Saturday, March 14, 2026

सिद्धू सर का जन्मदिन और उनके जीवन की चंद झांकियां

झांकी-एक 

सेंट स्टीफंज कॉलेज के प्रिंसिपल ने सिद्धू की दाखिले की दरख़ास्त ठुकरा दी क्योंकि दाखिले तो दो महीने पहले खत्म हो चुके! सिद्धू घबराया नहीं. सीधा यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार के पास पहुंचा. मदद मांगी. रजिस्ट्रार ने कहा,’ वापस सेंट स्टीफंज कॉलेज जाओ. प्रिंसिपल को कहो, मुझे टेलीफोन फोन करे. यह बात सुनकर सिद्धू लौटकर कॉलेज की तरफ चल पडा. रास्ते में उसको एक एम. ए. हिंदी का छात्र मिल गया. उसने सलाह दी. एम. ए. इंग्लिश करने के लिए रामजस कॉलेज को सबसे बढ़िया माना जाता है. रामजस का प्रिंसिपल आप भी अंग्रेजी पढ़ाता है. 

इस वक्त के रामजस कॉलेज और तब के रामजस कॉलेज में बहुत फर्क था. सिद्धू ने अपना रास्ता बदल लिया. वह उलटी जानिब चल पड़ा. रामजस कॉलेज पहुंच गया. प्रिंसिपल बी.बी गुप्ता को मिला. प्रिंसिपल ने सिद्धू की काबलियत झट पहचान ली. सिद्धू को कहा, दाखिले के 250 रुपए जमा करा दे. पर सिद्धू के पास इतनी रकम थी नहीं. उसके पास 15 रुपए थे. प्रिंसिपल गुप्ता ने कैशियर को कहा, ‘इससे सिर्फ 9 रुपए ले लो. आज दाख़िले का आख़िरी दिन है. दाख़िले की जरुरी रस्म पूरी कर लो. बाकी की फीस यह बाद में दे देगा. होशियारपुर लौटने के वास्ते छह रुपए इसके पास रहने दे. हॉस्टल में इसके वास्ते कमरा भी अलोट करवा दे.’ 

-डॉ सी.डी वर्मा 


झांकी-दो 

अमरीकन साहित्य के बारे में 1966 में एक सेमीनार हुआ. सिद्धू ने इसमें वाल्टविटमन पर पेपर पेश किया. अमरीकन प्रोफेसर क्रिस्टी ने इस पेपर को सेमीनार में पेश हुए सभी पर्चों में से बेहतरीन कहा. डॉ सरूप सिंह ने, जो उस वक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंग्रेजी विभाग के मुखिया थे, सिद्धू की भरपूर प्रंशसा की. और तुरंत ही फुलब्राइट स्कालरशिप पर उसके अमरीका जाने का प्रबंध कर दिया. विसकानसिन यूनिवर्सिटी ने उसको अपनी यूनिवर्सिटी से भी अंग्रेजी की एम. ए करने के लिए कहा. उसने परीक्षा दी और यूनिवर्सिटी में से अव्वल रहा. पौने तीन साल में वो एम. ए और डॉक्टरेट दोनों हासिल करके, डेढ़ महीना यूरोप की सैर करके, वापस हंसराज कॉलेज आ पहुंचा. 

-डॉ कुलदीप सिंह धीर


झांकी-तीन 

जब मैं डॉ सिद्धू से इनामों-सम्मानों की बात करने लगा, तो वह बीच में ही टोकर बोला: इनाम-सम्मान बड़े मिले हैं, पर मैं तुम्हें ‘बाबा बंतू’ की बात सुनाता हूं. ‘बाबा बंतू’ पंजाब यूनिवर्सिटी की बी.ए. क्लास में लगा हुआ है. मैं नवां शहर गया. अपने एक मित्र के पास ठहरा, जो कॉलेज में पढ़ाता था. जब मैंने ‘बाबा बंतू’ के प्रभाव के बारे में पूछा, वह कहने लगा: नहीं रीस ‘बाबा बंतू की. ‘बाबा बंतू’ की जात-बरादरी के लड़के-लड़कियां शेर बने बैठे हैं कि उनके बाबा दा की नीच समझी जाने वाली बोली में लिखी किताब भी उनको कोर्स में पढ़ाई जा सकती है! मुझे ‘बंतू’ के पुत्र-पौत्रों ने अपना कहा. मैं सदियों तक उनका कर्जदार रहूंगा. डॉ सिद्धू का गला भर आया. और आंखें खुशी के आंसुओं से भर गईं. उसका पक्के रंग वाला चेहरा स्वाभिमान से ज्वलंत था. 

