Saturday, July 1, 2023

आधे-अधूरे ख्याल-1

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वे अपने-अपने हिसाब से चलते रहे 
वो उनके हिसाब से बदलता रहा! 

💭

रिश्ते 
सब के सब 
अपने-अपने 
खून के साथ 
खड़े हो गए. 

एक वो था 
जो सही के साथ 
खड़ा रहा
और 
अकेला रह गया. 
💭

वो अपने ही घर में 
किराएदार हो गया 
लोग कहते हैं कि 
वो अपनी जिंदगी में 
नाकामयाब हो गया. 

Friday, May 26, 2023

'जंगल जलेबी' वाला लड़का

बेटी के पेपर चल रहे हैं. एक पेपर के दौरान बेटी की एग्जाम सेंटर में एंट्री कराने के बाद मैं समय काटने के लिए यूं ही सेंटर के आसपास टहल रहा था. फिर सोचा जब टाइम पास ही करना है तो क्यों ना बेटी के खाने के लिए कुछ सामान खरीद लाता हूं. पेपर देकर निकलेगी तो खा लेगी. बस फिर क्या था परचून की दुकान की खोज होने लगी. इधर-उधर काफी भटकने के बाद जब कहीं वो दुकान नहीं मिली, जिस पर से केक, चाकलेट, बिस्कुट आदि कुछ मिल सके.खैर पता करने पर दूर एक दुकान का पता चला. केक, चाकलेट, बिस्कुट खरीदकर मैं सेंटर के लिए हो लिया. रास्ते में एक पार्क मिला. जहां बच्चों के अभिवाहक धूप से बचने के लिए इधर-उधर बैठे थे. मैं भी वही खड़ा हो गया. और खड़े-खड़े एक चाकलेट खा गया. चाकलेट खाकर जब फ़ारिग़ हुआ. टाइम देखा तो अभी भी पेपर छूटने में काफी समय था. तभी देखा पार्क के एक कोने में लगे पेड़ पर कोई आठ-एक साल का बच्चा प्लास्टिक की रस्सी से एक पानी की बोतल को बांधकर बार-बार पेड़ की तरह फेंक रहा था. पहले तो समझ नहीं आया कि ये बच्चा कर क्या रहा है. फिर जब पास जाकर देखा तो पता लगा ये बच्चा तो पेड़ से 'जंगल जलेबी' तोड़ने की कोशिश कर रहा है. वो मैले-से कपड़े पहना था. ऐसा लगा रहा था जैसे कई दिन से नहाया भी ना हो. यूं तो पेंट कमीज पहने था लेकिन उसकी पेंट कमर से थोड़ा बड़ी थी शायद. इसलिए बार-बार उसे ऊपर किए जा रहा था. पहले उस रस्सी से बंधी बोतल को पेड़ पर फेंकता और फिर तुरंत ही पेंट को ऊपर करता. काफी देर के प्रयास के बाद उसे एक दो 'जंगल जलेबी' मिल गई लेकिन शायद उसे ज्यादा 'जंगल जलेबी' की जरुरत थी या उसकी ज्यादा पाने की इच्छा थी. मैं उसकी इस लगन को देखे जा रहा था. पास खड़े दो-चार अभिवाहक उसे गाइड भी कर रहे थे कि ऐसे नहीं फेंको, वैसे फेंको. उस तरफ जाकर फेंको.

अब तक मेरे दिमाग में बस यही आ रहा था कि ये भरी दुपहरी में ऐसा क्यों कर रहा है? क्या इसे भूख लगी है? क्या बस 'जंगल जलेबी' के लिए ही ऐसा कर रहा है? दिमाग में ये नहीं आया कि बैग में बिस्कुट, केक भी तो रखे हैं. मैं बस उसकी मेहनत और लगन को ही देखता रहा. और उसकी 'जंगल जलेबी' पाने की इच्छा से प्रभावित होता रहा. मुझे याद नहीं आता कि मैंने कभी 'जंगली जलेबी' को इस तरह तोड़कर कभी खाया हो. बस इतना याद है कि मेरे ननिहाल में एक मामा हैं वो एक बकरी पाला करते थे. वे उसे अपने पास ना रखकर बकरी पालने वाले दिए रखते थे. और रोज उस बकरी के लिए कुछ ना कुछ खाने के लिए ले जाते थे. वे ढेर सारी बकरियों में भी उसे पहचान लिया करते थे. और उनकी एक आवाज पर वो बकरी दौड़ी चली आती थी. उन्ही दिनों एक बार उन्होंने मुझे 'जंगल जलेबी' खाने के लिए दी थी. उस दिन पता चला था कि जलेबी ही नहीं एक 'जंगल जलेबी' भी होती है. उस दिन के बाद 'जंगल जलेबी' तो कई बार देखी. लेकिन कभी दुबारा खाई नहीं. खैर थोड़ी ही देर बाद मुझे ख़याल आया कि अरे बैग में बेटी के खाने का सामान रखा है. उसमें से कुछ तो इसको दिया ही जा सकता है. फिर मैंने उसे अपने पास बुलाया. बैग खोला तो सामने केक ही था और वो मैंने उसे दे दिया. वो पूछने लगा कि ये क्या है? मैंने कहा कि केक है.केक! शायद उसे केक के बारे में पता नहीं था. केक को लेकर वो फिर से 'जंगल जलेबी' तोड़ने लगा. कहानी बस यही खत्म नहीं होती है. असल कहानी तो आगे शुरू होती है. दरअसल उससे वो केक का पैकेट संभल नहीं रहा था. शायद केक के पैकेट को वो नीचे रखना नहीं चाहता था. क्या पता उसे भूख भी लगी हो. फिर उसने 'जंगल जलेबी' तोड़ना बंद कर दिया. उस रस्सी बंधी बोतल को वहीँ छोड़कर वो केक को लेकर आगे बढ़ गया. मैं वही खड़ा रह गया. फिर कुछ देर बाद जब मैं सेंटर के पास जाने लगा तो बीच रास्ते में वो मुझे फिर मिला. केक बस थोड़ा-सा ही बचा था. तभी उसके पास खड़ी दो लड़कियों में एक लड़की उससे 'जंगल जलेबी' मांगने लगी. ये लड़कियां शायद किसी दोस्त या बहन-भाई का पेपर दिलवाने लाई थीं. और मेरी ही तरह पेपर के छूटने का इंतजार कर रही थीं. इनके 'जंगल जलेबी' के मांगने पर उसने 'जंगल जलेबी' को छिला और एक पीस उन्हें देने लगा लेकिन उन लड़कियों ने वो पीस लेने से मना कर दिया. और कहा कि दूसरा वाला दो. फिर उसने बची हुई पूरी 'जंगल जलेबी' उस लड़की को दे दी. मैं उस बच्चे को देखता हुआ. उसके मिल-बांटकर खाने वाले दिल को महसूस करता हुआ आगे बढ़ गया.

