर की उल्टी नसीहत नहीं सुनी। बेटियां पालने में कोई कोताही नहीं बरती। नतीजा? आज जीवन भर का सुख मेरे और ज्ञानकौर के पल्ले है।

पचहत्तर बरस की उम्र तक मुझे कोई मर्द नहीं टकराया जो दिल से, बेटियों को पुत्रों के बराबर समझता हो। हर मर्द बोलेगा, मेरे इस नाटक की नायिका गुरदेव कौर की मां बनने की इच्छा सही होगी, लेकिन उसको गर्भ वही मर्द कर सकता है जो विवाह के भांवरों से बांधा गया हो। अगर देबो दूसरे मर्द के नजदीक खुद चलकर जाती है, यह है उसके चाल-चलन की गिरावट ! मैं इसका गिरावट नहीं मानता। रिगवेद के अंदर युवती यमी की भांति, हर औरत का मां बनने का हक है। उसका यत्न सही है। हर प्रकार से जायज है।

कुछ संतरे जीवन के यथार्थ को नाटकीय रूप देने की बाबत।

इस नाटक की मूल घटना, गांव वहमोवाल में, 1955 को घटी थी। उस समय मेरी आयु 17 साल की थी। गुरदेव कौर और पाखंडी स्वामी के बारे में मुझे हर किस्म की जानकारी थी।  इस नाटक का पहला ड्राफ्ट मैने 1991 में पूरा किया। मूल घटना के 36 बरस बाद। असली नायिका और रघुनाथ बुरी मौत मरे थे। क्या मैं उनकी मौतों से नाटक का अंत करुं ? बीस एक बरस मैं इस दोचित्ती में फंसा रहा। बीस एक सल अधिकतर सोच मैंने इस खर्रे पर खर्च की। मेरा निर्णय था: मैं नाटक का सुखद प्रभाव छोडूं। अगर तुम ने कहानी असली जीवन से भी उठाई हो उसमें अदला-बदली करना तुम्हारा अधिकार है। अपनी नायिका को मैंने आखिर में दिलेर मां बनने के वास्ते हल्लाशेरी दी है। देबो और उसका बच्चा जिंदा रहेंग़े! यही सच्चा धर्म है। आज की हर बेटी बहन के वास्ते मैं सुखी जीवन की मिसाल पेश करना चाहता था।

इस ड्रामे को बेटियों बहनों के नजरिये से पढ़ो।

-चरणदास सिद्धू

[ सुन रहे हो ना तुम...बेटियों ना चाहने वालों ]

नोट- अभी पिछले ही दिनों मिली थी यह नाटक की किताब " मेरा बच्चा और मैं " , जिसके लेखक हैं डॉ. चरणदास सिद्धू और जिसे प्रकशित किया है " श्री गणेश प्रकाशन " ने। आप भी पढ़िए इस अच्छी किताब को।

Saturday, August 31, 2013

तेरी याद

तेरी याद
बहुत देर हुई, जलावतन हो चुकी
मैं नहीं जानती
वह जीती है या मर गई...
पर एक बार एक घटना हुई
ख्यालों की रात बहुत गहरी थी
और इतनी खामोश थी
कि एक पत्ता हिलने से भी
बरसों के कान चौंक जाते थे ...
फिर तीन बार लगा
कोई छाती का द्वार खटखटाता है
नाखूनों से दीवार को खरोंचता है
और लगता है, कोई दबे पांव
घर की छत पर जा रहा है ...
तीन बार उठकर - मैंने सांकल टटोली
अंधेरा -कभी कुछ कहता-सा लगता था
और कभी बिल्कुल खामोश हो जाता था
फिर एक आवाज आई
" मैं एक स्मृति हूं
बहुत दूर से आई हूं
सब के आंख से बचती हुई
अपने बदन को चुराती हुई
सुना है - तेरा दिल आबाद है
पर कहीं कोई सूना-सा कोना मेरे लिए होगा...

[ ये रचना अमृता प्रीतम द्वारा लिखित " अज्ञात का निमंत्रण'' नामक किताब से ली गई हैं। इस किताब को प्रकाशित किया है " किताब घर" ने। आज अमृता प्रीतम जी का जन्मदिन भी है। ]

Sunday, November 13, 2011

नाटक- गालिब-ए-आजम और मैं

जब भी गोरा चेहरा, ऊंची नाक, चौड़ा माथा, लम्बे कान, घनी सफेद दाढ़ी, लम्बा कद, इकहरा बदन जिस पर लम्बा-सा चोगा , और सिर पर बड़ी-सी फर वाली टोपी पहनने वाले शख़्स मिर्जा असद अल्ला खां ग़ालिब उर्फ चाचा ग़ालिब का जिक्र आता है , तो उनका यह शेर बरबस ही याद आ जाता है जिसमें उनकी पूरी शख्सियत मौजूद है :

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे।
कहते हैं कि गालिब का है, अंदाज-ए-बयां और॥

सच  में मिर्जा गालिब का अंदाज-ए-बयां न्यारा ही था। वरना मिर्जा गालिब इतने दिनों तक अपनी शेरो शायरी के बल पर लोगों के दिलों में जिंदा न रह पाते। मैं तो अब तक शेरो शायरी का मतलब मिर्जा गालिब और मिर्जा गालिब का मतलब शेरो शायरी समझता रहा था। मैंने जब भी गालिब की शेरों शायरी की तरफ अपने कदम बढाये, फारसी के कठिन शब्द हमेशा गतिरोध की तरह बीच में आ खड़े हुए। इसके इतर मिर्जा गालिब के बारे में यही जाना कि शायर तो वो अच्छे थे पर बदनाम बहुत थे। इससे अधिक कुछ नहीं जाना। यह संयोग था कि जब सी. डी. सिद्धू  सर का लिखा नाटक " गालिब-ए-आजम" देखा तो मैं मिर्जा गालिब की शेरो शायरी के साथ-साथ उनका भी मुरीद हो गया। इस नाटक से मुझे मिर्जा गालिब की शख्सियत के कई पहलुओं से रुबरु होने का मौका मिला। नाटक में सी. डी. सिद्धू सर ने मिर्जा गालिब की जिंदगी के तीन अहम पन्नों को इतनी खूबसूरती से पेश किया है, मानो ऐसा लगा जैसे मिर्जा गालिब दोबारा जिंदा हो गए हों।

यूं तो मिर्जा गालिब और बदकिस्मती दोनों साथ-साथ चलते हैं, किंतु इस नाटक में गालिब के उस एक रुप को जब जाना तो मैं उनके हौंसले का कायल हुए बगैर नहीं रह सका, जब पूरी पेंशन न मिलने के कारण उन्हें मुफलिसी में गुजर-बसर करना पड़ी। जिंदगी के सुनहरे दिनों में वो सिर तक कर्ज में डूबे रहे। रोज-ब-रोज दरवाजे पर कर्जख्वाहों के तकाजे मिर्जा गालिब की बेगम उमराओं जान को परेशान करते रहे। एक वक्त ऐसा भी आया जब मिर्जा गालिब के खिलाफ डिक्रियां निकलने लगी। जिसकी वजह से मिर्जा गालिब का गृहस्थ जीवन तनावों से घिरता रहा। मगर क्या मजाल कि इस फनकार को अपने फन से कोई तकलीफ जुदा कर पाती। यहां तक कि तनावो के बीच मिर्जा गालिब अपने नन्हें-नन्हें बच्चों को फौत होते देखता रहा और अंदर ही अंदर रोता रहा। शायद तभी उनकी कलम से यह शेर निकला :

मेरी किसमत में गम अगर इतना था ।
दिल भी, या रब्ब , कई दिये होते ॥

गालिब का दूसरा रुप इस नाटक में बखूबी तौर पर सामने आया है। जब फीरोजपुर झिरका व लोहारु के राजा नवाब अहमद खां की अनिकाही बेगम मुद्दी का बेटा शम्स अलादीन पूरी पेंशन ना देने की दगाबाजी लगातार करता रहा। और जब मिर्जा गालिब के सिर के ऊपर से पानी गुजरने लगा, तब वह इस बेइंसाफी के खिलाफ यह कहते हुए उठ खड़ा हुआ कि जिस कलमकार ने खुद जिंदगी से जूझना नहीं सीखा, मुश्किलात को शिकस्त देना नहीं सीखा, वो दूसरों को क्या सिखाऐगा? एक डरपोक ऐसी नज्म नहीं कह सकता , जो दूसरों को बहादुर बनाए। एक कायर ऐसा शेर नहीं कह सकता जो सामईन के अंदर नई रुह फूंके। और वह अपनी पेंशनी हक की लड़ाई के लिए बनारस से होते हुए कोलकाता पहुंचकर अपने साथ किए गए धोखे के खिलाफ मुकदमा दायर करता है। बेशक यह इतिहास में दर्ज है पर यह सिद्धू सर के इस नाटक की खासियत है कि नाटक का नायक लाचारी, गुरबत और ढेरों तकलीफों के बीच रहते हुए भी बेईमानी और बेइंसाफी के खिलाफ जंगजू की तरह खड़ा हो जाता है, और दर्शकों को मुश्किलों से लड़ने का जज्बा देता है। यह अलग बात है कि चंद साल बाद ही वह पेंशन का मुकदमा खारिज होने के कारण एक बार फिर सदमे से गुजरता है। मगर नाटक के नायक मिर्जा गालिब की ही ताकत थी कि तमाम तकलीफों से भरी जिंदगी में भी इंसानियत का दामन पकड़े हुए कहता है :

हम कहां के दाना थे, किस हुनर में यक्ता थे ।
बेसबब हुआ गालिब दुश्मन आसमां अपना ॥

सिद्धू सर के लिखे नाटकों में लगभग हर नायक की भांति ही मिर्जा गालिब की भी परिस्थितयां, हालात, हमेशा दुश्मन बने रहे। मगर इन हालात और तकलीफों के बीच से ही नाटक का नायक एक नया जीवन दर्शन, एक नई जीवन पद्धति, जीवन जीने का तरीका, अपनी बनारस और कोलकाता की यात्राओं में से खोज निकाल लाता है। इन दोनों शहरों की माटी की महक, जीवनशैली, संस्कृति को देखकर नायक की सोच में आए बदलावों को इस नाटक में भरपूर जगह दी गई है। बल्कि यूं कहूं कि अन्य नाटककारों ने इसका बस जिक्र भर किया है परतुं सिद्धू सर ने मिर्जा गालिब की जिंदगी में से जीवन के अध्यात्म को, उसके दर्शन को, अपने नाटक में पूरी तरह उंडेल दिया है। और यही इस नाटक की आत्मा है। मिर्जा गालिब का इस नाटक में यह तीसरा रुप है। जब वह बनारस की "चिरागे दैर" की रोशनी में इल्म को पाता है और कहता है : बनारस के कयाम ने मेरी सोच बदल दी। इन दिनों बहुत कुछ पता चला है मुझे। मजहब के बारे में। दीन धर्म के बारे में। धर्म के नाम पर पुजारियों ने, मुल्लाओं ने, फर्जी किस्से कहानियां घड़ रखे हैं। गरीबों को दौजख के खौफ दिखाकर , जन्नत के झूठे ख्वाब बुनकर, फुसला रखा है । ये तो पहले ही बेचारे भूख के मारे हैं, बीमारियों के सताये है, मौत के दहलाये हैं। ऊपर से पंडित और मुल्लाओं के ये ढ्कौसले। यह जुल्म है। यह खाओ, वो न खाओ। यह पियो, वो न पियो। नमाज पढ़ो । रोजा रखो। बुतो को मत पूजो। गालिब आगे कहता है: पुराने तौर तरीके बदलों। खुदा खोखली रस्मों रीतों में नही घुसा बैठा। खुदा आपसी मोहब्बत में है।

