Sunday, August 7, 2022

फ्रेंडशिप डे

एक हमारे 'जाट यार' थे. थे क्या अब भी हैं. बात स्कूल के दिनों की है. हमारी क्लास के एक दोस्त 'सरदार' भी थे. नाम था 'गुरुदर्शन सिंह'. हम तीनों ही अधिकतर बार '234 नंबर बस' से स्कूल आते थे. जोकि दिल्ली के 'लखनऊ रोड़' से निकलकर. 'खालसा कॉलेज' से होते हुए 'कर्मपुरा' जाती थी. लेकिन हम 'रूपनगर' वाले स्टैंड पर उतर जाते थे. अक्सर उन दोनों के बीच किसी ना किसी बात पर बहस हो जाती थी. बहस के बाद 'गुरुदर्शन सिंह' उसे 'और जाट, सोलह दुनी आठ' कहकर चिढ़ाता था. और 'जाट यार' उसे 'दूरदर्शन' कहकर चिढ़ाता था. 'गुरुदर्शन सिंह' का साथ 12 क्लास के बाद छूट गया. लेकिन 'जाट' यार बनकर जुड़े रहे. अभी तक जुड़े हुए हैं.


धीरे-धीरे हम बड़े होते गए. 'जाट यार' अब चौधरी हो चुके थे. लोग उन्हें अब चौधरी साहब कहने लगे थे. और एक मैं था कि लोग 'गुर्जर' भी नहीं मनाते थे! गुर्जर दोस्त कहते थे कि साले तू तो हमारी गुर्जर कौम पर कलंक है! खैर चौधरी से एक किस्सा याद हो आया. इस किस्से के आपां साक्षी नहीं हैं लेकिन है सच.

किस्सा कुछ यूं है. 'जाट यार' की दोस्त मंडली में से किसी को पैसे की जरुरत आन पड़ी. वो 'जाट यार' के दूसरे साथी के पास आकर कहने लगा कि इतने पैसे की जरुरत है. अगर हो सके तो दे दो. मैं कुछ दिन में लौटा दूंगा. लेकिन जिससे पैसे मांगे जा रहे थे उसके पास पैसे नहीं थे. उसने मना कर दिया. परंतु पैसे मांगने वाले को एक रास्ता सूझा दिया कि चौधरी साहब से मांगकर देख ले. उसके पास होंगे. तो दे देगा. अगर नहीं होंगे तो भी वो किसी से मांग कर तेरी जरुरत पूरी कर देगा. लेकिन ये ध्यान रखियो. 'नाम लेकर या भाई कुछ पैसे चाहिए.' कहकर पैसे मत मांग लेना. और अगर तू ये कहेगा कि चौधरी साहब कुछ पैसों की जरुरत है. कैसे भी करके पैसे चाहिए. तो वो कहीं से भी पैसे लाकर दे देगा. उस लड़के ने वैसा ही किया. हमारे 'जाट यार' को चौधरी साहब सुनना अच्छा लगता था. 'जाट यार' चौधरी साहब कहने पर पिघल गए और उसे किसी से पैसे उधार लेकर दे दिए. और उसका काम बन गया. ऐसे थे हमारे 'जाट यार.'

एक और किस्सा है उस 'जाट यार' का. जिसका मैं खुद साक्षी रहा हूं. दरअसल हुआ कुछ यूं कि एक मेरे दोस्त हैं. पैरों से चल नहीं सकते तो चार पहिए की गाड़ी का इस्तेमाल करते हैं. एक वक्त था जब उनके पास अच्छा खासा पैसा हुआ करता था. पिता जी की अच्छी खासी सैलरी थी. घर से बिज़नेस भी कर रहे थे. लेकिन फिर इनके पिताजी की एक एक्सीडेंट में मौत हो गई. और बिज़नेस भी खत्म हो गया. किराए से घर चल रहा था. खैर! एक दिन हुआ कुछ यूं कि इनके जीजा जी की भी मौत हो गई. खबर लगने पर मैं उनके घर गया. पता लगा इनकी जेब में पैसे नहीं. ये करें तो क्या करें. मैंने अपनी जेब टटोली तो उसमें भी कुछ ज्यादा पैसे नहीं. खैर जाट यार को फोन किया गया. वे मेरी वजह से इन्हें जानते पहचानते थे. दोस्त जैसा संबध तो नहीं कह सकते लेकिन दोनों के बीच दुआ-सलाम तो थी ही. उसे फोन कर बताया कि यार ऐसे-ऐसे हो गया. क्या किया जाए? तब उसने कहा था ' मुझे पता है तू चाहकर भी उसकी हेल्प नहीं कर सकता क्योंकि तेरे हालात मैं जानता हूं. लेकिन मैं कुछ करता हूं...तू एक काम कर. मुझे आधे घंटे बाद तू फलां जगह मिल. मैं आधे घंटे बाद उस जगह पहुंच गया. वो अपनी सदाबहार सवारी 'बुलेट' पर बिना हेलमेट लगाए आया. और बोला,' ये पांच हजार रुपए हैं. तू उसे अपने नाम से दे दे. जब उसके पास होंगे तब दे देगा.' और जाट यार पैसे देकर चला गया. मैंने वो पैसे उसके नाम ही से उस दोस्त को दे दिए. आज इतने साल बीत गए. उस दोस्त ने वो पैसे अभी तक दिए नहीं. और इस 'जाट यार' ने आजतक मुझसे मांगे नहीं. सुना है आज फ्रेंडशिप डे है!
 

Friday, March 25, 2022

सागर सरहदी...

