समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई
समाजवाद उनके धीरे धीरे आई
हाथी से आई, घोड़ा से आई
अंग्रेज़ी बाजा बजाई, समाजवाद बबुआ.....
आंधी से आई, गांधी से आई
बिरला के घर में, समाजवाद बबुआ.....
नोटवा से आई, वोटवा से आई
कुर्सी के बदली हो जाई, समाजवाद बबुआ.....
कांग्रेस से आई, जनता से आई
झंड़ा के बदली हो आई, समाजवाद बबुआ.....
रुबल से आई, डालर से आई
देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद बबुआ.....
लाठी से आई, गोली से आई
लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद बबुआ.....
मंहगी ले आई, गरीबी ले आई
केतनो मजूर कमाई, समाजवाद बबुआ.....
छुटवा के छुटहन , बड़्वा के बड़हन
हिस्सा बराबर लगाई, समाजवाद बबुआ.....
परसो ले आई, बरसो ले आई
हरदब अकासे तकाई, समाजवाद बबुआ.....
धीरे धीरे आई, चुप्पे चुप्पे आई
अंखियन पे पर्दा लगाई
समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई ................
गोरख पाण्डेय
कल कमाल खान जी ने एक स्टोरी में गोरख जी की लिखी दो लाईन कहीं तो एकदम मुझे उनकी लिखी पूरी रचना याद हो आई। फिर मन किया क्यों ना आप साथियों के साथ भी बांट दूँ। आप बताए कैसी लगी। वैसे अब तक जितना भी गोरख पाण्डेय जी का लिखा पढा है सब दिल को छुआ है। इसलिए उनको दिल से शुक्रिया।