गालिब यहीं नहीं रुकते बल्कि अपनी आंखों में संत रविदास के बेगमपुर का ख्वाब देखते है, " जहां किसी को कोई गम न हो। सब जमीन जायदाद साझे में हो। बराबर हों सब लोग। कोई ऊंच नीच न हो। हर एक को रोटी मिले। कपड़ा मिले। वहीं दूसरी ओर गालिब जब कोलकाता की आधुनिकता के उजाले में खुद को खड़ा पाता है तो वह उसके हर नक्श को बखूबी देखता और समझता है। वह कोलकाता की फिजा में आधुनिकता की पड़ी छौंक को पहचानता है, उसकी महक को अपने नथूनों से अनुभव करता है। जीवन में क्या आवश्यक है क्या नहीं, बारिकी से समझता है। तभी तो वो कह उठता है कि " नई दुनिया को सलाम करो। कोलकाता देखो। अंग्रेजों की नई नई इजादें देखो। हम पत्थर से पत्थर टकरा कर आग जलाया करते थे। अंग़्रेज को देखो। एक तिनके पर थोड़ा सा मसाला लगाया और छूं!  आग जल गई! बड़े बड़े जहाज चलते है समुद्र में। हजारों कोस तक। कैसे ?  भाप से! " गालिब इधर आधुनिकता की रोशनी में आगे बढ़ने की ओर इशारा करता है। और इन इशारों को समझते हुए मेरा दिल कहता है :

हुई मुद्दत कि गालिब मर गया पर याद आता है।
वो हर एक बात पे कहना कि यूं होता तो क्या होता ॥

तब मुझे लगता है कि आखिर यह "यूं " कितना गजब ढाता है। यूं होता तो क्या होता? इस यूं में क्या-क्या होता? या क्या-क्या हो सकता है? यह नाटक भी उसी की ओर आगे बढता हुआ एक कदम है। लगता है कि नाटक के लेखक सी.डी. सिद्धू सर भी आपसी मोहब्बत के धर्म , बेगमपुर के ख्वाब और कोलकाता की आधुनिकता के सपनो को अपनी आंखों में संजोये इस नाटक को रचते हैं। और इन सपनों से इंसान को इंसान बनने को प्रेरित करते हैं। इंसान को जिंदगी की तमाम तकलीफों से लड़ने के लिए जंगजू बनाते है। और एक खुशहाल, सुखी जिंदगी जीने के लिए नए-नए सपनो की राह दिखाते हैं। सी.डी. सिद्धू सर के इस नाटक " गालिब-ए-आजम" की यही तो खूबी है। और यह इस नाटक की जान है। अगर मैं " गालिब-ए-आजम " को नहीं देख पाता तो संभवत: गालिब को भी नहीं जान पाता । या यूं कहूं कि एक पूरी जिंदगी को नहीं जान पाता जो गालिब के जरिए हमें अपनी जिंदगी जीना सिखाती है। बकौल गालिब- " बेगम, यही है मेरी जिंदगी भर की कमाई। मेरा "दीवान-ए- गालिब" क्या जिंदगी बख्शी है खुदा ने। हादसों का हुजूम। मुसीबतों का जमघट। मगर मैंने हिम्मत नहीं हारी। हर मुश्किल को शेयरों में ढालता गया । हर नन्हें मुन्ने की मौत पर, मैं तहयया करता रहा, कि मैं अपने कलम से मलकल मौत से बदला लूंगा। मैं लाफानी कलाम कहूंगा। उमराओ, आज मुस्करा दो । हंस दो। " यह मुस्कराहट, खुशी, हंसी ही जीवन जीने का हौसला। और नाटक के लेखक का मकसद। जो सिद्धू सर के हर नाटक की तरह इस नाटक की पटकथा का अंत है। जब इन सुंदर पक्तिंयों के साथ मंच का पर्दा गिरता है तो "गालिब-ए-आजम" नाटक हमारे दिलो दिमाग पर छा जाता है। शायद सालों के लिए , सदियों के लिए , या फिर जीवन भर के लिए ।

- सुशील कुमार छौक्कर

नोट- यह नाटक रिव्यू "गालिब-ए-आजम" पुस्तक से लिया गया है, पुस्तक के लेखक है डॉ. चरणदास सिद्धू। और प्रकाशित हुआ है "श्री गणेश प्रकाशन"- 32/52 , गली नम्बर -11, भीकम सिंह कालोनी , विश्वास नगर, शाहदरा से ।

Sunday, October 2, 2011

लहूलुहान इंसान

आदमी है कि सिर्फ सांसे ले रहा है 
क्योंकि वह मरना नहीं चाहता है
कभी मां-बाप की बुढ़ी होती हडिडयो की चिंता में
कभी बच्चों की जवान होती मुस्कराहट की फिक्र में
और कभी उसकी खातिर जो हर सुख-दुख में साथ देती है।
वरना तो वह खुद के अंदर बैठे इंसान को
रोज ही लहूलुहान होते देखता है।
उसके जख्मों को अपनी जीभ से चाटता है
इसके अलावा उसके पास कोई चारा है भी क्या ?
क्योंकि
जब तक,
घृणा से देखती आंखे होगीं,
कटु शब्द बोलती जबानें होगीं ,
कमजोर पर उठते हाथ होंगे
सच को कुचलने वाले पैर होंगे,
लूटने वाले शातिर दिमाग होंगे,
जात-पात पर लड़ते इंसान होंगे,
किसानों को ठगते व्यापारी होंगे,
मजदूरों का खून चूसते साहूकार होंगे। 
तब तक
वह ऐसे ही जख्मों को जीभ से सहलाऐगा,
उससे रिसते खून के घूंट पीता जाऐगा।

 -सुशील छौक्कर

Tuesday, September 27, 2011

बेटी और उसकी बातें














बेटी के नन्हें-नन्हें हाथ अब बड़े होने लगे हैं

खिलौनों के साथ किताबें-पेंसिल भी पकड़ने लगे हैं.

जुबां अब इसकी तुतलाती नहीं है

द,आ का डंडा,दा,द ऊ की मात्रा,दू,दादू पढ़ने लगी है.

फरमाईशें छोटी-छोटी करती है

सपने बड़े-बड़े देखती है.

कभी अकेले कमरे में बच्चों को पढ़ाती मिलती है

कभी हम सबको सुई लगाती फिरती है

स्कूल जाते वक्त कभी रोती नहीं

होम-वर्क किए बगैर कभी सोती नहीं.

कभी-कभी सहेलियों की देखा-देखी

बाइक से स्कूल जाने को कहती है.

समझाने पर पैदल ही मुस्कराती चली जाती है.

देख कर इसकी मासूमियत दिल भर आता है

फिर इसके बड़े-बड़े सपनो की खातिर

बहुत कुछ करने को जी चाहता है.

- नैना के पापा

 

Monday, September 5, 2011

शिक्षक दिवस पर, गुरु की बातें

माननीय प्रधान जी ते साथियों:

पहला धिआंवां बाबा नानक,

जिन प्यार दा सबक सिखाया

दूजे धिआंवां भगत सिंध नूं

जालम नूं ललकारे....

C.D.Sidhu Sir

ये दोनों सतरें मेरे नाटक भाइया हाकम सिंह के गीत का हिस्सा हैं। मेरे पूरे नाटकों का विषय पक्ष यही है। बाबा नानक का आपसी प्यार का सबक  सरबत के भले की कामना। और महान क्रांतिकारी भगत सिंह शहीद का शोषण के खिलाफ युद्ध। जालिमों से टक्कर लेना। ये सबक सदियों पुराने हैं। कुल दुनिया के बुजुर्गों ने, कवियों ने, कलाकारों ने, दोहराए हैं। विषय पक्ष, किसी भी लेखक का  संदेश , नितांत नया नहीं हो सकता। तो मेरे 33 नाटकों का नयापन क्या है। मेरी कोशिश रही है कि मैं अपने गांव के लोगों को, अपने इलाके के लोगों को, अपनी बोली के अंदर, मंच पर जीवंत कर सकूँ। और अपने लोगों को उनके पड़ोसियों के किस्से देखा कर, उनके इतिहास की घटनाएं दोहरा कर, जीवन के बारे में अधिक  चौकस कर सकूं- ताकि वे हिम्मत करके, अपनी कमजोरियों से, सामाजिक कुरीतियों से, वहमों-भ्रमों से, आजाद हो सकें। बेइंसाफी सए,जुलम सितम से, जूझ सकें। मैं सतलुज और व्यास दरियाओं की बाहों में पनपते, जरखेज इलाके, दुआबा का जन्मा पला हूँ। गांव  भाम, जिला होशियारपुर। दुआबा हमेशा लोक नाटक का गढ़ रहा है। मैं नकल  और रासलीला खेलने वाली टोलियों का वारिस हूँ। मैंने दुआबा को पूरी  तरह जानने की कोशिश की है। मेरे अधिकतर पात्र  जाने पहचाने जीवन से लिए गए है। उनकी बोली भी वही है  जो मैं बचपन से सुनता आया हूँ।अपने लोगों की सच्ची तस्वीर खेंचने के वास्ते मैं कई बरस देहात में घूमा हूँ। देहाती कपड़े पहनकर। फेरी वाला बनकर , साधु के लिबास में, या कोई दूसरा किरदार बनकर। मैंने अपने लोगों के साथ एकरुप होने की कोशिश की है।मुझे लगातार अहसास रहा है कि मैं दिल्ली में बसते हुए , कॉलेज में पढ़ाते हुए , अपने पिछले जीवन  को, अपनी  जड़ो को, न भूलूं। मैं बे-जमीन गरीब परिवार का पहला बंदा हूँ जो कॉलेज की पढ़ाई करने दिल्ली तक पहुंचा। और वहां से पी.एच.डी करने अमरीका तक गया। मेरे पिता की सदा मुझे ताड़ना रही –" चार  अक्खर अंग्रेजी के पढ़कर कभी अपने आपको गरीबों से ऊंचा मत समझना।" मैं धरती पुत्र हूँ। सदा धरती से जुड़ा रहा हूँ। मेरे नाटकों के पात्र मेरे परिवार के बंदे है। रिश्तेदार हैं। पड़ोसी है। वे दलित लोग जिन्होंने सदियों से जमीन वालों का, रजवाड़ो का, पुजारियों का जुल्म सहा है।उनकी मुशिकलों को, संताप को, मैंने नजदीक से देखा है, झेला है। शायद इसी कारण मैं गरीबों को मंच पर जिंदा खड़ा करने में कामयाब हुआ हूँ। मेरे कुछ दोस्त बताते है, मैं पंजाब का पहला लेखक हूँ जिसने दृढ होकर सेपी का काम करने वाले, बागवान, मोची, जुलाहे, नाई, कहार, कुम्हार,  मिस्तरी, बाजीगर नायक नायिकाओं का सृजन किया है। शायद यही मेरी नाटकों का नयापन है।

