Tuesday, March 24, 2009

इस अंधेरी रात के बाद उजली सुबह कब होगी?


रात के एक बजे, एक आदमी कार से उतर कर, पार्किंग के 10 रुपये के लिए, पार्किंग वाले से पुलिस वाला होने का रोब देखाकर तू तू मैं मैं करता हुआ बिना पैसे दिए शान से चला जाता हैं।.............. रात के डेढ़ बजे, उस जगह से चंद कदम दूर एक आदमी आमलेट दो रुपये महँगा होने की वजह से भूख का गला दबा कर चुपचाप चला गया ........... लगभग पौने दो बजे, फिर वही आदमी सिगरेट के लिए यही आता है और सिगरेट लेकर आमलेट वाले के हाथ पर सिक्के रख देता है, आमलेट वाला एक रुपये और माँगता है वह आदमी एक रुपये की जगह सिगरेट ही उसके हाथ पर रख देता है और अपनी तलब को दफनाकर अपने मरीज के पास लौट जाता है.............आज पहली बार लगा कि सिगरेट पीनी ........  ढाई बजे कुछ आदमी बहस करते हुए, धर्मो की लड़ाई में उलझे हैं। पुराने जख़्मों को कुरेद कर अपनी अपनी बातों को सही ठहरा रहे हैं और चीजों का बँटवारा करते हुए ये..... तुम्हारी, ये..... उनकी, ये..... हमारी ............ रात को काट रहे है .........  चार बजे, एक आदमी मृत भाई की लाश के पास पत्थर की मूर्ति सा खड़ा है। पैसे नही है घर ले जाने को ...... पास से गुजरता एक आदमी वजह पूछता है और फिर सारा इंतजाम कर अपनी दिल की मरीज माँ के पास चला जाता है।.......... कभी कभी रातें इतनी लम्बी क्यों हो जाती है?...................पाँच बजे एक परिवार रो रहा है पास खड़े आदमी का मोबाईल बज उठता है 'हट जा ताऊ पाछे ने' ....... दौलत से मोबाईल खरीद लिया पर उसके रखने का शिष्टाचार नही खरीद सका।..................... ( निंदा जी से माफी माँगते हुए) "आओ दोस्तों एक ऐसा भी धर्म लाया जाए जिसमें जिदंगी की लड़ाई में हाँफते इंसानो का होंसला बढ़ाया जाए।"....................

दिल हो तो धरती माँ जैसा, प्यार दे सबको एक बराबर
भले बुरे सब माँ के जाये, फूल और काँटा एक बराबर 
मिट्टी में जो बीज पनपता, धरती के लिए एक बराबर 
कोख न हिंदू, कोख न मुसलिम, जीवन बख़्शे एक बराबर।   

और हाँ कल भगत सिंह की शहादत का दिन था उनकी कुर्बानी को सलाम करते हुए उनकी याद में उन्हीं का शेर।  

हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली, 
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे न रहे। 
                           भगत सिंह 

नोट- यह पोस्ट अपने अनदेखे अनजाने( वैसे थोड़ा देखा, थोड़ा जाना भी है पर थोड़ा ही, पर मुलाकात नही हुई आजतक) दोस्त के लिए। ताऊ की पहेली तो रोज शनिवार को आती है पर यह छौक्कर की पहेली आज के लिए है बस, आपका बताना है वो दोस्त कौन है? सही जवाब देने वाले को ईनाम दिया जाएगा " प्यार भरा शुक्रिया" और हाँ ऊपर दी गई रचना मेरे गुरु श्री चरणदास सिंधू जी के नाटक " किस्सा पंडित कालू कुम्हार" से हैं जोकि "वाणी प्रकाशन" से छपा है।

Saturday, March 14, 2009

मुझे किस किस ने बिगाड़ा और जीवन संवारा।



मैं तो प्रतिदिन यही अनुभव करता हूँ कि मेरे भीतरी और बाहरी जीवन के निर्माण में कितने अगणित व्यक्तियों के श्रम और कृपा का हाथ रहा हैं और इस अनूभूति से उददीत मेरा अंतक:करण कितना छटपटाता है कि मैं कम से कम इतना तो दुनिया को दे संकू जितना मैंने उससे अभी तक लिया है।  - आंइस्टीन 
अभी 8 मार्च को कंचन जी ने एक पोस्ट की थी। जिसे पढ़कर आंइस्टीन जी का यह कथन याद आ गया। कंचन जी ने उस पोस्ट में पूछा था कि " उन तीन पुरुष और तीन महिलाओं का नाम बताईए जिनका आपके व्यक्तित्व निर्माण में बहुत बड़ा हाथ है।" वैसे ये सच में ही बड़ा मुश्किल काम हैं। पर ज्यादा गहराई में ना जाकर बस चंद पल सोचकर जो दिमाग में आया वही लिख रहा हूँ।  

