Saturday, September 26, 2026

क्या खोया, क्या पाया, क्या कमाया ?

कभी-कभी आपकी ख़राब चीज भी आपकी पहचान बन जाती है. दरअसल हुआ कुछ यूं कि एक काफी महंगी दवा थी, जोकि कुछ महीने तक चलनी थी. इसलिए दिमाग में ख़याल आया कि कहीं से थोड़ी छूट मिल जाए तो सहारा-सा लग जाए. कुछ देर यूं ही सोचता रहा. दिमाग पर फिर थोड़ा जोर डाला तो एक मेडिकल स्टोर वाले राजू जी की की तरफ ध्यान चला गया. उनसे दुआ-सलाम थी बस. जब भी दवा लेने जाता था. तो उनसे दवा लेने के अलावा भी बातचीत हो जाती थी. कभी आम बात. कभी राजनीतिक वाली बातें. लेकिन उनके मेडिकल स्टोर तक जाना मेरे लिए तब संभव नहीं था. उनका फोन नंबर तो था. वहीं समस्या ये भी थी कि वे मुझे शक्ल से तो जानते थे लेकिन नाम से नहीं. खैर मैंने फोन मिला ही दिया. और कोई चारा भी नहीं था. 


फोन उठाते ही वे बोले, ' हेल्लो.'
इधर से मैं बोला,' राजू भाई, मैं सुशील बोल रहा हूं. आप मुझे शायद नाम से नहीं जानते हैं लेकिन शक्ल से पहचानते हैं. कैसे हैं आप?

वे बोले, 'मैं ठीक हूं. आप बताएं.'

'दरअसल अब कैसे कहूं.अगर आप पहचान जाते तो मैं कुछ बोल पाता.' मैं बोला.

वे तुरंत ही बोले, 'आप बोलिए. मैं आपको पहचान गया हूं.'

'मैं झट से बोल पड़ा, ' आपने कैसे पहचान लिया?

'वे बोले, 'आपकी आवाज से.'

'सच में आपने आवाज से पहचान लिया.' मैं अचम्भे से बोला.

'हां, आपकी आवाज ही आपकी पहचान है.' वे हंसते हुए बोले.


अब मेरे लिए आसान हो गया था बात करना. और फिर उनसे काफी देर तक बातें हुईं. जैसे पहले होती थीं. उसी लहजे में. बातचीत में पता चला कि इनको मेडिकल लाइन छोड़े हुए करीब डेढ़ साल हो गया. वे अब दूसरा काम करने लगे हैं. लेकिन इन्होंने कहा कि आप एक काम कीजिए. मैं आपको एक फोन नंबर दे रहा हूं. आप इनसे बात कर लीजिए. आपको दवा पर उतनी छूट मिल जाएगी, जितनी मैं देता. मैं उनको फोन कर देता हूं. आप जब चाहे तब जाकर दवा ले लेना. आखिर में उन्हें नए काम की शुभकामनाएं देने के बाद बात खत्म हो गई.


बाद में यही बात मैं बेटी को बताने लगा कि वो मेडिकल स्टोर वाले राजू जी से बात हो गई है. बातचीत जैसे-जैसे हुई. वैसे-वैसे बता दी दी. 

बेटी मेरी बातें सुनकर कहने लगीं कि 'फिर तो आप बहुत खुश होंगे?' 

मैंने पूछा,' वो क्यों?' 

तो वे मजाक वाले लहजे में कहने लगीं,' अब तो लोग आपको आपकी आवाज से भी पहचानते हैं!' 

मैं इस बात पर थोड़ी देर तक हंसता रहा! जैसे बेटी ने कोई चुटकला सुनाया हो!

फिर बाद में बैठा-बैठा सोचने लगा कि पहचान क्या होती है? आदमी किस-किस चीज से पहचाना जा सकता है. क्या वह अपने नाम से पहचाना जाता है?  या अपने काम से?  या फिर अपने व्यवहार से. लोग उसको उसके नाम की वजह से याद रखते हैं या फिर उसके व्यवहार की वजह से. पहचान या याद रह जाने में पद और पैसा कितना रोल अदा करता है? फिर बाद में बैठे-बैठे ऐसी ही सोचते-सोचते अपने आप से पूछने लगा. बेटा, क्या खोया, क्या पाया, क्या कमाया, आज तक?

जवाब मिला. कुछ भी तो नहीं. ना ही पैसा बना पाया. ना नाम ही कमा पाया. गाड़ी-बंगला, बैंक बैलेंस...हा हा. मन ही मन में मैं हंसने लगा. यह हंसी वो हंसी नहीं थी. जो बेटी की बात सुनकर आई थी. ये हंसी कुछ और ही कहानी कह रही थी.

फिर जब बिस्तर पर सोने के लिए गया. तब किसी रात को कही बेटी की बात याद आ गई. सोने से पहले एक बार किसी टॉपिक पर चर्चा हो रही थी, जैसी हम बाप-बेटी के बीच अक्सर चर्चा होती रहती है. अब याद नहीं किस बात पर चर्चा थी. लेकिन ये याद है कि आखिर में मैं ऐसी ही बातें बेटी से कहने लगा था. शब्दों का हेर-फेर रहा होगा. परंतु भाव यही था. बेटी काफी देर तक मुझे सुनती रहीं. मैं अपने दिल के अंदर का सारा गुबार निकालता रहा. 


फिर जब थोड़ा गुबार निकालकर चुप हुआ. थोड़ी-सी सांस ली.