बाबा नानक के जीवन ढ़ग का मेरे ऊपर बहुत असर है। अपनी जिंदगी के कई बरस नानक ने दुआबा में बिताए। अपने प्यार के संदेश को उसने हिंदुस्तान के कोने कोने में पहुंचाया।नानक ईमानदार कामगार  के घर की सूखी रोटी खाकर खुश था। बेईमान अमीरों को सरेबाजार  फटकारता था।बाबर जैसे हमलावारों के सताए हुए गरीबों की वेदना  को नानक ने लफ्ज दिए। नानक सरीखे शायर के रास्ते पर  चलते हुए, अगर मैं अपनी कलम से, मजदूरों को जबान दे सकूं, मं अपनी जिंदगी सार्थक समझूंगा। अपने जमाने का नानक बहुत  बहादुर शायर था। हरिद्वार पहुंचकर , नानक ने पाखंडी ब्राहम्णों को ललकारा। गरीबों को इन ठगों से आजाद  करने  की कोशिश की। क्या मैं,आज  अयोध्या  पहुंचकर , मक्का पहुंचकर , कटटरपंथियों को धर्म का सही अर्थ समझाने का हौंसला रखता हूँ। संतो  की वाणी ने हमेशा मेरा मार्गदर्शन किया है। खासकर कबीर जुलाहे के ये बोल:


पत्थर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़।

तांते  तो चक्की भली, पीस खाये संसार॥

इंकलाब का सबक मुझे इंग्लैंड या अमरीका से लाने की जरुरत नहीं थी। मेरे मुल्क के बुजुर्ग सदियों तक हमें पाखंडियों से, पुजारियों से, खबरदार रहने की शिक्षा देते रहें। अगर मैं अपने नाटकों में उन्हीं की शिक्षा दोहरा सकूं तो मुझे फखर होगा। संत रविदास, नामदेव, सदना, कबीर सब  गृहस्थी थे।इनसे मैंने लेखन के बारें में,कला के सृजन की बाबत, बढ़िया सबक सीखा। कलाकार कोई अलग किस्म का जानवर नहीं होता। कविता के गैबी ताकत की जरुरत नहीं। कला का सृजन  और जूते बनाना, कपड़ा बुनना, खेत  में हल चलाना, बीज  बोना, फसल समेटना एक ही इंसान  कर सकता है। खाली समय में एक कामगार गीत बना सकता है, गा सकता है.... अपने देहात में,परिवार में, मैंने बहुत बंदे देखे है जो रोटी कमाने के धंधे के साथ साथ , नाचने गाने का काम भी कर सकते हैं। मैं भी उन साधारण लोगों जैसा हूँ। 43 बरस मैंने  हंसराज कॉलेज दिल्ली में अग्रेंजी पढ़ाई। नाटक लिखते वक्त , खेलते वक्त, मैंने इसे अपने अध्यापन का ही हिस्सा माना। किताब है?कोई भी बंदा लिख सकता है। नाटय निर्देशन ? हर  बशर कर सकता है। सिर्फ लग्न  चाहिए। मेहनत चाहिए। मैं  इसी किस्म  का मजदूर लेखक हूँ। रंगकर्मी हूँ। अध्यापक हूँ।

बोली के बारे में भी मेरा पक्का अकीदा है: चंगा साहित्य सिर्फ अपनी मां-बोली में रचा जा सकता है। साहित्य  अपने लोगों के साथ अपनी बोली में रचाया हुआ संवाद है। मैं अग्रेंजी में नाटक लिखकर, हिंदुस्तानियों के बारे में, उनकी अच्छाइयों या बुराइयों की बाबत,  इंग्लैंड या अमरीका वालों को रिपोर्ट नहीं भेजनाअ चाहता। मैं भंगी बाबा बंतू के, जुलाहे किरपा राम के, चमार खुशिया राम के, बेटे बेटियों संग सीधी बातचीत करना चाहता हूँ। उनका हौंसला बढ़ाना चाहता हूँ। उनमें बेहतर भविष्य  की कामना जगाना चाहता हूँ। और इस  काम  के लिए सबसे कारगर  माध्यम हमारी मादरी जबान हो सकती है। मेरे सभी नायक-नायकाओं का शिखर है शहीद भगत सिंह। बचपन से मैं अपने इलाके में जन्मे इस सूरमें के किस्से सुनता आया हूँ। मेरी भगत सिंह शहीद:नाटक तिक्कड़ी मेरी पूरी  कृतियों का सार है। तत्व है। भगत सिंह मेरा आदर्श है। जुल्म के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए, सामराजी शाषकों संग जूझने के लिए, मजहब के पाखड़ों को तर्को की तलवार से कत्ल करने के लिए, भगत सिंह हमेशा मेरा प्रेरणा स्त्रोत  रहा है। इन तीन नाटकों में इस महापुरुष का सच्चा  स्वरुप पेश करके मुझे बहुत संतोष मिला है। साहित्य अकादमी ने,  हमारे काम को सराहा है। हम तहदिल से शुक्रगुजार हैं। 

केंद्रीय साहित्य अकादमी द्वारा साल 2003 में, "भगत सिंह शहीद: नाटक तिक्कड़ी" को दिए गए सम्मान पर, मेरे गुरु श्री चरणदास सिद्धू जी द्वारा पढा गया पर्चा। और यह पर्चा पुस्तक "ड्रामेबाजियां" से लिया गया है जिसे प्रकाशित किया है "बुकमार्ट पब्लिशर्स" ने , लिखा  है "श्री चरणदास सिद्धू जी" ने। नाटक नाटक लिखने वाले,खिलने वाले और नाटक पढने वालों को यह किताब पसंद आऐगी। 

Monday, May 9, 2011

‘वह लड़का आज भी मुझमें बसा हुआ है’

दिल्ली की बेतहाशा गर्मियों वाली दोपहर को चिलचिलाती धूप से पुरानी दिल्ली स्थित हरदयाल सिंह लाइबेरी की छत तप रही थी, पंखे गर्म हवा फेंक रहे थे, बड़े बड़े कूलर भी हांफ रहे थे। मैं सुबह जल्दी ही लाइबेरी आ जाता था, इसलिए एक बजते ही पेट में चूहे हलचल मचाने लगते थे। लाइब्रेरी की बड़ी गोलाकार सफेद घड़ी में एक बजते ही बैग से खाने का डिब्बा निकालकर लाइब्रेरी में मौजूद लड़के लड़कियों के साथ मैं भी बाहर निकल आया। सबने अपने-अपने ठीए संभाल लिए, मैं बरगद के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर खाना खाता था। लिहाजा उसी बरगद के पेड़ के नीचे जाकर रोज की तरह वहीं से चायवाले को एक स्पेशल चाय के लिए आवाज लगा दी।

पता नहीं हमारे कुनबे में खाना खाते वक्त कुछ पीने (चाहे वह चाय हो, दूध, लस्सी या फिर रायता) की आदत किसने डाली थी। मैं भी इसे आज तक निभाए जा रहा हूं, या यूं समझिए कि एक आदत सी हो गई है और कहते हैं आदतें छुड़ाए नहीं छूटती हैं। बस चंद पलों में ही चायवाला चान लेकर आ गया। मै।ने खाना खाना शुरू किया। बीच बीच में चाय की चुस्कियां भी लेता रहा। खाना खाने के बाद मैं पुरानी दिल्ली का नजारा देखने लगा। सामने चांदनी चौक को जाने वाली सड़क पर गाड़ियां कम हो रही थी। भीड़ पर गर्मी का असर साफ नजर आ रहा था।

तभी एक सात आठ साल का सांवला सा लड़का, फअी हुई नीली कमीज और मैली सी सफेद निक्कर पहने मेरे पास आया। एक हाथ आगे बढ़ाकर बोला, “ अंकल, एक रूपया दे दो, भूख लगी है।” पहले तो मैं उसे अनदेखा कर इधर उधर देखता रहा। फिर मन में आया कि बोल दूं “परे हट, यह तेरे जैसे बच्चों का रोज का धंधा है” क्योंकि इस इलाके में भिखारियों की संख्या बहुत ज्यादा थी। पर पता नहीं क्यों एक बार फिर उस पर नजर जाते ही मैं खुद से ही उलझ गया कि पैसे दूं या ना दूं। इसी बीच वह फिर से बोला, “अंकल, एक रूपया दे दो, भूख लगी है।” मैंने झट से अपनी जेब में हाथ डालकर एक सिक्का निकाला, जो दो रूपये का था। यह मैंने उस लड़के को दे दिया। लड़का सिक्का लेकर तुरंत सामने चांदनी चौक की तरफ जाने वाली सड़क की ओर भाग खड़ा हुआ। मैं वहां खड़े होकर खाना खाने के बाद आए नींद के झोंके को भगाने की कोशिश में जुटा था, लू के गर्म गर्म थपेड़ों का मुझसे टकराकर निकलने का सिलसिला जारी था।

लगभग पांच सात मिनट बाद वही लड़का सामने से आता हुआ नजर आया। उसके हाथ में डबल रोटी के टुकड़े और चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। मेरे पास आकर बोला, ” ये लो अंकल,” ना जाने क्यों मेरा हाथ भी एक भिखारी की तरह आगे बढ़ गया और उसने मेरे हाथ पर एक रूपये का चमकता हुआ सिक्का रख दिया। वह जिधर से आया था उसी तरफ चल दिया। मैं एक बुत की तरह खड़ा हुआ, कभी उसे जाते हुए देखता, कभी अपने हाथ पर रखे हुए चमकते सिक्के की तरफ। कुछ ही पलों में वह मेरी आंखो से ओझल हो गया। मगर मेरे दिलो-दिमाग में वह अब भी था।

मैं सोचने लगा कि क्य वह भिखारी था। यदि भिखारी था, तो क्या कोई भिखारी इतना ईमानदार भी हो सकता है? जितना मांगा, उतना ही लिया, जबकि मैंने तो उससे कुछ कहा भी नहीं था कि यह दो रूपये का सिक्का है, इसमें से एक रूपया लौटा देना। और अगर भिखारी न भी हो तो भी ले जा चुके पैसों को वापस लौटा देने की मानकिकता कितनों की रहती है? फिर सोचने लगा कि क्या पेट की भूख ने उसे भिखारी बना दिया था क्योंकि आजकल तो धन की भूख में भिखारी ज्यादा बनते दिखाई देते हैं, यदि ऐसा भी नहीं था तो क्या इस देश में ईमानदारी बची है? और बची भी है तो क्या सिर्फ बच्चों में बची है?