सबसे पहले बेझिक पहला नाम ले सकता हूँ, वो हैं मेरे गुरु चरण दास सिधू जी । जिनसे मैं बहुत प्रभावित रहा हूँ। जिनके बारें में जितना लिखा जाए उतना कम है। पर यहाँ एक चीज का जिक्र करुँग़ा। उन्होंने अपनी एक किताब में कहीं कहा था कि " अगर सैल्फ ऐक्सप्रेशन न मिले, घुटन अंदर से न निकले, दिल की गांठे न खुलें, तो लड़के लड़कियाँ नशे पीने लग जाते हैं। क़ातिल बन जाते हैं। पगला जाते हैं। कट्टरपंथी मौत के फरिशते बन जाते हैं। इसका एक ही इलाज है: आत्म अभिव्यक्ति।" इसी आत्म अभिव्यक्ति की लौ इन्होंने ही जगाई थी मेरे अंदर। दिल में बहुत गुबार होते थे जिन्हें मैं नही निकाल पाता था। लोगों ने मजाक बनाया मेरा। एक यही थे जिन्होंने लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। शायद अवसाद में जाने से बचा लिया। उनका सीधा, सादा, नम्र जीवन जीना मुझे हमेशा आकर्षित करता रहा है। आज इनका जन्मदिन भी हैं। और आज के ही दिन मैं इनसे मिला भी था। आज के दिन इस पोस्ट को करने का कारण भी। दूसरा नाम मैं अपने पिता जी का लूँगा। जिन्होंने जिदंगी में लड़ना सिखाया। मुसीबत में भी जीने का ज़ज़्बा बनाए रखना सिखाया। जब भी कभी हमारे घर में कोई मुसीबत आई हमेशा पिता जी ने कहा कि " हाथ नहीं गड़े जमीन में अभी मेरे।" तीसरा नाम मैं एक लड़के का लूँगा जिसका मुझे नाम भी नही पता। पर कुछ पल के लिए आया था मेरी जिदंगी में। वह मुझे एक दिन लाईब्रेरी के बाहर मिला। एक फटी सी कमीज पहने। मेरे पास आकर एक रुपया माँगने लगा शायद उसे बहुत भूख लगी थी और मैंने उसे दो रुपये का सिक्का दे दिया। वह भागकर ब्रेडपीस ले आया और एक रुपया मेरी हथेली पर रखकर, मुझे ईमानदारी का पाठ पढ़ा गया।  वह मुझे बता गया कि भुखमरी और गरीबी में भी ईमानदारी नही मरती। और हम हैं कि ईमानदारी का बस ढोल ही पीटते रहते हैं। उस लड़के पर एक पोस्ट की थी एक सात आठ साल का लड़का और भूख   के नाम से। 

पहला नाम मैं यहाँ अपनी मम्मी जी का लूँगा। जिन्होंने सबसे प्यार करना सिखाया। गिले शिकवे चंद पल के लिए होने चाहिए। आखिर एक इंसान ही तो एक इंसान के काम आता है। "कोई तुम्हारें लिए क्या करता है यह मह्त्वपूर्ण नही हैं बल्कि तुम क्या करते किसी के लिए यह महत्वपूर्ण।" दूसरा नाम एक लड़की का। इस लड़की से भी एक ही बार मिला। उन्होंने बात ही बात में एक बात कही थी कि " अगर भगवान या इंसान तुम्हें दुख देकर अंचभित करें तो तुम भी उस दुख में खुश रह कर उसे अंचभित कर दो। मतलब हमेशा खुश रहो बस।" तीसरा नाम मैं अपनी बेटी का लूँगा। सुनयना ( यह नाम सिधू सर जी ने रखा था हमारी नैना के लिए) जो मुझे यह सिखाती है कि जो चीज जहाँ से उठाओ उसको वही रखों। यह आदत उसे किसने सीखाई मुझे पता नही पर वह मुझे जरुर सिखाती हैं।  

