Tuesday, February 26, 2013

मोहन राकेश और उनके किस्से, भाग-1

अगर कहीं एक ऐसा शख्स दिखाई पड़े, जो सिल्क की निहायत लंबे कालरवाली कमीज पहने हो, जिसके कफ कोट की बांहों से छह अंगुल बाहर निकले हों और उनमें एकदम पुरानी चाल के कफ-बटन हों, जिसकी टाई की गांठ ढीली मुट्ठी की तरह गर्दन में बेतरतीबी से कसी हो, कीमती कपड़े की पैंट जिस पहननेवाले से पनाह मांग रही हो और जो गोल्ड फ्लैक की सिगरटें जला-जलाकर खा रहा हो और माचिस की तीलियां, राख और टुकड़े निहायत साफ-सुथरी और सजी जगहों में फेंकता जा रहा हो और बात-बात पर आसमान-फाड़ ठहाके लगाता हो और लेखक के बजाय किसी बार का रईस, पर पहली नजर एकदम गावदी प्रोपराइटर लगता हो, तो समझ लीजिए कि वह राकेश है। अगर वह राकेश न भी हुआ तो वह राकेशनुमा आदमी आपको उसका अता-पता बता देगा,“ आप उन साहब को पूछ रहे हैं! जी हां, कल ही उन्होंने यहां टेबल रिजर्व कराई थी, चार-पांच दोस्तों के लिए ... पैसे भी दे गए थे, पर आए नहीं!"...

दिल्ली से कटा हुआ कीर्ति नगर इधर-उधर खाली पड़े हुए प्लॉट, जहां शाम सात बजे से खामोशी छा जाती थी। जब भी वहां बैठता, तो कुछ देर के लिए उसके ठहाकों से दीवारें हिलने लगतीं, पर के क्षण बाद ही बड़ी गहरी खामोशी छा जाती। भीतर से बुलावा आता,“ राकेश जी.... और जब वह लौटता, तो उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में एक अजीब-सा बेगानापन दिखाई पड़ता और फिर अपनी परेशानी को दबाता हुआ कहता, “चलो डियर, कनॉट प्लेस चलते हैं!” और घर से बाहर आते ही वह अपने फॉर्म में आ जाता। वही चुभती हुई बातें, यारों के किस्से और ठहाके! वह हंसता, तो तारों पर बैठी हुई चिड़ियां पंख फड़फड़ाकर उड़ जातीं, और राह चलते ऐसे चौंककर देखते, जैसे किसी को दौरा पड़ गया हो ! ...

7 फरवरी 62 की सर्द सुबह जब वह मेरे घर आया, तो एकदम टूटा हुआ था, पैसे के दुश्मन ने अपना पर्स देखा और साठ-सत्तर रुपए देखकर बोला, “ राजपाल से पैसे लेने हैं! जेब में आज पाई नहीं है......” मै गौर से उसे देख रहा था, अभी-अभी उसने अपनी आंखे चोरी से सुखाई थी, कुछ क्षण खामोश रहकर सोचा था और तंगद्स्ती में भी टैक्सी लेकर मेरे साथ निकल पड़ा था.... टैक्सी से उतरते ही उसने टैक्सी वाले को पांच रुपए इनाम के थमा दिए थे और आगे बढकर गोल्ड फ्लैक का एक टिन खरीद लिया था। दोपहर में हम अलग हो गए। वापस घर आया, तो राकेश की एक चिट पड़ी थी और बियर की दो बोतलें- दोनों खाली- एक में दो घूंट बियर और सिगरेट के टिन में एक सिगरेट – बाकी वह सब पी गया था और चिट पर लिखकर छोड़ गया था, “ कोशिश करुंगा कि रात नौ-साढे नौ बजे फिर आऊं। स्थिति काफी गंभीर है। तुम्हें एक काम अवश्य करना है। सुबह फ्रंटियर मेल पर पुरानी दिल्ली स्टेशन से अम्मा को रिसीव कर लेना और उन्हें साथ यहीं ले आना... मैं किसी भी समय आकर मिल लूंग़ा ! “और इस मुसीबत के समुद्र में डूबते-उतरते हुए भी उसकी विनोद वृति मरी नहीं थी, अंत में चिट पर लिख गया था, “तुम्हारे हिस्से की बियर और सिगरेट छोड़े जा रहा हूं।“  उसे उस वक्त कोसकर सिगरेट तो मैंने सुलगा ली थी, पर तली में पड़ी हुई दो घूंट बियर बोतल समेत फेंक दी थी।......

वह इस बात का भूखा है कि कोई उसका है! यही उसकी अनवरत तलाश है ... कोई उसका है और वह किसी का है – चाहे वह मां हो, दोस्त हो, बीवी हो, या दो दिन का मुलाकाती! वह एकाएक अपना सब कुछ दे बैठता है, कहता कुछ भी नहीं, पर जिससे एक बार मिल लेता है, उसे वह गैर नहीं समझता। वह उसकी जिंदगी के दायरे में आ जाता है। अगर ऐसा न होता, तो कश्मीर में वह तीन दिन परेशान न घूमता। राकेश जब पहलगाम पहुंचा, तो तय यही था कि सब दोस्त तम्बू लगाकर रहेंगे और सबके तम्बू अलग-अलग होंगे। राकेश पिछले साल भी पहलगाम आ चुका था और एक तम्बूवाले से तम्बू लगवाकर रह चुका था। पहलगाम पहुंचने पर पता लगा कि वह तम्बूवाला श्रीनगर गया हुआ है। वहां और भी बहुत-से तम्बूवाले थे, जो उसे घेर रहे थे, पर वह तीन दिन तक उस जरा-सी जान-पहचान के तम्बूवाले के लिए इंतजार करता रहा और जब वह वापस आया, तभी उसने अपना तम्बू लगवाया। और गुरुद्वारा रोड के टैक्सी स्टैंड पर जब आठ महीने बाद एक दिन फिर वह मेरे साथ पहुंचा, तो वह उसी टैक्सीवाले को खोज रहा था, जिसने उसे मुसीबतजदा दिनों में बहिफाजत पूरी दिल्ली घुमाई थी और जिसका नाम तक उसे याद नहीं था। और इस मायने में कम्बख्त की किस्मत भी जोरदार है – जिसे वह चाहता है, वह मिल भी जाता है।......... 

जिंदगी की गंभीर-से-गंभीर और अहम बातों को सुलझाने के लिए उसके पास कई नुसखे हैं। एक नुसखा बहुत ही लाजवाब है और उन सभी साहित्यकारों के लिए फायदेमंद है, जो नौकरियों में लगे हुए हैं और हर क्षण नौकरी छोड़ने की बात करते हैं। वह आपसे गंभीरता से पूछेगा, “नौकरी छोड़ने की बात सोच रहे थे? ”

“हां !”

“कुछ तय नहीं कर पा रहे हो ?”
“ हां ! “

“सुबह दस बजे कपड़े पहनकर दफ्तर जाने का उत्साह मन में होता है ?”

“इसका क्या मतलब ?”

“अगर कपड़े बदलकर दफ्तर जाने को मन करता हो, तो तुम्हें नौकरी करनी चाहिए, अगर न करता हो , तो छोड़ देनी चाहिए! और कुछ सोचने की जरुरत नहीं है- सीधा-सादा नुसखा है...

भविष्य की चिंता कीजिए तो एक और नुसखा उसके पास है, “कम-से-कम पांच सौ में गुजारा हो जाएगा ! है ना ? तो सूद पर तीन हजार कर्ज लो और आराम से बेफिक्र होकर छह महीने में छह हजार का काम करो, फिक्र किस  बात की है। "

भारतीय डेलीगेशन का अपना लीडर चुना जा रहा है। कोई साहब कहते हैं – मिनिस्ट्री की राय है कि अमुक को चुना जाए। वह अमुक अभी अनुपस्थित है। आने वाला है। राकेश भन्नाता हुआ सिगरेट का पैकेट निकालता है । उसमें सिगरेट नहीं है। एक क्षण वह सिगरेट के लिए झुंझलाता है, फिर वहीं से बहुत ऊंची आवाज में नाराजी से बोलता है- अगर सरकार ही सब तय करेगी तो हम यहां किसलिए हैं? हम जो लीडर चुगेंगे वह लीडर होगा। अगर इस तरह सरकार के डिक्टेट्स माने जाऐंगे तो मैं इसके विरोध में वाकआऊट करता हूं। मैं उसे हाथ के दवाब से समझाकर बैठा लेता हूं। धीरे से कहता हूं- सिगरेट लाने के लिए वाकआउट करने की जरुरत नहीं है। वह यों भी आ सकती है। वह हंस देता है- तू नस पकड़ लेता है, पर यहां दूसरा मसला भी है...

एयरपोर्ट चलने से पहले वह परेशान है। पुरवा के लिए खिलौना लेना है। इतवार। बाजार बंद है। सोचा, दादर से होते हुए निकल जाऐंगे। वह खुला होगा। फिर वक्त नहीं रहा। सीधे एयरपोट पहुंच गए। लाऊंज में पहली कतार की आखिरी तीन कुर्सियों में से अतिंम वाली छोड़कर शेष दो पर बैठे हम कॉफी पी रहे है। वह बहुत उदास है। भरा-भरा, थका-थका।

इस बार बहुत थक गया हूं, दिल्ली जाकर खूब सोऊंगा।

-मैं शायद पहली तारीख को आऊं।

-आना तो जगा लेना। वह फिर चश्मे के भीतर से झांककर कहता है...

फोन पर एक आवाज –दिल्ली में कुछ हो गया है। फौरन मालूम करिए......

दिल्ली का वही एयरपोर्ट है। वही रास्ता है। और वही राजेन्द्रनगर है। शायद जिंदगी की हलचल भी वही रही हो। पर भयानक सन्नाटा है। आज हलचल में कोई आवाज नहीं है। पेड़ो में हवा नहीं है। हवा में जान नहीं है। वही छोटा-सा फाटक। वही टूटी हुई प्राम, बाईं दीवार से लगी खड़ी। जीने का दरवाजा खुला हुआ। ऊपर घर का दरवाजा खुला हुआ। जैसे यहां कोई नहीं रहता। गलत घर तो नहीं है? मैं अपने इस घर का पता तो नहीं भूल गया? पहला कमरा- सब हैं। जैसे कोई नहीं पहचानता। दूसरा कमरा-वहां भी कुछ हैं। वे भी नहीं पहचानते। बरामदा- दो-तीन लोग वहां भी हैं, वे भी नहीं पहचानते। मैं ही किसी को कहां पहचान पा रहा हूं। आखिरी कमरा- उसमें सफेद चादर ओढ़े कोई लेटा है-वह भी नहीं पहचानता। शायद देख नहीं पाया। मैं सिरहाने बैठकर चादर हटाता हूं।

सुन!

राकेश नहीं सुनता।

-देख तो..

वह नहीं देखता।

-अरे जाग तो।

वह नहीं जागता....

कुछ भी बीता नहीं है। लोग कहते हैं, वह सैंतालीस साल का था। दोस्त की कोई उम्र होती है? दोस्त और मां- ये हमेशा अपनी उम्र के होते हैं। बाकी सबकी उम्रों में फर्क होता है।.....