मैंने 'बाजार' फिल्म बहुत बाद में देखी. पहले मुझे उसके गानों से प्यार हुआ था. उस प्यार की बदौलत ही इस फिल्म के गानों की कैसेट ले आया था, जिसमें गानों के साथ-साथ संवाद भी थे. ना जाने कितनी बार अपने वॉकमेन पर उस कैसेट को लगाकर लूप में सुना करता था. तब तक मैं सागर सरहदी जी को नहीं जानता था. तब हम केवल केवल फिल्म के हीरो-हीरोइन को ही जानते थे. फिर बाद में एक दोस्त की बदौलत मैं इस फिल्म को देख पाया था. फिल्म को देखकर फिर इस फिल्म से भी प्यार हो गया था. इसका असर ये रहा कि मैं तुरंत ही मार्किट जाकर इस फिल्म की सीडी ले आया था. इस वक्त तक भी मैं सागर सरहदी जी को नहीं जानता था. फिल्म देखते वक्त मन जरुर हुआ था कि किसने  इस फिल्म को बनाया है वो शख्स कौन है? लेकिन बस बात मन ही मन में रह गई थी. फिर जिंदगी की आपा-धापी में लग गए. सालों बाद एक दिन ऐसा आया कि इरफ़ान जी के 'गुफ़्तगू' कार्यक्रम  में 'सागर सरहदी जी' नजर आए. बातचीत सुनी और देखी गई. और एक सीधे-सच्चे, जज्बाती इंसान से सामना हुआ. और वो दिन था जब मुझे सागर सरहदी जी से भी प्यार हो गया था. उस इंटरव्यू को देखते हुए सागर सरहदी जी का एक-एक शब्द दिल में उतर रहा था. कई जगह उनकी बातों में दुहराव आया लेकिन उनके सवाल जहन को चीर रहे थे. मसलन 'मुझे ये बात आज भी बहुत खटकती है. और सता रही है. ऐसी कौन-सी ताकतें हैं जो आपको अपना गांव छोड़ने के लिए मजबूर करती हैं? आपको आदमी से रिफ्यूजी बना देती हैं?' यह सवाल आज भी दिमाग के एक कौने में बैठा हुआ है. इंटरव्यू के बाद मन करने लगा कि इनको और जानने का. रात भर Youtube पर इनके इंटरव्यू देखता रहा. इंटरव्यू ज्यादा तो ना थे. लेकिन जो थे उन्हें ही बार-बार देखता रहा. बाद में लगा कि इनके और भी इंटरव्यू आने चाहिए. इनके जो भी दर्द हैं. वे बाहर निकलने चाहिए. ना जाने क्या-क्या दबा रखा है इस इंसान ने अपने अंदर. वो बाहर आना ही चाहिए. चाहे फिल्म के रूप में या फिर इंटरव्यू के रूप में, या फिर किसी अन्य रूप में. अगले दिन सुबह होते ही. मुंबई में अपने पत्रकार मित्र को फोन किया. कहा कि ये इंटरव्यू देखो. और अगर खुद इनका इंटरव्यू कर सको तो करो यार. ऐसे इंसान बड़े कम होते हैं इस दुनिया में. खैर! आज यह खबर मिली कि यह महामारी पिछले साल ही इस प्यारे इंसान को भी हमसे दूर ले गई. खबर सुनकर ऐसा लगा जैसे कोई आपका अपना नजदीकी चला गया हो. ऐसा नजदीकी, जिनसे आप कभी नहीं मिले लेकिन जिन्हें आप प्यार करते थे. उनके काम को पसंद करते थे. उनके जज्बात को समझते थे. उनके दर्द को समझते थे. उनके लिए खुशियां की दुआ करते थे.

नोट-फोटो गूगल से ली गई है.

Saturday, September 18, 2021

मोहन राकेश और उनके किस्से, भाग-3

एक बेहद गर्म शाम, आज जब हम दोनों (दुष्यंत, और मोहन राकेश) अपनी-अपनी ख़ाली जेबों को कोसते हुए उसके घर जा रहे थे। गर्मी के कारण वह बुरी तरह हाँफ रहा था और जेब के कारण वह बेतरह परेशान था। मगर ठहाकों पर ठहाके लगा रहा था। मैंने पूछा, "क्यों खुश हो रहा है?" तुम समझते नहीं, वह बोला, " मैं गरीबी को ब्लफ़ कर रहा हूँ। कहीं साली यह न समझे कि मैं उसके रोब में आ गया...दरअसल यह राकेश की अदा थी और इसी पर लोग मरते भी थे। अगर उसकी जेब में अंतिम दस रुपए बचे हैं तो वह यह नहीं सोचता था कि इन्हें खर्च न करुँ, बल्कि यह सोचता था कि इन्हें जल्दी से जल्दी कैसे ठिकाने लगाऊँ ! वह साढ़े सात रुपए टैक्सी में खर्च करके ओमप्रकाश के पास पहुँचता और अपने ठेठ अमृतसरी पंजाबी लहजे में, उन्हे पुकारकर, बचे हुए पैसे उनके सामने पटक देता, " ले भाई, अब यह ढाई रुपए बचे हैं, बोल अब क्या करना है इनका?"

Saturday, July 24, 2021

गुरु पूर्णिमा पर गुरु की यादें और उनकी बातें

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि सिद्धू सर मुझे अक्सर क्यों याद आते हैं? जहां कहीं गुरु-टीचर, प्रोफेसर की बात हो, मैं उनको याद किए बिना क्यों नहीं रहता? दोस्तों में उनकी चर्चा किए बिना क्यों नहीं रहता? बेटी को उनके किस्से सुनाए बिना क्यों नहीं रहता? उनकी लिखी किताबों को पढ़ता क्यों रहता हूं? इंटरनेट की दुनिया में उनके बारे में लिखे-कहे को क्यों ढूढ़ता रहता हूं? किसी के मुंह से उनके किस्से-संस्मरण सुनने को मिल जाएं तो सुनकर बेहद खुश क्यों हो जाता हूं? शायद यह सब इसलिए होता है कि वे मेरे दिल के बेहद करीब हैं. दिल के करीब इसलिए हैं कि वे दिल के बहुत अच्छे इंसान थे. उनके लिए ना कोई छोटा था. ना कोई बड़ा था. ना कोई अपना था. ना कोई पराया था. जो उनसे मिला वो उनका अपना था. किसी की भी मदद करने से वे पीछे नहीं हटते थे. जो उनसे बन सकता था वो वे कर देते थे. खासकर हम जैसे छात्रों की तो वे खुलकर मदद करते थे.

