पिछले कई दिनों से आस्ट्रेलिया से आई 'चॉकलेट' को खाते हुए सोच रहा था कि 'चॉकलेट' के बारे में कुछ लिखूं. कुछ बातें थीं. कुछ यादें थी. कुछ बाहर से आईं चॉकलेट का स्वाद ही ऐसा था, जो बार-बार कहता था चॉकलेट खाकर वाह-वाह तो कर रहे हो. कुछ तो लिख दो मेरी तारीफ में. लेकिन टलता रहा. आदमी का एक उम्र के बाद चीजों के प्रति थोड़ा चाव कम-सा हो जाता है. वो चीजों को टालता रहता है. पर मैं तो इतना भी उम्रदराज नहीं हुआ हूं. फिर भी ऐसा क्यों?. बस इन्हीं सवालों के बीच आज जब पता चला कि आज तो 'चॉकलेट डे' है तो फिर रहा ही नहीं गया. विदेशी 'चॉकलेट' के स्वाद ने आखिरकार लिखने बैठा ही दिया.
वैसे 'चॉकलेट' का मैं कोई ज्यादा शौक़ीन नहीं रहा हूं. लेकिन एक बार क्या हुआ. एक रिश्तेदार राम मनोहर लोहिया अस्तपाल, जिसे विलिंगडन अस्पताल भी कहा करते थे, में दाखिल थे. अस्तपाल में देर रात तक रुकना पड़ा. खाने को कुछ था नहीं. बाहर खाने को कुछ ख़ास मिला नहीं. थक-हारकर एक 'चॉकलेट' ले ली थी. जब खाई तो बेहद स्वादी लगी. वो साइज़ में थोड़ी छोटी थी. एक से कहां पेट भरने वाला था. बस फिर क्या था. जेब में कई सारी 'चॉकलेट' खरीदकर डाल लीं. रात इन्हीं 'चॉकलेट' के सहारे कटी. बस फिर क्या था. जब कोई मुश्किल वक्त में साथ दे उसे भूला तो नहीं सकते हैं ना. उस 'चॉकलेट' का स्वाद जीभ पर बना रहा. गाहे-बगाहे खाते रहते थे. वैसे उस 'चॉकलेट' का नाम 'BARONE' था. बाद में वो आना बंद हो गई. मेरा चॉकलेट' खाना भी बंद-सा हो गया. वो अलग बात है कभी कभार दूसरी 'चॉकलेट' खा लेता था. पर उन 'चॉकलेट' में वो बात नहीं थी, जो 'BARONE' में थी. वो कहते हैं ना जो स्वाद जीभ से उतरकर दिल में बस जाए वो भुलाए भूलता है क्या भला? वो पहले प्यार की तरह याद रहता है.
फिर ब्लॉग की दुनिया का उदय हुआ. इंटरनेट पर ब्लॉग लिखे-पढ़े जाने लगे. कोई अपने मन की बात लिखता था. कोई राजनीति पर लिखता था. कोई साहित्य पर लिखता था. बाद में दिल्ली में जगह-जगह ब्लॉगर की बैठकी होने लगी थीं. उन्हीं बैठकी में से एक बैठकी 'सिविल लाइन' के 'सीएसडीएस' में हुई. जहां हम भी गए हुए थे. अब याद नहीं वह बैठकी किस विषय पर रखी गई थी लेकिन इतना पता है, वहां एक ब्लॉगर जर्मनी से आए थे. नाम अभी याद नहीं आ रहा. शक्ल याद है. वे दाढ़ी रखते थे. वे अपने साथ जर्मनी की 'चॉकलेट' लाए थे. बैठकी में आए सभी ब्लॉगर को वो 'चॉकलेट' दी गई थी. शायद गोल-सी टॉफ़ी नुमा वो 'चॉकलेट' थी. जहां तक मुझे याद है वहां किसी ने ये बताया था कि इस 'चॉकलेट' के अंदर वाइन है या इसमें वाइन जैसा स्वाद आता है. ऐसा ही कुछ. आपां तो पहली बार ऐसा सुन रहे थे. आपां ने ऐसी 'चॉकलेट' कभी नहीं खाई थी. आपां तो 'BARONE' खाने वाले लोग थे. खैर हमें भी वह 'चॉकलेट' मिली लेकिन उसमें वाइन की बात सुनकर आपां उसे ना खा पाए. घर आकर वो 'चॉकलेट' पिताजी को दे दी. पिताजी के लिए वह पहली 'चॉकलेट' रही होगी शायद. हमारी 'BARONE' के जैसे. अब हमें नहीं पता कि उन्हें वह 'चॉकलेट' पसंद आई थी कि नहीं.