Friday, March 17, 2023

दिल्ली वाला लहजा और उसके वाला ह्यूमर...

जब से पैदा हुआ हूं. तब से दिल्ली को दिखाता आया हूं. उसकी गलियों में घूमता आया हूं. दिल्ली के चौराहों पर खड़े होकर दिल्ली के हर रंग को देखा है. यानि कुल मिलाकर दिल्ली से इश्क है. पर ये दिल्ली वाला लहजा’, ‘ये दिल्ली वाला ह्यूमरक्या होता है? सच मुझे पहले पता नहीं था. ऐसा नहीं है कि ये सब मैंने सुना नहीं होगा. देखा नहीं होगा. लेकिन ऐसे गौर करके पहचाना नहीं.

बेटी ने कई बार कहा,’ क्या पापाजी. कितने साल के हो गए हो आप. 40-45 साल के तो होगे ही. आपको ना कभी दिल्ली वाले लहजेमें बात करते देखा. दिल्ली वाले ह्यूमरकी तो बात ही छोड़ दो! मैं बचपन से आपको सुनती आ रही हूं. आपके शब्दों से दिल्ली वाली फील नहीं आती. कई बार ऐसे शब्दों (हिंदी के कम प्रयोग वाले और कठिन शब्द, और उर्दू के शब्द, ऐसा वो कहती है.) का यूज़ करते हो कि सर के ऊपर से चले जाते हैं. आप दिल्ली वाले लगते ही नहीं हो. वो देखो शाहरुख खान को. उनकी बातचीत में आज भी दिल्ली वाली फीलआती है. उनके मजाक से दिल्ली वाला ह्यूमरझलकता है. आज से पहले बहुत बार इस टॉपिक पर अपन दोनों की बातचीत हो चुकी है. वो फिलहाल अब याद नहीं. लेकिन अभी तापसी पन्नूको सुन रहा था. वे भी शाहरुख खान के 'दिल्ली वाले ह्यूमर' की बात कर रही थीं.

फिर बैठा-बैठा सोचने लगा कि ऐसा क्या और कैसे हुआ है कि मैं इतने सालों में ये सब नहीं पहचान पाया. उसे देख-समझ नहीं पाया. जिसे बेटी ने दो साल में पहचान लिया. इस बात पर बेटी को गर्व-सा फील हो रहा था कि जो बात उसने गौर की, वो बात उसके पापा नहीं कर पाए, जोकि उसकी नज़रों में बेहद इंटेलीजेंट हैं. यानि इस मामले में वो अपने पापा से आगे निकल गई!

Friday, November 18, 2022

सर कविता क्या होती? शेक्सपीयर से पूछकर बताऊंगा!

 

सर, पिछले दिनों बेटी के मांगने पर उस पर लिखी अपनी रचनाएं तलाश रहा था. उसी तलाश के दौरान ये डायरी मिली, जिसमें आपने मेरे लिए यह लिखा था. अपना लिखा यह याद है आपको!! याद तो होगा ही. आप भूलने वाले लोगों में कहाँ थे. ना जाने अब कहां होंगे? किस दुनिया में होंगे? और किस रूप में होंगे आप? लेकिन इतना पता है आप जहां भी होंगे अपनी धुन में लगे होंगे. जैसे यहां इस दुनिया में लगे रहते थे. वसुंधरा वाले घर के अपने कमरे की उस मेज पर, किताबें पढ़ते हुए, कुछ रचते हुए. हंसराज कॉलेज की कक्षाओं में मुझ जैसे स्टूडेंट्स को पढ़ाते हुए. नाटक मंच के पीछे. या फिर नाटक मंच के आगे में सबसे पीछे की किसी कुर्सी पर, अपनी आंखें नम किए हुए. पता है सर मैं अक्सर पीछे मुड़कर देखा करता था आपको भावुक होते हुए. जो जज्बात आप कह नहीं पाते थे वो जज्बात आपकी आंखें बोल जाती थीं.