मुझे याद है. तब तक मेरी और उनकी चंद मुलाकातें ही तो हुई थीं. एक दिन जब मैं हंसराज कॉलेज के उनके कमरे से निकलने लगा तो वे पूछ बैठे कि 'अब कहां जाएगा?'  मैंने कहा, 'सर अब मैं सीधे हरदयाल सिंह लाइब्रेरी जाऊंगा. जहां बैठकर मैं पढ़ाई करता हूं. कुछ एक फार्म भर हुए हैं सरकारी नौकरी के.  बस उन्हीं की तैयारी कर रहा हूं वहां जाकर.’ वे बोले, 'घर पर नहीं पढ़ते?' मैं बोला, ‘सर नहीं. उधर पढ़ाई हो नहीं पाती है. इसलिए उधर चला जाता हूं.'  फिर वे एक चाबी निकालते हुए बोले,' जा इसकी एक डुप्लीकेट चाबी बनवाकर ले आ.' चाबी वाले सरदारजी की दुकान का रास्ता बताकर उन्होंने मुझे भेज दिया. मैं गया. सरदारजी से चाबी बनवाकर मैंने उन्हें दे दी. वे फिर डुप्लीकेट चाबी मुझे देते हुए बोले,' ये चाबी तू रख. जब भी तेरा मन करे, यहां बैठकर पढ़ लिया कर. किसी भी वक्त तू आ सकता और किसी भी वक्त तू जा सकता. ये समझ ये तेरा ही कमरा है.’ (उन्हें यह क्वार्टर कॉलेज की तरफ से मिला हुआ था. लेकिन वे तब वसुंधरा में रहने लगे थे.) मैंने मना नहीं किया और वो चाबी रख ली. वो अलग बात है. मैंने उस चाबी का कभी प्रयोग नहीं किया. आज भी मैंने वो चाबी संभालकर रखी हुई है. मैं तब उस चाबी से उस घर और उस दिल को देख पाया था जो हम जैसे बच्चों के लिए सदा खुला रहता था. जैसे-जैसे समय बीतता रहा है. मेरे दिल में उनके लिए एक घर बनता रहा, जिसमें वे आज भी रहते हैं. बस वे अब पहले-सी लंबी-लंबी बातें नहीं करते. मेरा पहले जैसा हौसला नहीं बढ़ाते. मुझे पहली-सी शाबासी नहीं देते. बस उस घर में मौजूद रहते हैं.

मुझे याद है. पहले जब भी कोई किताब या अन्य चीज मुझे डाक से भेजते थे तो मेरा नाम उस पर होता था. जब मेरी शादी हो गई तो मेरी पत्नी का नाम भी उसमें आने लगा. वो भी मेरे नाम से ऊपर. फिर बेटी हुई तो उसका नाम हम दोनों के नाम से ऊपर. एक दिन क्या देखता हूं. उनकी एक नई किताब ‘ड्रामेबाजियां’ डाक से आई. किताब खोली तो अंदर लिखा था. 'सुनयना के लिए, प्यार से नानी सिद्धू, नाना सिद्धू.' (मेरी बेटी का नाम ‘नैना’ से ‘सुनयना’ उन्होंने ही रखा था.) ऐसा था उनका प्यार. जिस प्यार में मैं भाव-विभोर हो जाता था. उस प्यार में बह जाता था. जैसा वे प्यार करते थे. वैसे ही हम बच्चों का हौसला भी बढ़ाते थे. मुझे याद नहीं कभी उन्होंने किसी छात्र को हतोत्साहित किया हो. आप चाहे कितनी ही बड़ी गलती कर दें. या आपसे हो जाए. मैंने उन्हें कभी गुस्सा करते नहीं देखा. इवन एक बार की बात है. एक नाटक में एक किरदार निभाते हुए मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई थी. फिर भी उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा. मुझ पर गुस्सा नहीं हुए. बस यही कहा ‘बहुत अच्छे’. मेरा वो रोल पहला और आख़िरी था. ये अलग बात वे ये जरुर कहते थे कि ऐसा करोगे तो और अच्छा हो जाएगा. जब नाटक की रिहर्सल होती थी तो वे ऐसे ही हौसला बढ़ाते थे. और अगर किसी छात्र की एक्टिंग उन्हें बहुत ज्यादा पसंद आ जाती थी तो वे इनाम के रूप में अपनी जेब से एक रुपया निकालकर छात्र को दे देते थे. फिर 11 रुपए देने लगे. बल्कि एक बार तो एक लड़के की एक्टिंग देखकर इतने खुश हुए कि उसे शायद 101 रुपया दे दिए. ऐसा था उनका हौसला बढ़ाने का तरीका. बाद में वो 101 रुपए पाने वाला लड़का बम्बई भी गया था. फिल्मों में काम करने. अजय देवगन की एक फिल्म में एक किरदार निभाते नजर भी आया था. मैंने तो बच्चों को उस एक इनाम के लिए बहुत मेहनत करते भी देखा है. वो बात अलग है कि मुझे वो इनाम कभी नहीं मिला! मिलता कैसे एक रोल मिला था वो भी सही से नहीं कर सका! सच में बहुत निराशा हुई थी तब मुझे!