फिर दिन बीते. साल बीते. एक दिन काजल जी विदेश घूमने गए. जब वे वापिस आए तो एक दिन उनका मैसेज आया. ' एक माइक्रो गिफ्ट आपके लिए भी लाए हैं. अब मिलने का उपक्रम आपको करना होगा.' ये मेरे लिए सरप्राइज था. सरप्राइज ने मुझे बेहद खुश कर दिया था. बहुत दिनों के बाद ऐसा सरप्राइज मिला था, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल था. वैसे भी गिफ्ट मिलना किसे पसंद नहीं और अगर वो सरप्राइज भी हो तो खुशी दोगुनी हो जाती है. मैं बाहर से बच्चे की तरह खुश था. और अंदर ही अंदर बड़ों की तरह भाव विभोर था. दरअसल ऐसे सरप्राइज देना मुझे अच्छा लगता है. अपने दोस्तों को बहुत बार ऐसे सरप्राइज मैंने दिए भी हैं. एक बार अपने दोस्त की शादी की सालगिरह पर हम पति-पत्नी रात को केक लेकर उनके घर पहुंच गए थे! दोस्तों से कुछ ऐसे ही सरप्राइज मुझे मिले भी हैं. वैसे ऐसे सरप्राइज के किस्से कई सारे हैं लेकिन उनकी बातें फिर कभी. आज सिर्फ 'चॉकलेट' की बातें. पर ये सरप्राइज कुछ अलहदा-सा था. मिलने का कार्यक्रम तय हो गया. बेटी साथ थी. हम मिले. काजल जी से मिलकर बेहद अच्छा लगा. फिर जब वो सरप्राइज देखा. सच में दिल खुश हो गया. मैंने सच में सोचा नहीं था कि ऐसा सरप्राइज गिफ्ट मिलेगा. सरप्राइज गिफ्ट के साथ ढेर सारी 'चॉकलेट' भी मिली थीं. वे 'चॉकलेट' इतनी स्वादी थीं कि मत पूछो. जिंदगी में पहली बार विदेशी 'चॉकलेट' का स्वाद ले रहा था. 'चॉकलेट' मुंह में डालते ही ऐसे पिघल जा रही थी जैसे नूनी घी मुंह में डालते ही पिघल जाता है. बेटी से ज्यादा वे 'चॉकलेट' मैंने खाईं थी. इन्हें खाने के बाद फिर से 'चॉकलेट' खाने की इच्छा परवान चढ़ी चुकी थी. वो भी विदेशी 'चॉकलेट' 😍
फिर बाद में जब बेटी की मौसेरी बहन आस्ट्रेलिया गईं तो उनसे कहा गया कि जब वे दिल्ली आएं तो वहां की 'चॉकलेट' हमारे लिए जरुर लाएं. वे जब दिल्ली अपने घर आईं तो साथ में खूब सारी 'चॉकलेट' लाई थीं. हम फिर से खुश. अभी हाल ही में जब बेटी की मौसी जी अपनी बेटी से मिलने आस्ट्रेलिया गईं तब भी उन्हें आस्ट्रेलिया की 'चॉकलेट' लाने को कहा गया. काजल जी ने विदेशी 'चॉकलेट' के स्वाद का ऐसा चस्का लगा दिया है कि मन करता है कोई ना कोई विदेश जाता रहे. विदेशी 'चॉकलेट' लाता रहे. और मैं विदेशी 'चॉकलेट' खाता रहूं. स्वाद ही ऐसा होता है. अब जब बेटी की मौसी जी आस्ट्रेलिया से आने के बाद पिछले हफ्ते हमारे घर आईं तो खूब सारी 'चॉकलेट' लेकर लाईं थीं. तब से वहीं 'चॉकलेट' खाई जा रही हैं. जीभ से उनका स्वाद लिया जा रहा. जुबां से वाह वाह कहा जा रहा है. पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि बाहर की 'चॉकलेट' यहां की 'चॉकलेट' से अच्छी होती हैं. पता नहीं ऐसा मेरा भ्रम है या फिर बाहर की 'चॉकलेट' वाकई इतनी लज़ीज़ होती हैं. आप 'चॉकलेट' खाकर, अपना अनुभव बता सकते हैं और 'चॉकलेट डे' मना सकते हैं 😍 नोट- यह पोस्ट लिखी तो 'चॉकलेट डे' पर ही गई थी लेकिन पोस्ट करना भूल गए थे. इसलिए पोस्ट अगले दिन 10 फरवरी को की गई 😎