कई सारे सवाल दिमाग में दौड़ने लगे थे, यह लाजिमी भी था क्योंकि जिस दौर में हम जी रहे हैं वहां चारों सिवाय लूट मारी के कुछ नजर नहीं आता। अगर बच्चों में ही ईमानदारी बची है तो मुझे लगता है कि ईश्वर हमें बड़ा होने ही न दें। और यदि हम बड़े हो भी जाएं तो ईमानदार रहना भी सीख जाएं।
यह चमकता हुआ सिक्का सिर्फ सिक्का नहीं रहा। यह उस बच्चें की ईमानदारी का आईना बन गया था जिसमें मैं अपना चेहरा देख सकता था और सोच सकता था कि ईमानदार होने का एक यह भी उदाहरण होता है, जिसके बूते आप किसी के जेहन में हमेशा के लिए बसे रह सकते हैं।
जैसे वह लड़का आज भी मुझमें बसा हुआ है।

नोट- इस बच्चे की ईमानदारी को "तहलका हिंदी" ने 15 मई 2011 के संस्करण के  अपने "आपबीती स्तंभ" में सलाम किया है। और साथ ही ऊपर दिया गया स्केच भी "तहलका" से लिया गया है। शुक्रिया तहलका ।

Tuesday, August 10, 2010

जीने की खातिर

बनिहारन
























एक बच्चा छोटा सा,
मैले-कुचैले कपड़े पहने,
रोज़ मुझे सड़क किनारे,
मिट्टी में पत्थरों संग,
खेलता मिलता हैं।

कभी देख मुस्कराता हैं,
कभी देखता ही जाता हैं।

माँ इसकी पत्थर तौड़ती है,
रख तसले में फिर उन्हें ढ़ोती है।
माथे पर आती पसीने की बूंदों को,
अपने फटे हुए पल्लू से पोंछती हैं।


बीच-बीच में तिरक्षी निगाहों से,
अपने लाडले को भी देखती है।

बताती है ये पेट की खातिर,
दूर गाँव से इस शहर आई है।
फुटपाथ बनाऐगी,
कुछ पैसा कमाऐगी।
चौमासे में गाँव वापस चली जाऐगी,
और ज़मीनदार के खेत में धान लगाऐगी।

इधर हम शहर की चमक में,
खूब तरक्की की बात करेंगे।
उधर ये लालटेन की रोशनी में,
चूल्हा सुलगाऐगी।

 - सुशील कुमार छौक्कर

Tuesday, April 13, 2010

12 अप्रैल

आज का दिन खास हैं
सबको प्यारा सा अहसास हैं
आज के दिन खिली थी एक कली
एक गाँव के गौबर से पूते आँगन में।

देखकर दुनिया यह हल्की सी मुस्कराई थी
चारपाई पर लेटे-2 नन्हें पैरों से फिर साईकिल चलाई
पग-पग चलती रही, धीरे-धीरे बढ़ती रही ।

सहेलियों संग गिटों से खेलती रही
आईस-पाईस में छिपते छिपाते
गाँव की पाठशाला में क ख ग घ पढती रही
गुड्डे गुडिया की दुनिया भी बसाती रही।

जब आई बाली उम्र
छोटे बड़े सपने सतरंगी बुनती रही
पर जब देखी परम्परा की रीति
सीखी कढ़ाई-बुनाई और खाने की विधि
माँ ने याद दिलाई दादी की बातें
"बेटियाँ होती हैं पराई"
डोली में बैठकर फिर सजन घर चली।

पर उसने दूसरी राह भी सपनों में रची थी
जब वह अपने नाम से जानी जाऐगी
रुढ़ियों की छाया से दूर होकर
अपनी एक अलग पहचान बनाऐगी
इसलिए साथ उसने यह दूसरी राह भी चुनी
करके एम. ए, लगी वो फिर बच्चों को पढ़ाने।

फिर वो दिन भी खास होगा
जब गर्व का अहसास होगा
जब ये कली पूरा फूल बनेगी
मैडम से प्रिंसीपल मैडम बनेगी।

Tuesday, March 2, 2010

आह...... होली पर बेटी, मेरा बचपन लौटा लाई।

नैना की होली

हम अपना बचपन देख नहीं पाते बस अपने बड़े बुजुर्गो से सुन ही पाते हैं, या एक आध घटनाएं हमारी स्मृति में बची रह जाती है। अगर हमें अपना बचपन देखना है तो अपने बच्चों के बचपन के संग हो लेना चाहिए और उस छूटे हुए बचपन को फिर से जीने के लिए। कुछ ऐसा ही मैंने इस बार किया। अपने और बेटी की खातिर हम भी होली में रंगीले हो लिए। सुबह सुबह बेटी ने हमें रंगा, दोपहर में हमने बेटी को रंग दिया। और बेटी की माँ कहाँ पीछे रहने वाले थी सो उन्होंने तो सबको ऐसा रंगा की सब एक दूसरे को पहचान ही नहीं पाए। खैर आप हमारी बेटी की होली की फोटो देखिए। और हाँ बेटी की पसंद के 10 गाने भी जानिए जिनको सुनने के लिए वह अपने पापा से खूब जिद करती हैं। और पापा गानों के लिए ब्लोगर साथियों के पीछे पड़े रहते हैं।

















सैंया छेड़ देवें, ननद चुटकी लेवे
ससुराल गैंदा फूल ..............................

















दिल तो बच्चा है जी, थोड़ा कच्चा है जी
हाँ दिल तो बच्चा है जी ........................













आजा आजा दिल निचोड़े ,रात की मटकी तोड़े
कोई गुड़ लक निकाले, आज गुड लक तो फोड़ॆ ...........

















तू पैसा पैसा करती है क्यों पैसे पे इतना मरती है
मैं पैसों की लगा दूँ ढेरी री री री री...................













इब्न ए बतूता ता ता , बगल में जूता ता ता
पहने तो करता है चुर्र .............................













जब लाईफ हो आऊट आफ कंट्रोल
होंठो करके गोल, होठों को करके गोल
सीटी बजा के बोल ALL IS WELL













आजा आजा जिन्दे शामियाने के तले
जेरी वाले नीले आसमाने के तले
जय हो जय हो जय हो .......................................

















होले होले से हवा लगती है
होले होले से दवा लगती है
होले होले से दुआ लगती है
होले होले .......................
होले होले हो जाऐगा प्यार ....................













मसकली मसकली मसकली मसकली मसकली .........

















बेटा हो जा जवान तेरी शादी करुँगा
शादी करुँगा तेरी शादी करुँगा .......

कैसी लगी हमारी होली। और नैना बेटी के पसंद के गानों में से आपकी पसंद का गाना कौन सा है,  ये भी बताना जी।
 

Friday, February 19, 2010

फुरसत के कुछ पल यूँ कर बीते।

काफी दिनों के बाद अब जाकर कुछ राहत मिली है तो सबसे पहले अपनी ब्लोग की दुनिया याद आई। इसलिए राम जी के हाथों की जादूगरी के कुछ नमूने लेकर आया हूँ। हुआ कुछ यूँ कि एक काम से गया था कनाट प्लेस, पर वो काम तो हुआ नहीं और पहुँच गया अपनी पसंदीदा जगह मंडी हाऊस , बस वही राम जी की कला की प्रदर्शनी लगी हुई थी । "दिल तो बच्चा है जी" नही माना, उछलता कूदता घुस गया।
 
  
  
  
  
  
  
  
  
  
  
  

आप चाहे तो ये प्रदर्शनी 22 फरवरी तक दिल्ली के कापननिक्स मार्ग पर रवीन्द्र भवन में देख सकते है। और अधिक जानकारी के लिए www.ramsutar.com पर भी जा सकते हैं। और राम जी के हाथों से बनी बेहतरीन और सुन्दर कला का आनंद ले सकते हैं। 

Tuesday, January 5, 2010

किताबें













किताबें 

किताबें
रंग बिरंगी
छोटी-बड़ी
मोटी-पतली
अलमारी में से
हर पल झाँकती हैं।

फिर आकर पास मेरे
हँसाती हैं, रुलाती हैं
देर तक मुझसे बतियाती हैं
जब छोड़े सारी दुनिया
तब मेरा साथ निभाती हैं।

"माँ"
हाथ पकड़कर चलना सिखाती है
"मुझे चाँद चाहिए"
सपनो को पँख लगाती है
"पीली छतरी वाली लड़की"
इश्क की महक से महकाती है
"नास्तिक शहीद "
जीने का मकसद बताती है।


नोट- आजकल साथियों किन्हीं कारणों से ब्लोगजगत पर ज्यादा समय नही दे पा रहा हूँ। उसके लिए माफी चाहूँगा और साथ ही आप सभी साथियों को नववर्ष की ढेरों शुभकामनाएं देना चाहूँगा।

Monday, December 7, 2009

अमिताभ जी और सुशील की जुगलबंदी की मुम्बई











ये मुम्बई हैं मेरे यार 

देख रहा हूँ
रेल की पटरियों पर
तारकोल की सड़को पर
लोगों को भागते-दोड़ते हुए।
हवा गाती नहीं इनकी साँसों में
हँसी नाचती नहीं इनके चेहरों पर।
रेल में बैठी लड़की की लटे हवा में लहरा रही
आँखे उसकी नींद की थाप पर झपक-झपक जा रही।
दो पंक्षी ढूढ़ रहे एक छोटा सा आशियाना
पर मिलता नहीं फुटपाथ का भी आसरा।
समुद्र किनारे गुमसुम बैठा एक बुजुर्ग दंपति
समुद्र की लहरों में अपने अतीत को ढूढ़ रहा।
ना जाने ये लोग जीवन का कौन सा सूत्र अपनाते हैं?
मुश्किल हालतों में भी जीने की लौ जलाते जाते हैं।