और जो अपने वक्त की उम्र हासिल कर ले, वह क्या होता है। उसका क्या नाम होता है ? एक नाम मोहन राकेश होता है। 

( नोट- मोहन राकेश पर लिखा कमलेश्वर का यह संस्मरण " मेरा हमदम मेरा दोस्त " किताब से लिया गया है। इस किताब का प्रकाशन " किताबघर" ने किया है। और यह संस्मरण 14 पेज का है इसलिए इसके कुछ हिस्से लाया हूँ।)

 

Monday, September 10, 2012

मैं जिंदा हूँ




मन होता नहीं, किसी से मिलने के लिए
दिल पसीजता नहीं, जरुरतमंदो के लिए.
खुली आंखें देखती हैं, जुल्म होते हुए
हाथ उठते नहीं, जुल्मी लोगों के लिए.
जुबान खुलती नहीं, अपने हक के लिए
पैर चलते नहीं, सत्य की आवाज़ के लिए.
दिमाग सोचता नहीं, अपने देश के लिए
फिर भी लोग कहते हैं कि, मैं जिंदा हूँ !


Friday, May 11, 2012

घी के दिए जलाऐंगे, मंटो का जन्मदिन मनाऐंगे...

लम्बा-तिरछा , चपटा, गोरा-गोरा, हाथ की पीठ पर नसें उभरी हुईं, कंठ की घंटी बाहर निकली , सूखी टांगो पर बड़े- बड़े पांव, लेकिन  बेडौल नहीं, स्त्रैणता लिए हुए अजीब सी नफासत, चेहरे पर झुंझलाहट, आवाज में बेचैनी....... मंटो को पहली बार देखकर कुछ  इन बातों का अहसास  होता है।  वह अपने बुजुर्गों की इज्जत करता है, मुहब्बत नहीं। अदब-आदाब में, आचार-व्यवहार में, दृष्टिकोण में दोनों तरफ इतना घोर मतभेद था कि मंटो ने बचपन से ही अपना घर छोड़ दिया था और अपने लिए नया पथ खोजना शुरु कर दिया था। अलीगढ़ , लाहौर, अमृतसर, बम्बई, दिल्ली- इन स्थानों ने मंटो की जिंदगी को कई रंगो में देखा है। रुसी साहित्य का पुजारी मंटो, चीनी साहित्य का प्रेमी मंटो, कटुता और निराशा का शिकार मंटो, गुमनाम  मंटो, बदनाम मंटो, भटियार- खानों, शराबखानों और चकलों में जाने वाला मंटो और फिर घरेलू मंटो, मुहब्बत करने वाला मंटो, दोस्तों की मदद करने वाला मंटो.... उर्दू का सुविख्यात  लेखक मंटो...वह हजार बार कहता है, मुझे इंसानों से मुहब्बत नहीं है। मैं एक गले-सड़े कुत्ते के पिल्ले से मुहब्बत कर लूंगा, लेकिन  इंसानों से नहीं। वह कहेगा, " मुझे मैत्री, द्या, करुणा , प्यार- किसी पर विश्वास नहीं। मेरा विश्वास  शराब  पर है। यह प्रगतिशीलता सब बकवास है। मैं प्रगतिशील नहीं हूँ। मैं सिर्फ  मंटो हूँ और शायद वह भी नहीं हूँ....

मंटो की बातों में हास्य , अनोखापन ज्यादा होता है। दुनिया के किसी विषय पर पर उससे बात कीजिए , वह उस पर एक नए अंदाज से बात करेगा।  आम रास्तों से बचकर चलने की आदत अब उसके मिजाज का एक  अंग बन गई है। वह उसे छोड़ नहीं सकता- आप यदि दास्तवस्की की प्रशंसा करें तो वह सॉमरसेट मॉम के गुण गाएगा। आप बम्बई शहर की खूबियां गिनाऐंगे तो वह अमृतसर की तारीफ के गीत गाने लगेगा। आप जिन्ना या गांधी की महानता के कायल होते नजर आएंगे तो वह अपने मुहल्ले के मोची की महानता जताने लगेगा।  आप गोश्त और पालक पसंद फरमाएंगे तो वह आपको दाल खाने की तरगीब देगा। आप शादी करना चाहेंगे तो वह आपसे कुंआरा रहने को कहेगा।  आप कुंवारेपन को अच्छा समझेंगे तो वह शादी की उपयोगिता पर बहस करके आपको शादी के लिए मजबूर करेगा।  आप उसके एहसान का जिक्र करेंगे तो वह आपको बुरा- भला कहेगा, आप उसे गाली देंगे तो वह आपके लिए पांच सौ की नौकरी ढूंढता फिरेगा- मंटो के मिजाज की तरह उसकी दोस्ती , दुश्मनी और उसका प्रतिशोध भी अजीब है और उसमें सच्ची मानवता के बहुत से पहलू पाए जाते हैं। उसकी कठोरता , निर्भीकता और कटुता एक तरह का एक खोल है, जो उसने अपने नर्म व्यक्तिव की सुरक्षा के लिए अपने ऊपर चढ़ा रखा है। अपने आपको दूसरों से एकदम अलग दिखाने की इच्छा वास्तव में इसके सिवा और कुछ नहीं है कि वह अंदर से बिल्कुल हमारे जैसा है, बल्कि हमसे ज्यादा जख्मी है, ज्यादा भावुक है, ज्यादा हमदर्द है....

मैंने मंटो को रोते हुए भी देखा है। वह अपने डेढ़ वर्ष के बच्चे की मौत पर रो रहा था । उसका गला रुंधा हुआ था और उसके पपोटे सूजे हुए थे और उसने मुझसे कहा " कृशन, मैं मौत से नहीं डरता, किसी मौत का असर नहीं लेता। लेकिन यह बच्चा- इसलिए नहीं कहता हूं कि यह मेरा बच्चा है- इसलिए कहता हूं - तुम इसे देखते हो न, इस वक्त भी कितना मासूम , कितना नया, कितना प्यारा मालूम होता है। मैं सोचता हूँ कि जब कोई नया ख्याल अपने खात्मे तक पहुंचने से पहले टूट जाता है, उस वक्त कितना बड़ा सानहा होता है। हर नया बच्चा एक नया ख्याल है। यह क्यों टूट गया? अभी मैंने इसे तड़फते देखा है। मैं मर जाऊं, तुम मर जाओ, बुढ्ढे, जवान, अधेड़ उम्र के लोग मर जाए, मरते रहते हैं, लेकिन यह बच्चा - फितरत ( प्रकृति) को किसी नए ख्याल का इतनी जल्दी न गला घोंटना चाहिए।" और फिर वह फूट-फूटकर रोने लगा। उसने जो खोल अपने ऊपर चढ़ा दिया था, उसके टुकड़े-टुकड़े हो चुके थे....

मंटो की जिंदगी की बहुत सी ऐसी बातें हैं जो उसकी जिंदगी में नहीं कहीं जा सकती  और इसलिए लिखी भी नहीं जा सकती। लेकिन एक घटना मैं यहां लिखे बिना नहीं रह सकता.... अचानक मेरी मुलाकात मंटो से रेलगाड़ी में हो गई। कोई दस पन्द्रह मिनट तक हम लोग इकटठे रहे। इधर-उधर की बातों के बाद मंटो ने एकाएक मुझे पूछा, " भई मैंने पूना में एक लड़की "शे" साहब के पास भेजी थी, ऐक्ट्रेस बनने की ख्वाहिश रखती थी। उसका क्या हुआ?" मैंने कहा- " वह लड़की तो "प " साहब के पास है आजकल।" फिर मैंने पूछा , " तुमने उसका अध्ययन किया होगा?" मंटो ने अत्यंत गंभीर होकर कहा , " लाहौल विला कूवत! मैं तो सिर्फ तवायफों का अध्ययन करता हूँ। मैं शरीफ लड़कियों के नजदीक नहीं फटकता।" यह मंटो का खास अंदाज है। फिर उसने रुककर कहा- " मुझे तो बेचारी बड़ी शरीफ मालूम होती थी, किंतु पेट बुरी बला है।" फिर वह देर तक चुप रहा। और मैंने महसूस किया कि इस इंसान के अंदर कितनी झिझक, शर्म की पाकीजगी है। वह औरत को कितनी साफ सुथरी, पवित्र और इस्मत-परवर देखना चाहता है। और जब कोई जिंदगी और सृष्टि और सौन्दर्य के स्त्रोत को गंदगी और मल से पाक देखना चाहे तो उसके स्वस्थ दृष्टिकोण के प्रति कोई संदेह नहीं रहता, उसकी साहित्यिक ईमानदारी को स्वीकार करना ही पड़ता है। कम से कम मुझे इसका पूरा विश्वास है। यह अलग बात है कि मंटो मुझे केवल झुठलाने के लिए दो एक कहानियां मेरे दांवे को गलत साबित करने के लिए लिख दे...... 

नोट- मंटो के सौवें जन्मदिन पर एक दीपक  हमारी तरफ से " मंटो: मेरा दुश्मन " किताब से कृशन चन्द्र का लिखा संस्मरण । अलग अलग टुकड़ो को एक साथ जोड़ने के लिए माफी चाहूँग। 


Sunday, November 13, 2011

नाटक- गालिब-ए-आजम और मैं

जब भी गोरा चेहरा, ऊंची नाक, चौड़ा माथा, लम्बे कान, घनी सफेद दाढ़ी, लम्बा कद, इकहरा बदन जिस पर लम्बा-सा चोगा , और सिर पर बड़ी-सी फर वाली टोपी पहनने वाले शख़्स मिर्जा असद अल्ला खां ग़ालिब उर्फ चाचा ग़ालिब का जिक्र आता है , तो उनका यह शेर बरबस ही याद आ जाता है जिसमें उनकी पूरी शख्सियत मौजूद है :

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे।
कहते हैं कि गालिब का है, अंदाज-ए-बयां और॥

सच  में मिर्जा गालिब का अंदाज-ए-बयां न्यारा ही था। वरना मिर्जा गालिब इतने दिनों तक अपनी शेरो शायरी के बल पर लोगों के दिलों में जिंदा न रह पाते। मैं तो अब तक शेरो शायरी का मतलब मिर्जा गालिब और मिर्जा गालिब का मतलब शेरो शायरी समझता रहा था। मैंने जब भी गालिब की शेरों शायरी की तरफ अपने कदम बढाये, फारसी के कठिन शब्द हमेशा गतिरोध की तरह बीच में आ खड़े हुए। इसके इतर मिर्जा गालिब के बारे में यही जाना कि शायर तो वो अच्छे थे पर बदनाम बहुत थे। इससे अधिक कुछ नहीं जाना। यह संयोग था कि जब सी. डी. सिद्धू  सर का लिखा नाटक " गालिब-ए-आजम" देखा तो मैं मिर्जा गालिब की शेरो शायरी के साथ-साथ उनका भी मुरीद हो गया। इस नाटक से मुझे मिर्जा गालिब की शख्सियत के कई पहलुओं से रुबरु होने का मौका मिला। नाटक में सी. डी. सिद्धू सर ने मिर्जा गालिब की जिंदगी के तीन अहम पन्नों को इतनी खूबसूरती से पेश किया है, मानो ऐसा लगा जैसे मिर्जा गालिब दोबारा जिंदा हो गए हों।