-डॉ अजित सिंह


झांकी-चार 

सिद्धू बड़ी प्यारी शरारतें करता है. ( सयाना बंदा शरारती होता है और शरारती बंदा सयाना होता है. और ऐसे बंदे जिंदगी में सफल होते हुए देखे जाते हैं.) अक्सर लेखक किसी मुश्किल में फंसने के डर के मारे अपनी पुस्तक के आगे यह नोट लिख देते हैं कि ‘ इस नाटक या नावल के पात्र और घटनाएं फर्जी हैं. अगर किसी का नाम किसी पात्र के नाम से मेल खा जाए, तो यह सिर्फ संयोग ही होगा.’ 

इसके उलट, सिद्धू अपनी हर रचना के शुरू में अक्सर दिलचस्प नोट लिख देता है: ‘इस ड्रामे के अंदर वाले बंदों के नाम और घटनाएं सच्ची हैं. हर बंदे को लेखक पर मुकदमा करने की पूरी छूट है.’ एक स्थान पर वह लिखता है,’ इस ड्रामे की घटनाएं सही और सच्ची हैं. पिटाई से बचने की खातिर, लेखक ने कुछ एक बंदों के नाम उलटे-सीधे कर दिए हैं.’ 

-जगदीश कौशल


झांकी-पांच 

प्रश्न- कोई अपूर्ण रही ख्वाहिश? 

उत्तर- सिर्फ दो ख्वाहिशें पूरी नहीं हुईं. एक तो दिन बड़ा छोटा होता है. मैं ज्यादा काम और ज्यादा आनंद लेना चाहता हूं. दूसरा, मेरा ब्याह हेमा मालिनी से नहीं हो सका. 

-रोजाना जगवाणी, जालंधर


[सभी झांकियां 'नाटककार चरणदास सिद्धू, शब्द-चित्र' नामक किताब से लिए गए हैं. जिसे संपादित रवि तनेजा जी ने किया है और छापा 'श्री प्रकाशन' ने है. बाकी की झांकियों के लिए आप किताब पढ़ सकते हैं. ]

Saturday, February 14, 2026

प्यार का दिन और सीरो-सत्ता













पिछले दिनों एक रील में पंजाब यूनिवर्सिटी के अंदर किसी लड़की के द्वारा गाया गीत सुना था. गीत के बोल थे.

