सत्तो- बोलैंगी नहीं कुछ.
सीरो- की बोलां!
सत्तो- कुछ भी.
[ पंजाबी फिल्म 'शायर' से.]
किसी को फसल के अच्छे दाम की तलाश,किसी को काम की तलाश,किसी को प्यार की तलाश, किसी को शांति की तलाश, किसी को खिलौनों की तलाश,किसी को कहानी की तलाश,किसी को प्रेमिका की तलाश, किसी को प्रेमी की तलाश,................ तलाश ही जीवन है
3.
माया- बिना बताए चले जाते हो. जाके बताऊं कैसा लगता है!
1.
महेंद्र- अब भी माचिस रखती हो? पहले तो मेरे लिए रखती थीं और अब.
सुधा- अब अपने लिए रखती हूं.
महेंद्र- मतलब सिगरेट पीना शुरु कर दिया क्या?
सुधा- नहीं. आपकी भूलने की आदत नहीं गई. मेरी रखने की आदत नहीं गई.
2.
महेंद्र- चश्मा कब से लगाने लगीं?
सुधा- दो-ढाई साल हो गए हैं.
महेंद्र- अच्छा लगता है. समझदार लगती हो.
सुधा- पांच साल पहले समझदार नहीं लगती थी?
महेंद्र- लगती थी. अब ज्यादा लगती हो.
सुधा- आपने दाढ़ी कब से बढ़ा ली?
महेंद्र- कुछ दिनों से. क्यों मैं समझदार नहीं लगता?
['इजाजत' फिल्म से ]
13.
सुनो
कभी-कभी
यूं ही बैठे-बैठे
सोचता हूं मैं
तुम अपने मन की बातें
अब किससे कहती होंगी?
14.
सुनो
पता है तुम्हें
तुम मुझे इतनी अच्छी क्यों लगती थीं
दरअसल तुम मुझे समझती थीं
इसलिए इतनी अच्छी लगती थीं.
15.
सुनो
आखिर कब तक तुम
मेरे सपनों में आती रहोगी
कभी सपनों से निकलकर
मुझसे मिलने आओ
बहुत कुछ कहना है मुझे
कुछ तुम्हें भी तो कहना होगा.
12.
सुनो
पता है तुम्हें
बीती रात के अंतिम पहर में
मैंने तुम्हारे सारे खतों के
पुर्जे-पुर्जे कर दिए
पुर्जे करने से पहले
मैं उन्हें एक-एक कर पढ़ता रहा
पढ़कर
कभी खुश होता
कभी उदास
और
कभी तो ऐसा लगता
जैसे तुम ही कमरे में बैठी
एक-एक ख़त को पढ़कर सुना रही हो
'आज मैंने तुम्हारे लिए
पूरे-पूरे दो पेज भर दिए हैं
है ना
क्या इनाम दोगे!'
क्या इनाम दिया था मैंने
याद आया कुछ तुम्हें?
कुछ देर बाद
फिर तुम कहती हो
'पढ़ लिया कि नहीं
मैं आ जाऊं क्या
बुला ले ना
मैं पढ़कर सुना दूंगी
आऊं मैं!'
और
तुम आजतक ना आ सकीं
और अब
ये ख़त भी नजर नहीं आएंगे
बिल्कुल तुम्हारी तरह
वैसे कितने साल हो गए
हम दोनों को मिले हुए?
याद आया कुछ तुम्हें?
वैसे तुम्हें पता है
इन खतों के टुकड़े मैंने क्यों किए
दरअसल
शरीर साथ नहीं देता अब
एक दर्द को सुलाता हूं
तो दूसरा जाग जाता है
दूसरे को बहलाता हूं
तो तीसरा नाराज हो जाता है
आखिर किस-किस दर्द की दवा करूं मैं अब
बस इन्हीं में उलझा कभी-कभी
हाथ की रेखाओं को देखा करता हूं
अब तो ये भी टूटने लगी हैं
अपनी राह से भटकने लगी हैं
बल्कि पता है तुम्हें
जीवन रेखा तो कब की दो टुकड़े हो चुकी
उस टूटी रेखा को देख
डर-डर जाता हूं मैं अब
पहले तो डरा सहमा तुम्हारे लिखे ख़त
पढ़ लिया करता था
थोड़ा बहुत अपने आपसे
हंस बोल लिया करता था
फिर एक दिन अपने डर से ही
तुम्हारा डर याद आया
जो तुमने किसी रोज एक ख़त में लिखा था
'ये ख़त कभी किसी के हाथ लग गए तब क्या होगा?'