यूं तो मिर्जा गालिब और बदकिस्मती दोनों साथ-साथ चलते हैं, किंतु इस नाटक में गालिब के उस एक रुप को जब जाना तो मैं उनके हौंसले का कायल हुए बगैर नहीं रह सका, जब पूरी पेंशन न मिलने के कारण उन्हें मुफलिसी में गुजर-बसर करना पड़ी। जिंदगी के सुनहरे दिनों में वो सिर तक कर्ज में डूबे रहे। रोज-ब-रोज दरवाजे पर कर्जख्वाहों के तकाजे मिर्जा गालिब की बेगम उमराओं जान को परेशान करते रहे। एक वक्त ऐसा भी आया जब मिर्जा गालिब के खिलाफ डिक्रियां निकलने लगी। जिसकी वजह से मिर्जा गालिब का गृहस्थ जीवन तनावों से घिरता रहा। मगर क्या मजाल कि इस फनकार को अपने फन से कोई तकलीफ जुदा कर पाती। यहां तक कि तनावो के बीच मिर्जा गालिब अपने नन्हें-नन्हें बच्चों को फौत होते देखता रहा और अंदर ही अंदर रोता रहा। शायद तभी उनकी कलम से यह शेर निकला :

मेरी किसमत में गम अगर इतना था ।
दिल भी, या रब्ब , कई दिये होते ॥

गालिब का दूसरा रुप इस नाटक में बखूबी तौर पर सामने आया है। जब फीरोजपुर झिरका व लोहारु के राजा नवाब अहमद खां की अनिकाही बेगम मुद्दी का बेटा शम्स अलादीन पूरी पेंशन ना देने की दगाबाजी लगातार करता रहा। और जब मिर्जा गालिब के सिर के ऊपर से पानी गुजरने लगा, तब वह इस बेइंसाफी के खिलाफ यह कहते हुए उठ खड़ा हुआ कि जिस कलमकार ने खुद जिंदगी से जूझना नहीं सीखा, मुश्किलात को शिकस्त देना नहीं सीखा, वो दूसरों को क्या सिखाऐगा? एक डरपोक ऐसी नज्म नहीं कह सकता , जो दूसरों को बहादुर बनाए। एक कायर ऐसा शेर नहीं कह सकता जो सामईन के अंदर नई रुह फूंके। और वह अपनी पेंशनी हक की लड़ाई के लिए बनारस से होते हुए कोलकाता पहुंचकर अपने साथ किए गए धोखे के खिलाफ मुकदमा दायर करता है। बेशक यह इतिहास में दर्ज है पर यह सिद्धू सर के इस नाटक की खासियत है कि नाटक का नायक लाचारी, गुरबत और ढेरों तकलीफों के बीच रहते हुए भी बेईमानी और बेइंसाफी के खिलाफ जंगजू की तरह खड़ा हो जाता है, और दर्शकों को मुश्किलों से लड़ने का जज्बा देता है। यह अलग बात है कि चंद साल बाद ही वह पेंशन का मुकदमा खारिज होने के कारण एक बार फिर सदमे से गुजरता है। मगर नाटक के नायक मिर्जा गालिब की ही ताकत थी कि तमाम तकलीफों से भरी जिंदगी में भी इंसानियत का दामन पकड़े हुए कहता है :

हम कहां के दाना थे, किस हुनर में यक्ता थे ।
बेसबब हुआ गालिब दुश्मन आसमां अपना ॥

सिद्धू सर के लिखे नाटकों में लगभग हर नायक की भांति ही मिर्जा गालिब की भी परिस्थितयां, हालात, हमेशा दुश्मन बने रहे। मगर इन हालात और तकलीफों के बीच से ही नाटक का नायक एक नया जीवन दर्शन, एक नई जीवन पद्धति, जीवन जीने का तरीका, अपनी बनारस और कोलकाता की यात्राओं में से खोज निकाल लाता है। इन दोनों शहरों की माटी की महक, जीवनशैली, संस्कृति को देखकर नायक की सोच में आए बदलावों को इस नाटक में भरपूर जगह दी गई है। बल्कि यूं कहूं कि अन्य नाटककारों ने इसका बस जिक्र भर किया है परतुं सिद्धू सर ने मिर्जा गालिब की जिंदगी में से जीवन के अध्यात्म को, उसके दर्शन को, अपने नाटक में पूरी तरह उंडेल दिया है। और यही इस नाटक की आत्मा है। मिर्जा गालिब का इस नाटक में यह तीसरा रुप है। जब वह बनारस की "चिरागे दैर" की रोशनी में इल्म को पाता है और कहता है : बनारस के कयाम ने मेरी सोच बदल दी। इन दिनों बहुत कुछ पता चला है मुझे। मजहब के बारे में। दीन धर्म के बारे में। धर्म के नाम पर पुजारियों ने, मुल्लाओं ने, फर्जी किस्से कहानियां घड़ रखे हैं। गरीबों को दौजख के खौफ दिखाकर , जन्नत के झूठे ख्वाब बुनकर, फुसला रखा है । ये तो पहले ही बेचारे भूख के मारे हैं, बीमारियों के सताये है, मौत के दहलाये हैं। ऊपर से पंडित और मुल्लाओं के ये ढ्कौसले। यह जुल्म है। यह खाओ, वो न खाओ। यह पियो, वो न पियो। नमाज पढ़ो । रोजा रखो। बुतो को मत पूजो। गालिब आगे कहता है: पुराने तौर तरीके बदलों। खुदा खोखली रस्मों रीतों में नही घुसा बैठा। खुदा आपसी मोहब्बत में है।

गालिब यहीं नहीं रुकते बल्कि अपनी आंखों में संत रविदास के बेगमपुर का ख्वाब देखते है, " जहां किसी को कोई गम न हो। सब जमीन जायदाद साझे में हो। बराबर हों सब लोग। कोई ऊंच नीच न हो। हर एक को रोटी मिले। कपड़ा मिले। वहीं दूसरी ओर गालिब जब कोलकाता की आधुनिकता के उजाले में खुद को खड़ा पाता है तो वह उसके हर नक्श को बखूबी देखता और समझता है। वह कोलकाता की फिजा में आधुनिकता की पड़ी छौंक को पहचानता है, उसकी महक को अपने नथूनों से अनुभव करता है। जीवन में क्या आवश्यक है क्या नहीं, बारिकी से समझता है। तभी तो वो कह उठता है कि " नई दुनिया को सलाम करो। कोलकाता देखो। अंग्रेजों की नई नई इजादें देखो। हम पत्थर से पत्थर टकरा कर आग जलाया करते थे। अंग़्रेज को देखो। एक तिनके पर थोड़ा सा मसाला लगाया और छूं!  आग जल गई! बड़े बड़े जहाज चलते है समुद्र में। हजारों कोस तक। कैसे ?  भाप से! " गालिब इधर आधुनिकता की रोशनी में आगे बढ़ने की ओर इशारा करता है। और इन इशारों को समझते हुए मेरा दिल कहता है :

हुई मुद्दत कि गालिब मर गया पर याद आता है।
वो हर एक बात पे कहना कि यूं होता तो क्या होता ॥

तब मुझे लगता है कि आखिर यह "यूं " कितना गजब ढाता है। यूं होता तो क्या होता? इस यूं में क्या-क्या होता? या क्या-क्या हो सकता है? यह नाटक भी उसी की ओर आगे बढता हुआ एक कदम है। लगता है कि नाटक के लेखक सी.डी. सिद्धू सर भी आपसी मोहब्बत के धर्म , बेगमपुर के ख्वाब और कोलकाता की आधुनिकता के सपनो को अपनी आंखों में संजोये इस नाटक को रचते हैं। और इन सपनों से इंसान को इंसान बनने को प्रेरित करते हैं। इंसान को जिंदगी की तमाम तकलीफों से लड़ने के लिए जंगजू बनाते है। और एक खुशहाल, सुखी जिंदगी जीने के लिए नए-नए सपनो की राह दिखाते हैं। सी.डी. सिद्धू सर के इस नाटक " गालिब-ए-आजम" की यही तो खूबी है। और यह इस नाटक की जान है। अगर मैं " गालिब-ए-आजम " को नहीं देख पाता तो संभवत: गालिब को भी नहीं जान पाता । या यूं कहूं कि एक पूरी जिंदगी को नहीं जान पाता जो गालिब के जरिए हमें अपनी जिंदगी जीना सिखाती है। बकौल गालिब- " बेगम, यही है मेरी जिंदगी भर की कमाई। मेरा "दीवान-ए- गालिब" क्या जिंदगी बख्शी है खुदा ने। हादसों का हुजूम। मुसीबतों का जमघट। मगर मैंने हिम्मत नहीं हारी। हर मुश्किल को शेयरों में ढालता गया । हर नन्हें मुन्ने की मौत पर, मैं तहयया करता रहा, कि मैं अपने कलम से मलकल मौत से बदला लूंगा। मैं लाफानी कलाम कहूंगा। उमराओ, आज मुस्करा दो । हंस दो। " यह मुस्कराहट, खुशी, हंसी ही जीवन जीने का हौसला। और नाटक के लेखक का मकसद। जो सिद्धू सर के हर नाटक की तरह इस नाटक की पटकथा का अंत है। जब इन सुंदर पक्तिंयों के साथ मंच का पर्दा गिरता है तो "गालिब-ए-आजम" नाटक हमारे दिलो दिमाग पर छा जाता है। शायद सालों के लिए , सदियों के लिए , या फिर जीवन भर के लिए ।

- सुशील कुमार छौक्कर

नोट- यह नाटक रिव्यू "गालिब-ए-आजम" पुस्तक से लिया गया है, पुस्तक के लेखक है डॉ. चरणदास सिद्धू। और प्रकाशित हुआ है "श्री गणेश प्रकाशन"- 32/52 , गली नम्बर -11, भीकम सिंह कालोनी , विश्वास नगर, शाहदरा से ।

Sunday, October 2, 2011

लहूलुहान इंसान

आदमी है कि सिर्फ सांसे ले रहा है 
क्योंकि वह मरना नहीं चाहता है
कभी मां-बाप की बुढ़ी होती हडिडयो की चिंता में
कभी बच्चों की जवान होती मुस्कराहट की फिक्र में
और कभी उसकी खातिर जो हर सुख-दुख में साथ देती है।
वरना तो वह खुद के अंदर बैठे इंसान को
रोज ही लहूलुहान होते देखता है।
उसके जख्मों को अपनी जीभ से चाटता है
इसके अलावा उसके पास कोई चारा है भी क्या ?
क्योंकि
जब तक,
घृणा से देखती आंखे होगीं,
कटु शब्द बोलती जबानें होगीं ,
कमजोर पर उठते हाथ होंगे
सच को कुचलने वाले पैर होंगे,
लूटने वाले शातिर दिमाग होंगे,
जात-पात पर लड़ते इंसान होंगे,
किसानों को ठगते व्यापारी होंगे,
मजदूरों का खून चूसते साहूकार होंगे। 
तब तक
वह ऐसे ही जख्मों को जीभ से सहलाऐगा,
उससे रिसते खून के घूंट पीता जाऐगा।

 -सुशील छौक्कर

Tuesday, September 27, 2011

बेटी और उसकी बातें














बेटी के नन्हें-नन्हें हाथ अब बड़े होने लगे हैं

खिलौनों के साथ किताबें-पेंसिल भी पकड़ने लगे हैं.

जुबां अब इसकी तुतलाती नहीं है

द,आ का डंडा,दा,द ऊ की मात्रा,दू,दादू पढ़ने लगी है.

फरमाईशें छोटी-छोटी करती है

सपने बड़े-बड़े देखती है.

कभी अकेले कमरे में बच्चों को पढ़ाती मिलती है

कभी हम सबको सुई लगाती फिरती है

स्कूल जाते वक्त कभी रोती नहीं

होम-वर्क किए बगैर कभी सोती नहीं.

