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Wednesday, July 8, 2009

चंद मुलाकातों का साया

कुछ यादें, कुछ बातें गुरु की।

एक तगड़ा शरीर, एक कड़क आवाज़ और एक सांवला चेहरा जब कफ लगे हुए सफेद कुर्ता पाजाम पहनकर निकलता था तो छात्र ही क्या, टीचर भी अपनी अपनी क्लास में घुस जाया करते थे। जिस दिन नही आए तो समझो बच्चों और टीचरों की मौजा ही मौजा। कोई भी काम समय पर नही, ना ही समय पर घंटी बजेगी। ना ही समय पर टीचर  कक्षाओं में पहुँचेगे। और ना ही बच्चें पढ़ॆगे। जिसे देखो वही इन्हें कौसता मिलेगा। वो चाहे बच्चें हो, टीचर हो या फिर अभिवाहक। फिर भी हर अभिवाहक अपने बच्चों को इसी स्कूल में पढाना चाहता है। वो भी प्रिंसीपल सर श्री राजबीर सिंह बंसल जी के रहते हुए। वजहें बहुत है। पर सबसे बड़ी वजह है स्कूल में अच्छी पढ़ाई का होना। हर साल स्कूल का बहुत ही अच्छा रिजल्ट आना। और हर साल अपने जोन में शीर्ष पर रहना।


सुबह की प्रार्थना के लिए सभी छात्र और छात्राऐं निकल रहे हैं कक्षाओं से। हम भी निकल रहें हैं बाजुओं को नीचे करके और अपनी घड़ी को छिपाते हुए। स्कूल के स्टेज के उल्टे हाथ की तरफ लड़कियाँ और सीधे हाथ की तरफ लड़के। "तुम ही हो माता पिता भी तुम, तुम ही हो बंधु सखा भी तुम हो......" प्रार्थना के ये शब्द स्कूल में गूंज रहे हैं। प्रार्थना के बाद राष्ट्रगान होता हैं। जिस समय अवधि में ये होना चाहिए उस समय अवधि में ही होना चाहिए ये सर का आदेश है। खैर आज राष्ट्रगान एक ही बार हुआ। सर स्टेज पर आ चुके हैं। सर हमेशा की तरह बिना लिखा भाषण देना शुरु करते हैं। वो भाषण केवल भाषण नही होता है नेताओं के भाषण की तरह, उस पर अमल करना भी जरुरी होता है। इसी अमल के कारण सारे टीचर कुढ़ते रहते हैं इनसे। तभी सर की निगाह दो बच्चों पर पड़ती है जो मेरे पीछे बैठे हैं। भाषण अधूरा छोड़कर उन्हें स्टेज पर बुला लिया जाता है। तूफान से पहले की शाँति चारों फैल चुकी है। एक सवाल की गूँज शांति को भंग करती है। "किस बात पर हँसी आई तुम दोनों को?" जवाब ना मिलने पर एक लड़के को एक थप्पड़ रसीद कर किनारे कर दिया जाता है। फिर दूसरे लड़के से वही सवाल पूछा जाता है? जवाब ना मिलने पर फिर जो थप्पड़ो का सिलसिला चलता है वह कई मिनट तक नही रुकता। दोस्त को पीटता देख अच्छा नही लगता है। पर क्या करुँ वो मेरा दोस्त बाद में हैं, उससे पहले वो उनका लड़का है।