पिछले दिनों संयोग का धागा नीली छतरी वाले ने ऐसा बुना जो अमिताभ जी से जाकर मिला। वहाँ से आने के बाद ये तुकबंदी बनी। जिस पर अमिताभ जी ने अपनी उंगलियों का जादू चला दिया। और ऊपर वाला स्केच बना डाला। और ऐसे ये जुगलबंदी बन गई। वैसे मेरे से पहले अमिताभ जी ने मेरी इस मुम्बई यात्रा पर एक बहुत ही सुन्दर पोस्ट लिखकर, अपने ब्लोग पर छाप डाली। जिसका शीर्षक कुछ यूँ था। "सुशील जी की अमिताभ यात्रा" इस पोस्ट को पढ़कर उधर भी घूम आईए।

नोट- ऊपर दिये स्कैच को सही रुप से देखने के लिए उस पर क्लीक करें।

Monday, November 16, 2009

जिंदगी के रंग-सुशील के संग




संघर्ष का रंग- अभी हाथ नही गड़े धरती में मेरे







जिंदगी की शुरुआत संघर्ष रंग से ही होती है। बाकी के रंग जिंदगी में आते जाते रहते हैं। पर ये रंग आपकी जिंदगी से ऐसा रंग जाता है कि छूटता ही नहीं। फीका हो जाता है पर छुटता नही है। जिस घटना की इस रंग के रुप चर्चा कर रहा हूँ उससे ज्यादा मुझे किसी चीज के लिए संघर्ष नही करना पड़ा। बात उन दिनों की हैं। जब छोटी बहन की तबीयत ऐसी खराब हुई कि खिलखिलाते चेहरों पर उदासी का रंग चढ़ गया था। और जिस घर में खूब चहल पहल हुआ करती थी वो घर अब खामोश सा रहने लगा था। बसों में धक्के खाते हुए, सरकारी अस्पताल की लम्बी लाईनों में घंटो खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार करना। काफी दिन तो अलग अलग टेस्टों में ही गुजर गए। बस चंद दिनों में एक स्वस्थ बहन एक लकड़ी सी बन गई थी। सब कुछ छोड़कर बस मुझे यही सूझता था कैसे भी इसे बचाना है। तीन महीनों के बाद एक टेस्ट की रिपोर्ट आई जिससे बीमारी और दवाई का पता चला। खैर डाक्टर साहब ने दवाई लिख दी। जब दवाई लेने गए तो पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। इतनी तो इनकम भी नही जितनी की दवाईय़ाँ लिखी गई है। और ऊपर से तनखा भी समय पर नही मिलती थी पिताजी को। मुझे याद है जिस दिन तनखा मिलती थी पिताजी को उसी दिन आते ही मेरे हाथ में तनखा रखकर कहते थे "कल सुपर बाजार जाकर दवा ले आना" खैर दवाईयाँ चलती रही। नौकरी कर नही सकता था क्योंकि अस्पताल बहुत जाना पड़ता था। दिमाग में आया कि टयूशन पढ़ाया जाए और सरकारी नौकर बनने के लिए तैयार करनी चाहिए। उन दिनों जब भी वक्त मिलता था मैं हरदयाल लाईब्रेरी भी जाया करता था पेपरों की तैयारी के लिए। उस वक्त शायद मैं बीकाम की आखिरी साल की परीक्षा दे चुका था। समझ नही आता था जब सारी तनखा दवाईयों और दूसरे अस्पताल के खर्चों में चली जाती है तो घर कैसे चलता है। और टयूशन पढ़ाकर भी ज्यादा पैसे कमा नही पाता था। इसी बीच मुझे एक छोटा लड़का मिला जिसने मुझे ईमानदारी का पाठ पढाया वो भी उस वक्त जब पैसे की खातिर मेरे भटकने की गुंजाईश ज्यादा थी साथ ही गलत रास्ते पर भी जा सकता था क्योंकि पैसो की बहुत जरुरत थी। बात कुछ यूँ थी कि वह लड़का मेरे पास आया और बोला अंकल जी एक रुपया दे दो। भूख लगी है ब्रेड खाऊँगा। मैंने उसे दो रुपये का सिक्का दे दिया। फिर वह ब्रेड लेकर आया और मुझे इक रुपये का सिक्का वापिस देकर चला गया। भूख की खातिर भी वह लड़का नही भटका। और मुझे जिंदगी का एक नया पाठ और एक नया रंग दिखा गया। खैर दवाई चलती रही। पर बहन की तबीयत में बहुत मामूली सुधार दिख रहा था पर जैसी उम्मीद डाक्टर को थी वो सुधार कहीं नजर नही आ रहा था। डाक्टर के पास दवाई बदलने का चारा भी नही था। कोई सात महीने बाद अचानक मेरी निगाह नीचे पडी एक गोली पर पड़ी जोकि बहन के स्कूल बस्ते के पास थी। बस्ते को खोला गया तो आँखे फटी की फटी रह गई। उसके अंदर काफी गोली और केप्सूल रखे हुए थे। डाँट कर बहन से पूछा तो पता चला कि वो हमारे सामने एक ही गोली को खाती थी बाकी गोलियों को नहीं। बची दवाईयों को नाली में बहा देती थी और जिनको नही फैंक पाती थी उसे बस्ते में डाल देती थी। क्योंकि उसे वो दवाईयाँ कड़वी लगती थी। अजीब सी हालत हो गई थी हम सब की। खासकर पिताजी की। सारा पैसा पानी में चला गया। पहले ही इतना कर्ज हो चुका था। मैं सोचने लगा अब आगे क्या होगा। अगले दिन हम सब बैठे हुए थे तब मैंने पिताजी से पूछा अब क्या होगा पापा? उनका जवाब एक लाईन में आया अभी हाथ नही गड़े धरती में मेरे और बाहर निकल गए। आज भी कोई परेशानी आती है तो पिताजी के कहे ये शब्द मुसीबतों से लड़ने का ज़ज़्बा दे जाते है। बाद में डाक्टर ने कहा कि ये ही दवाईयाँ चलेगी उतने ही दिन। खैर छोटी बहन तब जी गई..............


शब्दों के रंग- जूझोगे तो जीओगे। 
आदमी को चाहिए वह जूझे, 

परिस्थितयों से लड़े 
एक स्वप्न टूटे, तो दूसरे गढ़े। 
                  -अज्ञात


हँसी का रंग- बंदर की पूछ 

किस्सा तब का है जब मैं 12वी क्लास में "धनपतमल बिरमानी स्कूल रुपनगर" में पढ़ा करता था। बात दिवाली के दिनों के बाद की हैं। जिस क्लास को दिवाली से पहले सजाया गया था। दिवाली के बाद उसी क्लास को सजाने में लगे समान को उतारा और खराब किया जा रहा था। मैं ज्यादा कुछ ना करके रंगीन कागज के रीबीन तोड़कर छुट्टी होने पर चुपके से दोस्तों के पीछे पेंट में लगा देता था और मैं गले में हाथ डालकर बस स्टेंड तक ले जाता था। स्कूल से लेकर स्टेण्ड तक के रास्ते में जो भी देखता वही हँसता। और मैं हँसी को ऐसे रोक रहा था जैसे छोटे बच्चे को शरारत करने से रोकते है। रोज कोई ना कोई मेरा शिकार बन रहा था। पर एक दिन क्या देखता हूँ। मैं बस स्टेण्ड पर खड़ा हूँ लड़कियाँ हँस रही है। मेरे अगल बगल खड़े साथी भी हँस रहे है। मामला समझते देर नही लगी, देखा तो आज मेरे पीछे बंदर जैसी पूँछ (कागज के रीबन) लगी हुई थी।

Saturday, November 7, 2009

प्रभाष जी, क्या सचमुच आप इस रविवार "कागद कारे" लेकर नही आऐंगे?

रविवार की सुबह "कागद कारे" का ऐसे इंतजार होता था।  
रविवार की सुबह देर तक मैं चाहकर भी सो नही पाता। क्योंकि रविवार है। और किसी चीज का इंतजार है। आँख खुलते ही मुँह से आवाज निकलती है पेपर। नीचे से कोई पेपर लेकर आता। पाँच पेपरों में से जिस पेपर की तलाश है उसे सबसे पहले निकाल संपादकीय पेज खोलता हूँ। जिस रविवार यह पेपर नही मिलता तो सुबह बासी सी लगती है। फिर बस एक आवाज निकलती है "जीतू"(छोटा भाई) वो पेपर कहाँ है।" नीचे से ही आवाज आती है "आज नही आया, पेपर वाला कह रहा था कि आज ये पेपर नही आया।" (पेपर वाला अक्सर यह पेपर नही लाता) मैं बिस्तर से निकल पड़ता हूँ। ना बाथरुम जाने की जरुरत, ना ही टूथ ब्रश करने की जरुरत। और ना ही नाशता करने की इच्छा। बस एक ही काम कि ये पेपर कैसे लाया जाए। फिर से जीतू को आवाज लगती। और वो पैर पटकता हुआ आता है और पैसे लेकर पेपर लाने के लिए बाईक से निकल जाता है। अक्सर घर में चर्चा रहती है कि ऐसा क्या है इस पेपर में जो हमें धक्के खाने पड़ते है। जब तक पेपर नही आऐगा ये बैचेन क्यों रहता है? थोडी देर बाद मेरी आवाज फिर से गूँजती है "क्या हुआ अभी तक पेपर नही आया। कितनी देर हो गई। पेपर लेने गया है या अमेरिका गया है। कल से इस पेपर वाले को बदल दो, .... एक यही पेपर नही लाता बाकी सब ले आता है, नही चाहिए मुझे ऐसा पेपरवाला.....................। फिर घर का एक सदस्य कहेगा कि "तसल्ली भी रखा करो।" फिर दूसरा सदस्य कहेगा "पेपर पेपर पेपर..., पेपर हो गए या ......."पर माँ तो माँ होती है ना" आ गई अपने बड़े बेटे का पक्ष लेने। और बोलने लगेगी "एक पेपर नही ला सकते तुम, मैं तो अनपढ ठहरी, नही तो खुद जाकर ले लाती।" वो पेपर कोई और नही "जनसत्ता" है। और उस पेपर के जिस कालम को पढने के लिए मैं सुबह सुबह बैचेन रहता हूँ वो कालम है "कागद कारे" बाकी के सारे काम इसको पढने के बाद .................