कभी-कभी सहेलियों की देखा-देखी

बाइक से स्कूल जाने को कहती है.

समझाने पर पैदल ही मुस्कराती चली जाती है.

देख कर इसकी मासूमियत दिल भर आता है

फिर इसके बड़े-बड़े सपनो की खातिर

बहुत कुछ करने को जी चाहता है.

- नैना के पापा

 

Monday, September 5, 2011

शिक्षक दिवस पर, गुरु की बातें

माननीय प्रधान जी ते साथियों:

पहला धिआंवां बाबा नानक,

जिन प्यार दा सबक सिखाया

दूजे धिआंवां भगत सिंध नूं

जालम नूं ललकारे....

C.D.Sidhu Sir

ये दोनों सतरें मेरे नाटक भाइया हाकम सिंह के गीत का हिस्सा हैं। मेरे पूरे नाटकों का विषय पक्ष यही है। बाबा नानक का आपसी प्यार का सबक  सरबत के भले की कामना। और महान क्रांतिकारी भगत सिंह शहीद का शोषण के खिलाफ युद्ध। जालिमों से टक्कर लेना। ये सबक सदियों पुराने हैं। कुल दुनिया के बुजुर्गों ने, कवियों ने, कलाकारों ने, दोहराए हैं। विषय पक्ष, किसी भी लेखक का  संदेश , नितांत नया नहीं हो सकता। तो मेरे 33 नाटकों का नयापन क्या है। मेरी कोशिश रही है कि मैं अपने गांव के लोगों को, अपने इलाके के लोगों को, अपनी बोली के अंदर, मंच पर जीवंत कर सकूँ। और अपने लोगों को उनके पड़ोसियों के किस्से देखा कर, उनके इतिहास की घटनाएं दोहरा कर, जीवन के बारे में अधिक  चौकस कर सकूं- ताकि वे हिम्मत करके, अपनी कमजोरियों से, सामाजिक कुरीतियों से, वहमों-भ्रमों से, आजाद हो सकें। बेइंसाफी सए,जुलम सितम से, जूझ सकें। मैं सतलुज और व्यास दरियाओं की बाहों में पनपते, जरखेज इलाके, दुआबा का जन्मा पला हूँ। गांव  भाम, जिला होशियारपुर। दुआबा हमेशा लोक नाटक का गढ़ रहा है। मैं नकल  और रासलीला खेलने वाली टोलियों का वारिस हूँ। मैंने दुआबा को पूरी  तरह जानने की कोशिश की है। मेरे अधिकतर पात्र  जाने पहचाने जीवन से लिए गए है। उनकी बोली भी वही है  जो मैं बचपन से सुनता आया हूँ।अपने लोगों की सच्ची तस्वीर खेंचने के वास्ते मैं कई बरस देहात में घूमा हूँ। देहाती कपड़े पहनकर। फेरी वाला बनकर , साधु के लिबास में, या कोई दूसरा किरदार बनकर। मैंने अपने लोगों के साथ एकरुप होने की कोशिश की है।मुझे लगातार अहसास रहा है कि मैं दिल्ली में बसते हुए , कॉलेज में पढ़ाते हुए , अपने पिछले जीवन  को, अपनी  जड़ो को, न भूलूं। मैं बे-जमीन गरीब परिवार का पहला बंदा हूँ जो कॉलेज की पढ़ाई करने दिल्ली तक पहुंचा। और वहां से पी.एच.डी करने अमरीका तक गया। मेरे पिता की सदा मुझे ताड़ना रही –" चार  अक्खर अंग्रेजी के पढ़कर कभी अपने आपको गरीबों से ऊंचा मत समझना।" मैं धरती पुत्र हूँ। सदा धरती से जुड़ा रहा हूँ। मेरे नाटकों के पात्र मेरे परिवार के बंदे है। रिश्तेदार हैं। पड़ोसी है। वे दलित लोग जिन्होंने सदियों से जमीन वालों का, रजवाड़ो का, पुजारियों का जुल्म सहा है।उनकी मुशिकलों को, संताप को, मैंने नजदीक से देखा है, झेला है। शायद इसी कारण मैं गरीबों को मंच पर जिंदा खड़ा करने में कामयाब हुआ हूँ। मेरे कुछ दोस्त बताते है, मैं पंजाब का पहला लेखक हूँ जिसने दृढ होकर सेपी का काम करने वाले, बागवान, मोची, जुलाहे, नाई, कहार, कुम्हार,  मिस्तरी, बाजीगर नायक नायिकाओं का सृजन किया है। शायद यही मेरी नाटकों का नयापन है।

बाबा नानक के जीवन ढ़ग का मेरे ऊपर बहुत असर है। अपनी जिंदगी के कई बरस नानक ने दुआबा में बिताए। अपने प्यार के संदेश को उसने हिंदुस्तान के कोने कोने में पहुंचाया।नानक ईमानदार कामगार  के घर की सूखी रोटी खाकर खुश था। बेईमान अमीरों को सरेबाजार  फटकारता था।बाबर जैसे हमलावारों के सताए हुए गरीबों की वेदना  को नानक ने लफ्ज दिए। नानक सरीखे शायर के रास्ते पर  चलते हुए, अगर मैं अपनी कलम से, मजदूरों को जबान दे सकूं, मं अपनी जिंदगी सार्थक समझूंगा। अपने जमाने का नानक बहुत  बहादुर शायर था। हरिद्वार पहुंचकर , नानक ने पाखंडी ब्राहम्णों को ललकारा। गरीबों को इन ठगों से आजाद  करने  की कोशिश की। क्या मैं,आज  अयोध्या  पहुंचकर , मक्का पहुंचकर , कटटरपंथियों को धर्म का सही अर्थ समझाने का हौंसला रखता हूँ। संतो  की वाणी ने हमेशा मेरा मार्गदर्शन किया है। खासकर कबीर जुलाहे के ये बोल:


पत्थर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़।

तांते  तो चक्की भली, पीस खाये संसार॥

इंकलाब का सबक मुझे इंग्लैंड या अमरीका से लाने की जरुरत नहीं थी। मेरे मुल्क के बुजुर्ग सदियों तक हमें पाखंडियों से, पुजारियों से, खबरदार रहने की शिक्षा देते रहें। अगर मैं अपने नाटकों में उन्हीं की शिक्षा दोहरा सकूं तो मुझे फखर होगा। संत रविदास, नामदेव, सदना, कबीर सब  गृहस्थी थे।इनसे मैंने लेखन के बारें में,कला के सृजन की बाबत, बढ़िया सबक सीखा। कलाकार कोई अलग किस्म का जानवर नहीं होता। कविता के गैबी ताकत की जरुरत नहीं। कला का सृजन  और जूते बनाना, कपड़ा बुनना, खेत  में हल चलाना, बीज  बोना, फसल समेटना एक ही इंसान  कर सकता है। खाली समय में एक कामगार गीत बना सकता है, गा सकता है.... अपने देहात में,परिवार में, मैंने बहुत बंदे देखे है जो रोटी कमाने के धंधे के साथ साथ , नाचने गाने का काम भी कर सकते हैं। मैं भी उन साधारण लोगों जैसा हूँ। 43 बरस मैंने  हंसराज कॉलेज दिल्ली में अग्रेंजी पढ़ाई। नाटक लिखते वक्त , खेलते वक्त, मैंने इसे अपने अध्यापन का ही हिस्सा माना। किताब है?कोई भी बंदा लिख सकता है। नाटय निर्देशन ? हर  बशर कर सकता है। सिर्फ लग्न  चाहिए। मेहनत चाहिए। मैं  इसी किस्म  का मजदूर लेखक हूँ। रंगकर्मी हूँ। अध्यापक हूँ।

बोली के बारे में भी मेरा पक्का अकीदा है: चंगा साहित्य सिर्फ अपनी मां-बोली में रचा जा सकता है। साहित्य  अपने लोगों के साथ अपनी बोली में रचाया हुआ संवाद है। मैं अग्रेंजी में नाटक लिखकर, हिंदुस्तानियों के बारे में, उनकी अच्छाइयों या बुराइयों की बाबत,  इंग्लैंड या अमरीका वालों को रिपोर्ट नहीं भेजनाअ चाहता। मैं भंगी बाबा बंतू के, जुलाहे किरपा राम के, चमार खुशिया राम के, बेटे बेटियों संग सीधी बातचीत करना चाहता हूँ। उनका हौंसला बढ़ाना चाहता हूँ। उनमें बेहतर भविष्य  की कामना जगाना चाहता हूँ। और इस  काम  के लिए सबसे कारगर  माध्यम हमारी मादरी जबान हो सकती है। मेरे सभी नायक-नायकाओं का शिखर है शहीद भगत सिंह। बचपन से मैं अपने इलाके में जन्मे इस सूरमें के किस्से सुनता आया हूँ। मेरी भगत सिंह शहीद:नाटक तिक्कड़ी मेरी पूरी  कृतियों का सार है। तत्व है। भगत सिंह मेरा आदर्श है। जुल्म के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए, सामराजी शाषकों संग जूझने के लिए, मजहब के पाखड़ों को तर्को की तलवार से कत्ल करने के लिए, भगत सिंह हमेशा मेरा प्रेरणा स्त्रोत  रहा है। इन तीन नाटकों में इस महापुरुष का सच्चा  स्वरुप पेश करके मुझे बहुत संतोष मिला है। साहित्य अकादमी ने,  हमारे काम को सराहा है। हम तहदिल से शुक्रगुजार हैं। 

केंद्रीय साहित्य अकादमी द्वारा साल 2003 में, "भगत सिंह शहीद: नाटक तिक्कड़ी" को दिए गए सम्मान पर, मेरे गुरु श्री चरणदास सिद्धू जी द्वारा पढा गया पर्चा। और यह पर्चा पुस्तक "ड्रामेबाजियां" से लिया गया है जिसे प्रकाशित किया है "बुकमार्ट पब्लिशर्स" ने , लिखा  है "श्री चरणदास सिद्धू जी" ने। नाटक नाटक लिखने वाले,खिलने वाले और नाटक पढने वालों को यह किताब पसंद आऐगी। 

Tuesday, July 26, 2011

लोकगीतों वाले बाबा...