और हाँ सर आपने मेरा वाला वो सवाल तो अब तक पूछ लिया होगा ना शेक्सपीयर जी से. वही वाला सर. जो मैंने एक बार आपसे पूछा था कि ‘सर कविता क्या होती?’ और आपने मजाक में कहा था शेक्सपीयर से पूछकर बताऊंगा! अब तो आपकी खूब छनती भी होगी शेक्सपीयर जी से. आप कहाँ चैन से बैठने वालों में से हैं. बुला लेते होंगे जार्ज बर्नार्ड शॉ जी को भी. और फिर दुनिया जहां की बातें-बहस होती होंगी. जैसे वसुंधरा वाले सोसाइटी वाले पार्क में धूप में पांच-सात कुर्सियां पर बैठकर आप लोग किया करते थे. यहां की तरह हंसी-मजाक, बहस की आवाजें वहां भी दूर तक जाती होंगी. उन्हें सुनकर बाकी लेखक लोग भी आ जम जाते होंगे बाकी खाली पड़ी कुर्सियों पर. उसके बाद फिर जो समा बंधता होगा. उसके बारे में सोचकर ही मैं आनंदित हो रहा हूं. उधर आप उतने प्रसन्न होते होंगे. खैर जब आपकी याद आती है या तो आपकी किताबें उठा लेता हूं या फिर बेटी-पत्नी को आपके बारे में बताने लग जाता हूँ, आपके जो किस्से मुझे पता हैं, उन्हें सुनाने लग जाता हूं. पता है सर कभी-कभी मन करता है कि आपके समकालीन या आपके दोस्तों के पास जाऊं और उनसे आपके किस्से पूंछू. उन्हें फिर कलमबद्ध कर. एक किताब का रूप दूं. कुछ दिलचस्प किस्से प्रताप सहगल जी ने सुनाए थे एक बार. और ना जाने कितने और होंगे. उनमें से कितने किस्सों को सुनकर आनंद आएगा. कितने किस्सों से हौसला मिल जाएगा. और कितनों से एक नई राह मिल जाएगी. वो राह फिर किसी-किसी को मंजिल तक भी ले जाएगी. खैर आपकी कमी बेहद खलती है. आप वो पेड़ थे, जिसकी छाया में बैठकर मैं अपने मन की कह लेता था. आपके अनुभव से कुछ सीख लेता था. आपके पास बैठकर एक नई ऊर्जा मिलती थी. हौसला मिलता था. लेकिन अब कोई आप जैसा हौसला नहीं बढ़ाता. सर आपकी कमी खलती है. आपकी याद आती है!

नोट-आज ही के दिन सिद्धू सर हम सबको छोड़कर चले गए थे!

Saturday, November 5, 2022

चलती बस में दिल्लीवालों को चढ़ने की आदत ना हो. ऐसा हो नहीं सकता- मनोज पाहवा

ऑफिस-ऑफिस वाले भाटिया जी की बात में दम है. पूछो कैसे. दरअसल हम तीन दोस्त थे. एक सिख थे. दूसरे जाट थे और तीसरा मैं. तीनों में किसी की भी आदत रुकी बस में चढ़ने की नहीं थी. दो साल तक रूपनगर के स्कूल जाना हुआ. याद नहीं कि कभी ये नियम टूटा हो. कई बार जब बस रुक भी जाती थी. और हम में कोई भीड़ की वजह उतर नहीं पाता तो वो अगले स्टैंड पर उतरता था. या फिर बस के चलने पर उतरता था. तब डीटीसी बसें तो हुआ करती थीं लेकिन तब तक रेड लाइन बसें आ गईं थी. उन बसों में स्कूल, कॉलेज के बच्चों का स्टाफ चला करता था. जैसे दिल्ली पुलिस वालों का चला करता था. स्टाफ भी स्टाइल से बोला जाता था. और एक मैं था स्टाफ बोलने में शर्म आती थी. इस बात पर दोनों  दोस्त मुझे डरपोक कहा करते थे. और हाँ उस वक्त के बच्चों की ये आदत हुआ करती थी कि बस के अंदर नहीं जाना. गेट पर ही लटककर जाना है और हर स्टैंड पर उतरना है. इस बात को लेकर कई बार कंडक्टर से लड़ाई भी हो जाया करती थी. कई बार बस के शीशे बच्चों का शिकार हो जाया करते थे. और कभी कंडक्टर!

खैर एक बार छुट्टी से पहले स्कूल को बंक करके हम तीनों घर जा रहे थे. हमेशा की तरह तीनों चढ़ती बस में ही चढ़े. ये याद नहीं कि बस 234 नंबर थी या फिर कोई और. लेकिन ये याद है वजीराबाद के आने से पहले हम दो ( मैं और सिख यार.) में शर्त लग गई कि बस को बिना छुए जो घर के स्टॉप तक जाएगा वो जीत जाएगा. डीटीसी बस खाली-सी थी. बस फिर क्या था. मैं पिछले गेट से थोड़ा पीछे खड़ा हो गया. तब डीटीसी की कुछ बसों में पीछे सीट नहीं हुआ करती थीं. पिछ्ला हिस्सा खाली हुआ करता था. सरदार जी मेरे से आगे. जाट यार अंपायर बने हुए थे. जैसे ही बस ने वजीराबाद पुल क्रॉस किया वैसे ही पता नहीं क्या हुआ. बस ड्राईवर ने एकदम से ब्रेक लगा दिए. और मैं बस के अंदर आगे-पीछे करते हुए ऐसे गिरा कि बस के सभी लोग हंसने लगे थे. मेरी सारी हेकड़ी निकल गई थी. और चेहरे पर 12 बज गए थे. 

[ पाहवा जी की बात सुनकर ये वाकया याद हो आया. सोचा याद के लिए लिख दूं. बाकी फोटो गूगल से ली गई है.]

Sunday, August 7, 2022

फ्रेंडशिप डे

एक हमारे 'जाट यार' थे. थे क्या अब भी हैं. बात स्कूल के दिनों की है. हमारी क्लास के एक दोस्त 'सरदार' भी थे. नाम था 'गुरुदर्शन सिंह'. हम तीनों ही अधिकतर बार '234 नंबर बस' से स्कूल आते थे. जोकि दिल्ली के 'लखनऊ रोड़' से निकलकर. 'खालसा कॉलेज' से होते हुए 'कर्मपुरा' जाती थी. लेकिन हम 'रूपनगर' वाले स्टैंड पर उतर जाते थे. अक्सर उन दोनों के बीच किसी ना किसी बात पर बहस हो जाती थी. बहस के बाद 'गुरुदर्शन सिंह' उसे 'और जाट, सोलह दुनी आठ' कहकर चिढ़ाता था. और 'जाट यार' उसे 'दूरदर्शन' कहकर चिढ़ाता था. 'गुरुदर्शन सिंह' का साथ 12 क्लास के बाद छूट गया. लेकिन 'जाट' यार बनकर जुड़े रहे. अभी तक जुड़े हुए हैं.