मैंने उनकी सीधी-सपाट जुबान में खूब कहानी-किस्से सुने हैं. अपनी घुमक्कड़ी की बातें जमकर सुनाते थे. कैसे वे एक बार हाथ देखने वाले पंडित बन गए. कैसे एक रात उन्होंने भिखारियों के साथ गुजारी थी आदि-आदि. दरअसल वे अक्सर कॉलेज की छुट्टियों में घूमने निकल जाते थे. कभी-कभी रूप बदलकर भी. ये उनका तरीका था. लोगों की कहानियां सुनने का. उनकी तकलीफ को जानने-समझने का. जिस रस के साथ वे किस्से कहते थे सच में उन्हें सुनने में बहुत आनंद आता था. बीच-बीच में गालियाँ का तड़का भी होता था. लेकिन कभी उनके मुंह से कड़वापन सुनने को नहीं मिला. ‘उल्लू के पट्ठे कागज तो बाद में बचाना. पहले तू अपनी आँख तो बचा. कागज तो बन जाएगा आँख ना बनेगी दूसरी तेरी.’ (कागज बचाने के चक्कर में मेरे छोटे-छोटे अक्षर में लिखने पर.) हरामजादा मुशर्रफ गोल-गोल घूमा रहा है. (तब अटल जी की सरकार थी और मुशर्रफ दिल्ली और आगरा के बीच घूम रहे थे.) उनकी गालियों के कुछ किस्से किताबों में दर्ज हैं. कुछ समकालीन लोगों को याद भी हैं. याद से याद आया एक बार जब मैं उनसे मिलने गया तो उनके कमरे का मैदान की तरफ वाला गेट खुला हुआ था. मेज पर टेबल लैंप जल रहा था. सर अपने हाथ में मैग्नीफाई गिलास से अपनी किसी आने वाली किताब की प्रूफ रीडिंग कर रहे थे. मैदान से खेलते बच्चों का शोर आ रहा था. मैं यूं ही पूछ बैठा कि ‘सर आप डिस्टर्ब नहीं होते इस शोर से’. वे बोले, ‘उल्लू के पट्ठे इधर से मुझे नई-नई गालियां सीखने को मिलती हैं. और तू कहता है कि सर डिस्टर्ब नहीं होते इस शोर से.’ और फिर वे जोर से खिलखिलाकर हंस पड़े.

रिटायर्ड होने के बाद भी वे खूब काम किया करते थे. कई नाटक तो उन्होंने रिटायर्ड होने के बाद ही लिखे. वो अलग बात है वे नाटक उनके दिमाग में सालों से पक रहे होंगे. सच में वे काम को बहुत महत्व देते थे. उनका मानना था कि काम से बड़ा कुछ नहीं. जब तक साँसे हैं काम करते रहो. वे अपने आखिर समय तक नाटक लिखते रहे. वो कहते थे आखिर वक्त में जब तुम पीछे मुड़कर देखो तो लगना चाहिए कि तुमने कुछ किया है. चाहे तुमने लालकिले पर झंड़ा ना फ़हराया हो. लेकिन तुमने अपने काम का झंड़ा तो गाड दिया ना बस. मैं जब भी उनसे कहता था कि सर ये परेशानी है या ये तकलीफ है तो हमेशा हल तो देते ही थे साथ ही साथ में ये भी कहते थे कि कुछ ना कुछ काम करता रह. अपने मन का काम करता रह. अपने मन का काम करता रहेगा तो ध्यान हटेगा. जब ध्यान हटेगा तो तकलीफ-परेशानी भी कम महसूस होगी. और कोई नया काम भी बनेगा. उनका हमेशा ही ये मानना था ‘ WORK is a great HEALER.’  ये पंक्ति उन्होंने अपने बेड के सामने रखी किताबों की अलमारी पर लगा रखी थी. पिछले साल एक विडियो देख रहा था, जिसमें उनकी बेटी प्रमिला जी उनके बारे बात कर रही थीं. जिसमें उन्होंने बताया कि वे अपने आखिर समय में अस्पताल के बिस्तर पर थे. ना चल सकते थे. ना उठ सकते थे. एक दिन उन्होंने मिलने आई अपनी बेटी से कहा कि ‘एक काम करना, वीणा (उनकी बड़ी बेटी) को बोलना कि वो एक गीत है ना जो मैंने चौथी क्लास में लिखा था उसमें एक जगह ‘प्रीतम’ आया हुआ है. उसकी जगह ‘सिरजनहार’ कर दें.’ मतलब कि वे अपने आखिर समय, तकलीफ में भी काम कर रहे थे. पुराना उधेड़ रहे थे. नया गढ़ रहे थे. फिर आप ही बताओ ऐसे इंसान को कोई क्यों ना याद करे, क्यों ना प्यार करे!

Sunday, June 20, 2021

जेएनयू अनंत जेएनयू कथा अनंता

जे सुशील की किताब ‘जेएनयू अनंत जेएनयू कथा अनंता’ एक किताब ही नहीं बल्कि जेएनयू के अनगिनत किस्सों का एक दस्तावेज है. इस दस्तावेज में दर्ज किस्सों को आप पढ़ते ही नहीं बल्कि उन किस्सों की लहरों के साथ आप बहने लग जाते हैं या यूं कहें कि कई बार उन्हें जीने से लग जाते हैं. चाहे आप जेएनयू के छात्र रहे हों. या फिर उसके छात्र ना रहे हों. जेएनयू को कभी देखा हो या उसे नहीं देखा हो. बस आप इन किस्सों के साथ-साथ बहते चले जाते हैं. बहते-बहते कब ‘पार्थसारथी पहाड़ियां’ आ जाती हैं पता ही नहीं चलता. आप इन पहाड़ियों के पेड़ों पर बैठी जानी-अनजानी रंग-बिरंगी चिड़ियों की चहचहाहट को सुनने लग जाते हैं. उन्हें पहचाने की कोशिश करने लग जाते हैं. फिर थोड़ी देर बाद कहीं थोड़ी दूर किसी एक कोने में नाचते मोर देखने लग जाते हैं. कहीं-कहीं इन पहाड़ियों पर आपको बंदर हाय-हेल्लो करते भी मिल जाते हैं. जब आपको इन बंदरों के ‘हाय हेल्लो’ से डर लगने लगता है तो आप किसी सड़क पर निकले मार्च में लगे ‘मार्च ऑन’ के नारे को कुछ और ही समझकर ठहाकों पर ठहाके लगाने लग जाते हैं. कभी ‘खुल’ गए छात्रों के किस्से सुनकर अचंभित होते हुए ‘गर्मी में आग तापने लग जाते हैं’. या फिर कभी ‘आप अखबार को पानी में भीगोकर पढ़ने लग जाते हैं’. कभी कहीं ‘एलियन’ शब्द सुनकर चौंक जाते हैं. और सोच में पड़ जाते हैं कि यार जेएनयू में ‘एलियन’! ( इस किताब को पढेंगे तो ‘एलियन’ भी मिल जाएंगे. हैरान ना हो दोस्त!!) और फिर आप एलियन’ वाली बात को दरकिनार कर ‘चांदनी रात’ में थोड़ा-सा रूमानी होने निकल जाते हैं. वहां किसी के मुंह से निकले इन शब्दों में कि ‘जो मजा प्रेम का प्रक्रति में है वो कमरे में कहां.’ यह बात पढ़-सुनकर आप सहमति में धीरे से अपना सिर हिलाते हैं. और एक पल के लिए अपने प्रेम को भी याद करने लग जाते हैं. और पुराने दिनों के ख्यालों में खो से जाते हैं! अभी आप अपने पुराने ख्यालों में खोए ही रहते हैं कि किताब झट से आपको ‘पहला झटका’ देती है, फिर ‘दूसरा झटका’ देती है, ‘तीसरे  झटके’ के बाद ‘चौथा झटका भी देती है. ये झटके ‘प्लेन’ या भूकंप आदि के नहीं होते हैं. ये झटके ‘अंग्रेजी’ के’, ‘चाय के’, और ‘सिगरेट के’ होते हैं. और इन झटकों के बाद आपके अंदर के आत्मविश्वास को बीज, खाद, पानी मिल जाता है. आत्मविश्वास से भरे आप फिर गुरुओं के संस्मरण पढ़ने लगते हैं. फिर चाहे वे ‘पुष्पेश पंत सर’ हों, ‘पुरुषोतम अग्रवाल सर’ हों, ‘निवेदिता मेनन मैडम’ हों, या फिर ‘चिनाय सर’ हों. वे कैसे छात्रों को ‘सही रास्ते’ दिखाते हैं. वे कैसे छात्रों का ‘हौसला’ बढ़ाते हैं. वे कैसे छात्रों को ‘सवाल करना सीखाते’ हैं. वे कैसे अपनी गलती मानते हुए छात्रों को उस गलती के बारे में बताते हैं. और वे कैसे जीवन में ‘सही फैसले लेना सीखते’ हैं. आप यह सब जान जाते हैं. मतलब आप ‘जेएनयू’ को पहचान जाते हैं.

