संघर्ष का रंग- “अभी हाथ नही गड़े धरती में मेरे”
जिंदगी की शुरुआत संघर्ष रंग से ही होती है। बाकी के रंग जिंदगी में आते जाते रहते हैं। पर ये रंग आपकी जिंदगी से ऐसा रंग जाता है कि छूटता ही नहीं। फीका हो जाता है पर छुटता नही है। जिस घटना की इस रंग के रुप चर्चा कर रहा हूँ उससे ज्यादा मुझे किसी चीज के लिए संघर्ष नही करना पड़ा। बात उन दिनों की हैं। जब छोटी बहन की तबीयत ऐसी खराब हुई कि खिलखिलाते चेहरों पर उदासी का रंग चढ़ गया था। और जिस घर में खूब चहल पहल हुआ करती थी वो घर अब खामोश सा रहने लगा था। बसों में धक्के खाते हुए, सरकारी अस्पताल की लम्बी लाईनों में घंटो खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार करना। काफी दिन तो अलग अलग टेस्टों में ही गुजर गए। बस चंद दिनों में एक स्वस्थ बहन एक लकड़ी सी बन गई थी। सब कुछ छोड़कर बस मुझे यही सूझता था कैसे भी इसे बचाना है। तीन महीनों के बाद एक टेस्ट की रिपोर्ट आई जिससे बीमारी और दवाई का पता चला। खैर डाक्टर साहब ने दवाई लिख दी। जब दवाई लेने गए तो पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। इतनी तो इनकम भी नही जितनी की दवाईय़ाँ लिखी गई है। और ऊपर से तनखा भी समय पर नही मिलती थी पिताजी को। मुझे याद है जिस दिन तनखा मिलती थी पिताजी को उसी दिन आते ही मेरे हाथ में तनखा रखकर कहते थे "कल सुपर बाजार जाकर दवा ले आना" खैर दवाईयाँ चलती रही। नौकरी कर नही सकता था क्योंकि अस्पताल बहुत जाना पड़ता था। दिमाग में आया कि टयूशन पढ़ाया जाए और सरकारी नौकर बनने के लिए तैयार करनी चाहिए। उन दिनों जब भी वक्त मिलता था मैं हरदयाल लाईब्रेरी भी जाया करता था पेपरों की तैयारी के लिए। उस वक्त शायद मैं बीकाम की आखिरी साल की परीक्षा दे चुका था। समझ नही आता था जब सारी तनखा दवाईयों और दूसरे अस्पताल के खर्चों में चली जाती है तो घर कैसे चलता है। और टयूशन पढ़ाकर भी ज्यादा पैसे कमा नही पाता था। इसी बीच मुझे एक छोटा लड़का मिला जिसने मुझे ईमानदारी का पाठ पढाया वो भी उस वक्त जब पैसे की खातिर मेरे भटकने की गुंजाईश ज्यादा थी साथ ही गलत रास्ते पर भी जा सकता था क्योंकि पैसो की बहुत जरुरत थी। बात कुछ यूँ थी कि वह लड़का मेरे पास आया और बोला अंकल जी एक रुपया दे दो। भूख लगी है ब्रेड खाऊँगा। मैंने उसे दो रुपये का सिक्का दे दिया। फिर वह ब्रेड लेकर आया और मुझे इक रुपये का सिक्का वापिस देकर चला गया। भूख की खातिर भी वह लड़का नही भटका। और मुझे जिंदगी का एक नया पाठ और एक नया रंग दिखा गया। खैर दवाई चलती रही। पर बहन की तबीयत में बहुत मामूली सुधार दिख रहा था पर जैसी उम्मीद डाक्टर को थी वो सुधार कहीं नजर नही आ रहा था। डाक्टर के पास दवाई बदलने का चारा भी नही था। कोई सात महीने बाद अचानक मेरी निगाह नीचे पडी एक गोली पर पड़ी जोकि बहन के स्कूल बस्ते के पास थी। बस्ते को खोला गया तो आँखे फटी की फटी रह गई। उसके अंदर काफी गोली और केप्सूल रखे हुए थे। डाँट कर बहन से पूछा तो पता चला कि वो हमारे सामने एक ही गोली को खाती थी बाकी गोलियों को नहीं। बची दवाईयों को नाली में बहा देती थी और जिनको नही फैंक पाती थी उसे बस्ते में डाल देती थी। क्योंकि उसे वो दवाईयाँ कड़वी लगती थी। अजीब सी हालत हो गई थी हम सब की। खासकर पिताजी की। सारा पैसा पानी में चला गया। पहले ही इतना कर्ज हो चुका था। मैं सोचने लगा अब आगे क्या होगा। अगले दिन हम सब बैठे हुए थे तब मैंने पिताजी से पूछा “अब क्या होगा पापा?” उनका जवाब एक लाईन में आया “अभी हाथ नही गड़े धरती में मेरे” और बाहर निकल गए। आज भी कोई परेशानी आती है तो पिताजी के कहे ये शब्द मुसीबतों से लड़ने का ज़ज़्बा दे जाते है। बाद में डाक्टर ने कहा कि ये ही दवाईयाँ चलेगी उतने ही दिन। खैर छोटी बहन तब जी गई..............
शब्दों के रंग- जूझोगे तो जीओगे।
आदमी को चाहिए वह जूझे,
एक स्वप्न टूटे, तो दूसरे गढ़े।
-अज्ञात
हँसी का रंग- बंदर की पूछ