धीरे-धीरे हम बड़े होते गए. 'जाट यार' अब चौधरी हो चुके थे. लोग उन्हें अब चौधरी साहब कहने लगे थे. और एक मैं था कि लोग 'गुर्जर' भी नहीं मनाते थे! गुर्जर दोस्त कहते थे कि साले तू तो हमारी गुर्जर कौम पर कलंक है! खैर चौधरी से एक किस्सा याद हो आया. इस किस्से के आपां साक्षी नहीं हैं लेकिन है सच.

किस्सा कुछ यूं है. 'जाट यार' की दोस्त मंडली में से किसी को पैसे की जरुरत आन पड़ी. वो 'जाट यार' के दूसरे साथी के पास आकर कहने लगा कि इतने पैसे की जरुरत है. अगर हो सके तो दे दो. मैं कुछ दिन में लौटा दूंगा. लेकिन जिससे पैसे मांगे जा रहे थे उसके पास पैसे नहीं थे. उसने मना कर दिया. परंतु पैसे मांगने वाले को एक रास्ता सूझा दिया कि चौधरी साहब से मांगकर देख ले. उसके पास होंगे. तो दे देगा. अगर नहीं होंगे तो भी वो किसी से मांग कर तेरी जरुरत पूरी कर देगा. लेकिन ये ध्यान रखियो. 'नाम लेकर या भाई कुछ पैसे चाहिए.' कहकर पैसे मत मांग लेना. और अगर तू ये कहेगा कि चौधरी साहब कुछ पैसों की जरुरत है. कैसे भी करके पैसे चाहिए. तो वो कहीं से भी पैसे लाकर दे देगा. उस लड़के ने वैसा ही किया. हमारे 'जाट यार' को चौधरी साहब सुनना अच्छा लगता था. 'जाट यार' चौधरी साहब कहने पर पिघल गए और उसे किसी से पैसे उधार लेकर दे दिए. और उसका काम बन गया. ऐसे थे हमारे 'जाट यार.'

एक और किस्सा है उस 'जाट यार' का. जिसका मैं खुद साक्षी रहा हूं. दरअसल हुआ कुछ यूं कि एक मेरे दोस्त हैं. पैरों से चल नहीं सकते तो चार पहिए की गाड़ी का इस्तेमाल करते हैं. एक वक्त था जब उनके पास अच्छा खासा पैसा हुआ करता था. पिता जी की अच्छी खासी सैलरी थी. घर से बिज़नेस भी कर रहे थे. लेकिन फिर इनके पिताजी की एक एक्सीडेंट में मौत हो गई. और बिज़नेस भी खत्म हो गया. किराए से घर चल रहा था. खैर! एक दिन हुआ कुछ यूं कि इनके जीजा जी की भी मौत हो गई. खबर लगने पर मैं उनके घर गया. पता लगा इनकी जेब में पैसे नहीं. ये करें तो क्या करें. मैंने अपनी जेब टटोली तो उसमें भी कुछ ज्यादा पैसे नहीं. खैर जाट यार को फोन किया गया. वे मेरी वजह से इन्हें जानते पहचानते थे. दोस्त जैसा संबध तो नहीं कह सकते लेकिन दोनों के बीच दुआ-सलाम तो थी ही. उसे फोन कर बताया कि यार ऐसे-ऐसे हो गया. क्या किया जाए? तब उसने कहा था ' मुझे पता है तू चाहकर भी उसकी हेल्प नहीं कर सकता क्योंकि तेरे हालात मैं जानता हूं. लेकिन मैं कुछ करता हूं...तू एक काम कर. मुझे आधे घंटे बाद तू फलां जगह मिल. मैं आधे घंटे बाद उस जगह पहुंच गया. वो अपनी सदाबहार सवारी 'बुलेट' पर बिना हेलमेट लगाए आया. और बोला,' ये पांच हजार रुपए हैं. तू उसे अपने नाम से दे दे. जब उसके पास होंगे तब दे देगा.' और जाट यार पैसे देकर चला गया. मैंने वो पैसे उसके नाम ही से उस दोस्त को दे दिए. आज इतने साल बीत गए. उस दोस्त ने वो पैसे अभी तक दिए नहीं. और इस 'जाट यार' ने आजतक मुझसे मांगे नहीं. सुना है आज फ्रेंडशिप डे है!
 

Friday, March 25, 2022

सागर सरहदी...

मैंने 'बाजार' फिल्म बहुत बाद में देखी. पहले मुझे उसके गानों से प्यार हुआ था. उस प्यार की बदौलत ही इस फिल्म के गानों की कैसेट ले आया था, जिसमें गानों के साथ-साथ संवाद भी थे. ना जाने कितनी बार अपने वॉकमेन पर उस कैसेट को लगाकर लूप में सुना करता था. तब तक मैं सागर सरहदी जी को नहीं जानता था. तब हम केवल केवल फिल्म के हीरो-हीरोइन को ही जानते थे. फिर बाद में एक दोस्त की बदौलत मैं इस फिल्म को देख पाया था. फिल्म को देखकर फिर इस फिल्म से भी प्यार हो गया था. इसका असर ये रहा कि मैं तुरंत ही मार्किट जाकर इस फिल्म की सीडी ले आया था. इस वक्त तक भी मैं सागर सरहदी जी को नहीं जानता था. फिल्म देखते वक्त मन जरुर हुआ था कि किसने  इस फिल्म को बनाया है वो शख्स कौन है? लेकिन बस बात मन ही मन में रह गई थी. फिर जिंदगी की आपा-धापी में लग गए. 

