कबाड़ी
चिड़ियों का अलार्म सुनकर
कूड़ॆ के ढेर में से वह उठता है।
डाल कंधे पर प्लास्टिक का बोरा
बिना खाये वह गली-गली घूमता है।
देख उसे कुत्ते भोंकते है
लोग नाक मुँह सिकोड़ते है।
कड़ी धूप हो या ठुठरती ठंड़
बोरे से अपना शरीर वह ढकता फिरता है।
जिन जगहों को देख हम मुँह पर रुमाल रखते है
ऐसी जगहों को देख वह मचल उठता है।
दोपहर बाद अपने घर की राह चलता है
करके बोरे को खाली वह गत्ते, प्लास्टिक और लोहे को छाँटता है।
बेचकर उस कबाड़ को कुछ रुपये कमाता है
घर आकर फिर वह चूल्हा सुलगाता है।
ना वो मोहन, ना वो हुसैन
ना वो बेदी, ना वो जोसफ कहलाता है
वो तो बस एक कबाड़ी पुकारा जाता है।