तू जो नज़रां मिलाइयाँ, असीं भुलिए किवें।
तू जो नींदां चुराइयाँ, असीं भुलिए किवें।
कहके हमदम कदी ते कदी बावरा।
तू मोहब्बतां सिखाइयाँ, असीं भुलिए किवें।
गीत थोड़ा समझ आया, दो-एक शब्दों के अर्थ समझ नहीं आए. लेकिन इसमें 'कुछ' था जो मुझे पसंद आ रहा था. पंजाबी बोल सुकून दे रहे थे. बस फिर क्या था. उस गीत का मतलब जानने की इच्छा हुई. उस 'कुछ' को पकड़ते हुए, एक दोस्त से उसके मतलब जाने. फिर गूगल पर उस गीत को ढूंढता रहा. वो मिल नहीं रहा था. रात हो चुकी थी. पर मैं लगा रहा. आखिरकार पता चला कि यह गीत एक 'पंजाबी फिल्म' 'शायर' का गीत है. फिर वो गीत लूप में चलता रहा. फिर इसी फिल्म का दूसरा गीत सुना. वो भी लूप में चलता रहा. फिर रात में ही सारे गीत सुन डाले. फिर अगले दिन काम करता रहा और ये गीत लूप में चलते रहे. कई दिनों तक इन गीतों के जादू ने मेरे को घेरे रहा. फिर एक दिन YouTube पर एक रील मिली, जिसमें इस फिल्म का आख़िरी सीन था. उसमें नायक अपनी लिखी नज्म सुनाता है. उस नज्म में आए शब्द दिल को भीगो गए. पहले की तरह कई शब्द समझ में नहीं आए. कुछ का मतलब पता नहीं चला लेकिन इसमें भी 'कुछ' था जो बेहद पसंद आ रहा था. फिर मैं फिल्म देखने के लिए छटपटाने लगा. फिर कई दिन छटपटाने के बाद फिल्म देखने का जुगाड़ हो गया. फिर क्या था रात को ही फिल्म देख डाली. फिल्म के एंड ने भावुक कर दिया. फिल्म का आख़िरी सीन भी लूप में चलता रहा. नायक के द्वारा कही नज्म मन को छूती रही. मैं उसे बार-बार सुनता रहा. बार-बार ही उसके भावों में बहता रहा. फिर समझ आया वो जो 'कुछ' था ना. वो 'कुछ' नहीं, प्यार था, मोहब्बत थी, जो पंजाबी शब्दों के जरिए मेरे को भावविह्वल कर रही थी.

याद के लिए फिल्म का एक संवाद बड़ी मुश्किल से पंजाबी बोली में लिख पाया. कुछ शब्द फिर भी सही से लिखने से रह गए लेकिन भाव समझ में आ रहे हैं. आपका मन करे तो भावों की नदी में आप भी डूबकी लगा लीजिए.  


सीरो- दुखी ना हो बापू. तू मेरे नाल कुछ गलत नी किता. बस इना जरूर है के, तेरी शान तल्ले संसार इतना चंगा लगदा सी, उतना सच्ची-मुच्ची है नी. घबरा ना बापू, तगड़ी है तेरी धी. ऐ नी हारदी. बापू - पुत्त, तू की हाल बना लिया आपणा, किना रोग ला लिया अपने आप नूं. तू चल मेरे नाल. आ शाबाश मेरी धी, चल मेरे नाल. छड्ड दे ये सारे बोझ. छड्ड दे. सीरो - बापू, जद्दों घर तां रहा मैं धी दा फर्ज अदा कितातां. हूण बीवी दा कर रही हां. इस दरवेश ने कदे साथ नी छड्ड्या. जदों लोग मैनूं कलहणी कह रहे सन, ओदों वी मेरे नाल सी. हूण अब फर्ज मेरा. बापू, तू दस. तेरे चेले किवें ने? बापू - मैं ठीक हां. ते चेले. ओह मुड़ के कदे नहीं आया. अपने घर वी नहीं गया. पता नहीं कित्थे चला गया. सीरो - हूणा यही करना सी. बेसब्र कां सब्र कित्थे सी. ओह मैनूं लੱਭण ( ढूंढने)वास्ते निकल गया होवे, ते आपणा आप ही खो बैठा होवे. चंगा होवे जे ओह अखां नाल सांझ पा लेवे, ते फिर शायर बन जावे. मोहब्बत लिखण लग जावां. बापू - सीरो पुत्त, तैनूं सत्ता बहुत याद आउंदा है. सीरो - यादां नूं कौन रोक सकदा है बापू जी. कदे-कदे मैं दुआ करदी हां कि ओह शायर बन जावे. पर हर रोज़ दुआ करदी हां कि मेरा शोहर ठीक हो जावे. अतीत नूं सिर्फ़ याद किता जा सकदा है. पर सानूं मौजूदा वक्त नाल ही जीणा पैंदा है. इकबाल - सीरो, कोई बोल तां दे. सीरो - नहीं इकबाल. होण मैनूं बोल नहीं ओंदे. मेरे बोल तां उत्थे ही रह गए, सत्ते कोल. हां, एह समझ लै कि ओह मैनूं शायरी दा.... (उपहार) मंग्या ते, मैनूं उन्हां बोल दे दिते. होण तां जे ओह बोले, तां मैं बोलां.