सालों बाद एक दिन ऐसा आया कि इरफ़ान जी के 'गुफ़्तगू' कार्यक्रम  में 'सागर सरहदी जी' नजर आए. बातचीत सुनी और देखी गई. और एक सीधे-सच्चे, जज्बाती इंसान से सामना हुआ. और वो दिन था जब मुझे सागर सरहदी जी से भी प्यार हो गया था. उस इंटरव्यू को देखते हुए सागर सरहदी जी का एक-एक शब्द दिल में उतर रहा था. कई जगह उनकी बातों में दुहराव आया लेकिन उनके सवाल जहन को चीर रहे थे. मसलन 'मुझे ये बात आज भी बहुत खटकती है. और सता रही है. ऐसी कौन-सी ताकतें हैं जो आपको अपना गांव छोड़ने के लिए मजबूर करती हैं? आपको आदमी से रिफ्यूजी बना देती हैं?' यह सवाल आज भी दिमाग के एक कौने में बैठा हुआ है. इंटरव्यू के बाद मन करने लगा कि इनको और जानने का. रात भर Youtube पर इनके इंटरव्यू देखता रहा. इंटरव्यू ज्यादा तो ना थे. लेकिन जो थे उन्हें ही बार-बार देखता रहा. बाद में लगा कि इनके और भी इंटरव्यू आने चाहिए. इनके जो भी दर्द हैं. वे बाहर निकलने चाहिए. ना जाने क्या-क्या दबा रखा है इस इंसान ने अपने अंदर. वो बाहर आना ही चाहिए. चाहे फिल्म के रूप में या फिर इंटरव्यू के रूप में, या फिर किसी अन्य रूप में. अगले दिन सुबह होते ही. मुंबई में अपने पत्रकार मित्र को फोन किया. कहा कि ये इंटरव्यू देखो. और अगर खुद इनका इंटरव्यू कर सको तो करो यार. ऐसे इंसान बड़े कम होते हैं इस दुनिया में. खैर! आज यह खबर मिली कि यह महामारी पिछले साल ही इस प्यारे इंसान को भी हमसे दूर ले गई. खबर सुनकर ऐसा लगा जैसे कोई आपका अपना नजदीकी चला गया हो. ऐसा नजदीकी, जिनसे आप कभी नहीं मिले लेकिन जिन्हें आप प्यार करते थे. उनके काम को पसंद करते थे. उनके जज्बात को समझते थे. उनके दर्द को समझते थे. उनके लिए खुशियां की दुआ करते थे.

नोट-फोटो गूगल से ली गई है.

Saturday, September 18, 2021

मोहन राकेश और उनके किस्से, भाग-3

एक बेहद गर्म शाम, आज जब हम दोनों (दुष्यंत, और मोहन राकेश) अपनी-अपनी ख़ाली जेबों को कोसते हुए उसके घर जा रहे थे। गर्मी के कारण वह बुरी तरह हाँफ रहा था और जेब के कारण वह बेतरह परेशान था। मगर ठहाकों पर ठहाके लगा रहा था। मैंने पूछा, "क्यों खुश हो रहा है?" तुम समझते नहीं, वह बोला, " मैं गरीबी को ब्लफ़ कर रहा हूँ। कहीं साली यह न समझे कि मैं उसके रोब में आ गया...दरअसल यह राकेश की अदा थी और इसी पर लोग मरते भी थे। अगर उसकी जेब में अंतिम दस रुपए बचे हैं तो वह यह नहीं सोचता था कि इन्हें खर्च न करुँ, बल्कि यह सोचता था कि इन्हें जल्दी से जल्दी कैसे ठिकाने लगाऊँ ! वह साढ़े सात रुपए टैक्सी में खर्च करके ओमप्रकाश के पास पहुँचता और अपने ठेठ अमृतसरी पंजाबी लहजे में, उन्हे पुकारकर, बचे हुए पैसे उनके सामने पटक देता, " ले भाई, अब यह ढाई रुपए बचे हैं, बोल अब क्या करना है इनका?"

Saturday, July 24, 2021

गुरु पूर्णिमा पर गुरु की यादें...

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि सिद्धू सर मुझे अक्सर क्यों याद आते हैं? जहां कहीं गुरु-टीचर, प्रोफेसर की बात हो, मैं उनको याद किए बिना क्यों नहीं रहता? दोस्तों में उनकी चर्चा किए बिना क्यों नहीं रहता? बेटी को उनके किस्से सुनाए बिना क्यों नहीं रहता? उनकी लिखी किताबों को पढ़ता क्यों रहता हूं? इंटरनेट की दुनिया में उनके बारे में लिखे-कहे को क्यों ढूढ़ता रहता हूं? किसी के मुंह से उनके किस्से-संस्मरण सुनने को मिल जाएं तो सुनकर बेहद खुश क्यों हो जाता हूं? शायद यह सब इसलिए होता है कि वे मेरे दिल के बेहद करीब हैं. दिल के करीब इसलिए हैं कि वे दिल के बहुत अच्छे इंसान थे. उनके लिए ना कोई छोटा था. ना कोई बड़ा था. ना कोई अपना था. ना कोई पराया था. जो उनसे मिला वो उनका अपना था. किसी की भी मदद करने से वे पीछे नहीं हटते थे. जो उनसे बन सकता था वो वे कर देते थे. खासकर हम जैसे छात्रों की तो वे खुलकर मदद करते थे.