सच में तब क्या होगा
मैंने भी ये सोचा था
इसलिए
सारे ख़तों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए
बीती रात मैंने
क्या पता
जीवन रेखा पर चल रहा मेरी सांसों का पहिया
कब टूटी जीवन रेखा के पास आकर थम जाए
कब मेरा जीवन खत्म हो जाए
लेकिन
जिंदगी के इस अंतिम पहर में
आखिरी ख्वाहिश की तरह
दिल चाहता है एक बार फिर से
तुमसे मिलना
मुझसे मिलने तुम जरुर आना
और फिर
पहले की तरह
चुपके से मेरे हाथ में
एक छोटा-सा ख़त थमा जाना
जिससे जान जाऊं मैं हाल तुम्हारा
और फिर
निकल जाऊं मैं अकेले ही
यह दुनिया छोड़कर कहीं दूर
बहुत दूर.
यूं भी तुम्हीं ने तो एक ख़त में लिखा था
'सब अकेले ही इस दुनिया में आते हैं
और अकेले ही जाते हैं
आज तक कितनों ने साथ मरने की कसम खाई होगी
किसी से भी पूछ के देख
कौन किसके साथ जिया
और किसके साथ मरा
ये तो किसी को पता नहीं
हम साथ-साथ मरेंगे नहीं
केवल साथ-साथ जिएंगे
बस
और कुछ नहीं
तू मरने का नाम मत लिया कर
क्योकिं मरने के बाद सब भूल जाते हैं
साथ मरने की नहीं
बस साथ जीने की दुआ मंगाकर
समझा
अब खाएगा मरने की कसम.'
याद आया कुछ तुम्हें?
मुझे यकीन है
तुम्हें सब याद होगा
मन के किसी एक कोने में
सब कुछ छुपाकर रखा होगा
लेकिन
एक बात तो बताओ
मेरे मरने के बाद
मुझे भूल तो नहीं जाओगी ना तुम?
सच-सच बताना
तुम्हें मेरी कसम.
आपको किसी दिन सुबह जल्दी उठना होता है तो आप मोबाइल में अलार्म लगाते हैं. आप अलार्म लगा देते हैं. लेकिन आपकी आंखें अलार्म से पहले जाग जाती है. आपके साथ ऐसा होता है या नहीं ये मुझे नहीं पता लेकिन मेरे साथ अक्सर होता है. अपने को एम्स जाना था. सुबह 5.30 का अलार्म लगाया था. 5.15 बजे ही आंखें खुल गईं. 6.40 पर घर से निकला. 7.15 बजे एम्स के एक नंबर गेट पर पहुंच गया. राजकुमारी OPD अब दूर बन गई है. जल्दी से शेयरिंग वाले ऑटो में बैठा. वो खाली था. मन ही मन बोला कि पहले से देर हो गई है. और सवारी के इंतजार में और देर हो जाएगी. खैर ऑटोवाले ने एक दो बार आवाज तो लगाईं कि राजकुमारी OPD-राजकुमारी OPD. लेकिन वे जल्द ही एक ही सवारी बैठाकर चल दिए. लेकिन बीच में ऑटो रोककर पैदल चलते मरीजों को देखकर एक दो बार आवाज लगाईं राजकुमारी OPD-राजकुमारी OPD. इसी बीच में हम बोल दिए कि यहां से कौन जाएगा राजकुमारी OPD. खैर कोई नहीं चढ़ा. पीछे हम दो लोग ही बैठे रहे. ऑटोवाले कुछ दूर चले ही थे कि दूर से ही एक बुजुर्ग दंपति को देखकर बोले,' चलो फ्री में ही सवारी बैठा लेता हूं.' मैं बोला, 'हां बैठा लो.' ऑटोवाले ऑटो रोककर बोले,' आ जाओ बैठ जाओ. राजकुमारी OPD जाओगे ना.' वे बुजुर्ग पति-पत्नी मना करने लगे. या तो उनके पास पैसे नहीं थे. या फिर पैसे बचाना चाहते होंगे. लेकिन जब मैंने कहा कि ये फ्री में ले जाएंगे तो फटाफट से तैयार हो गए. मैं पीछे से उतरकर आगे बैठ गया जिससे वे दोनों पीछे बैठ सकें. जैसे ही राजकुमारी OPD आई मैं ऑटोवाले से पूछ बैठा, यहीं उतारेंगे कि गेट पर उतारेंगे? ' 'जब पैसे लिए हैं तो गेट पर ही उतारेंगे' ऑटोवाले बोले. खैर उन्होंने गेट के पास ही उतारा. हम झट से उतरे और फट से जेब से एक 50 रुपए का नोट निकालकर दे दिया. हमारा 20 रुपए किराया बना था. वे बैलेंस पैसे देने लगे तो हम बोले रहने दीजिए. समझिए ये पैसे फ्री सवारी वालों ने दिए हैं. वे बहुत खुश हुए. फिर ना जाने किन-किन शब्दों में दुआएं देने लगे. और हम भागकर लाइन में लग गए.