तभी मौक़ा देखकर बेटी बोलीं,' अब मैं कुछ बोलूं.'

'हां बोलो' मैं बोला.


ये जो आपकी जान-पहचान में पत्रकारों, एडिटर्स, प्रोफेसरों, लेखकों, डॉक्टर, बड़े पद पर बैठे अफसरों का सर्किल है और ये जो आपके बचपन के दोस्त हैं ना. वो सब के सब बिना आपके बड़े पद, बिना पैसे, बिना गाड़ी, बिना बंगले के बने हैं. इन सबने जो आपके अंदर देखो होगा, आप समझो कि वही आपकी कमाई है. वही आपने अब तक कमाया है. बस सीधा सिंपल.' वे बोलीं.


मैं अपनी आदतनुसार फिर से सोचने लगा. 'क्या ये बात सच में इतनी सिंपल है?' 


Wednesday, September 9, 2026

एक बोलो, राजमा या दाल?

ग्राहक- भैया चावल हैं?
दुकानदार- हां हैं.
ग्राहक- तो भैया एक प्लेट दे दो.
दुकानदार- राजमा डालूं या दाल?
ग्राहक- दोनों डाल दो भैया, थोड़ी-थोड़ी.
दुकानदार- एक बोलो, राजमा या दाल?
ग्राहक- चलो भैया राजमा डाल दो.


[चंद सेकंड बाद.]

ग्राहक- भैया, दो रोटी कितने की हैं?
दुकानदार- दस रुपए की.
ग्राहक- रहने दो फिर!


Sunday, August 2, 2026

पुरानी जींस और गिटार. घर की वो छत और मेरा यार...

हम बाप-बेटी और पत्नी किसी एक्सीडेंट पर चर्चा कर रहे थे. बात एक्सीडेंट से होते हुए ना जाने किधर-किधर चली गई. फिर आखिर में किसी बात पर मेरे द्वारा एक दोस्त का जिक्र आ गया.

और फिर चर्चा के बिल्कुल आखिर में बेटी मेरे से मुखातिब होकर कहने लगी कि 'जब भी हम किसी रिश्ते-दोस्ती की बातें करने लगते हैं तो आपकी तरफ से आपके इन दोस्त का जिक्र आ ही जाता है. जैसे आज फिर से आ गया 😍'

अभी फेसबुक पर आया तो पता लगा आज तो 'फ्रेंडशिप डे' है. तब से सोच रहा हूं 'फ्रेंडशिप डे' के दिन किसी दोस्त का याद आना. एक अच्छे दोस्ती की निशानी कहा जाएगा है या नहीं?


चाहे अब संपर्क ना होता हो. और ना ही अब किसी तरह की बातचीत भी होती हो!

पर मैं सोच रहा हूं कि आज के दिन वो दोस्त हो या ना हो. क्या ही फर्क पड़ता है यार. जिंदगी में बहुत कुछ घटता ही है. बहुत लोग जुड़ते हैं. कुछ लोग छूट जाते ही हैं.  पर उनसे जुड़ी यादें और उनसे जुड़े किस्से तो याद ही किए जा सकते हैं. संग-संग बिताए पुराने दिनों की खुशबू को तो महसूस किया ही जा सकता है. उनमें रंग भरा जा ही सकता है. उनसे एक पेंटिंग बनाई ही जा सकती है. और फिर दिल के किसी कोने में वो सजाई भी जा ही सकती है. जिसमें जब हम लड़ते-झगड़ते हुए भी साथ-साथ 234, 108, 262, 269, 212 नंबर की बसों से सफर किया करते थे.. साथ ही स्कूल की आधी छूट्टी में  रूपनगर के एक पार्क में साथ साथ बैठकर ही खाना खाया करते थे. जिसमें घर के खाने के साथ 'नैन सिंह' के छोले जरुर हुआ करते थे. वहीं साथ-साथ ही पार्क से थोड़ी दूर ही 'साधू बेला' में जाकर ठंडा-ठंडा पानी पिया करते थे. इवन बाद में साथ-साथ ही बाथरूम भी जाया करते थे 😜 क्लास के बाकी साथी इस बात का खूब मजाक भी बनाया करते थे 😂 और हम दोनों की जोड़ी को 'जय-वीरू' की जोड़ी कहा करते थे 😂

खैर...

पुरानी जींस और गिटार

मोहल्ले की वो छत

और मेरे यार.......


Wednesday, April 29, 2026

प्यार के रंग सिनेमा में- 3

5.

सलीम- अपने आप को सोने की चिड़िया क्यों कहा तुमने.

नजमा- बस यही नहीं बता सकती, अगर कहीं आप समझ गए, मुझे माफ कर दीजिए, और ना समझे तो भूल जाईएगा. 

सलीम- भूलने की शर्त तुम नहीं लगा सकती.

नजमा- आप मुझ से तो ज्यादती कर ही रहे हैं, अपने फन के साथ भी इंसाफ नहीं कर रहे.

सलीम- जो फन तुम्हारे और मेरे बीच दीवार बन जाए,मैं उसे छोड़ना पसंद करुंगा.

नजमा- मैं आपके फन की बहुत कद्र करती हूं सलीम साहब.

सलीम- लेकिन चाहती नहीं मुझे .

नजमा- आपसे शादी नहीं कर सकती, खुदा हाफिज.

सलीम- सुनो अगर कहीं मुलाकात हो गई.तो पहचान लोगी मुझे. 

नजमा- सलाम जरुर करुंग़ी. 

['बाजार' फिल्म से]

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