बाकी यह ‘जेएनयू अनंत जेएनयू कथा अनंता’ नामक किताब-विताब किस्से, संस्मरण ही नहीं सुनाती बल्कि ‘जेएनयू’ के इतिहास के बारे में काफी कुछ कह जाती हैं. जेएनयू’ कब बना? कैसे बना? यह किताब इस संबंध में एक से एक नई जानकारी दे जाती है. मसलन 'फिक्की ऑडिटोरियम' के पीछे ‘गोमती हाउस’ की कैंटीन, जिसमें मैंने खुद काफी समय तक खाना खाया है, क्योंकि वो थोड़ा सस्ता होता था. वहां शुरू में इस यूनिवर्सिटी का कैंपस हुआ करता था. जब यह यूनिवर्सिटी शुरू हुई थी. और यह ‘गोमती हाउस’ आज भी अपने इतिहास के साथ वहां मौजूद है. जेएनयू की प्रवेश परीक्षा कितनी भाषाओं में दी जा सकती है इसका भी जवाब आपको इस किताब में मिल जाएगा. जेएनयू के छात्रावास के नाम किन-किन नदियों पर हैं. इस बात का जिक्र भी यह किताब करती है. ‘PIG शब्द’ का एक नया अर्थ इस किताब में मिल जाता है. यह किताब जेएनयू की ‘ढाबा संस्कृति’ यानि ‘गंगा ढाबा’ के बारे में भी बताती है. यह किताब यहाँ के छात्र चुनाव के बारे में, उनके जोरदार नारों के बारे में भी बताती है. माने यह जेएनयू के बारे में बेहद अच्छी और ज्यादा जानकारी देती है. 

आखिर में इस किताब के किस्से, संस्मरण और जानकारी से अलग दो खूबसूरत बातें भी बताता चलूं. पहली कि इस किताब में कई जगह कविता-अकविता का भी इस्तेमाल किया गया है. जिसे पढ़कर सच में दिल खुश हो जाता है. और अगले पेज को पढ़ने से पहले एक बार फिर से उसे पढ़ने को दिल चाहता है! इसलिए इस लंबी कविता-अकविता की सिर्फ चार पंक्तियों को यहां लिखने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूं.

‘आप अगर लड़कियों के साथ रिश्तों को बहन बेटी मां से इतर एक इंसान के तौर पर देख पाते हैं तो आप जेएनयू के हैं. 

अगर आप सवाल उठा रहे हैं चाहे आप कहीं भी हों.

तो आप निश्चिंत रूप से जेएनयू के ही हैं.’ 

वहीँ दूसरी खूबसूरत बात ये है कि इस किताब में करीब ग्यारह इलस्ट्रेशन शामिल हैं, जिन्हें ‘मी जे’ ने बनाया है. जोकि बेहद ही खूबसूरत हैं. या यूं कहूं ये इलस्ट्रेशन इस किताब को चार चाँद लगाते हैं तो गलत ना होगा. हर सुंदर इलस्ट्रेशन मनोहर तरीके से किताब की कथाओं का हाथ पकड़े ‘जेएनयू अनंत जेएनयू कथा अनंता’ कह रहे हैं. बल्कि इन इलस्ट्रेशन के साथ इन किस्सों को पढ़कर मुझे ‘एम. एफ हुसैन’ जी की किताब ‘एम. एफ हुसैन की कहानी अपनी ज़ुबानी’ की याद हो आई.  

और आखिर में...

‘जेएनयू उनमें ही नहीं बसा जो जेएनयू में पढ़े हैं बल्कि उनमें भी बसा हुआ जो उसे प्यार करते हैं.’


Saturday, June 12, 2021

चिन्ना मैम...