और जाते जाते सिधू सर जी को जन्मदिन की ढेरों मुबारकबाद और शुभकामनाएं देते हुए उनकी एक रचना जो उन्होंने नौवीं या दसवीं जमात में पढते हुए लिखी थी, आप साथियों के लिए प्रस्तुत करना चाहूँगा।  

उठ जाग अंधेरे में से तू, 
तेरा प्रीतम तेरे दिल बसता। 
नहीं स्वर्ग कोई आसमानों में, 
धरती को स्वर्ग बना, बंदे। 
कर ख़त्म ग़ुलामी, बंदर-बाँट, 
बंदे को रब्ब बना,बंदे। 
तू कामगार ही सिर्जनहार, 
क्यों पत्थरों पंडों में फंसता? 

उठ जाग अंधेरे में से तू, 
तेरा प्रीतम तेरे दिल बसता। 
सब भरम भुलावे छोड़ दे अब, 
तू सीधे रस्ते चल, बंदे। 
रब्ब ढूंढने के ढंग बदल गए, 
रब्ब इक दूजे को कह, बंदे। 
क़ादर क़ुदरत क़ुदरत क़ादर,
हर पीर पैग़ंबर है कहता। 


नोट- ऊपर की गई पोस्ट में पाँच लिंक है हरे रंग में, अगर समय हो तो उस लिंक पर क्लिक करके उस पोस्ट को भी पढ सकते हैं। और अपना अमूल्य कमेंट दे सकते है। शुक्रिया। 









Tuesday, March 3, 2009

चल मेरी सखी

दो चार दिन पहले यूँ ही चार लाईने दिमाग में घूम रही थी। हम ठहरें आलसी आदमी, सोचा चलो घूमने दो काहे उन्हें परेशान करें। पर जब संडे के दिन बेटी को चिड़ियाघर घुमाकर आए। तो हम थक गए थे सोचा वो चार लाईने भी घूमते घूमते थक गई होंगी इसलिए अब उन्हें आराम दे देना चाहिए। कागज़ कलम लेकर बैठे तो उन चार लाईनों से इतनी लाईने बनती ही चली गई। फिर नजर मारी तो देखा ये लाईने तो ठीक ठाक बन गई है,फिर दिल नही माना कि इनसे छेड़छाड की जाए। पर दिमाग हिचक रहा था इन्हें पोस्ट करने से। पर दिल है कि माना नहीं। फिर दोनों ने मीटिंग की और प्रस्ताव पारित कर दिया कि यह तुकबंदी पोस्ट कर दी जाए, बिना छेड़छाड़ के। छेड़छाड़ की तो "सखी" नाराज हो जाऐगी। तो साथियों पेश आज की पोस्ट।


चल मेरी सखी

एक आशियाना बनाते हैं।
आ फिर मिलकर तिनके बिनते हैं
अपने हाथों से उसकी नींव रखते हैं।
जहाँ
चमके सूरज की पहली किरणें
खिले फूलों की ढेरों कलियाँ
गूँजे चिडिय़ों की चहचाहटें।
आ मेरी सखी
ऐसा ही एक आशियाना बनाएं।

वहाँ
ना तेरी
ना मेरी
हो हमारी आवाजें।
मैं तुझको चलने की जमीन दूँ
तू मुझको उड़ने का आकाश दे।
तू मेरे सपनों को पानी से सींचे
मै तेरे ख्वाबों में पंख लगाऊँ।
मैं ना खींचू कोई लक्ष्मण रेखा
तू ना डाले बेड़िया।

आ मेरी सखी
ऐसा ही एक आशियाना बनाएं।

Monday, February 23, 2009

उठो बाबा

उठो बाबा

अब नहीं पूछूँगी
मेरी मम्मी कहाँ हैं ?
मेरे पापा कहाँ हैं ?
सबके तो हैं, मेरे कहाँ हैं ?
उठो बाबा।

अब कौन प्यारी आवाज लगा सुबह उठाऐगा ?
अब कौन बस्ता लेकर स्कूल छोड़कर आऐगा ?
अब कौन गोल गोल रोटी बना खिलाऐगा ?
अब कौन कहानी सुनाकर नींद को बुलाऐगा ?
उठो बाबा।