मुझे याद है. तब तक मेरी और उनकी चंद मुलाकातें ही तो हुई थीं. एक दिन जब मैं हंसराज कॉलेज के उनके कमरे से निकलने लगा तो वे पूछ बैठे कि 'अब कहां जाएगा?'  मैंने कहा, 'सर अब मैं सीधे हरदयाल सिंह लाइब्रेरी जाऊंगा. जहां बैठकर मैं पढ़ाई करता हूं. कुछ एक फार्म भर हुए हैं सरकारी नौकरी के.  बस उन्हीं की तैयारी कर रहा हूं वहां जाकर.’ वे बोले, 'घर पर नहीं पढ़ते?' मैं बोला, ‘सर नहीं. उधर पढ़ाई हो नहीं पाती है. इसलिए उधर चला जाता हूं.'  फिर वे एक चाबी निकालते हुए बोले,' जा इसकी एक डुप्लीकेट चाबी बनवाकर ले आ.' चाबी वाले सरदारजी की दुकान का रास्ता बताकर उन्होंने मुझे भेज दिया. मैं गया. सरदारजी से चाबी बनवाकर मैंने उन्हें दे दी. वे फिर डुप्लीकेट चाबी मुझे देते हुए बोले,' ये चाबी तू रख. जब भी तेरा मन करे, यहां बैठकर पढ़ लिया कर. किसी भी वक्त तू आ सकता और किसी भी वक्त तू जा सकता. ये समझ ये तेरा ही कमरा है.’ (उन्हें यह क्वार्टर कॉलेज की तरफ से मिला हुआ था. लेकिन वे तब वसुंधरा में रहने लगे थे.) मैंने मना नहीं किया और वो चाबी रख ली. वो अलग बात है. मैंने उस चाबी का कभी प्रयोग नहीं किया. आज भी मैंने वो चाबी संभालकर रखी हुई है. मैं तब उस चाबी से उस घर और उस दिल को देख पाया था जो हम जैसे बच्चों के लिए सदा खुला रहता था. जैसे-जैसे समय बीतता रहा है. मेरे दिल में उनके लिए एक घर बनता रहा, जिसमें वे आज भी रहते हैं. बस वे अब पहले-सी लंबी-लंबी बातें नहीं करते. मेरा पहले जैसा हौसला नहीं बढ़ाते. मुझे पहली-सी शाबासी नहीं देते. बस उस घर में मौजूद रहते हैं.

मुझे याद है. पहले जब भी कोई किताब या अन्य चीज मुझे डाक से भेजते थे तो मेरा नाम उस पर होता था. जब मेरी शादी हो गई तो मेरी पत्नी का नाम भी उसमें आने लगा. वो भी मेरे नाम से ऊपर. फिर बेटी हुई तो उसका नाम हम दोनों के नाम से ऊपर. एक दिन क्या देखता हूं. उनकी एक नई किताब ‘ड्रामेबाजियां’ डाक से आई. किताब खोली तो अंदर लिखा था. 'सुनयना के लिए, प्यार से नानी सिद्धू, नाना सिद्धू.' (मेरी बेटी का नाम ‘नैना’ से ‘सुनयना’ उन्होंने ही रखा था.) ऐसा था उनका प्यार. जिस प्यार में मैं भाव-विभोर हो जाता था. उस प्यार में बह जाता था. जैसा वे प्यार करते थे. वैसे ही हम बच्चों का हौसला भी बढ़ाते थे. मुझे याद नहीं कभी उन्होंने किसी छात्र को हतोत्साहित किया हो. आप चाहे कितनी ही बड़ी गलती कर दें. या आपसे हो जाए. मैंने उन्हें कभी गुस्सा करते नहीं देखा. इवन एक बार की बात है. एक नाटक में एक किरदार निभाते हुए मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई थी. फिर भी उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा. मुझ पर गुस्सा नहीं हुए. बस यही कहा ‘बहुत अच्छे’. मेरा वो रोल पहला और आख़िरी था. ये अलग बात वे ये जरुर कहते थे कि ऐसा करोगे तो और अच्छा हो जाएगा. जब नाटक की रिहर्सल होती थी तो वे ऐसे ही हौसला बढ़ाते थे. और अगर किसी छात्र की एक्टिंग उन्हें बहुत ज्यादा पसंद आ जाती थी तो वे इनाम के रूप में अपनी जेब से एक रुपया निकालकर छात्र को दे देते थे. फिर 11 रुपए देने लगे. बल्कि एक बार तो एक लड़के की एक्टिंग देखकर इतने खुश हुए कि उसे शायद 101 रुपया दे दिए. ऐसा था उनका हौसला बढ़ाने का तरीका. बाद में वो 101 रुपए पाने वाला लड़का बम्बई भी गया था. फिल्मों में काम करने. अजय देवगन की एक फिल्म में एक किरदार निभाते नजर भी आया था. मैंने तो बच्चों को उस एक इनाम के लिए बहुत मेहनत करते भी देखा है. वो बात अलग है कि मुझे वो इनाम कभी नहीं मिला! मिलता कैसे एक रोल मिला था वो भी सही से नहीं कर सका! सच में बहुत निराशा हुई थी तब मुझे!