विनोद दुआ सर के घर मैं करीब चार बार गया हूं. दो बार विनोद दुआ सर जरुर मिले लेकिन मुझे कभी चिन्ना दुआ मैडम नहीं मिली. फिर एक बार हुआ यूं कि मैं बंगाली मार्किट में मैगज़ीन की दुकान पर पर मैगज़ीन उलट-पलट रहा था. तभी एक महिला मेरे बगल में आकर खड़ी हो गईं और मैगज़ीन वाले से कुछ कहने लगीं. मैंने मुंह उठाकर देखा था वे चिन्ना मैडम थीं. मैंने नमस्ते करते हुए पूछा कि आप चिन्ना दुआ हैं ना? वे नमस्ते करते हुए बोलीं कि जी मैं चिन्ना दुआ हूं. फिर कुछ देर बात होती रही. बातचीत में सिद्धू सर का भी जिक्र आया. और विनोद दुआ सर का जिक्र तो आना ही था. बेहद प्यार से मिली. थोड़ी देर बातचीत के बाद लगा ही नहीं कि हम पहले मिले ही नहीं. और घर आने का कहकर वे चली गईं. घर तो फिर कभी जाना ही नहीं हुआ लेकिन विनोद दुआ सर से बाद में दो-चार बार मुलाकात जरुर हुई.

एक दिन किसी ने बताया कि आज हैबिटैट सेंटर में विनोद दुआ और चिन्ना दुआ जी का एक कार्यक्रम है, जिसमें वे गीत-गजल सुनाएंगे. बहुत चर्चाएं सुनी थी हमने भी इस जोड़ी के गायन की, लेकिन आमने-सामने कभी सुना नहीं था. खैर शाम को हम भी हैबिटैट सेंटर चले गए. सच में कार्यक्रम शानदार रहा. आनंद आ गया था उस शाम. कार्यक्रम के खत्म होने के बाद विनोद दुआ सर से मुलाकात भी हुई.
फिर आया कोरोना महामारी का दौर. पता लगा कि विनोद दुआ सर भी कोरोना के शिकार हो गए हैं. इस महामारी से दिल तो पहले से ही उदास था और यह खबर पाकर और उदास हो गया. फिर चिन्ना मैडम की तबीयत ख़राब का भी पता चला. मन और भी ख़राब हो गया. फिर रोज दोनों के हालचाल पता करने के लिए विनोद दुआ सर की वाल पर बिना नागा सुबह-शाम जाने लगा. जिस दिन कोई खबर ना मिलती तो बैचेनी से हो जाती थी. फिर ट्विटर छान डालता था कि कहीं कुछ खबर मिल जाए. वैसे वीनू सर का नंबर तो था लेकिन ऐसे समय में बात करने की हिम्मत ना होती थी..शब्द ही नहीं थे.. ऐसे समय में मेरा जैसा इंसान बात भी नहीं कर सकता. समय नहीं आता कि क्या बात कि जाए और क्या नहीं..बल्कि एक बार जब कहीं से हालचाल की कोई खबर नहीं मिली तो मैंने सिद्धू सर की बेटी प्रमिला जी को ही फोन लगा दिया था..फिर उनसे पता चला कि ये हालात हैं. विनोद अब ठीक हैं लेकिन चिन्ना की तबीयत ज्यादा खराब है..भगवान् से दुआ करो कि दोनों जल्द ठीक हो जाएं...भगवान् से तो मैं शुरू से बिना नागा यही कहता था कि भगवान् इन्हें ठीक कर दो...और बहुत हो गया आपका तांडव. अब इस दुनिया पर रहम कर दो...लेकिन भगवान को तो कुछ और ही मंजूर था...बेशक चिन्ना मैडम हमसे बेहद दूर चली गईं हैं लेकिन वे हमारे दिल में आज भी बसी हुईं हैं. अपनी मधुर आवाज में, और अपने सरल स्वभाव में...

Friday, June 11, 2021

दिल करता है...

 

दिल्ली का दिल सी पी
सच में अब दिल करता है. घर से निकल जाऊं. मेट्रो पकड़कर सीपी पहुंच जाऊं. हो आऊं गणेश मंदिर के बाद हनुमान मंदिर. ले आऊं वो बूंदी का प्रसाद जिसे हम बाप-बेटी बड़े चाव से खाते थे. और है क्या? ये हम बाप-बेटी हर बार कहते थे. फिर सामने के कॉफ़ी होम में घुस जाऊं. पी आऊं एक कॉफ़ी. देख आऊं उन बुजुर्गों को, जो खूब गप्प लड़ाते थे. बीच-बीच में जमकर ठहाके भी लगाते थे. निकल फिर इधर से पहुंच जाऊं उस पंजाबी टी स्टाल पर, जिसके पनीर पकौड़े-हरी चटनी के साथ गजब का आनंद देते थे. खाकर इसे फिर लगा आऊं सीपी के इनर सर्किल का एक चक्कर. जी भर के रंग-बिरंगी चीजों को देख लूं. अगर कुछ दिल को भाए तो मोबाइल से उनकी तस्वीर भी खींच लूं. लगे सताने जब गर्मी तो Chaayos का रुख कर लूं. बैठ फिर एक चाय के बहाने दो घंटे तक दोस्त के साथ गप्पे लडाऊं. कभी फिल्मों की बातें करूं, कभी पसंदीदा लेखकों के किस्से सुनाऊं. और नेताओं के किए जुमलों की भी खूब धज्जियां उडाऊं. जब कुछ प्रेमी जोड़े सीट का इंतजार करते दिखे तो झट से मैं फिर उठ जाऊं. निकल जाऊं उधर को जिधर कोई अपने हक़ के लिए लड़ रहा है. और कोई दूसरों की आवाज बुलंद कर रहा है. कुछ देर कर लूं इनसे बात. कुछ देर सुन लूं इनकी भी मन की बात. फिर कुछ देर बाद चार कदम बढ़ा लूं उस तरफ, जिस तरफ मेरा पसंदीदा जायका मिलता है. फिर पी लूं कई गिलास केरला हाउस कैंटीन की उस लस्सी को, जिसके पीने के बाद मुझे एक अलग ही दिव्य आनंद मिलता है. पहुंच जाऊं पैदल ही फिर मंडी हाउस. एक बार निहार लूं जी भरकर रविन्द्र आर्ट गैलरी को. मिल आऊं साहित्य अकादमी के पुस्तकालय की उन किताबों से, जिनसे मिले एक साल से ज्यादा हो गया. फिर चला जाऊं श्रीराम सेंटर की कैंटीन में भी, जिसकी चाऊमीन मुझे सबसे ज्यादा पसंद है. खिला आऊं उन बिल्लियों को भी कुछ, जो मेरे चाऊमीन खाने पर मेरे आपपास घूमती रहती थीं. मिल आऊं बंगाली मार्किट के उस मैगज़ीन वाले से भी, जिससे मैं कुछ मैगज़ीन खरीद लिया करता था. चाहे वो तहलका हो, नया ज्ञानोदय, या फिर अहा जिंदगी....
खैर दिल का क्या है. वो तो बच्चा है जी, कोई बात नहीं दो चार बार छटपटाएगा. फिर शांत जाएगा. वैसे भी अब तो मेरा दिमाग मेरे दिल को बार-बार बच्चन जी की वो पंक्तियां याद दिलाता रहता कि 'मन का हो तो अच्छा, ना हो तो और भी अच्छा.'