Tuesday, February 10, 2026

चॉकलेट डे

पिछले कई दिनों से आस्ट्रेलिया से आई 'चॉकलेट' को खाते हुए सोच रहा था कि 'चॉकलेट' के बारे में कुछ लिखूं. कुछ बातें थीं. कुछ यादें थी. कुछ बाहर से आईं चॉकलेट का स्वाद ही ऐसा था, जो बार-बार कहता था चॉकलेट खाकर वाह-वाह तो कर रहे हो. कुछ तो लिख दो मेरी तारीफ में. लेकिन टलता रहा. आदमी का एक उम्र के बाद चीजों के प्रति थोड़ा चाव कम-सा हो जाता है. वो चीजों को टालता रहता है. पर मैं तो इतना भी उम्रदराज नहीं हुआ हूं. फिर भी ऐसा क्यों?. बस इन्हीं सवालों के बीच आज जब पता चला कि आज तो 'चॉकलेट डे' है तो फिर रहा ही नहीं गया. विदेशी 'चॉकलेट' के स्वाद ने आखिरकार लिखने बैठा ही दिया. 


वैसे 'चॉकलेट' का मैं कोई ज्यादा शौक़ीन नहीं रहा हूं. लेकिन एक बार क्या हुआ. एक रिश्तेदार राम मनोहर लोहिया अस्तपाल, जिसे विलिंगडन अस्पताल भी कहा करते थे, में दाखिल थे. अस्तपाल में देर रात तक रुकना पड़ा. खाने को कुछ था नहीं. बाहर खाने को कुछ ख़ास मिला नहीं. थक-हारकर एक 'चॉकलेट' ले ली थी. जब खाई तो बेहद स्वादी लगी. वो साइज़ में थोड़ी छोटी थी. एक से कहां पेट भरने वाला था. बस फिर क्या था. जेब में कई सारी 'चॉकलेट' खरीदकर डाल लीं. रात इन्हीं 'चॉकलेट' के सहारे कटी. बस फिर क्या था. जब कोई मुश्किल वक्त में साथ दे उसे भूला तो नहीं सकते हैं ना. उस 'चॉकलेट' का स्वाद जीभ पर बना रहा. गाहे-बगाहे खाते रहते थे. वैसे उस 'चॉकलेट' का नाम  'BARONE' था. बाद में वो आना बंद हो गई. मेरा चॉकलेट' खाना भी बंद-सा हो गया. वो अलग बात है कभी कभार दूसरी  'चॉकलेट'  खा लेता था. पर उन  'चॉकलेट' में वो बात नहीं थी, जो 'BARONE' में थी. वो कहते हैं ना जो स्वाद जीभ से उतरकर दिल में बस जाए वो भुलाए भूलता है क्या भला? वो पहले प्यार की तरह याद रहता है. 


फिर ब्लॉग की दुनिया का उदय हुआ. इंटरनेट पर ब्लॉग लिखे-पढ़े जाने लगे. कोई अपने मन की बात लिखता था. कोई राजनीति पर लिखता था. कोई साहित्य पर लिखता था. बाद में दिल्ली में जगह-जगह ब्लॉगर की बैठकी होने लगी थीं. उन्हीं बैठकी में से एक बैठकी 'सिविल लाइन' के 'सीएसडीएस' में हुई. जहां हम भी गए हुए थे. अब याद नहीं वह बैठकी किस विषय पर रखी गई थी लेकिन इतना पता है, वहां एक ब्लॉगर जर्मनी से आए थे. नाम अभी याद नहीं आ रहा. शक्ल याद है. वे दाढ़ी रखते थे. वे अपने साथ जर्मनी की  'चॉकलेट' लाए थे. बैठकी में आए सभी ब्लॉगर को वो 'चॉकलेट' दी गई थी. शायद गोल-सी टॉफ़ी नुमा वो 'चॉकलेट' थी. जहां तक मुझे याद है वहां किसी ने ये बताया था कि इस 'चॉकलेट' के अंदर वाइन है या इसमें वाइन जैसा स्वाद आता है. ऐसा ही कुछ. आपां तो पहली बार ऐसा सुन रहे थे. आपां ने ऐसी 'चॉकलेट' कभी नहीं खाई थी. आपां तो  'BARONE' खाने वाले लोग थे. खैर हमें भी वह 'चॉकलेट' मिली लेकिन उसमें वाइन की बात सुनकर आपां उसे ना खा पाए. घर आकर वो 'चॉकलेट' पिताजी को दे दी. पिताजी के लिए वह पहली 'चॉकलेट' रही होगी शायद. हमारी  'BARONE' के जैसे. अब हमें नहीं पता कि उन्हें वह  'चॉकलेट' पसंद आई थी कि नहीं.