मुझे अच्छी तरह याद है। उस रोज दिनभर बारिश होती रही।शाम के वक्त बूंदे ज़रा थम गई थीं, लेकिन आकाश पर अभी तक बादल छाए थे। ऐसा लगता था कि अभी-अभी मेह फिर बरसने लगेगा। मैं और गोपाल मित्तल ‘मकतबा उर्दू’ से ब्रांडर्थ रोड़ की तरफ जा रहे थे। अनारकली के चौक पर किसी ने 'मित्तल' का नाम लेकर आवाज दी। हमने मुड़कर देखा, बांए हाथ, 'मुल्ला हुसैन हलवाई' की दुकान के सामने, एक सिक्ख युवक हमें बुला रहा था। वह युवक 'राजेन्द्र सिंह बेदी' था, जिसे एक बार पहले मैं एक गोष्ठी में देख चुका था। उसके साथ एक और व्यक्ति था  लम्बे बाल, लम्बी और लम्बी दाढ़ी , मैला  और लम्बा ओवर कोट। ‘आओ, तुम्हे एक बहुत बड़े फ्रॉड से मिलाएं।’ 'गोपाल मित्तल' ने कहा। ‘किससे ?’ मैंने पूछा. ‘देवेन्द्र सत्यार्थी' से।’ उसने जवाब दिया। सत्यार्थी उस वक्त गाजर का हलवा खाने में तल्लीन था, इसलिए जब गोपाल ने मेरा परिचय कराया तो उसने विशेष ध्यान न दिया। सत्यार्थी ने हलवे की प्लेट खत्म करने के बाद बेदी की तरफ देखा और कहा, ‘ बड़ी मजेदार चीज है, दोस्त! एक प्लेट और नहीं ले दोगे? बेदी उस वक्त गोपाल से किसी साहित्यक विषय पर बातें कर रहा था। ‘ले लो।’ उसने जल्दी से कहा. ‘लेकिन पैसे?’  सत्यार्थी बोला,’तुम पैसे दो, तब ना! ‘ओह!’ बेदी ने ज़रा चौंकते हुए कहा और हलवाई को पैसे अदा करके हलवे की दूसरी प्लेट  सत्यार्थी के हाथ में थमा दी।  सत्यार्थी फिर हलवा खाने में लीन। बेदी और मित्तल बातें करने लगे। मैं खामोश एक तरफ खड़ा रहा। हलवे की दूसरी प्लेट खत्म करने के बाद सत्यार्थी ने अपनी जेब से एक मैला खाकी रुमाल निकालकर हाथ पौंछा। पास पड़ी हुई टीन की कुर्सी पर से अपना  कैमरा और चमड़े का थैला उठाया और गोपाल मित्तल की तरफ बढ़ते हुए बोला,’यार मित्तल, एक खुशखबरी सुनोगे?’ ‘क्या?’ उसने कहा. ‘मैं प्रगतिशील हो गया हूं।’ ‘हूं! तो गोया तुमने फिर एक कहानी लिखी है?’... यह मेरी उससे पहली मुलाकात थी।

इसके बाद वह मुझे कई बार मिला कभी किसी जनरल मर्चेंट की दुकान के सामने, कभी किसी डाकघर के द्वार पर, कभी किताबों की किसी दुकान में, कभी मैकलोड रोड और निस्बत रोडा के चाय-घरों में और कभी यों ही राह चलते चलते...फिर बहुत दिनों तक मेरी और उसकी भेंट नहीं हुई। इसके बाद वह मुझे लाहौर के एक प्रसिद्ध उर्दू प्रकाशक की दुकान पर मिला। सत्यार्थी प्रकाशक की दुकान पर उससे क्षमा याचना करने आया था। कुछ दिन पहले उसने उस प्रकाशक के खिलाफ एक गोष्ठी में एक कहानी पढकर सुनाई थी, जिस पर प्रकाशक बेहद खफ़ा था। लेकिन जब सत्यार्थी ने उसे बताया कि यह कहानी वह उसकी पत्रिका में बिना पारिश्रमिक के देने को तैयार है तो प्रकाशक ने उसे माफ कर दिया और उसे अपने साथ निजाम होटल में चाय पिलाने ले गया। मैं और फिक्र तौंसवी भी साथ थे। रास्ते में देवेंद्र सत्यार्थी प्रकाशक के कंधे पर हाथ रखकर चलने लगा और बोला-'चौधरी! तुम्हारी पत्रिका उस जिन्न के पेट की तरह है, जो एक बस्ती में घुस आया था। और उस वक्त तक उस बस्ती से बाहर जाने को राजी नहीं हुआ था, जब तक वहां के निवासियों ने उसे यह विश्वास नहीं दिला दिया कि वे प्रतिदिन गुफा में एक आदमी भेंट के तौर पर भेजते रहेंग़े....तुम भी वैसे ही एक जिन्न हो और तुम्हारी पत्रिका तुम्हारा पेट है। हम बेचारे अदीब और शायर हर महीने उसके लिए खाना जुटाते हैं, लेकिन उसकी भूख मिटने में नहीं आती।' प्रकाशक चुपचाप सुनता रहा। 'अब मेरी तरफ देखो।' सत्यार्थी बोला, 'मैंने तुम्हारे खफा होने के डर से तुम्हें मुफ्त कहानी देना स्वीकार कर लिया। लेकिन तुम ही बताओ, क्या मेरा जी नहीं चाहता कि मैं साफ और सुथरे कपड़े पहनूँ, और मेरे जूते तुम्हारे जूतों की तरह कीमती और चमकीलें हों। मेरी बीवी रेशमी साड़ी पहने और मेरी बच्ची तुम्हारी बच्ची की तरह तांगे में स्कूल जाए। लेकिन कोई मेरी भावनाओं पर ध्यान नहीं देता, कोई मुझे मेरी कहानी का मेहनताना बीस रुपये से ज्यादा नहीं देता, और तुम हो कि बीस रुपये भी हजम कर जाते हो। खैर, तुम्हारी मर्जी। चाय पिला देते हो, यही बहुत है।' प्रकाशक फिर भी चुपचाप सुनता रहा...

मैं उसी रोज शाम की गाड़ी से लायलपुर जा रहा था। होटल में पहुंचकर प्रकाशक ने मुझसे पूछा, 'आप वापस कब आऐंगे?' 'दो तीन रोज में।' मैंने जवाब दिया। 'तुम कहीं बाहर जा रहे हो?' सत्यार्थी ने पूछा। 'हां, दो रोज के लिए लायलपुर जा रहा हूँ।' मैंने कहा। 'लायलपुर?' वह बोला और फिर न जाने किस सोच में डूब गया। फिर थोड़ी देर के बाद उसने पूछा, 'अगर मैं तुम्हें अपना कैमरा दे दूँ तो क्या तुम मेरे लिए किसानों के झूमर नृत्य की तस्वीरें उतार लाओगे?' 'मेरे लिए तो यह मुशिकल है।' मैंने कहा, 'तुम खुद क्यों नहीं चलते।' 'मैं? मेरा जी तो बहुत चाहता है।' वह बोला, 'लेकिन' 'वह एक मिनट रुका और फिर थैले के कागजों का एक पुलिंदा निकालकर प्रकाशन से बोला, 'चौधरी, यह मेरी नई कहानी है, अगर तुम इसके बदले में मुझे रुपये दे दो।' प्रकाशक ने कहानी लेकर जेब में रख ली और बोला, 'आप साहिर से कर्ज ले लीजिए। जब आप लोग लौटेगे तो मैं उन्हें रुपये दे दूंगा।' 'तुम अपनी कहानी वापस ले लो, 'आजकल मेरे पास रुपए हैं।' मैंने सत्यार्थी से कहा। लेकिन प्रकाशक ने कहानी वापस नहीं की। सत्यार्थी चुपचाप मेरे साथ चल पड़ा। रास्ते में मैंने उससे कहा,' तुम जल्दी से घर जाकर बतलाते आओ। अभी गाड़ी छूटने में काफी वक्त हैं।' 'नहीं। इसकी कोई जरुरत नहीं।' वह बोला, 'मेरी बीवी मेरी आद्त जानती है! अगर मैं दो चार दिन के लिए घर से गायब हो जाऊं तो उसे उलझन या परेशानी नहीं होती।' 'तुम्हारी मर्जी।' मैंने कहा और उसे साथ लेकर चल पड़ा। गाड़ी मुसफिरों से खचाखच भरी हुई थी और कहीं तिल धरने को स्थान नहीं था। बहुत से लोग बाहर पायदानों पर लटक रहे तेह और वे लोग, जिन्हें पायदानों पर भी जगह नहीं मिली थी, गाड़ी की छत पर चढ़ने का प्रयास कर रहे थे। सिर्फ फौजी डिब्बों में जगह थी, लेकिन उनमें गैर फौजी सवार नहीं हो सकते थे। 'अब क्या किया जाए।' मैंने सत्यार्थी से पूछा। ' ठहरों, मैं किसी सिपाही से बात करता हूँ।' वह बोला। 'कुछ फायदा नहीं' मैंने कहा, 'वो जगह नहीं देंगे।' 'तुम आओ तो सही।' वह मुझे बाजू से घसीटते हुए बोला और जाकर एक फौजी से कहने लगा, 'मैं शायर हूँ, लायलपुर जाना चाहता हूँ। आप मुझे अपने डिब्बे में बिठा लीजिए। मैं रास्ते में आपको गीत सुनाऊंगा।' 'नहीं-नहीं, हमको गीत-वीत कुछ नहीं चाहिए।' डिब्बे में बैठे हुए सिपाही ने जोर से हाथ झटकते हुए कहा। ' क्या मांगता है?' दूसरे फौजी ने अपनी सीट पर से उठते हुए तीसरे फौजी से पूछा। तीसरे फौजी ने बंगला भाषा में उसे कुछ जवाब दिया। 'मैं सचमुच शायर हूँ,' सत्यार्थी ने कहा, ' मुझे सब भाषाएं आती है।' और फिर वह बंगला भाषा में बात करने लगा। फौजी आश्चर्य से उसका मुंह ताकने लगे। ' तमिल, जानता है?' एक नाटे कद के काले भुजंग फौजी ने डिब्बे कई खिड़की में से सिर निकालकर उससे पूछा। 'तमिल, मराठी, गुजराती.पंजाबी सब जानता हूँ।' सत्यार्थी ने कहा, 'आपको सब भाषाओं के गीत सुनाऊंगा।' 'अच्छा?' तमिल सिपाही ने कहा 'हां!' सत्यार्थी बोला और तमिल में उससे बातें करने लगा। तभी इंजन ने सीटी दी। 'तो क्या मैं अंदर आ जाऊं?' सत्यार्थी ने पूछा। दरवाजे के पास बैठा हुआ सिपाही कुछ सोचने लगा। 'गीत पसंद न आएं तो अगले स्टेशन पर उतार देना।' सत्यार्थी बोला। फौजी हंस पड़ा और बोला, 'आ जाओ!' सत्यार्थी मेरे हाथ से अटैची लेकर जल्दी से अंदर घुस गया। मैं डिब्बे के सामने बुत बना खड़ा रहा। 'आओ आओ, चले आओ।' सत्यार्थी ने सीट पर जगह बनाते हुए दोनों हाथों के इशारे से मुझे बुलाया। फौजियों ने घूरकर मेरी तरफ देखा। मैं दो कदम पीछे हट गया। 'यह भी शायर है, ' सत्यार्थी ने कहा, 'यह भी गीत सुनाऐगा। हम दोनों गीत सुनाएंग़े।'

प्रीतनगर के कुछ व्यक्तियों की ओर से उर्दू और पंजाबी के साहित्यकारों को एक संयुक्त पार्टी दी गई। एक कवयित्री और सत्यार्थी साथ-साथ बैठे थे। चाय के बाद शायरी का दौर भी चल रहा था। सब शायरों ने एक एक नज्म सुनाई। लेकिन जब सत्यार्थी की बारी आई तो वह खामोश बैठा रहा। कवयित्री ने कहा, 'आप कुछ सुनाइए न।' ' छोड़िए जी,' सत्यार्थी बोला, ' मेरी कविता में क्या रखा है?' और उसने चाय की प्याली मुंह से लगा ली। तभी एक कोने से आवाज आई, 'घटना! घटना! ' सत्यार्थी से हंसी रोके न रुकी। भक से उसका मुंह खुला और सारी चाय दाढ़ी और कोट पर बिखर गई। वह मैले खाकी रुमाल से चेहरे पर ओट किए अपनी कुर्सी से उठा और नल पर जाकर मुंह धोने लगा। जब वह मुंह धोकर लौटा तो उसका चेहरा बेहद उदास था। कवयित्री के साथ की कुर्सी खाली छोड़कर वह एक कोने में दुबककर बैठ गया। फिर उसने कोई बात नहीं की। पार्टी खत्म होने के बाद मैंने सत्यार्थी से उसकी खामोशी का कारण पूछा तो वह बहुत दुखे दिल से कहने लगा: 'मैं सभ्य लोगों की सोसाईटी में बहुत कम बैठा हूँ। मैंने अपनी सारी उम्र किसानों और खानाबदोशों में बिताई है। और अब, जब मुझे मार्डन किस्म की महफिलों में बैठना पड़ता है तो मैं घबरा जाता हूँ। मैं ज्यादा से ज्यादा सावधानी बरतने की कोशिश करता हूँ ,फिर भी मुझसे जरुर कोई न कोई ऐसी हरकत हो जाती है, जो समाज की नजर में आमतौर से अच्छी नहीं समझी जाती हैं।' मुझे सत्यार्थी की इस बात से बहुत दुख हुआ। उसने सचमुच बहुत बड़ी कुर्बानी दी थी। लोकगीतों की तलाश में उसने हिंदुस्तान का कोना-कोना छान मारा था। अनगिनत लोगों के सामने हाथ फैलाया था। बीसियों किस्म की बोलियां सीखी थीं, किसानों के साथ किसान और खानाबदोशों के साथ खानाबदोशों बनकर अपनी जवानी की उमंगो भरी रातों का गला घोंट दिया था। लेकिन उसकी सारी कोशिश, सारी मेहनत और सारी कुर्बानी के बदलें में उसे क्या मिला? एक भुख भरी जिंदगी और एक अतृप्त प्यार...