आज का दिन

आज "जनसत्ता" आया हुआ है। पर प्रभाष जी के जाने की खबर सुबह किसी समाचार चैनल से मिली। एकदम से स्तम्भ रह गया। और एकटक टीवी को देखता रहा। पर फिर अपनी भावानाओं पर काबू पाया। ना जाने कैसा रिश्ता था मेरा और उनका। कभी कभी सोचता हूँ तो लगता है कि शब्दों और विचारों का एक रिश्ता है। एक भावनात्मक रिश्ता। पता नही कब कैसे "कागद कारे" से परिचय हुआ और एक रिशतें में बदल गया। उनके लिखे "कागद कारे" कभी होंसला दे जाते, कभी कुछ सीखा जाते, कभी अनदेखी तस्वीर को देखा जाते, कभी आँखो में आँशु ले आते और कभी जीने का जज़्बा दे जाते। उनके लिखे शब्दों से मिट्टी की खूशबू आती है। उनका "अपन" शब्द अपना सा लगता है। उनकी खरी खरी बातों ऊँचे ओहदों पर बैठे लोगो की जमीन को हिला जाती है। पता नही उनके लिखे कितने लेखों की कटिंग आज भी फाईल में लगी हुई है। आज जब उस फाईल को निकाला तो उनके शब्दों और विचारों की लहरों में बहता चला गया। कई बार प्रभाष जी से आमना सामना पर कभी बात नही हुई। सोच रहा हूँ कि परसो रविवार है। क्या सचमुच "कागद कारे" नही आऐगा? क्या अब भी मैं रविवार की सुबह का बेसर्बी से इंतजार करुँगा? उस बैचेनी का अब क्या होगा? प्रभाष जी अब कौन हर रविवार सुबह मेरे संग बैठकर चाय पीऐगा। इस रविवार सुबह जनसत्ता तो आऐगा, प्रभाष जी क्या आप सचमुच नही आऐंगे?...................................

प्रभाष जी की खरी खरी जिसके हम कायल थे।


कहते है आज अगर बालको उधोग खड़ा किया जाता तो उसमें कम से कम पाँच हजार करोड़ रुपय लगते। बालको के इक्यावन प्रतिशत शेयर यानी उसकों चलाने की मिलकियत और उस पर नियंत्रण साढे पाँच सौ करोड रुपयों में स्टारलाइट कंपनी को सौंप दिया गया। इस उधोग के पास अपने दो बिजली घर है जिनमें प्रत्येक पाँच सौ करोड़ का माना जाता है। विनिवेश मंत्री अरुण शौरी ने सब आंकड़े बताए लेकिन मानने वाले नहीं मानते कि यह सौदा साफ और पारदर्शी है। छतीशगढ के मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री निवास के एक असंवैधानिक सत्ता केंद्र ने सौ करोड़ रुपय इस सौदे में लिए है। लेकिन अरुण शौरी इसे बकवास बताते है। वीपी सिंह और बोफर्स वीर अरुण शौरी अब तक नहीं बता सके कि वे चौंसठ करोड़ किसने खाए? पंद्रह साल हो गए। लेकिन बालको के सौदे में कोई गडबड वे नही देखते। अरुण शौरी जब पत्रकार हुआ करते थे तो गाँधी के लंबे-लंबे उद्धरण दे-देकर राजनेताओं को कोड़े मारा करते थे। क्या बालको स्टरलाइट कंपनी को इसलिए सौंपा गया है कि उसके मालिक ने गाँधी के टृस्टीशिप सिद्धांत को मान लिया है? तब एक लेख में नेताओं को दुतकारते हुए अरुण शौरी ने लिखा था- काके ये थूक के चाट जाएंगे। उनके मुहावरे और मंतव्य को अब उन्हीं पर लागू किया जाए तो कहना पड़ॆगा- काके, ये विश्व बैंक के पले-पनपे एडम स्मिथ के सपूत है। ये गाँधी को थूक कर हेडगेवार को चाट जाएंगे। बालको, तुम देखना ये बड़ी ईमानदारी से देश को बेच खाएंगे।


नोट- ऊपर बाक्स में लिखा हुआ अंश प्रभाष जी के एक लेख से लिया गया है जो जनसत्ता में छपा था। जिसकी कटिंग मेरे पास है और वहाँ से उतारा गया है। इसलिए "जनसत्ता" पेपर का शुक्रिया। और फोटो गूगल और रविवार डाट काम से लिया गया है। साथ ही ये पोस्ट कल लिखी गई थी पर किन्हीं कारणों से आज पोस्ट की जा रही है।

Monday, October 26, 2009

अब वह मरीज कभी दरवाजा खटखटाने नहीं आएगा।

लतिका रेणु जी का फणीश्वरनाथ 'रेणु' जी पर लिखा अंतरंग संस्मरण ।

भागलपुर जेल से कुछ राजनीतिक-बन्दी पटना अस्पताल में इलाज के लिए भेजे गए थे। मैं यहाँ नर्स-इंचार्ज थी। थोडे दिनों में इलाज कराकर वापस भेज दिए गए। एक दिन वार्ड का चक्कर लगाते हुए देखती हूँ, भागलपुर जेल से आए कुछ सिपाही आपस में गप्पें मार रहे है। मैंने उनसे पूछा, "आप लोगो के साहब लोग तो चले गए, फिर आप सब अब तक यही हैं?" "एक साहब अभी है" एक सिपाही ने बेड की तरफ इशारा करते हुए कहा। मैंने देखा एक बढ़ी दाढी और बालवाला दुबला-पतला नौजवान आँखे बन्द किए पड़ा है। मेरे कुछ पूछने पर उसने आँखें खोलीं, और मुझे मिनटों देखता रहा। कुछ बोला नहीं। मैं आगे बढ गई। शाम को एक नर्स ने आकर बताया- भागलपुर जेल से आया राजयक्ष्मा का वह बन्दी मरीज मेरे बारे पूछ रहा था। पहले तो मरीज खुद ही पूछ लिया करता था, बाद में कुछ स्वास्थ्य सुधरा तो पर्ची पर लिखकर किसी के मार्फत भिजवाता-" आप मुझे देखने क्यों नही आतीं।" मैं जाती। बहुत पूछने पर अपनी तबीयत के बारें में दो एक बात बतलाता और चुप। उसकी आँखो में जी पाने की लालसा झलकती होती थी और कई बार तो उस मासूम से चेहरे को देखकर मैं सोचती यह आदमी, इस कदकाठी और उम्र का क्रांतिकारी भी हो सकता है? डा. बनर्जी की देखरेख में मरीज एक दिन ठीक-ठाक होकर वापस भेज दिया गया। बाद को, साल छह महीने में कभी अस्पताल में ही वह दिख जाता। देखकर सोचती, किसी को देखने आया होगा, लेकिन तब क्या जानती थी कि वह मुझे ही देखने पूर्णिया से यहाँ चला आता है। बस, वैसे ही चुप, नि:शब्द वार्ड के इधर-उधर विचरकर वापस हो जाता। कभी नजरें मिलतीं तो मैं महज औपचारिकतावश पूछ लिया करती,"आपनी ठीक-ठाक तो?" " हाँ..." बहुत संक्षिप्त सा उत्तर। एक बार मिला तो कहने लगा-" देखिए, मैं स्वस्थ नजर आने लगा हूँ न? डाक्टर ने कहा था, घर जाकर खूब आम, दही, दूध, मछली खाओ, सो मैंने अपनी खुराक बढ़ा दी है और ....... मरीज सचमुच स्वस्थ नजर आ रहा था। मैंने कहा " इसी तरह खाने पीने पर ध्यान रखना होगा।" और वह हँसने लगा था। चार वर्ष बाद एक दिन एक नर्स ने मुझे एक पुर्जा थमाया-" मैं फिर बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हूँ, आप मुझे देखने नही आएँगी?" और देखने गई, सुना बीमारी अबकी बढ गई है, मुँह से खून गिरता है, मैंने कहा-" आपने बदपरहेजी की?" " इस बार मैं बचूँगा नहीं" -मेरे सवाल के बदले हताश होकर उसने कहा। तो मैंने सांत्वना दी-" ठीक-ठाक रहिए, आप जरुर बचेंग़े" जाने दुबारा उसे देखकर मन को कैसा तो लगा था, शायद यही कुछ कि इसे बचना चाहिए। पिछली बीमारी से वापस जाने के बाद, बीच-बीच में उसका आकर मिलना, अपने स्वास्थय के बारें मेरे हल्के फुल्के निष्कषों पर खुश होना उसे अच्छा लगता था और अच्छी लगने वाली उस बात ने ही शायद उसके मन में मेरे लिए स्नेह के बीज बो दिए थे। दुबारा भर्ती होने पर मेरी सांत्वना के बदले कहा- " इस बार बच गया तो फिर जीवन में कभी बदपरहेजी नहीं करुँगा।"