फिर दिन बीते. साल बीते. एक दिन काजल जी विदेश घूमने गए. जब वे वापिस आए तो एक दिन उनका मैसेज आया. ' एक माइक्रो गिफ्ट आपके लिए भी लाए हैं. अब मिलने का उपक्रम आपको करना होगा.' ये मेरे लिए सरप्राइज था. सरप्राइज ने मुझे बेहद खुश कर दिया था. बहुत दिनों के बाद ऐसा सरप्राइज मिला था, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल था. वैसे भी गिफ्ट मिलना किसे पसंद नहीं और अगर वो सरप्राइज भी हो तो खुशी दोगुनी हो जाती है. मैं बाहर से बच्चे की तरह खुश था. और अंदर ही अंदर बड़ों की तरह भाव विभोर था. दरअसल ऐसे सरप्राइज देना मुझे अच्छा लगता है. अपने दोस्तों को बहुत बार ऐसे सरप्राइज मैंने दिए भी हैं. एक बार अपने दोस्त की शादी की सालगिरह पर हम पति-पत्नी रात को केक लेकर उनके घर पहुंच गए थे! दोस्तों से कुछ ऐसे ही सरप्राइज मुझे मिले भी हैं. वैसे ऐसे सरप्राइज के किस्से कई सारे हैं लेकिन उनकी बातें फिर कभी. आज सिर्फ 'चॉकलेट' की बातें. पर ये सरप्राइज कुछ अलहदा-सा था. मिलने का कार्यक्रम तय हो गया. बेटी साथ थी. हम मिले. काजल जी से मिलकर बेहद अच्छा लगा. फिर जब वो सरप्राइज देखा. सच में दिल खुश हो गया. मैंने सच में सोचा नहीं था कि ऐसा सरप्राइज गिफ्ट मिलेगा. सरप्राइज गिफ्ट के साथ ढेर सारी 'चॉकलेट' भी मिली थीं. वे  'चॉकलेट' इतनी स्वादी थीं कि मत पूछो. जिंदगी में पहली बार विदेशी 'चॉकलेट' का स्वाद ले रहा था. 'चॉकलेट' मुंह में डालते ही ऐसे पिघल जा रही थी जैसे नूनी घी मुंह में डालते ही पिघल जाता है. बेटी से ज्यादा वे 'चॉकलेट' मैंने खाईं थी. इन्हें खाने के बाद फिर से 'चॉकलेट' खाने की इच्छा परवान चढ़ी चुकी थी. वो भी विदेशी 'चॉकलेट' 😍 


