खिलौनों के साथ किताबें-पेंसिल भी पकड़ने लगे हैं.
जुबां अब इसकी तुतलाती नहीं है
द,आ का डंडा,दा,द ऊ की मात्रा,दू,दादू पढ़ने लगी है.
फरमाईशें छोटी-छोटी करती है
सपने बड़े-बड़े देखती है.
कभी अकेले कमरे में बच्चों को पढ़ाती मिलती है
कभी हम सबको सुई लगाती फिरती है
स्कूल जाते वक्त कभी रोती नहीं
होम-वर्क किए बगैर कभी सोती नहीं.
कभी-कभी सहेलियों की देखा-देखी
बाइक से स्कूल जाने को कहती है.
समझाने पर पैदल ही मुस्कराती चली जाती है.
देख कर इसकी मासूमियत दिल भर आता है
फिर इसके बड़े-बड़े सपनो की खातिर
बहुत कुछ करने को जी चाहता है.
- नैना के पापा
