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Saturday, April 11, 2009

कुछ बातें और शरारतें बेटी की।



बेटी
का बचपन

यूँ तो अभी बच्ची है
पर बातें दादी माँ सी करती है।
जब कभी कुछ नया देखती है
सवालों की झड़ी लगा देती है।
सूरज बाबा संग मुस्कराती जागती है
उठते ही बस दूध, पापे माँगती है।
जिद करे तो जिददी कहलाए
ना करे तो घर खाने को आए।
गानों की शौकीन
कभी "होले-होले" पर नाचे
कभी "तेरी शादी करुँगा" को गाए।
बच्चों संग खेलने को मचलती है
ना मिले जब कोई
"मेरे साथ खेलो" हमसे कहती है।
टाफ़ी हो, चाकलेट हो या हो फिर पेस्ट्री
याद आने पर दिन-भर माँगती रहती है।
किताबें डाल अपनी मम्मी के बैग में
स्कूल जाने की एक्टिंग करती है।
खुद मेरे साथ जाकर लाई अपनी किताबें नही पढ़ती है
जब तब देखो मेरी मैंगजीनों को देखती, फाड़ती रहती है।
देर रात तक ऊधम मचाए
जब नींद आए तो झट से सो जाए
सोती हुई प्यारी नजर आए
बस यूँ ही देखते रहने को जी चाहे
ऐ ख़ुदा रहम करना
कहीं मेरी ही नजर ना लग जाए।


आजकल बेटी अपनी नानी के यहाँ गई हुई है। घर खाने को दोड़ता है। चुपचाप बैठकर उसकी बातें और शरारतें याद करता हूँ। वही से ये तुकबंदी निकल गई। कोई तुकबंदी लिखूँ और आप साथियों से साझा ना करुँ ऐसा भला हो सकता है। और हाँ आजकल समय नही मिल रहा ब्लोग की दुनिया को देखने का , जब समय होता है तो नेट नही होता है। दस बारह दिन हो गए घर का नेट नही आ रहा। और आफिस में एक आदमी को तीन तीन आदमी का काम करना पड रहा है। खैर पोस्ट डाल रहा हूँ कैफे में बैठकर।

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