फिर बाद में जब बेटी की मौसेरी बहन आस्ट्रेलिया गईं तो उनसे कहा गया कि जब वे दिल्ली आएं तो वहां की 'चॉकलेट' हमारे लिए जरुर लाएं. वे जब दिल्ली अपने घर आईं तो साथ में खूब सारी 'चॉकलेट' लाई थीं. हम फिर से खुश. अभी हाल ही में जब बेटी की मौसी जी अपनी बेटी से मिलने आस्ट्रेलिया गईं तब भी उन्हें आस्ट्रेलिया की  'चॉकलेट' लाने को कहा गया. काजल जी ने विदेशी 'चॉकलेट' के स्वाद का ऐसा चस्का लगा दिया है कि मन करता है कोई ना कोई विदेश जाता रहे. विदेशी 'चॉकलेट' लाता रहे. और मैं विदेशी 'चॉकलेट' खाता रहूं. स्वाद ही ऐसा होता है. अब जब बेटी की मौसी जी आस्ट्रेलिया से आने के बाद  पिछले हफ्ते हमारे घर आईं तो खूब सारी 'चॉकलेट' लेकर लाईं थीं. तब से वहीं 'चॉकलेट' खाई जा रही हैं. जीभ से उनका स्वाद लिया जा रहा. जुबां से वाह वाह कहा जा रहा है. पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि बाहर की 'चॉकलेट' यहां की 'चॉकलेट' से अच्छी होती हैं. पता नहीं ऐसा मेरा भ्रम है या फिर बाहर की 'चॉकलेट' वाकई इतनी लज़ीज़ होती हैं. आप 'चॉकलेट' खाकर, अपना अनुभव बता सकते हैं और 'चॉकलेट डे' मना सकते हैं 😍 नोट- यह पोस्ट लिखी तो 'चॉकलेट डे' पर ही गई थी लेकिन पोस्ट करना भूल गए थे. इसलिए पोस्ट अगले दिन 10 फरवरी को की गई 😎

Saturday, January 31, 2026

Tuesday, January 20, 2026

आधे-अधूरे ख्याल-4

💭
कुछ लोग आपके नजदीकी नहीं होते लेकिन आपके नजदीक होते हैं.
💭
कोई-कोई खुशी इतनी बड़ी लगती है कि उसके बदले मिली तकलीफें छोटी लगने लगती हैं!
💭
जब जवान बेटा बीमार हो जाता है, तब बूढ़ा बाप जवान हो जाता है!
💭
तकलीफों में भी हमें मुस्कराना चाहिए क्योंकि मुस्कराने से तकलीफें भाग जाती हैं.
💭
कुछ लोग अपने को समझदार समझते हैं. हर किसी को अधिकार भी है अपने को समझदार समझने का. लेकिन दूसरे को बेवकूफ तो ना समझो. 
💭
मुश्किल वक्त में आदमी सबसे पहले अपना आत्म विश्वास खोता है. 
💭
जिंदगी की उलझनों को सुलझाते-सुलझाते आदमी एक दिन काफी सुलझा हुआ आदमी हो जाता है. लेकिन फिर उसके बाद वह अकेला भी हो जाता है! 
💭
आदमी जब चारों तरफ से मुश्किलों से घिर-सा जाता है. तो वह राहत के छोटे-मोटे रास्ते तलाशने लगता है. यह सोचकर कि क्या पता किस राह राहत मिल जाए. इसलिए कभी इस राह तो कभी उस राह. ना जाने कितने ही रास्तों से वह गुजरता रहता है. दरअसल वह यह सब इसलिए करता है क्योंकि बाद में वह अफ़सोस नहीं करना चाहता है कि अगर तू उस राह चला गया होता तो 'क्या पता' राहत का एक झोंका मिल गया होता. और ये जो 'क्या पता' है ना, ये आदमी के पैरों में पहिए लगा देता है. फिर आदमी रास्तों पर भटकता रहता है.
💭
जब लोगों के पास पैसे आ जाते हैं तो बड़े बोल भी आ जाते हैं.
💭
बुरे वक्त में अच्छी यादें दवा का काम करती हैं.
💭
कभी-कभी यूं ही मुस्कराकर दुखों को चिढ़ा देना चाहिए. 

Monday, January 12, 2026

प्यार के रंग सिनेमा में-2

 3.
माया- बिना बताए चले जाते हो. जाके बताऊं कैसा लगता है! 


4. 
महेंद्र बाहर गार्डन में बिस्तर पर लेटा हुआ थे. माया गर्म पानी और तौलिये से महेंद्र का बदन पोंछ रही थीं. पानी ज्यादा गर्म था. 



महेंद्र- बहुत गर्म है यार.
माया- ठीक है यार. जरा बर्दाश्त भी तो किया करो. बस दूसरे को ही जलाते रहते हो. कभी तुम्हारा भी तो धुआं निकले.
महेंद्र- बस.
माया- अभी और भी बाकी है. बड़े भद्दे पैर है तुम्हारे. 
महेंद्र- तुम्हारे मुंह से ज्यादा अच्छे हैं. 
माया- अपनी शक्ल देखी है कभी.
महेंद्र- तुमने देखी है?
माया- दिन रात वही तो देखती रहती हूं.