उसके ठीक-ठाक होकर अस्पताल से निकलने तक जाने क्यों मेरे मन में भी मोह पैदा हो गया, और हम दोनों एक-दूसरे को ज्यादा समझने लगे थे। वह अनजान मरीज मेरे मन में अपने लिए श्रद्धा जगाकर खुद वह यह पालने लगा था कि मरणांतक दौरे से उसे डाक्टर और दवा ने नही, मैंने बचाया है। वह वापस अपने गाँव लौट गया। इस बार बीच-बीच में उसके पत्र मिलते रहे। कभी मैं भी लिख देती। फिर एक दिन परिवार वाले उसे अस्पताल ले आए। सुन-देख कर पहले तो गुस्सा आया लेकिन उसका सूना, सपाट और म्लान चेहरा देख, खुद ही सहम गई। "इस बार, अब और बचने की उम्मीद नहीं"- मेरे आक्रोश के बदले उसकी आँखो से आँसू झरने लगे थे। होंठ नि:शब्द। एकांत मे जाकर आदिशक्ति माँ को याद किया-"या तो इसे पूर्ण स्वस्थ कर दो, या उठा लो माँ। बार बार क्यों?" पिछले वर्षों में आत्मीयता का एक रिश्ता जुड़ा था सो साधिकार डाँटा-डपटा-" हर बार मरने लगते हो तो यहीं एक जगह देखी है?" "और कहाँ जाऊँ?" भरे गले से उसकी आवाज निकली थी। नही कह सकती, उसके इस एक वाक्य ने मुझे किस गहराई तक बाँध डाला था मैं करती भी क्या सेवा में जुटी। डयूटी के अलावा जो समय बचता, उसी के पास बैठी होती। अपने हाथ का बना खाना उसे खिलाती, उसके कपड़ॆ, शरीर साफ करती, उसके लिए प्रार्थनाएँ करती-बचा लो माँ। और बचा, यानी स्वस्थ हुआ तो एक दिन जिद पकड़ बैठा-" अब कहीं नहीं जाऊँगा। यही रहूँगा, तुम्हारे पास।" मैंने समझा, भावुकता में बोल रहा है।  एक शाम डेरे से खाना लेकर अस्पताल जाने की तैयारी में थी, कि वह अपना सामान रिक्शा पर लादे पहुँचा-"अस्पताल से डिस्चार्ज-सर्टिफिकेट ले लिया है, और सचमुच मुझे अब कहीं नहीं जाना है।" उस बाल सुलभ जिद का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था- ठीक है बाबा। शादी की बात तय हुई तो मैंने अपने बड़े भाई को खबर की। उन्हें सारी जानकारी मिली तो समझाया-" इतने भयानक मरीज के साथ शादी मत करो।" लेकिन मुझे अपने निर्णय पर अडिग देख वह झुके और 5 फरवरी 1952 को मेरे मकान पर हम दोनों की विधिवत शादी हो गई। शादी के दिन उनकी शारीरिक हालत कैसी थी -जानते है "इतने कमजोर, कि शादी की तमाम रस्में उन्होंने दीवार से टिककर पूरी कीं। हम कुछ महीनों के लिए औराही-हिंगना गए। मैंने पहली बार उनका गाँव-घर देखा। पटना आए तो जिद पकड़ ली- "तुम नौकरी छोड़ दो।" लेकिन जब तक कोई आर्थिक विकल्प नहीं मिलता, मैं नौकरी कैसे छोड़ देती? अजीब पसोपेश में थी कि एक दिन उन्होंने फैसला सुनाया-" अब मैं लिखूँगा। जीने के लिए विकल्प तो ढूढ्ना ही होगा, लेकिन मुझे तुम्हारी नौकरी पसन्द नहीं।" और "मैला आँचल" लिखने की शुरुआत वहीं हुई- सब्जी बाग स्थित मकान पर। "मैला आँचल" के डा. प्रशांत की कल्पना उन्होंने डा. प्रसून बनर्जी- डा. टी.एन. बनर्जी के लड़के, जो तब हाऊस सर्जन थे, के व्यक्तितव, चलने, हँसने, बोलने के अन्दाज से ली। ममता के रुप में मुझे खींचा और कमली के रुप में गाँव वाली पत्नी पदमा जी को। बाकी की पृष्ठभूमि रही उनका ग्रामीण क्षेत्र। एक वर्ष में जब लेखन पूरा हो गया तब समस्या खड़ी हुई उसके प्रकाशन की। उन दिनों यहाँ रामेश्वर बाबू का यूनियन प्रेस हुआ करता था। तय हुआ, खुद ही छापेंगे। रामेश्वर बाबू छापने पर सहमत हुए। शर्त यह रखी गई कि सात सौ रुपए का कागज पहले देंगे, छपाई के नौ सौ रुपय धीरे धीरे उपनयास बेच कर सधा देंगे। और "मैला आँचल" छप गया।

छपने के बाद रामेशवर बाबू के पैंतरे बदले। कहा, रुपए दीजिए तब उपन्यास को हाथ लगाने देंगे। एक शाम लौटे तो दुखी थे- "मैला आँचल" बिक रहा है, और मुझे बताया नहीं जाता। कोई बात नहीं, दूसरा लिख दूँग़ा। मैंने कोई सलाह दी तो खीझ उठे- "पैसा ही तुम्हारे पास कि बची प्रतियाँ उठा लाऊँ? दो हजार रुपए की माँग करते हैं वे।" मैंने इधर उधर से रुपए जुगाड किए और 'मैला आँचल' की सही सलामत और दीमक खाई प्रतियाँ तक घर में रख दी गई। एक दोपहर राजकमल प्रकाशन के मालिक ओमप्रकाश जी घर ढूँढ़ते हुए पहुँचे। रेणु थे नहीं, ओमप्रकाश जी स्लिप छोड़कर चले गए- "वह आएँ तो कहिऐगा, मैं डेढ़ दो घंटे में फिर आऊँगा। दिल्ली से उन्हीं से मिलने आया हूँ। लौटे तो ओमप्रकाश जी की स्लिप देखकर कूदने लगे " बहुत बड़े प्रकाशक 'मैला आँचल' छापने की अनुमति लेने आए हैं।" शाम को ओमप्रकाश जी, मैं और इनमें बातचीत हो ही रही थी कि नागार्जुन जी श्री श्यामू सन्यासी को लेकर पहुँचे। 'मैला आँचल' इन्हें चाहिए। और लीजिए, मोल-भाव शुरु। दो दो प्रकाशक इकटठे - किस दें न दें। वह मुझे अन्दर के कमरे में ले गए। कहा- फैसला तुम्हीं पर छोड़ दूँगा। तुम्हारा पैसा लगा है। कहना-'मैला आँचल' हम ओमप्रकाश जी को ही देंगे। बाहर आकर कहा- "छपवाने में सारा पैसा लतिका जी का खर्च हुआ है, सो यही जाने, किसे देंगी।" मैंने फैसला सुनाया तो नागार्जुन जी दुखी हुए। सन्यासी जी दुगनी रायल्टी देने पर तैयार हो गए, लेकिन मैने कहा- "जो हो गया, हो गया।" और रात को ओमप्रकाश जी ने बची प्रतियों का बंडल बाँधा, रिक्शे पर लादा, स्टेशन चले गए। इस तरह वह उपन्यास लोगों के सामने आया। 1973 में दिल्ली गए। डा आत्मप्रकाश ने इलाज किया। कहा आपरेशन करवा लीजिए। वापिस आए तो चीर-फाड़ के डर से फिर वहाँ नही गए। 4 नवम्बर को घर जाने लगे। मैंने कहा -"आज गुरुवार है, यात्रा पर निकलना शुभ नहीं।" "घर जाने में यात्रा का शुभ अशुभ कैसा?" कहकर मुझे तो चुप कर दिया, लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ था। अच्छे बुरे का योग मानने वाले उनको आज यह कैंसी झक सवार हो गई? शुभ अशुभ बहुत मानते थे। घर गए तो चुप्पी लगा दी- न चिट्ठी न पत्री। जैसी पुरानी आदत थी। किसी ने आकर खबर दी, गाँव में बुरी तरह बीमार है, फार्बिसगंज लाया गया है खून चढ़ाया जा रहा है। बाद को टैक्सी में पटना लाए गए। देखा- स्लाइन की बोतलें साथ लगी हैं, साथ में डाक्टर, कम्पाउण्डर, घर का नौकर, दो एक और लोग। पेट कड़ा हो गया था, पाखाना-पेशाब बन्द। डाक्टर ने कहा है "तुरंत आपरेशन।" तो मन में हुआ इतनी जल्दी आपरेशन क्यों? थोड़ा ठहर लेते हैं। 1969 में भी हालत ऐसी ही हो गई थी- लगातार तीन दिन, तीन रात हिचकी आती रही, खून-ग्लूकोज चढ़ाया गया तो ठीक हो गये। इस बार भी मैंने ग्लूकोज चढ़्वाया तो पेशाब हुआ। लगा ठीक हो रहे हैं। पर होमोग्लोबिन बहुत कम था। डाक्टर ने कहा " होमोग्लोबिन सौ प्रतिशत हो जाए तब आपरेशन करेंगे।" हीमोग्लोबिन ठीक हुआ तो आपरेशन की तारीख तय कर दी गई। चुनाव की घोषणा हो चुकी थी, सो कहा- अब चुनाव के बाद ही। आपरेशन की तारीख से पहले अस्पताल से भागकर डेरे आ गए। काफी हाऊस जाना, चुनाव-कार्यालय में बैठना। चुनाव को लेकर बहुत उत्साहित थे। चार दिनों तक यह सब चला और फिर पाँचवे दिन उल्टी शुरु। फिर अस्पताल पहुँचाया गया। आपरेशन से बहुत डरते थे, सो इरादा था किसी तरह छुटकारा मिले, लेकिन कष्ट बढ़ा तो कहा- "नहीं, अब करा ही दूँगा।"

डाक्टर से 24 अप्रैल की तारीख तय कर दी। 24 तारीख गुरुवार था। मैंने याद दिलाया तो बोलें- "कोई बात नहीं, हो लेने दो। मुझे कुछ नहीं होगा।" ऊपर-ऊपर बुलन्दी थी लेकिन अन्दर ही अन्दर नर्वस हो रहे थे। सुबह में कहा-" कोकाकोला पीऊँगा।" मैंने मना किया। "कोकाकोला पी लेने में क्या है? आपरेशन में तो पेट चीर कर डाक्टर निकाल ही देगा।" फिर भी मैंने नहीं दिया तो बोले-"रामवचन जी को कह दिया है, आइसबैग ले आने को। कोकाकोला उसमें रखना, होश आने पर पीऊँग़ा।" और होश क्यों कर आता? सप्ताह से ज्यादा बेहोशी की हालत में गुजर गए तो एक दिन कोकाकोला की दो चार बूँदे मैंने होठों पर टपकाई। वे इधर उधर होकर फैल गई। उसके खाने पीने की बच्चों वाली जिद। क्या कहूँ? दो चार दिन बीमार होकर उठते तो जिद पकड़ लेते- कई दिन हो गए चिकन मँगवाओ। नहीं मँगवाओ तो पथ्य नहीं लूँगा, यह नहीं खाऊँगा, वह नहीं खाऊँगा और न जाने क्या क्या ......... अब सोचती हूँ तो लगता है अब से तैंतीस वर्ष पहले मृत्यु के कगार पर खड़े एक मरीज को मैंने देखा था। उसकी सेवा की थी। यह नहीं कहती कि उसे जीवन दिया था। मैं ऐसा कहने वाली कौन होती हूँ? तब से लेकर आज 11 अप्रैल की 1977 रात तक उसे अनवरत सेती रही और अंतत: वह चला गया। मैं किससे कहूँ कि इतने वर्षों की इस सेवा ने मुझे क्या दिया? जब तक जीवित हूँ, उनकी याद सेती रहूँगी- दो कमरों का यह फ्लैट , दीवारों पर लगी उनकी तस्वीरें, उनके दैनिक उपयोग के सामान और पुस्तकें...... यही सब छोड़ कर तो गए हैं वह - पिछले तैंतीस वर्षों की भुलाई न भूलने वाली यादें। आज भी लोग आते है। दरवाजे की कुण्डी खटकती है लगता है शायद वह ही हों।
"के?".............. पूछती हूँ।
जवाब में "आमि.... आमरा....... जैसे शब्द नहीं होते। अब वह मरीज कभी यह दरवाजा खटखटाने नहीं आएगा। दरवाजा, चाहे तीमारदार लतिका का हो, या खुद फणीश्वरनाथ 'रेणु' का।