मैंने उनकी सीधी-सपाट जुबान में खूब कहानी-किस्से सुने हैं. अपनी घुमक्कड़ी की बातें जमकर सुनाते थे. कैसे वे एक बार हाथ देखने वाले पंडित बन गए. कैसे एक रात उन्होंने भिखारियों के साथ गुजारी थी आदि-आदि. दरअसल वे अक्सर कॉलेज की छुट्टियों में घूमने निकल जाते थे. कभी-कभी रूप बदलकर भी. ये उनका तरीका था. लोगों की कहानियां सुनने का. उनकी तकलीफ को जानने-समझने का. जिस रस के साथ वे किस्से कहते थे सच में उन्हें सुनने में बहुत आनंद आता था. बीच-बीच में गालियाँ का तड़का भी होता था. लेकिन कभी उनके मुंह से कड़वापन सुनने को नहीं मिला. ‘उल्लू के पट्ठे कागज तो बाद में बचाना. पहले तू अपनी आँख तो बचा. कागज तो बन जाएगा आँख ना बनेगी दूसरी तेरी.’ (कागज बचाने के चक्कर में मेरे छोटे-छोटे अक्षर में लिखने पर.) हरामजादा मुशर्रफ गोल-गोल घूमा रहा है. (तब अटल जी की सरकार थी और मुशर्रफ दिल्ली और आगरा के बीच घूम रहे थे.) उनकी गालियों के कुछ किस्से किताबों में दर्ज हैं. कुछ समकालीन लोगों को याद भी हैं. याद से याद आया एक बार जब मैं उनसे मिलने गया तो उनके कमरे का मैदान की तरफ वाला गेट खुला हुआ था. मेज पर टेबल लैंप जल रहा था. सर अपने हाथ में मैग्नीफाई गिलास से अपनी किसी आने वाली किताब की प्रूफ रीडिंग कर रहे थे. मैदान से खेलते बच्चों का शोर आ रहा था. मैं यूं ही पूछ बैठा कि ‘सर आप डिस्टर्ब नहीं होते इस शोर से’. वे बोले, ‘उल्लू के पट्ठे इधर से मुझे नई-नई गालियां सीखने को मिलती हैं. और तू कहता है कि सर डिस्टर्ब नहीं होते इस शोर से.’ और फिर वे जोर से खिलखिलाकर हंस पड़े.

रिटायर्ड होने के बाद भी वे खूब काम किया करते थे. कई नाटक तो उन्होंने रिटायर्ड होने के बाद ही लिखे. वो अलग बात है वे नाटक उनके दिमाग में सालों से पक रहे होंगे. सच में वे काम को बहुत महत्व देते थे. उनका मानना था कि काम से बड़ा कुछ नहीं. जब तक साँसे हैं काम करते रहो. वे अपने आखिर समय तक नाटक लिखते रहे. वो कहते थे आखिर वक्त में जब तुम पीछे मुड़कर देखो तो लगना चाहिए कि तुमने कुछ किया है. चाहे तुमने लालकिले पर झंड़ा ना फ़हराया हो. लेकिन तुमने अपने काम का झंड़ा तो गाड दिया ना बस. मैं जब भी उनसे कहता था कि सर ये परेशानी है या ये तकलीफ है तो हमेशा हल तो देते ही थे साथ ही साथ में ये भी कहते थे कि कुछ ना कुछ काम करता रह. अपने मन का काम करता रह. अपने मन का काम करता रहेगा तो ध्यान हटेगा. जब ध्यान हटेगा तो तकलीफ-परेशानी भी कम महसूस होगी. और कोई नया काम भी बनेगा. उनका हमेशा ही ये मानना था ‘ WORK is a great HEALER.’  ये पंक्ति उन्होंने अपने बेड के सामने रखी किताबों की अलमारी पर लगा रखी थी. पिछले साल एक विडियो देख रहा था, जिसमें उनकी बेटी प्रमिला जी उनके बारे बात कर रही थीं. जिसमें उन्होंने बताया कि वे अपने आखिर समय में अस्पताल के बिस्तर पर थे. ना चल सकते थे. ना उठ सकते थे. एक दिन उन्होंने मिलने आई अपनी बेटी से कहा कि ‘एक काम करना, वीणा (उनकी बड़ी बेटी) को बोलना कि वो एक गीत है ना जो मैंने चौथी क्लास में लिखा था उसमें एक जगह ‘प्रीतम’ आया हुआ है. उसकी जगह ‘सिरजनहार’ कर दें.’ मतलब कि वे अपने आखिर समय, तकलीफ में भी काम कर रहे थे. पुराना उधेड़ रहे थे. नया गढ़ रहे थे. फिर आप ही बताओ ऐसे इंसान को कोई क्यों ना याद करे, क्यों ना प्यार करे!