एक दोपहर जब मैं दफ्तर में दाखिल हुआ तो एक खुशपोश नौजवान पहले से मेरा इंतजार कर रहा था। 'मैं देवेंद्र सत्यार्थी।' उसने कहा। मेरी आंखे आश्चर्य से खुली की खुली रह गई। दाढ़ी -मूंछ साफ और सिर पर संक्षिप्त बाल। 'यह देवेंद्र सत्यार्थी को क्या हो गया !' मैंने सोचा। 'बैठो।' उसने मुझे हैरान खड़े देखकर कहा। मैं बैठ गया। थोडी देर हम दोनों खामोश बैठे रहे। फिर मैं उसे अपने साथ पास के एक होटल में ले गया। जब बैयरा चाय ले आया तो मैंने पूछा, 'तुमने आखिर यह क्यों किया?' 'यों ही !' वह बोला। 'यह तो कोई जवाब न हुआ।' मैंने कहा, 'आखिर कुछ तो वजह होगी।' 'वजह?..... वजह दरअसल यह है, 'वह बोला,' मैं उस रुप से तंग आ गया था। पहले पहल मैं गीत इकटठा करने निकला तो मेरी दाढ़ी नहीं थी। उस वक्त मुझे गीत इकटठे करने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता था। लोग मुझ पर भरोसा नहीं करते थे। लड़कियां मेरे साथ बैठते हुए हिचकिचाती थी। फिर मैंने दाढ़ी और सिर के बाल बढ़ा लिये और बिल्कुल कलनदरों की सी शक्ल बना ली। इस रुप ने मेरे लिए बहुत सी आसानियां पैदा कर दी। देहाती मेरी इज्जत करने लगे। लड़कियं मुझे दरवेश समझकर मुझसे ताबीज मांगने लगी। मैंने देखा, अब उन्हें मेरे नजदीक आने में झिझक महसूस नहीं होती थी। मैं घंटो बैठा उनके गीत सुनता रहता। अब मेरी उदर पूर्ति भी आसानी से हो जाती थी, और बिना टिकट रेल का सफर करने में भी सुविधा हो गई थी। धीरे धीरे दाढ़ी और जटाएं मेरे व्यक्तित्व का अंग़ बन गई। 'फिर?' मैंने पूछा। 'फिर मैं शहर आ गया, 'वह बोला,' और लिखने को रोजी का जरिया बना लिया। मैं दूसरे लेखकों को देखता तो उन्हें एकदूसरे से इंतहा बेतकल्लुफ पाता। सारे वक्त वो एक दूसरे से हंसते खेलते और मजाक करते रहते। लेकिन यही लोग मुझसे बात करते तो उनके लहजें में तकल्लुफ आ जाता। मुझमें और उनमें आदर का एक बनावटी सा पर्दा खड़ा हो जाता। मुझे यों लगता, जैसे मैं उनके दिलों से बहुत दूर हूँ! आम लोग भी जब मेरे सामने आते तो अदब से बैठ जाते, जैसे वो किसी देवता के सामने बैठे हों- अपने से ऊंची और अलग हस्ती के सामने। 'फिर?' मैंने पूछा। 'आम मर्दों की निगाह पड़ते ही लड़कियों के चेहरों पर सुर्खी दौड़ जाती, उनके गाल तमतमा उठते। लेकिन जब मैं उनकी तरफ देखता तो उनके गालों का रंग वहीं उतर जाता। वो फैसला न कर सकती कि मैं उनकी तरफ पिता की निगाह से देख रहा हूँ या प्रेमी के? 'मैं उस जिंदगी से तंग आ गया था।' वह बोला,' मैंने फैसला कर लिया कि मैं अपनी इस शक्ल को बदल दूंगा। मैं देवता नहीं हूँ, इंसान हूँ और मैं इंसान बन कर ही रहना चाहता हूँ।' 'फिर?' मैंने आखिरी बार पूछा। 'फिर? फिर मैं इस वक्त तुम्हारे सामने बैठा हूँ। क्या मेरी शक्ल आम इंसानों की सी नहीं है?' 'है और बिल्कुल है।' मैंने कहा, 'लेकिन एक बात बताओ। हज्जाम ने तुमसे क्या चार्ज किया?' 'पांच रुपये।' सत्यार्थी ने कहा. 'लेकिन तुम यह क्यों पूछ रहे हों?' 'यों ही।' मैंने कहा। और फिर हम दोनों मुस्कराने लगे।

फिर दो तीन महीने तक मैंने उस की सूरत नही देखी। एक दिन मैं सत्यार्थी से मिलने उसके घर गया। वह टेबुल लेम्प की हल्की रोशनी में अपने छोटे से कमरे में मेज पर झुका हुआ कुछ लिख रहा था। कदमों की चाप सुनकर उसने दरवाजे की तरफ घूमकर देखा। 'हैल्लो साहिर!' मैं अंदर चला गया। सत्यार्थी ने दाढी और सिर के बाल् फिर से बढ़ा लिये थे। 'क्यों?' 'मैं कल शाम कई गाड़ी से जा रहा हूँ।' मैंने कहा, 'मुझे एक फिल्म कम्पनी में नौकरी मिल गई है।' 'अच्छा?' उसने कहा, 'तब तो आज तुमसे लम्बी चोड़ी बातें होनी चाहिए।' उसने फाउन्टेन पेन बंद करके रख दिया। इतने में सत्यार्थी की पत्नी अंदर आ गई। सूरत शक्ल से वह उनीतस-तीस बरस की लगती थी। मैंने हाथ जोड़कर नमस्ते की। 'नमस्ते।' वह बोली। सत्यार्थी ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा, 'ये आज यहीं रहेंगे और खाना भी यहीं खाएंगे।' वह जाकर खाना ले आई। सत्यार्थी की नौ बरस की बच्ची कविता भी आ गई। हम सब खाना खाने लगे। सत्यार्थी की बीवी हमारे करीब बैठी पंखे से हवा करती रही। ' खाना ठीक है?' उसने पूछा। 'सिर्फ ठीक ही नहीं , बेहद मजेदार है।' मैंने कहा। 'हम लोग गरीब है।' वह बोली। अचानक मुझे अपने सूट का ख्याल आ गया। 'मेरे पास यही एक सूट है।' मैने कहा, 'और यह भी मेरे मामा ने बनवा कर दिया। वह हंसने लगी- एक निहायत बेझिझक और पवित्र हंसी। और जब वह खाने खाये जूठे बर्तन उठाकर चली गई तब सत्यार्थी ने मुझसे कहा, 'इस औरत ने मेरे साथ अनगिनत दुख झेले है। हिंदुस्तान का कोई सूबा ऐसा नहीं, जहां वह भिखारी के साथ भिखारिन बनकर मारी-मारी न फिरी हो। अगर वह मेरा साथ न देती तो शायद मैं अपने उद्धेश्य में सफल न हो सकता।' 'तुम्हारी जिंदगी काबिले-रश्क है! ' मैंने कहा। 'जिंदगी? शायद जिंदगी से तुम्हारा मतलब बीवी है। मेरी बीवी वाकई काबिले-रश्क है, हालांकि कई बार इसकी मामूली शक्ल सूरत से मैं बेजार भी हो गया हूँ।' मैं दीवार पर लगी हुई तस्वीरों की तरफ देखने लगा। लेनिन...टैगोर...इकबाल....' इन तीनों की शक्ल सूरत के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है?' मैंने मुस्कराते हुए पूछा। 'इन तीनों का मेरी जिंदगी पर गहरा असर है।' सत्यार्थे बोला और फिर न जाने किस यादों में खो गया।

'जब मैं बिल्कुल नौ उम्र था,' थोडी देर बाद उसने कहा, 'तो मैंने आत्महत्या करने का इरादा किया था। कुछ दोस्तों को पता चल गया। वे मुझे पकड़ कर डाक्टर इकबाल के पास ले गए। इकबाल बहुत देर तक मुझे समझाते रहे। उनकी बातों ने मुझ पर गहरा असर किया और मैंने आत्महत्या का ख्याल को छोड़ दिया। फिर मैंने लेनिन को पढा। और मेरे दिल में गांव-गांव घूमकर लोकगीत इक्टठा करने का ख्याल पैदा हुआ। टेगौर ने मेरे इस ख्याल को सराहा। और मेरा हौंसला बढाया। मैं गीत जमा करता रहा और अब, जब ये तीनों मर चुके हैं तो रातों की खामोश तन्हाई में उन गीतों को उर्दू ,हिंदी या इंगलिश में ढालते समय कभी-कभी ऐसा लगता है, जैसे किसान औरतें और मर्द मेरे गिर्द घेरा बनाए खड़े हों और कह रहे हों।, अरे बाबा, हमने तुम्हें अपना समझा था, तुम पर भरोसा किया था। तुम हमारी सदियों की पूंजी को हम से छीनकर शहरों में बेच दोगे, यह हमें भूलकर भी शक नही हुआ था। लेकिन तुम हममें से नहीं थे। तुम शहर से आये थे और शहर को लौट गए। अब तुम उन गीतों को, जो हमारे दुख-सुख के साथी थे, जिन पर अबतक किसी व्यक्ति के नाम की मुहर नहीं लगी थी, अपने नाम की छाप के साथ बाजार में बेच रहे हो, और अपना और अपने बीवी बच्चों का पेट पाल रहे हो। तुम बहुरुपिए हो, फरेबी, धोखेबाज! और फिर जलती हुई आंखों से मुझे घूरने लगते हैं।' 'यह तुम्हारी भावुकता है, 'मैने कहा, 'तुमने इन गीतों को गांव के सीमित वातावरण से निकालकर असीम कर दिया है। तुमने एक मरती हुई संस्कृति की गोद में महकने वाले फूलों को पतझड़ के पंजों से बचाकर उनकी महक को अमर बना दिया है। यह तुम्हारा कारनामा है। आजाद और समाजवादी भारत में जब शिक्षा आम हो जाऐगी और जीवन शबाब पर आऐगा तो यही किसान, जो आज तुम्हारी कल्पना में तुम्हें जलती हुई आंखों से घूरते हैं, तुम्हें मुहब्बत और प्यार से देखकर मुस्कराएंग़े, उनके  बच्चें तुम्हें आदर और श्रद्धा के भाव से याद कर सकेंगे।' वह मुस्कराने लगा। मैं लाहौर से चला गया और बम्बई में फिल्मी गीत लिखने लगा।