नोट-Covid के इस दौर में अब घर में नहीं रहा जाता. घर की कैद से निकलने को दिल चाहता है. बस ये उसी दिल की बात है. और फोटो The Family Man Part-2 से लिया गया है.

Wednesday, June 9, 2021

मोहन राकेश और उनके किस्से, भाग-2

 
भारतीय डेलीगेशन का अपना लीडर चुना जा रहा है। कोई साहब कहते है‌- मिनिस्ट्री की राय है कि अमुक को चुना जाये। वह अमुक अभी अनूस्थित है। आने वाला है। मोहन राकेश भन्नाता हुआ सिगरेट का पैकेट निकालता है। उसमें सिगरेट नहीं है। एक क्षण वह सिगरेट के लिए झुंझलाता है, फिर वहीं से बहुत ऊंची आवाज में नाराजी से बोलता है:"अगर सरकार ही सब तय करेगी तो हम यहां किसलिए है? हम जो लीडर चुनेगे वह लीडर होगा। अगर इस तरह सरकार के डिक्टेटस माने जायेगे तो इसके विरोध में वाकआउट करता हूँ" मैं उसे हाथ के दवाब समझाकर बैठा लेता हूँ। धीरे से कहता हूँ " सिगरेट लाने के लिए वाकआउट करने की जरुरत नहीं हैं। वह यों भी आ सकती हैं।"
वह हँस देता है- "तू नस पकड़ लेता है, पर यहां दूसरा मसला है।"
['अपनी निगाह' नामक किताब में- कमलेश्वर]

Tuesday, June 1, 2021

तेरे जैसा यार कहां...

कुछ दोस्त साथ छूटते ही हाथ छोड़कर निकल जाते हैं. अनेक दोस्त साथ छूटने पर बीच-बीच में संपर्क बनाए रहते हैं. लेकिन कुछ दोस्त ऐसे भी होते हैं जिनका साथ भी छूट जाता है, हाथ भी छूट जाता है और संपर्क भी टूट जाता है परंतु वे याद हर दिन आते हैं. कमबख्त जिस दिन याद नहीं आते, सपने में चले आते हैं. कुछ तो ऐसा होता है, जिस वजह से वे याद आते हैं. ऐसा ही 'कुछ' था उसमें जो वो इतना याद आता है. अब आप कहेंगे कि भई तेरे जैसा होगा. इसलिए याद आ जाता है. अरे भई नहीं. वो मेरे जैसा नहीं था. वो तो मेरा उल्टा था. वो धरती था तो मैं आसमान. वो दिन था तो मैं रात. भारी असमानताओं के बाद भी हम दोस्त बने रहे. सालों साथ-साथ हाथ पकड़कर दोस्ती की राह पर चलते रहे. हम दोनों की मुलाकात स्कूल में हुई थी. यह मुझे शुरू में पसंद नहीं आया था. दरअसल बदमाशी का शौक पाले थे जनाब. जैसा उस उम्र में कुछ लड़कों के साथ हो जाता है. हाथ में कड़ा या उंगली में नुकली अंगूठी इसलिए नहीं पहनते थे कि इसका इन्हें शौक था बल्कि इसलिए कि किसी से लड़ाई हो जाए तो उसका थोबड़ा बिगाड़ने के काम में आ जाए. एक हम थे लड़ाई-वड़ाई से कोसों दूर लेकिन ना जाने फिर ऐसा क्या कुछ हुआ कि दोस्ती हो गई. दोस्ती भी ऐसी कि स्कूल में बच्चे हमारी दोस्ती की मिशाले देते थे. कोई जय-वीरू कहता था कोई कुछ और. एक बार तो क्लास के एक लड़के ने कहा, 'यार ये तुम्हारी दोस्ती तो ठीक है. लेकिन तुम दोनों को एक साथ पेशाब कैसे आ जाता है? एक साथ प्यास कैसे लग जाती. एक साथ भूख कैसे लग जाती है? दरअसल कुछ ऐसा नहीं था बस एक दूसरे का साथ देना था. जब दो इंसान एक दूसरे का साथ देने लगते हैं तो एक पुल-सा बन जाता है, फिर चाहे उस पुल को दोस्ती का नाम दे लो, या किसी रिश्ते का.

Thursday, September 5, 2013

शिक्षक दिवस पर एक सीख गुरु की यह भी...