Sunday, June 20, 2021

जेएनयू अनंत जेएनयू कथा अनंता

जे सुशील की किताब ‘जेएनयू अनंत जेएनयू कथा अनंता’ एक किताब ही नहीं बल्कि जेएनयू के अनगिनत किस्सों का एक दस्तावेज है. इस दस्तावेज में दर्ज किस्सों को आप पढ़ते ही नहीं बल्कि उन किस्सों की लहरों के साथ आप बहने लग जाते हैं या यूं कहें कि कई बार उन्हें जीने से लग जाते हैं. चाहे आप जेएनयू के छात्र रहे हों. या फिर उसके छात्र ना रहे हों. जेएनयू को कभी देखा हो या उसे नहीं देखा हो. बस आप इन किस्सों के साथ-साथ बहते चले जाते हैं. बहते-बहते कब ‘पार्थसारथी पहाड़ियां’ आ जाती हैं पता ही नहीं चलता. आप इन पहाड़ियों के पेड़ों पर बैठी जानी-अनजानी रंग-बिरंगी चिड़ियों की चहचहाहट को सुनने लग जाते हैं. उन्हें पहचाने की कोशिश करने लग जाते हैं. फिर थोड़ी देर बाद कहीं थोड़ी दूर किसी एक कोने में नाचते मोर देखने लग जाते हैं. कहीं-कहीं इन पहाड़ियों पर आपको बंदर हाय-हेल्लो करते भी मिल जाते हैं. जब आपको इन बंदरों के ‘हाय हेल्लो’ से डर लगने लगता है तो आप किसी सड़क पर निकले मार्च में लगे ‘मार्च ऑन’ के नारे को कुछ और ही समझकर ठहाकों पर ठहाके लगाने लग जाते हैं. कभी ‘खुल’ गए छात्रों के किस्से सुनकर अचंभित होते हुए ‘गर्मी में आग तापने लग जाते हैं’. या फिर कभी ‘आप अखबार को पानी में भीगोकर पढ़ने लग जाते हैं’. कभी कहीं ‘एलियन’ शब्द सुनकर चौंक जाते हैं. और सोच में पड़ जाते हैं कि यार जेएनयू में ‘एलियन’! ( इस किताब को पढेंगे तो ‘एलियन’ भी मिल जाएंगे. हैरान ना हो दोस्त!!) और फिर आप एलियन’ वाली बात को दरकिनार कर ‘चांदनी रात’ में थोड़ा-सा रूमानी होने निकल जाते हैं. वहां किसी के मुंह से निकले इन शब्दों में कि ‘जो मजा प्रेम का प्रक्रति में है वो कमरे में कहां.’ यह बात पढ़-सुनकर आप सहमति में धीरे से अपना सिर हिलाते हैं. और एक पल के लिए अपने प्रेम को भी याद करने लग जाते हैं. और पुराने दिनों के ख्यालों में खो से जाते हैं! अभी आप अपने पुराने ख्यालों में खोए ही रहते हैं कि किताब झट से आपको ‘पहला झटका’ देती है, फिर ‘दूसरा झटका’ देती है, ‘तीसरे  झटके’ के बाद ‘चौथा झटका भी देती है. ये झटके ‘प्लेन’ या भूकंप आदि के नहीं होते हैं. ये झटके ‘अंग्रेजी’ के’, ‘चाय के’, और ‘सिगरेट के’ होते हैं. और इन झटकों के बाद आपके अंदर के आत्मविश्वास को बीज, खाद, पानी मिल जाता है. आत्मविश्वास से भरे आप फिर गुरुओं के संस्मरण पढ़ने लगते हैं. फिर चाहे वे ‘पुष्पेश पंत सर’ हों, ‘पुरुषोतम अग्रवाल सर’ हों, ‘निवेदिता मेनन मैडम’ हों, या फिर ‘चिनाय सर’ हों. वे कैसे छात्रों को ‘सही रास्ते’ दिखाते हैं. वे कैसे छात्रों का ‘हौसला’ बढ़ाते हैं. वे कैसे छात्रों को ‘सवाल करना सीखाते’ हैं. वे कैसे अपनी गलती मानते हुए छात्रों को उस गलती के बारे में बताते हैं. और वे कैसे जीवन में ‘सही फैसले लेना सीखते’ हैं. आप यह सब जान जाते हैं. मतलब आप ‘जेएनयू’ को पहचान जाते हैं.

बाकी यह ‘जेएनयू अनंत जेएनयू कथा अनंता’ नामक किताब-विताब किस्से, संस्मरण ही नहीं सुनाती बल्कि ‘जेएनयू’ के इतिहास के बारे में काफी कुछ कह जाती हैं. जेएनयू’ कब बना? कैसे बना? यह किताब इस संबंध में एक से एक नई जानकारी दे जाती है. मसलन 'फिक्की ऑडिटोरियम' के पीछे ‘गोमती हाउस’ की कैंटीन, जिसमें मैंने खुद काफी समय तक खाना खाया है, क्योंकि वो थोड़ा सस्ता होता था. वहां शुरू में इस यूनिवर्सिटी का कैंपस हुआ करता था. जब यह यूनिवर्सिटी शुरू हुई थी. और यह ‘गोमती हाउस’ आज भी अपने इतिहास के साथ वहां मौजूद है. जेएनयू की प्रवेश परीक्षा कितनी भाषाओं में दी जा सकती है इसका भी जवाब आपको इस किताब में मिल जाएगा. जेएनयू के छात्रावास के नाम किन-किन नदियों पर हैं. इस बात का जिक्र भी यह किताब करती है. ‘PIG शब्द’ का एक नया अर्थ इस किताब में मिल जाता है. यह किताब जेएनयू की ‘ढाबा संस्कृति’ यानि ‘गंगा ढाबा’ के बारे में भी बताती है. यह किताब यहाँ के छात्र चुनाव के बारे में, उनके जोरदार नारों के बारे में भी बताती है. माने यह जेएनयू के बारे में बेहद अच्छी और ज्यादा जानकारी देती है. 

आखिर में इस किताब के किस्से, संस्मरण और जानकारी से अलग दो खूबसूरत बातें भी बताता चलूं. पहली कि इस किताब में कई जगह कविता-अकविता का भी इस्तेमाल किया गया है. जिसे पढ़कर सच में दिल खुश हो जाता है. और अगले पेज को पढ़ने से पहले एक बार फिर से उसे पढ़ने को दिल चाहता है! इसलिए इस लंबी कविता-अकविता की सिर्फ चार पंक्तियों को यहां लिखने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूं.

‘आप अगर लड़कियों के साथ रिश्तों को बहन बेटी मां से इतर एक इंसान के तौर पर देख पाते हैं तो आप जेएनयू के हैं. 

अगर आप सवाल उठा रहे हैं चाहे आप कहीं भी हों.

तो आप निश्चिंत रूप से जेएनयू के ही हैं.’ 

वहीँ दूसरी खूबसूरत बात ये है कि इस किताब में करीब ग्यारह इलस्ट्रेशन शामिल हैं, जिन्हें ‘मी जे’ ने बनाया है. जोकि बेहद ही खूबसूरत हैं. या यूं कहूं ये इलस्ट्रेशन इस किताब को चार चाँद लगाते हैं तो गलत ना होगा. हर सुंदर इलस्ट्रेशन मनोहर तरीके से किताब की कथाओं का हाथ पकड़े ‘जेएनयू अनंत जेएनयू कथा अनंता’ कह रहे हैं. बल्कि इन इलस्ट्रेशन के साथ इन किस्सों को पढ़कर मुझे ‘एम. एफ हुसैन’ जी की किताब ‘एम. एफ हुसैन की कहानी अपनी ज़ुबानी’ की याद हो आई.  

और आखिर में...

‘जेएनयू उनमें ही नहीं बसा जो जेएनयू में पढ़े हैं बल्कि उनमें भी बसा हुआ जो उसे प्यार करते हैं.’


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