नोट- लतिका रेणु जी का फणीश्वरनाथ 'रेणु' जी पर लिखा यह अंतरंग संस्मरण "रेणु का जीवन" किताब से लिया गया है जिसका संपादन किया है "भारत यायावर जी" ने और छापा है "वाणी प्रकाशन" ने। इन सबका शुक्रिया कहते हुए साथ में माफी भी चाहूँगा क्योंकि पोस्ट ज्यादा बड़ी हो रही थी इसलिए कुछ लाईनों को हटाना पड़ा। पर जब से इस संस्मरण को पढ़ा तो तब से बैचेन हो रहा था इसे ब्लोग साथियों से बाँटने के लिए।

एक सूचना- आगे से "जिदंग़ी के रंग" वाली पोस्ट महीने के पहले और तीसरे सोमवार को ही पेश की जाऐगी।

Wednesday, September 9, 2009

रिश्तें नाते

रिश्तें

रिश्तों के धागे उधड़ने लगे हैं
ना जाने कैसे रिश्तें बनने लगे हैं।

खेले थे जिनकी गौद में कभी
अब वही भारी होने लगे है।

सोचा था बुढ़ापे में मिल जाऐगी दो रोटी
अब तो रोटी के साथ ताने भी मिलने लगे हैं।

कैसी अजब समय की घड़ी है
पैसे रिश्तों को सीँचने लगे है।

कल मिला "सुशील" रास्तें में, बोला
"अब तो माँ बाप के भी बँटवारे होने लगे हैं।"


कुछ दिनों से कुछ घटनाओं को देख कर मन विचलित सा था। सोच रहा था आप साथियों से साँझा कर लूँ। पर दिमाग में शब्द घूम रहे थे पर कागज पर उतरने से मना कर रहे थे। पर कल रात 1 बजे अचानक ही ये शब्द निकलते चले गए और ये तुकबंदी बन गई। पहले सोच रहा था एक लेख लिखूँगा इन घटनाओं पर, पर लिख नही पाया। उससे पहले ही ये तुकबंदी बन गई। देखिए वो लेख कब आता है?

नोट- नैना की पोस्ट को भी देखा जाए जोकि सीधे हाथ पर सबसे ऊपर हैं।

Wednesday, August 19, 2009

दो बीघा का किसान

किसान

मैं दो बीघा का किसान
पालता तीन मवेशी, पाँच इंसान
एक कच्चा मकान टूटा सा
जिसमें खड़ा एक पेड़ बुढ्ढा सा
रामजी हमारे रुठे है
खेत हमारे सूखे है
कुएँ सूखने लगे
चूल्हे बुझने लगे
चारा खत्म
दाना खत्म
पेट उधारी से भरता है
पंसारी रोज तगादा करता है
पत्नी यह देख रोती है
बच्चों की जबान सोती है
फटी धोती, टूटी जूती में मेरी टाँगे
सूखे खेत का रुख करती हैं
धोक लगाकर अपने देवताओं की
मैं बस यही पुकार करता हूँ
रामजी अगर तुम बरस जाओ
खेत हमारे जी जाऐगे
फसल हमारी खिल जाऐगी
कर्ज की गठरी उतर जाऐगी
सपनो की पतंग आसमान छू जाऐगी

अमिताभ जी रोज कहते कुछ लिखो यार तो जी हाजिर है आपके लिए।

Monday, August 10, 2009

बेटी की बातें

बिल्ली दौड़ चूहा आया

साथियों नैना बेटी ने मेरा नया नाम बिल्ली ही रख दिया है। जब भी मेरे साथ खेलती है बस बिल्ली ही पुकारती है। बिल्ली अब दूसरा गेम खेलते है। बिल्ली अब चीडिया उड़ी,भैंस उड़ी खेलते है। बिल्ली अब चूहा दोड़ बिल्ली आई खेलते है ..........। जैसे ही खेल कर खत्म फिर से वही पापा जी। अजी मेरा नाम ही नही उसने तो अपने चाचा का नाम भी मीना रख दिया है। एक दिन शाम को जब आया तो देखा नैना अपने चाचा को बुढढा( उनके बाल अभी से सफेद होने लगे है) कह रही थी मैंने कहा "बेटा ऐसे नही कहते वो आपके चाचा है।" कहने लगी "पापा जी जब वो मेरे को मोटी बोलेगे तो क्या मैं बुढ्ढा ना बोलूँ। अगर वो मुझे नैना जी कहेंगे तो मैं भी उन्हें चाचा जी बोलूँगी।" खैर उनकी ये लड़ाई ऐसे ही चलती रहती है। जिस बचपन को हम जिदंग़ी की गलियों में भूल जाते है उसे हम अपने बच्चों के बचपन में देखते है। कुछ ऐसा ही है हो रहा है आजकल। उसकी छोटी छोटी बातें, शरारतें, जिद सब देखता सुनता हूँ। कभी देखकर हँसता हूँ। कभी गुस्सा भी हो जाता हूँ। और कभी भावुक हो जाता हूँ। और फिर अपने बचपन को याद करने की कोशिश करता हूँ तो बस दो यादें ही आँखो के पर्दे पर चलती है नर्सरी क्लास की। एक हम बच्चों को खूब सारे बिस्कुट खाने को मिलते थे। दूसरी एक दिन मै पापा जी की घंडी बाँध कर चला गया। मैडम ने देख लिया और घड़ी उतार ली। फिर जो मार पड़ी मम्मी से बस पूछो नही। बस इन दो यादों के अलावा कुछ याद नहीं। पर मैं इसकी खूब सारी यादें संजोकर रख लेना चाहता हूँ। जिस दिन स्कूल गई सब खुश थे क्योंकि घर में और बच्चें नही है और नैना बच्चों के साथ खेलने के लिए कई बार रोती है। कोई बच्चा अगर हमारे घर किसी काम से आ जाए तो समझो उसे वह नही जाने देती है। हमको इस बात की तसल्ली है कि इस बहाने कम से कम बच्चों के संग खूब खेल सकेगी। उनसे खूब सारी बातें भी कर सकेगी। उसकी मासूम सी बातें मेरे दिल को छू जाती है। एक दिन तबीयत ठीक नही थी मैं लेटा हुआ था वो आई और कहने लगी "पापा जी ये लो चने खा लो" मैंने कहा "बेटी मैं बाद में खा लूँगा मेरी तबीयत ठीक है थोडी देर सोने दो" और चने रखकर मेरे पैरों के पास रखी चदर को मुझे उढ़ाने की कोशिश करने लगी। पर मैने कहा बेटी रहने दो मैं खुद ही ओढ लूँगा। यह देख आँखे भर आई। ऐसे ही काफी दिनों पहले मैं पी सी पर बैठा कुछ काम कर रहा था। उसे बेड पर रखा केला नजर आ गया वह उसे उठाकर छीलने लगी। अक्सर उससे केला छिलता नही था पर उस दिन उसने वह केला छील दिया तो मेरे पास आकर बहुत खुश होकर बोली "पापा जी मैंने केला छील दिया मैं बड़ी हो गई।" देखो जिदंगी कैसी है हम बच्चें होना चाहते है और बच्चें बड़े होना चाहते है। सच वो अब बड़ी हो गई है दादी माँ सी बातें करने लगी है। एक दिन इसका चाचा इसके लिए छोटा सा केक ले आया तो मैंने कहा "बेटी मुझे भी दे दो" तो कहने लगी "इसे बड़े नही खाते बच्चें खाते है" और जल्दी जल्दी सारा केक खा गई। जब से स्कूल जाने लगी है मैडम भी हो गई है। अपनी मम्मी से कहती है "मैं मैडम हूँ बताओ ऐ फोर क्या होता है। उसकी मम्मी बोलेगी ऐ फोर आलू होता है।" फिर नैना बोलेगी "अरे बुद्धु ये भी नही आता ऐ फोर एप्पल होता है।" ऐसे ही वो हम सबको पढ़ाती फिरती है। स्कूल जाने के दो तीन बाद उसे छोटे छोटे बाल गीत याद होने लगे। फिर क्या हर रोज एक नया बाल गीत सुनाती है हम सबको। पर सबसे पहले वह अपनी पसंद के दो बाल गीत सुनाती है फिर बाकी के बाद में। तो लीजिए आप भी पढ़िए उसकी पसंद के दो बाल गीत।












बन्दर मामा
देखो आये बन्दर मामा,
कुर्ता ढीला तंग पजामा।
ठुमक-ठुमक कर नाच दिखाते,
माँग-माँग कर पैसे लाते।

चन्दा के घर जाऐगी गुड़िया
चन्दा के घर जायेगी गुड़िया
दूध मलाई खायेगी गुड़िया,
ब्यूटीफुल बन जायेगी गुड़िया।
तारों के संग आयेगा दूल्हा,
चन्दा के घर जायेगी गुड़िया।

सच एक दिन नैना ऐसे ही हँसती खेलती हुई अपने चंदा के घर चली जाऐगी अपने बाबुल का घर छोड़कर। और हमारे पास बस उसकी यादें रह जाऐगी कभी खूब हँसाने के लिए, कभी उसकी याद दिलाने के लिए और कभी क्या अक्सर रुलाने के लिए। इससे पहले कि मेरी आँखे बोलने लगे जल्दी से उसकी एक पहेली का जवाब दीजिए जो वो मेरे से अक्सर पूछती रहती है और उसकी माँ उसे बताती रहती है।
"कटोरे में कटोरा बेटा बाप से भी गौरा" बताओ बताओ जल्दी से सोच कर बताओ। हम चले।

Tuesday, July 14, 2009

उठ जाग मुसाफिर

उठ जाग मुसाफिर


उठ जाग मुसाफिर
सुबह को ना जागा , अब तो जाग
जीवन की दोपहर होने को आई है।

सुन साथी
दुनिया पहुँची मंगल पर
फ़िर क्यूं तू ठहरा पेड़ की छाँव में
देख , परख , चल उठ
उठ जाग मुसाफिर
सुबह को ना जागा , अब तो जाग
जीवन की दोपहर होने को आई है।

सुन साथी
किस गली गुम हो गये तेरे सपने
किस कर टूट गये माँ बाप से किये वादे
किधर खो गई तेरी इन्कलाबी बातें
"किसान है कमजोर, आम जन है बीमार और व्यापारी रहते सदा जवान।
इसलिए नही होती कोई क्रांति अपने देश "
सोच समझ , चल दिल में भर इक जोश
उठ जाग मुसाफिर
सुबह को ना जागा , अब तो जाग
जीवन की दोपहर होने को आई है।

सुन साथी
शरीर क्या है। इक मिटटी
आत्मा क्या है। इक अमर तत्व
तू क्या है ? तू क्या होगा ?
इक मिटटी या इक अमर तत्व
शेष अभी भी दोपहर और शाम
चल बढ़ा फ़िर से एक कदम

नोट- बस यूँ ही एक बार फिर से।

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