मेरी घरवाली ने और मैंने पांच बेटियां जन्मी, पाली, पढ़ाई, बिआही। अब वे जोरावर इंसान हैं। बढ़िया नौकरियां कर रही हैं। अपने बच्चे प्यार से पाल रही हैं। इस लिहाज से, थोड़े नानी-नाना होंगे जो हम दोनों जितने खुशकिस्मत होंगे। हमारे पड़ोसी हैरान हैं कि हमारे बच्चे हम बुड्ढों का इतना अच्छा ध्यान रखते हैं। हमारी हर जरुरत को चाव से पूरी करते हैं। पांच बेटियां जन्मने और पालने का हमारा तजुर्बा कैसा रहा? अगर हम ने पांच पुत्र जन्में होते, पाले होते, तो क्या फर्क होता हमारी जिंदगी में? ये सवाल हमसे अक्सर हमारे यार दोस्त पूछते हैं। हमारी हर बेटी ने अपना जीवन साथी अपने आप चुना। बेटे बेटियों ने, कम से कम खर्च करके, खुद बिआह रचाये। दाज-दहेज का धेला नहीं। बरसों पहले हो चुकीं उनकी शादियां कामयाब कही जा सकती हैं। इसलिए लोग ज्ञान कौर को और मुझे महाभाग्यशाली समझते हैं।

लेकिन हम ऐसे मनहूस समाज में बस रहे हैं जहां बेटी के पैदा होने को बहुत बुरा समझा जाता है। यहां लड़का जमाने के वास्ते हर यत्न करते हैं। वैध हकीमों से लेकर, साधु-संतो की, ओझा जादूगरों की, मुट्ठी चापी करते हैं। राजा जन्में चाहे रंक, औरत को मंदा ही बोला जाता है। बेटियां को गर्भ के अंदर ही कत्ल करना हमारे मुल्क में सदियों से चल रहा है। आज भी रोज अखबार के अंदर स्त्रियों के ऊपर हो रहे जुलमों की बाबत पढ़कर रूह कांप जाती है। सदियों पहले किसी मूर्ख ब्राह्म्ण ने लिख दिया- " पुत्र के बगैर हिंदू की गति नहीं होती। उसके पित्रों को पानी नहीं पहुंचता।" इससे बड़ा झूठ और कोई नहीं। कोरा वहम! लोगों को डराकर पूजा-पाठ का पाखंड रचकर, रकमें ठगने का प्रपंच। जूते मारो इस तरह के झूठे पुजारियों के!  आज का कानून मानो। आज लड़का और लड़की बराबर के नागरिक है। हर पहलू से बेटी और पुत्र को एक समान प्यार से, एक जैसे खर्च से, पालो पोसो। हमारी बेटियां-बहनें हर धंधे में मर्दों के बराबर काम कर सकती है। हर प्रकार से पुरुषों की बराबरी कर रही है।

बेटियों का पालन पोषण करते वक्त हमें कोई विशेष कठिनाई नहीं झेलनी पड़ी। हां, मैं एक बात से, रिश्तेदारों से, दोस्तों से, मर्द-प्रधान समाज से, हमेशा दुखी रहा हूं। मुझे अब तक बार-बार लड़के पेश किए जाते रहे हैं कि हम गोद ले लें। हमारे नजदीकी रिश्तेदारों ने चोखी कोशिश की कि हम उनका पुत्र मुतबन्ना बना लें। ताकि इस तरह वे हमारा घर घाट संभाल सकें। मैंने इस तरह के दगाबाज रिश्तेदारों को हमेशा जूती दिखाई है। शेर बनकर, अपनी हर बेटी की रक्षा की है। वहमी मौसियों-फूफियों को, सलाहकार मामा-मामियों को, अपनी बेटियों के दुश्मन समझकर, हमेशा घर बाहर धकेला है। लड़कियों को हीन समझने वालों के सिर सौ जूते!  इस पहलू से, तगड़ा बाप बनने के वास्ते, मुझे कईयों की धुनाई करनी पड़ी। मैंने किसी कंजर की उल्टी नसीहत नहीं सुनी। बेटियां पालने में कोई कोताही नहीं बरती। नतीजा? आज जीवन भर का सुख मेरे और ज्ञानकौर के पल्ले है।

पचहत्तर बरस की उम्र तक मुझे कोई मर्द नहीं टकराया जो दिल से, बेटियों को पुत्रों के बराबर समझता हो। हर मर्द बोलेगा, मेरे इस नाटक की नायिका गुरदेव कौर की मां बनने की इच्छा सही होगी, लेकिन उसको गर्भ वही मर्द कर सकता है जो विवाह के भांवरों से बांधा गया हो। अगर देबो दूसरे मर्द के नजदीक खुद चलकर जाती है, यह है उसके चाल-चलन की गिरावट ! मैं इसका गिरावट नहीं मानता। रिगवेद के अंदर युवती यमी की भांति, हर औरत का मां बनने का हक है। उसका यत्न सही है। हर प्रकार से जायज है।

कुछ संतरे जीवन के यथार्थ को नाटकीय रूप देने की बाबत।

इस नाटक की मूल घटना, गांव वहमोवाल में, 1955 को घटी थी। उस समय मेरी आयु 17 साल की थी। गुरदेव कौर और पाखंडी स्वामी के बारे में मुझे हर किस्म की जानकारी थी।  इस नाटक का पहला ड्राफ्ट मैने 1991 में पूरा किया। मूल घटना के 36 बरस बाद। असली नायिका और रघुनाथ बुरी मौत मरे थे। क्या मैं उनकी मौतों से नाटक का अंत करुं ? बीस एक बरस मैं इस दोचित्ती में फंसा रहा। बीस एक सल अधिकतर सोच मैंने इस खर्रे पर खर्च की। मेरा निर्णय था: मैं नाटक का सुखद प्रभाव छोडूं। अगर तुम ने कहानी असली जीवन से भी उठाई हो उसमें अदला-बदली करना तुम्हारा अधिकार है। अपनी नायिका को मैंने आखिर में दिलेर मां बनने के वास्ते हल्लाशेरी दी है। देबो और उसका बच्चा जिंदा रहेंग़े! यही सच्चा धर्म है। आज की हर बेटी बहन के वास्ते मैं सुखी जीवन की मिसाल पेश करना चाहता था।

इस ड्रामे को बेटियों बहनों के नजरिये से पढ़ो।

-चरणदास सिद्धू

[ सुन रहे हो ना तुम...बेटियों ना चाहने वालों ]

नोट- अभी पिछले ही दिनों मिली थी यह नाटक की किताब " मेरा बच्चा और मैं " , जिसके लेखक हैं डॉ. चरणदास सिद्धू और जिसे प्रकशित किया है " श्री गणेश प्रकाशन " ने। आप भी पढ़िए इस अच्छी किताब को।

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