पता नहीं किस साल की बात है। पर इतना पता है कि मैंने सरकारी स्कूल से पाँचवी कक्षा पास की थी। पिताजी और अंकल जी मेरा नाम घर के पास के प्राइवेट स्कूल "ज्ञान सरोवर"  में कराने ले जाते है। वहाँ एक व्यक्ति मेरे से कई सवाल पूछता है। मैं सोचता हूँ ये तो टीचर नही हो सकते है फिर क्यों सवाल पूछ रहे हैं? और मैं उनको सही जवाब दे देता हूँ। वो खुश होते है पर मैं खुश नही हूँ क्योंकि मुझे इस स्कूल में दाखिला नही लेना है। मैं कह देता हूँ "मुझे तो "जन-कल्याण स्कूल" में ही दाख़िला लेना।", वो पूछते है "उसी स्कूल में ही क्यों लेना है बेटा?" मैंने तपाक से कहता हूँ  "मैंने सुना है कि उस स्कूल के प्रिंसीपल बहुत सख्त है और वहाँ पढाई भी बहुत अच्छी होती है।", उनका दूसरा सवाल "क्या यहाँ पढ़ाई अच्छी नही होती?", मैंने कहा "मुझे नही पता, पर वहाँ ज्यादा अच्छी होती है इतना पता है।" उन्होने फिर अंकल जी से कहा " भाई इसका दाख़िला वही कराओ जहाँ इसका मन है।" ये व्यक्ति और कोई नहीं प्रिंसीपल सर श्री राजबीर बंसल ही हैं। पर मुझे नही पता था कि ये ही उस स्कूल के प्रिंसीपल है और इस स्कूल के मालिक।

हमारी दसवी क्लास का विदाई समारोह था, समारोह लगभग खत्म हो चुका था। ग्रुप फोटो भी हो चुका। बस सब एक दूसरे से बातें कर रहे है। मैं चाहता था कि एक फोटो याद के लिए प्रिंसीपल सर के साथ हो जाए। पर कहने से हिचक रहा था और एक कोने में खड़ा था। पर तभी एक लड़का आया और बोला कि तेरे को प्रिंसीपल सर बुला रहे है। मैं चौंका कि उन्हें कैसे पता चला कि मैं उनके साथ फोटो खींचवाना चाहता हूँ। खैर मैं उनके पास गया और बोला "जी सर", वो बोले "तुम्हारे को मेरे साथ फोटो खिचानी है।" मैं भला क्यों मना करता जब मन की मुराद पूरी हो रही थी। फोटो खींच लिया गया। पर मैं आज तक ये बात नही जान पाया कि ऐ कैसे हो गया। क्या ये इत्तेफ़ाक था? या फिर कुछ और? मैं आज तक नही समझ सका। साथ ही एक बात और कहना चाहूँगा कि जब से वो स्कूल छूटा है तब से लेकर आज तक मुझे साल में पता नही कितनी बार सपनों में प्रिंसीपल सर नजर आते है। स्कूल बदल जाता है, क्लास बदल जाती है, दीवारे बदल जाती है, घटना का रुप बदल जाता है पर एक चीज नही बदलती है वो है प्रिंसीपल सर। ये क्या है? सर सपने में क्यों आते है? मैं आज तक नही समझ सका।

सामने कुर्सी पर एक सांवले रंग का व्यक्ति बैठा है बनियान पहने। पतला सा चेहरा है। चेहरे की झुर्रीयाँ बुढ़ापे की कहानी कह रही है। हाथ कांप रहे है। दो सहायक खड़े है। मैं चरण स्पर्श करता हूँ। पर एक हाथ जो प्यार से सिर पर या पीठ पर आ जाता था आज वो ना पीठ पर आया ना सिर पर। बस कांपता  रहा हैं। दोस्त(उनका बेटा)   उनसे पूछता है क्या आपने इसे पहचान लिया। मैं उसी आवाज में उत्तर की प्रतीक्षा करता हूँ जो पहले स्कूल में गूंजा करती थी। जिसकी दहाड़ सुनकर टीचरों और बच्चों की घिघी बँध जाया करती थी। पर आज जो आवाज निकली वो बहुत ही धीमी थी। आवाज सुनने के लिए उनके नज़दीक जाना पड़ा और वो बोले "हाँ पहचान लिया, पर ये क्या दाढ़ी बढ़ा रखी है।" वो मुझे छोटी छोटी निगाहों से निहारते रहे और मैं भावुक होते हुए सोचता रहा , जिंदगी तू ऐसी क्यूँ होती है? मैं चला आया। पता चला कि ये आज भी अपने सहायकों के साथ अपने इस स्कूल को चला रहें इस हालत और इस उम्र में भी। उनके होंसले को सलाम करते हुए बस यही कहूँगा।

उठता है, चलता है, रुकता है, फिर से चलता है
कांपते हाथों से वो आज भी बच्चों को पढ़ाया करता हैं।

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