तुम कहते थे "तेरे बाप की याद आती हैं,
खुद चला गया मुझे जवान बनाकर"
क्या तुमको हमारी याद नहीं आऐगी ?
हमको यूँ बेसहारा छोड़कर
उठो बाबा।

तुम कहते थे "दुकान पर बैठा कर"
मैं कहती थी "अच्छा नहीं लगता"
अब मैं तुम्हें कुर्सी पर ऊँघने नहीं दूँगी
दुकान चलाकर खूब पैसा कमाऊँगी
उठो बाबा............................



Thursday, February 19, 2009

रुसी कवयित्री- मरीना त्स्वेतायेवा

कुछ रातें

कुछ रातें प्रिय के बिना
कुछ रातें अप्रिय के बिना
कुछ बड़े बड़ॆ तारे
दहकते हुए सिर के ऊपर
और कुछ हाथ
बढ़ते हुए उसकी तरफ जो सदियों से रहा नहीं और न होगा
जो सम्भव नहीं पर जिसे होना चाहिए ...................
बच्चे का एक आँशू
नायक के लिए
और नायक का एक आँशू बच्चे के लिए
पत्थरीलें पहाड़ हैं उसकी छाती में
उसे उतर आना चाहिए अब नीचे
जानती हूँ-जो हुआ
जानती हूँ-जो होगा,
जानती हूँ पूरी तरह
गूंगे-बहरे उस रहस्य को
तुतली और अबोध भाषा में जिसे
कहा जाता है जीवन

रुसी कवयित्री- मरीना त्स्वेतायेवा

साभार- वरयाक सिंह ( आधार प्रकाशन हरियाणा)

Sunday, February 15, 2009

ब्लोग की सालगिरह

आज इस ब्लोग ने एक साल पूरे कर लिए हैं। यह सब आप सब साथियों के सहयोग से संभव हो सका हैं इसलिए आप सभी का दिल से शुक्रिया। आज के दिन इस ब्लोग की पहली पोस्ट को थोड़ा रंग बिंरगा और थोडा बदलाव करके दुबारा पोस्ट करके ब्लोग की सालगिरह मनाने का मन किया।

नैना

कोई तेरे होने पर मनाये खुशी
और कोई अफ़सोस
कोई तेरे आने पर दे बधाई

और कोई दे दिलासा

ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?


कोई तुझे चुनमुन पुकारे
और कोई नैना

कोई तुझे दुर्गा बोले

और कोई सुनयना

ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?


कोई हँसे कि तू हँसे,
कोई रोये क्योंकि तू रोये

कोई खाये कि तू खाए

कोई सोये क्योंकि तू सोये

ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?


कोई कहे यह लड़कियों की सदी
कोई कहे फिर भी चाहत लड़को की

कोई बोले बेटे होते बुढापे की लाठी

कोई बोले मेरी बेटी मेरे बुढापे की नैना

ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?

Thursday, February 12, 2009

जिदंगी क्या इसी ही को कहते हैं ?


वही सुबह का अलार्म सुनकर
वही जनसत्ता पेपर पढ़कर
वही सुबह एक सा नाश्ता खाकर
वही बदलती इंसानी फ़िदरत को देखकर
वही आफिस में उंगलियाँ तोड़कर
वही भिन्नाते सिर के साथ बिस्तर पर गिरकर
मन उचट गया है
पर जिदंग़ी है कि बस कटे जा रही है 
कभी माँ-बाप के बुढ़ापे की आहट में
कभी बेटी की शरारत में
कभी पत्नी की मुस्कराहट में 
कभी चिड़ियों की चहचहाट में
कभी हवाओं की सरसराहट में
 