इस बार पहली बार की अपेक्षा लाइन छोटी थी. थोड़ी देर में ही अपनी OPD में पहुंच गए. टाइम 7.45 हो चुका था. अपनी OPD में अपना नंबर छठा था. 8 बजे के करीब पीली जैकेट पहने पेशेंट केयर कोऑर्डिनेटर आए. जिनका काम मरीज को टोकन नंबर देना होता है. वे मरीज को कहते हैं कि अपने मोबाइल से सामने लगाए गए बार कोड को स्कैन करें. और फिर वे प्रोसेस पूरा करके टोकन नंबर ले लें. और जो मरीज ऐसा नहीं कर पाते हैं. उनकी वे सहायता करते हैं. मैं फिर से कह रहा हूं. मुझे ये टोकन नंबर का सिस्टम नहीं समझ आ रहा. इस टोकन नंबर से क्या होता है? अगर स्कैन करके टोकन नंबर दे रहे हैं तो फिर लाइन क्यों लगवा रहे हैं. या फिर जब लाइन लगवा रहे हैं तो टोकन नंबर क्यों दे रहे हैं. बहुत मरीजों ये सब करना नहीं आता. वे बेचारे परेशान होते हैं. खैर अपने पास स्मार्ट फोन नहीं होता. हम तो कह देते हैं कि फोन नहीं है. वे फिर हमारी अपॉइंटमेंट वाली पर्ची पर कुछ लिख देते हैं. क्या लिख देते ये वे ही जाने.खैर कार्ड पर स्टीकर लगवाने के बाद डॉक्टर के कमरे के बाहर हमारा पहला नंबर था. आज पहला नंबर पाकर हम खुश थे. कार्ड मेज पर रखकर सामने की कुर्सी पर बैठ गए. यह देखते रहे कि कहीं हमारा कार्ड कोई पीछे ना कर दे. जब भीड़ आई तो कार्ड को सही नंबर से लगाने का जिम्मा भी ले लिया. तीन डॉक्टर के तीन कमरे थे. उन्हीं कमरों के तीन जगह कार्ड जमा हो रहे थे. उन्हें संभालने के लिय कोई भी सरकारी कर्मचारी नहीं थी. लेकिन जब 9 बजे के पास एक लेडी सरकारी कर्मचारी आईं तो हम अपने सीट पर बैठकर डॉक्टर का इंतजार करने लगे. इंतजार लंबा होने लगा. अगल-बगल कमरे के डॉक्टर आ गए. बस हमारे ही डॉक्टर नहीं आए. खैर लंबे इंतजार के बाद पता लगा कि आज हमारे डॉक्टर नहीं आएंगे. दिमाग खराब हो गया. हमारे कार्ड दूसरे डॉक्टर के रूम में ट्रांसफर कर दिए. जहां पहले से काफी भीड़ थी. समझ नहीं आया. जिस डॉक्टर के पास 20 कार्ड के मरीज हैं. वहां कार्ड ना भेजकर, वहां कार्ड भेज दिए जहां डॉक्टर के पास करीब 50 कार्ड हैं. सच में गुस्सा आया. लेकिन हम गुस्सा पी गए. और अपना कार्ड वहां से वापिस ले आए.
11 बजे वहां से OPD कार्ड लेकर फ़ारिग हुए तो सोचा जब जल्दी खाली हो गए हैं तो क्यों ना सर्जरी की अपॉइंटमेंट के बारे में पता करके चले. घर से ऑनलाइन अपॉइंटमेंट लेने की 10 दिनों से कोशिशें जारी थीं लेकिन अपॉइंटमेंट नहीं मिल रहा था. 'स्लॉट नोट ओपन एट' बार-बार लिखा आ रहा था. रात को 12 बजे भी और फिर एक बार 3 बजे रात को भी कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी. खैर जल्दी से 'सी-विंग' पहुंचे. 'सी-विंग' वो जगह से जहां अलग-अलग OPD के अपॉइंटमेंट लिए जा सकते हैं. वहां देखा भीड़ ना के बराबर थी. सर्जरी का पुराना कार्ड काउंटर पर दिया. दिल की धड़कने बढ़ने लगी क्योंकि सर्जरी का अपॉइंटमेंट बेहद जरुरी था. तब खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब सामने खिड़की से आवाज आई कि 13 का अपॉइंटमेंट दे दूं. हम दिल को थामे फ़टाफ़ट से बोले 13 नवंबर ना. वो बोले हां. फिर हम अपॉइंटमेंट की पर्ची लेकर खुशी से झूम उठे. और झूमते हुए 'सी-विंग' से बाहर निकले तो हमें सुबह उस ऑटोवाले की दी गईं दुआएं याद आने लगीं. ये उन्हीं दुआओं का असर था कि हमें सर्जरी की OPD का अपॉइंटमेंट मिल गया. हम मन ही मन नीली छतरी वाले और उस ऑटोवाले को शुक्रिया कहकर घर की ओर निकल पड़े. वो कहते है ना 'जिसे आप संयोग या इत्तेफ़ाक़ कहते हैं, हम उसे भगवान कहते हैं.'