और माया महेंद्र के पैरों को चूम लेती हैं, जिससे 
पैरों पर लिपस्टिक का निशान लग जाता है. 

महेंद्र- ये क्या कर रही हो?
माया- तुम्हारे पैर खूबसूरत बना दिए. अपनी स्टेम्प लगा के. अब तुम खो नहीं सकते. खो जाओगे तो ये दिखा देना. 
महेंद्र- अरे क्या करुं तेरा.
माया‌- अचार डाल लो.
महेंद्र- तुझे लेकर तो फंस गया मैं. 
माया- यू नो मैं फंस गई. तुम्हारे साथ रह भी नहीं सकती हूं और तुम्हारे बिना भी रह नहीं सकती.

[ 'इजाजत' फिल्म से. ]

Monday, January 5, 2026

प्यार के रंग सिनेमा में-1


1. 

महेंद्र- अब भी माचिस रखती हो? पहले तो मेरे लिए रखती थीं और अब.  

सुधा- अब अपने लिए रखती हूं.

महेंद्र- मतलब सिगरेट पीना शुरु कर दिया क्या? 

सुधा- नहीं. आपकी भूलने की आदत नहीं गई. मेरी रखने की आदत नहीं गई.



2. 

महेंद्र- चश्मा कब से लगाने लगीं?

सुधा- दो-ढाई साल हो गए हैं. 

महेंद्र- अच्छा लगता है. समझदार लगती हो. 

सुधा- पांच साल पहले समझदार नहीं लगती थी?

महेंद्र- लगती थी. अब ज्यादा लगती हो. 

सुधा- आपने दाढ़ी कब से बढ़ा ली?

महेंद्र- कुछ दिनों से. क्यों मैं समझदार नहीं लगता?


['इजाजत' फिल्म से ]


Sunday, December 28, 2025

सुनो आखिर कब तक तुम सपनों में आती रहोगी...

13.


सुनो 

कभी-कभी 

यूं ही बैठे-बैठे 

सोचता हूं मैं 

तुम अपने मन की बातें 

अब किससे कहती होंगी?


14.


सुनो 

पता है तुम्हें 

तुम मुझे इतनी अच्छी क्यों लगती थीं 

दरअसल तुम मुझे समझती थीं 

इसलिए इतनी अच्छी लगती थीं.


15.


सुनो 

आखिर कब तक तुम 

मेरे सपनों में आती रहोगी 

कभी सपनों से निकलकर 

मुझसे मिलने आओ 

बहुत कुछ कहना है मुझे 

कुछ तुम्हें भी तो कहना होगा.


Friday, December 19, 2025

आधे-अधूरे ख्याल-3

💭
ना किसी को तलब होती हमारी
ना किसी को याद आते हम
सच-सच बताना तुम
क्या इतने बुरे थे हम

💭
श्रीराम सेंटर के बाहर खड़ी
वो सांवली-सी खड़ी लड़की
सिगरेट के छल्लों से
जिंदगी की उलझनें
सुलझा रही थी शायद.

💭
गली के उस मोड़ पर
एक पल को ठहर जाता है वो
क्या पता आज भी
चाँद झांकता हो
उस घर के छज्जे से.

💭
वो भी क्या दिन थे लड़कपन के
जब फ्रेम जड़ी उनकी फोटो के पास
एक गुलाब का फूल रख दिया करते थे.

Friday, December 12, 2025

सुनो मुझे भूल तो नहीं जाओगी ना तुम?

12.

सुनो 

पता है तुम्हें 

बीती रात के अंतिम पहर में 

मैंने तुम्हारे सारे खतों के 

पुर्जे-पुर्जे कर दिए 

पुर्जे करने से पहले 

मैं उन्हें एक-एक कर पढ़ता रहा 

पढ़कर

कभी खुश होता  

कभी उदास  

और 

कभी तो ऐसा लगता 

जैसे तुम ही कमरे में बैठी 

एक-एक ख़त को पढ़कर सुना रही हो

'आज मैंने तुम्हारे लिए 

पूरे-पूरे दो पेज भर दिए हैं

है ना

क्या इनाम दोगे!' 