थोड़े दिनों के बाद मैंने सुना कि सत्यार्थी ने लाहौर छौड़ दिया है। और दिल्ली के किसी सरकारी पत्र के सम्पादन विभाग में नौकरी कर ली है। मुझे विश्वास है कि अब सत्यार्थी का लिबास पहले की तरह मैला कुचैला नहीं होता होगा। उसके जूते भी अब लाहौर के प्रकाशक के जूतों की तरह कीमती और चमकीलें होंग़े। नन्ही-मुन्नी कविता अब बड़ी हो गयी होगी और तांगे में स्कूल जाती होगी। लेकिन किसान? शायद अब भी सत्यार्थी उनके बारें में सोचता हो।

['साहिर लुधियानवी' का 'देवेन्द्र सत्यार्थी' पर लिखा प्रसिद्ध संस्मरण। जोकि 19 पेज का है पर यहां कुछ ही झांकियों को दिखाया गया है पर फिर भी लय टूटी हो तो माफी चाहूंगा। वैसे ये पूरा संस्मरण 'देवेन्द्र सत्यार्थी' की लिखी किताब "नीलयक्षिणी" में है। जोकि 'पराग प्रकाशन' से छ्पी है। और यही संस्मरण 'प्रकाश मनु' की किताब देवेन्द्र सत्यार्थी की चुनी हुई रचनाएं में भी है। ]

 

Tuesday, June 28, 2011

असरारुल हक मजाज लखनवी

मजाज उर्दू शायरी का कीटस है। मजाज शराबी है। मजाज बड़ा रसिक और चुटकलेबाज है। मजाज के नाम पर गर्ल्स कॉलेज अलीगढ़ में लाटरियां डाली जाती थी कि मजाज किसके हिस्से में पड़ता है। उसकी कवितायें तकियों के नीचे छुपाकर आंसुओं से सींची जाती थीं और कंवारियों अपने भावी बेटों का नाम उसके नाम पर रखने की कसमें खाती थी। 'मजाज के जीवन की सबसे बड़ी टे्जिड़ी औरत है।' मजाज से मिलने से पूर्व मैं मजाज के बारे में तरह तरह की बातें सुना और पढ़ा करता था और उसका रंगारंग चित्र मैंने उसकी रचनाओं में भी देखा था। उसकी नज्म 'आवारा' में तो मैंने उसे साक्षात रूप में देख लिया था। जगमगाती जागती सड़कों पर आवारा फिरने वाला शायर! जिसे रात हंस—हंस कर एक ओर मैखाने और प्रेमिका के घर में चलने को कहती है तो दूसरी ओर सुनसान वीराने में। जो प्रेम की असफलता और संसार के तिरस्कार का शिकार है। जिसके दिल में बेकार जीवन की उदासी भी है। और वातावरण की विषमताओं के विरूद विद्रोह की प्रचंड़ अग्नि भी।

मजाज से मेरी मुलाकात बड़े नाटकीय ढ़ग से हुई। रात के दस का समय होगा। मैं और साहिर नया मुहल्ला पुल बंगश के एक नए मकान में डट रहे थे। हम नहीं चाहते थे कि किसी को कानों कान खबर हो। साहिर चुपके चुपके सामान ढो रहा था और मैं मुहल्ले के बाहर सड़क के किनारे सामान की रखवाली कर रहा था कि एकाएक एक दुबला पतला व्यक्ति अपने शरीर नामक हडिडयों के ढचर पर शेरवानी मढ़े बुरी तरह लड़़खड़ाता और बड़बड़ाता मेरे सामने आ खड़ा हुआ। 'अख्तर शीरानी मर गया— हाए 'अख्तर' ! तू उर्दू का बहुत बडा शायर था— बहुत बड़ा।' वह बार बार यही वाक्या दोहरा रहा था। हाथें से शून्य में पल्टी सीधी रेखायें बना रहा था और साथ-साथ अपने मेजबान को कोस रहा था जिसने घर मे शराब होने पर भी उसे और शराब पीने को न दी थी और अपनी मोटर में बिठाकर रेलवे पुल के पास छोड़ दिया था। ठीक उसी समय कहीं से जोश मलीहाबादी निकल आए और मुझे पहचान कर बोले ' इसे संभालो प्रकाश ! यह मजाज है।' मजाज का नाम सुनते ही मैं एकदम चौंक पड़ा और दूसरे ही क्षण सब कुछ भुलाते हुए मैं इस प्रकार उससे लिपट गया मानों वर्षों पुरानी मुलाकाता हो।

मजाज एक महीना हमारे साथ रहा। उसकी शराबनोशी के बारे में मैं पहले से सुन चुका था और पहली मुलाकात में मुझे इसका तजुर्बा भी हो गया था, लेकिन इस एक महीने में मुझे अनुभव हुआ कि मजाज शराब नहीं पीता, शराब बड़ी बेदर्दी से मजाज को पीती जा रही है। यह अनुभव और भी उग्र हो उठा जब मेरे मौजूदा चांदनी चौक वाले मकान में मजाज लगातार कई महीने मेरे साथ रहा। इस बार मजाज को मैं उर्दू बाजार की एक पुस्तकों की दुकान पर से अर्धमृतावस्था में उठाकर लाया था और मैंने निश्चय किया था कि जहां तक संभव होगा उसे शराब नहीं पीने दूंगा। लेकिन अफसोस! मेरे सभी प्रयत्न व्यर्थ हुए। खाट छोड़ते ही मजाज ने फिर से पीना शुरू कर दिया। इस बुरी तरह कि जीवन में तीसरी बार उस पर नर्वस ब्रेकडाउन का आक्रमण हुआ। विश्वास न आता था, यही वह मजाज है जो होश की हालत में किसी मामूली से छछोरपन को भी गुनाह का दर्जा देता था, जिसे हर समय छोटे बड़े का लिहाज रहता था ओर जो इतना शर्मीला और लजीला था कि स्त्रियों के सामने उसकी नजरें तक न उठती थी। उन दिनों मजाज को देखकर पथ भ्रष्ट महानता का ख्याल आता था। और शायद उसने ठीक ही कहा था कि:

मेरी बर्बादियों का हम—नशीनों।

तुम्हें क्या, खुद मुझे भी गम नहीं है।।

यों तो मजाज को शुरू से रतजगे की बीमारी थी और इसी कारण घर के लोगों ने उसका नाम 'जग्गन' रख छोड़ा था, लेकिन उन दिनों शराब की तंद्रा के अतिरिक्त मजाज को बिल्कुल निद्रा न आती थी। अक्सर रात के डेढ़ दो बजे घर पहुंचता या पहुंचाया जाता। दरवाजा खोलने ओर उसे उसके कमरे में पहुंचाकर खाना खिलाने को मैंने नौकर को ताकीद कर रखी थी। लेकिन मजाज पर उस समय किसी से बातें करने का मूड सवार होता था, अतएव दरवाजा खुलते ही वह सीधा हमारे सोने के कमरे की ओर लपकता। सोने के कमरे का दरवाजा चूंकि भीतर से बंद होता था, इसलिए वह बाहर ही से चिल्लाकर पुकारता ' हद है, अभी से सो गये।' और यह पुकार सुबह चार पांच बजे फिर सुनाई देती ' हद है, अभी तक सो रहे हो।' और यह सिलसिला 5 दिसम्बर 1955 को बलरामपुर हस्पताल, लखनऊ में उस समय समाप्त हुआ जब कुछ मित्रों के साथ मजाज ने बुरी तरह शराब पी। मित्र तो अपने अपने घरों को चले गए लेकिन मजाज रात भर शराबखाने की खुली छत पर सर्दी में पड़ा रहा और उसके दिमाग की रग फट गई।

हमारा देश चूंकि मृतपूजक है इसलिए मजाज की मृत्यू पर अनगिनत लेख लिखे गये और उन लोगों ने भी बड़ा शौक मनाया जो उसकी जबान से उसका कलाम और चलते हए वाक्य सुनने के लिए उसे शराब के रुप में जहर पिलाया करते थे। दिल्ली की महफिलें जहां ऊपर के वर्ग की सुन्दर तथा भद्र महिलायों का झुरमुट होता था, जहां मजाज को ताबडतोड पैग पेश किये जाते थे और उससे ताबड़-तोड़ नज्में और गजलें सुनी जाती थी। जब मजाज का सांस फूल जाता तब उसे ड्राइवर के हवाले कर देते थे कि वो उसके घर छोड़ आए या अगर यह ना होता तो अपने बंगले के किसी कमरें में बंद करके बाहर से ताला लगा देते थे।

मजाज की जिंदगी के हालात बड़े दुखद थे। कभी पूरी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी, जहां से उसने बी.ए किया, उस पर जान देती थी। गलर्स कालेज में हर जबान पर उसका जिक्र था। उसकी आंखे कितनी सुंदर हैं! उसका कद कितना अच्छा है! वह क्या करता है? कहां रहता है? किसी से प्रेम तो नहीं करता—ये लड़कियों के प्रिय विषय थे और वे अपने कहकहों, चूड़ियों की खनखनाहट और उड़ते हुए दुपटटों की लहरों में उसके शेर गुनगुनाया करती थीं। लेकिन लड़कियों का यही चहेता शायर जब 1936 में रेडियो की ओर के प्रकाशित होने वाली पत्रिका आवाज का सम्पादक बनकर दिल्ली आया तो एक लड़की के ही कारण उसने दिल पर ऐसा घाव खाया जो जीवन भर अच्छा न हो सका । एक वर्ष बाद ही नौकरी छोड़कर जब वह अपने शहर लखनऊ को लौटा तो उसके सम्बंधियों के कथनानुसार वह प्रेम का ज्वाला में बुरी तरह फुंक रहा था और उसने बेतहाशा पीनी शुरू कर दी थी। इसी सिलसिले में 1940 में उस पर नर्वस ब्रेकडाउन का पहला आक्रमण हुआ और यह रट लगी कि फलां लड़की मुझसे शादी करना चाहती है लेकिन रकीब जहर देने की फिक्र में हैं। यहां यह बताना वेमौका न होगा कि मजाज ने दिल्ली के एक चोटी के घराने की अत्यंत सुंदर और इकलौती लड़की से प्रेम किया था, लेकिन उसके विवाहिता होने के कारण यह बेल मंढे न चढ़ सकी थीं।

