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Tuesday, May 5, 2009

आज का एक सच

छोटी सी तनख़्वाह में ............

वक्त की सुईयों ने
सबकी जुबान सील दी है।
बेटी अपने फटे हुए बस्तें को छिपाते हुए
रोज स्कूल जाया करती है।
बूढे पिता चंद पैसे बचाने की ख़ातिर
कड़ी धूप में इकलौता छन्ना हुआ रुमाल सिर पर रखकर
डी.टी.सी बस का इंतजार करते मिलते हैं।
माँ, हाथों की सूखी हडिड्यों पर लटकती खाल के सहारे
दिन हो या रात इस गर्मी में बिजना(पंखा) चलाती रहती है।
पत्नी पतली सी कलाईयों में
बस एक ही रंग की दो चूड़ियाँ डाले देखती है।
इनके चेहरों पर छाई उदासी
मुझे अंदर तक तकलीफ़ देती रहती है।
और मेरी आँखे, इनकी आँखो से
मिलने से कतराती फिरती है।
इस छोटी सी तनख़्वाह में
बस इनके खामोश चंद सवाल ही खरीद पाता हूँ
और जवाब के लिए दिन-भर मारा मारा फिरता हूँ।

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