क्या इनाम दिया था मैंने 

याद आया कुछ तुम्हें?


कुछ देर बाद 

फिर तुम कहती हो 

'पढ़ लिया कि नहीं 

मैं आ जाऊं क्या

बुला ले ना

मैं पढ़कर सुना दूंगी 

आऊं मैं!'

और 

तुम आजतक ना आ सकीं

और अब 

ये ख़त भी नजर नहीं आएंगे 

बिल्कुल तुम्हारी तरह

वैसे कितने साल हो गए 

हम दोनों को मिले हुए? 

याद आया कुछ तुम्हें?

 

वैसे तुम्हें पता है 

इन खतों के टुकड़े मैंने क्यों किए 

दरअसल  

शरीर साथ नहीं देता अब 

एक दर्द को सुलाता हूं 

तो दूसरा जाग जाता है

दूसरे को बहलाता हूं 

तो तीसरा नाराज हो जाता है

आखिर किस-किस दर्द की दवा करूं मैं अब 

बस इन्हीं में उलझा कभी-कभी  

हाथ की रेखाओं को देखा करता हूं 

अब तो ये भी टूटने लगी हैं 

अपनी राह से भटकने लगी हैं 

बल्कि पता है तुम्हें 

जीवन रेखा तो कब की दो टुकड़े हो चुकी 

उस टूटी रेखा को देख 

डर-डर जाता हूं मैं अब

पहले तो डरा सहमा तुम्हारे लिखे ख़त 

पढ़ लिया करता था

थोड़ा बहुत अपने आपसे 

हंस बोल लिया करता था  

फिर एक दिन अपने डर से ही 

तुम्हारा डर याद आया

जो तुमने किसी रोज एक ख़त में लिखा था 

'ये ख़त कभी किसी के हाथ लग गए तब क्या होगा?' 

सच में तब क्या होगा

मैंने भी ये सोचा था 

इसलिए 

सारे ख़तों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए 

बीती रात मैंने 

क्या पता 

जीवन रेखा पर चल रहा मेरी सांसों का पहिया 

कब टूटी जीवन रेखा के पास आकर थम जाए 

कब मेरा जीवन खत्म हो जाए

लेकिन 

जिंदगी के इस अंतिम पहर में  

आखिरी ख्वाहिश की तरह 

दिल चाहता है एक बार फिर से 

तुमसे मिलना 

मुझसे मिलने तुम जरुर आना 

और फिर 

पहले की तरह 

चुपके से मेरे हाथ में 

एक छोटा-सा ख़त थमा जाना 

जिससे जान जाऊं मैं हाल तुम्हारा 

और फिर 

निकल जाऊं मैं अकेले ही 

यह दुनिया छोड़कर कहीं दूर 

बहुत दूर.


यूं भी तुम्हीं ने तो एक ख़त में लिखा था 

'सब अकेले ही इस दुनिया में आते हैं 

और अकेले ही जाते हैं

आज तक कितनों ने साथ मरने की कसम खाई होगी

किसी से भी पूछ के देख  

कौन किसके साथ जिया

और किसके साथ मरा 

ये तो किसी को पता नहीं

हम साथ-साथ मरेंगे नहीं 

केवल साथ-साथ जिएंगे

बस

और कुछ नहीं

तू मरने का नाम मत लिया कर 

क्योकिं मरने के बाद सब भूल जाते हैं

साथ मरने की नहीं 

बस साथ जीने की दुआ मंगाकर

समझा

अब खाएगा मरने की कसम.'

याद आया कुछ तुम्हें? 


मुझे यकीन है

तुम्हें सब याद होगा

मन के किसी एक कोने में

सब कुछ छुपाकर रखा होगा

लेकिन

एक बात तो बताओ  

मेरे मरने के बाद 

मुझे भूल तो नहीं जाओगी ना तुम?

सच-सच बताना 

तुम्हें मेरी कसम.

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