उपचार से मानसिक दशा सुधरी तो माता पिता ने दिल के घाव का इलाज करना चाहा। लड़की! कोई सी लड़की जो उसके जीवन का सहारा बन सके, जो उसके रिसते हुए नासूर पर मरहम रख सके। मजाज ने सामान्य जीवन व्यतीत करने का निश्चय किया। उसी जमाने में, उसकी छोटी बहिन हमीदा के कथनानुसार चोट पर तस और चोट पड़ी। घर वालों ने किसी प्रकार एक नाता तै किया और मजाज ने शायद आत्म समर्पण में हामी भर दी। लेकिन जब बर—दिखव्वे के तौर पर अपने ससुर की सेवा में उपस्थित हुआ तो हजारों रूपया मासिक कमाने वाले सरकारी पदाधिकारी को डेढ़ सौ रूपल्ली माहवार पाने वाले एसिस्टैंट लायब्रेरियन में कोई आकर्षण नजर न आया। यहां एक बार फिर धन की जीत और कला की हार हुई। शायर ने एक बार दिल की आवाज पर कदम उठाये थे और मुंह के बल गिरा था। अबके अक्ल पर भरोसा किया था, फूंक फूंक कर कदम रखा था, लेकिन फिर ठोकर खा गया और खसिया कर रो पड़ा। और उस पर पागलपन का दूसरा हमला हुआ। अब वह स्वयं ही अपनी महानता के राग अलापता था। शायरों के नामों की सूची तैयार करता और गालिब और इकबाल के नाम के बाद अपना नाम लिखकर सूची समाप्त कर देता था।

मजाज की शायरी का प्रारंभ बिल्कुल परम्परागत ढ़ंग से हुआ और उसने उर्दू शायरी के मिजाज का सदैव ख्याल रखा। खालिस इश्किया शायरी करते हुए भी वह अपने जीवन तथा सामान्य जीवन के प्रभावों तथा प्रकृतियों को विस्मृत नहीं किया। हुस्नो इश्क का एक अलग संसार बसाने की बजाय वह हुस्नों इश्क पर लगे सामाजिक प्रतिबंधो के प्रति अपना रोष प्रकट करता। आसमानी हूरों की ओर देखने की बजाय उसकी नजर रास्ते के गंदे लेकिन हृदयाकर्षक सौंदर्य पर पड़ती और इन दृश्यों के प्रे़क्षण के बाद वह जन साधारण की तरह जीवन के दुख दर्द के बारें में सोचता और फिर कलात्मक निखार के साथ जो शेर कहता, तो उस में केवल किसी जोहराजबी से प्रेम ही नहीं होता, विद्रोह की झलक भी होती। यह विद्रोह कभी वह वर्तमान जीवन व्यस्था से करता, कभी साम्राज्य से, और जीवन की वंचनाओं के वशीभूत कभी कभी इतना कटु हो जाता कि अपनी जोहराजबीनों के रंगमहलों तक को छिन्न भिन्न कर देना चाहता।

इस में संदेह नहीं कि मजाज के जीवन में जितनी कटुतायें थी वह स्वयं ही उन सबका जन्मदाता था, लेकिन वह सदैव अपनी कटुताओं से खेला और उन्हीं से अपने लिए रस भी निचोड़ता रहा। आश्चर्य होता है कि ऐसा दुख भरा जीवन व्यतीत करने पर भी उसने कभी अपनी स्वाभाविक प्रफुल्लता और चुटकलेबाजी को हाथ से न जाने दिया था।

एक बार मित्रों की महफिल में एक ऐसे मित्र आये जिनकी पत्नी का हाल में ही देहांत हो गया था। और वे बहुत उदास थे। सभी मित्र उन्हें धीरज धरने को कहने लगे। एक मित्र ने तजवीज रखी कि दूसरी शादी तो आप करेंगे ही, जल्दी क्यों नहीं कर लेते ताकि यह गम दूर हो जाए। उन महाशय ने बड़ी गंभीरता से कहा कि जी हां, शादी तो मैं करूंगा लेकिन चाहता हूं कि किसी बेवा से करूं। यह सुनना था कि मजाज ने बड़ी सह्दयता प्रकट करते हुए तुरंत कहा, ' भाई साहब, आप शादी कर लीजिये, वह बेचारी खुद ही बेवा हो जाएगी।' अब कौन था जो इस भरपूर वाक्य से आनदिंत हुए बिना रह सकता। स्वयं वह मित्र भी खिलखिला पड़े।

इसी प्रकार एक साहित्य सम्मेलन में भाषण देते हुए जब एक सज्जन ने इकबाल की शायरी के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए उसे ध्वंसशील तथा प्रतिक्रिया वादी कह दिया तो श्रोताओं में से इकबाल के किसी ने चिल्लाकर कहा ' अपनी यह बकवास बंद कीजिये। इकबाल की रूह को सदमा पहुंच रहा है। जलसे में शायद गड़बड़ हो जाती, लेकिन मजाज ने तुरंत उठ कर माइक्रोफोन हाथ में लेते हुए कहा ' जनाब! सदमा तो आपकी रूह को पहुंच रहा है, जिसे आप गलती से इकबाल की रूह समझ रहे हैं।' और यों पूरी सभा कहकहा लगा उठी।

यह तो खैर महफिलों और जलसों की बातें है, मजाज रास्ता चलते हुए भी फुलझड़ियां छोड़ता जाता। एक बार एक तांगे को रोक कर तांगे वाले से बोला: 'क्यों मियां, कचहरी जाओगे?' तांगे वाले ने सवारी मिलने की आशा से प्रसन्न होकर उत्तर दिया, 'जायेंगे साब!'  'तो जाओ' मजाज ने कहा और अपने रास्ते पर हो लिया।

नोट- यह लेख "प्रकाश पंडित " के द्वारा लिखा गया है और "मजाज और उनकी शायरी" किताब से लिया गया है जिसे छापा "राजपाल प्रकाशन" हैं। और साथ ही सागर भाई का शुक्रिया जिन्होंने मजाज साहब से हमारा परिचय कराया। 

Monday, May 9, 2011

‘वह लड़का आज भी मुझमें बसा हुआ है’

दिल्ली की बेतहाशा गर्मियों वाली दोपहर को चिलचिलाती धूप से पुरानी दिल्ली स्थित हरदयाल सिंह लाइबेरी की छत तप रही थी, पंखे गर्म हवा फेंक रहे थे, बड़े बड़े कूलर भी हांफ रहे थे। मैं सुबह जल्दी ही लाइबेरी आ जाता था, इसलिए एक बजते ही पेट में चूहे हलचल मचाने लगते थे। लाइब्रेरी की बड़ी गोलाकार सफेद घड़ी में एक बजते ही बैग से खाने का डिब्बा निकालकर लाइब्रेरी में मौजूद लड़के लड़कियों के साथ मैं भी बाहर निकल आया। सबने अपने-अपने ठीए संभाल लिए, मैं बरगद के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर खाना खाता था। लिहाजा उसी बरगद के पेड़ के नीचे जाकर रोज की तरह वहीं से चायवाले को एक स्पेशल चाय के लिए आवाज लगा दी।

पता नहीं हमारे कुनबे में खाना खाते वक्त कुछ पीने (चाहे वह चाय हो, दूध, लस्सी या फिर रायता) की आदत किसने डाली थी। मैं भी इसे आज तक निभाए जा रहा हूं, या यूं समझिए कि एक आदत सी हो गई है और कहते हैं आदतें छुड़ाए नहीं छूटती हैं। बस चंद पलों में ही चायवाला चान लेकर आ गया। मै।ने खाना खाना शुरू किया। बीच बीच में चाय की चुस्कियां भी लेता रहा। खाना खाने के बाद मैं पुरानी दिल्ली का नजारा देखने लगा। सामने चांदनी चौक को जाने वाली सड़क पर गाड़ियां कम हो रही थी। भीड़ पर गर्मी का असर साफ नजर आ रहा था।

तभी एक सात आठ साल का सांवला सा लड़का, फअी हुई नीली कमीज और मैली सी सफेद निक्कर पहने मेरे पास आया। एक हाथ आगे बढ़ाकर बोला, “ अंकल, एक रूपया दे दो, भूख लगी है।” पहले तो मैं उसे अनदेखा कर इधर उधर देखता रहा। फिर मन में आया कि बोल दूं “परे हट, यह तेरे जैसे बच्चों का रोज का धंधा है” क्योंकि इस इलाके में भिखारियों की संख्या बहुत ज्यादा थी। पर पता नहीं क्यों एक बार फिर उस पर नजर जाते ही मैं खुद से ही उलझ गया कि पैसे दूं या ना दूं। इसी बीच वह फिर से बोला, “अंकल, एक रूपया दे दो, भूख लगी है।” मैंने झट से अपनी जेब में हाथ डालकर एक सिक्का निकाला, जो दो रूपये का था। यह मैंने उस लड़के को दे दिया। लड़का सिक्का लेकर तुरंत सामने चांदनी चौक की तरफ जाने वाली सड़क की ओर भाग खड़ा हुआ। मैं वहां खड़े होकर खाना खाने के बाद आए नींद के झोंके को भगाने की कोशिश में जुटा था, लू के गर्म गर्म थपेड़ों का मुझसे टकराकर निकलने का सिलसिला जारी था।

लगभग पांच सात मिनट बाद वही लड़का सामने से आता हुआ नजर आया। उसके हाथ में डबल रोटी के टुकड़े और चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। मेरे पास आकर बोला, ” ये लो अंकल,” ना जाने क्यों मेरा हाथ भी एक भिखारी की तरह आगे बढ़ गया और उसने मेरे हाथ पर एक रूपये का चमकता हुआ सिक्का रख दिया। वह जिधर से आया था उसी तरफ चल दिया। मैं एक बुत की तरह खड़ा हुआ, कभी उसे जाते हुए देखता, कभी अपने हाथ पर रखे हुए चमकते सिक्के की तरफ। कुछ ही पलों में वह मेरी आंखो से ओझल हो गया। मगर मेरे दिलो-दिमाग में वह अब भी था।

मैं सोचने लगा कि क्य वह भिखारी था। यदि भिखारी था, तो क्या कोई भिखारी इतना ईमानदार भी हो सकता है? जितना मांगा, उतना ही लिया, जबकि मैंने तो उससे कुछ कहा भी नहीं था कि यह दो रूपये का सिक्का है, इसमें से एक रूपया लौटा देना। और अगर भिखारी न भी हो तो भी ले जा चुके पैसों को वापस लौटा देने की मानकिकता कितनों की रहती है? फिर सोचने लगा कि क्या पेट की भूख ने उसे भिखारी बना दिया था क्योंकि आजकल तो धन की भूख में भिखारी ज्यादा बनते दिखाई देते हैं, यदि ऐसा भी नहीं था तो क्या इस देश में ईमानदारी बची है? और बची भी है तो क्या सिर्फ बच्चों में बची है?

कई सारे सवाल दिमाग में दौड़ने लगे थे, यह लाजिमी भी था क्योंकि जिस दौर में हम जी रहे हैं वहां चारों सिवाय लूट मारी के कुछ नजर नहीं आता। अगर बच्चों में ही ईमानदारी बची है तो मुझे लगता है कि ईश्वर हमें बड़ा होने ही न दें। और यदि हम बड़े हो भी जाएं तो ईमानदार रहना भी सीख जाएं।
यह चमकता हुआ सिक्का सिर्फ सिक्का नहीं रहा। यह उस बच्चें की ईमानदारी का आईना बन गया था जिसमें मैं अपना चेहरा देख सकता था और सोच सकता था कि ईमानदार होने का एक यह भी उदाहरण होता है, जिसके बूते आप किसी के जेहन में हमेशा के लिए बसे रह सकते हैं।
जैसे वह लड़का आज भी मुझमें बसा हुआ है।

नोट- इस बच्चे की ईमानदारी को "तहलका हिंदी" ने 15 मई 2011 के संस्करण के  अपने "आपबीती स्तंभ" में सलाम किया है। और साथ ही ऊपर दिया गया स्केच भी "तहलका" से लिया गया है। शुक्रिया तहलका ।

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