बहुत दिनों से मन में उथल पुथल थी। क्योंकि कई यार दोस्त और खुद मैं भी कहता रहता हूँ कि यार जिदंगी में मजा नही आ रहा। पर जीऐ जा रहे है। और कल यह सुनते ही झट से हमारा चाय वाला बोला " मजा कोई किसी के बाप का नौकर है जो किसी के कहने से आ जाएगा।" और फिर मुस्कराता हुआ पीछे से कान के पास आकर बोला कि "मेरे जैसे बन जाओ फिर देखना मजा भी आ जाऐगा।" पर मेरी समझ में नही आता कि जिसे देखो वही मुझे बदलने को कहता है, चाहे वो घरवाले हो या बाहर वाले? साथियों अब आप ही बताईए कि क्या मुझे बदलना चाहिए?  वैसे मैं जल्द ही अपनी अलमारी पर भगत सिंह जी की लिखी दो लाईनें लगाने वाला हूँ। जब से ये लाईने पढ़ी है तब से दिल को बहुत भा गई हैं। आप भी पढ़िए। नोट- हर पोस्ट के बोनस के रुप में सीधे हाथ की तरफ से सबसे ऊपर भी मेरी पसंद का कुछ लिखा होता है उसे भी पढ़ा करें। शुक्रिया।
इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।

Monday, February 9, 2009

पत्र के बहाने से


पत्र के बहाने से


तुम्हारा
और बाबू जी का
दोनों पत्र एक साथ
पकड़ाया, डाकिया ने।
पहले बाबूजी...
एक बार बाँच कर
सिरहाने की जगह
उसके लिए माक़ूल पाया 
तुम्हारा पत्र जेब में भरकर निकल आया
एक
बहुत छाँहवाली पेड़ के नीचे
जमकर बैठा,
एक नुकीली-सी चट्टान पर।
पेड़ की शाख़ें
तुम्हारी बाँहे बन गई
पत्तियाँ आँखे
हाँ... पीछे से तुम भी 
झुक आओ पत्र पर...
कई बार पढ़ गया
इत्ता छोटा पत्र !
और एक बार फिर से
बहुत बार पढ़ने के लिए
पढ़ने लगा तुम्हारा पत्र
बहुत देर बाद
अनमना-सा वहाँ से उठा
और दूसरे पेड़ के नीचे जा बैठा
एक और छायादार पेड़
एक और चट्टान
तुम्हारी बाँहे, तुम्हारी आँखे
और तुम्हारी बातें
तुम्हारे साथ बैठकर
पढ़ता रहा तुम्हारा पत्र
बड़ी ममता से देखती रहीं तुम
मुझे पढ़ते हुए
राह चलते
मिलते रहे लोग
होती रहीं बातें
उन बातों के बीच
बार्-बार
हाथ देकर देख लेता जेब में
फिर निकालकर दूसरी जेब में रखता
और पत्र के ऊपर रख देता अपना हाथ
हाँ... साथ-साथ चल रही हो तुम
तुम्हें छू रहा हूँ मैं
पिता का पत्र सिरहाने टिकाकर
सो रहा
तुम्हारा पत्र, दुआ की तरह
चादर बनाकर ओढ़ ली
आओ... आओ न अब याद
तुम्हें सपने में पाना चाहता हूँ
(कम से कम!)
सोने-जागने के बीच पड़ा
जरा-सा बुदबुदाया
'पगली!'
और जोरों से हँस पड़ा
अंधेरे कमरे में
लाखों जुगनू जाग पड़े
सिटपिटाकर चुप हो गया
थपक-थपककर सुलाता रहा
जुगनुओं को और
तुम्हें आँखो ही आँखो में
लाड़ से डाँटता रहा 
कि हँसाना मत
फिर धीरे-से उठा
बत्ती जलाया, और
तुम्हारा पत्र निकालकर पढ़ने लगा
दरअसल
यह याद नहीं कर पा रहा था
रोज़ समय पर खाने की बात
तुमने लिखा है
या बाबूजी ने?
-हाँ,
तुम्हीं ने लिखा है
तो बाबूजी ने क्या लिखा?
उनका पत्र निकालकर देखता हूँ-

उन्होंने तो रुपयों के लिए लिखा है
कि और ज़रुरत तो नहीं !
मैं मुस्कुराते हुए बत्ती बुझात हूँ
सोते-सोते उलाहना देता हूँ:
'बस, यही फ़िक्र रह गई
कि खाता कैसे हूँ! 
जीता कैसे हूँ तुम्हारे बग़ैर
... क्यों नहीं पूछा?'
कुछ ही देर बाद
अंधेरे में आँखे गड़ाकर देखता हूँ
कोई देख तो नहीं रहा
कुछ नहीं सूझता
धीरे-से बत्ती जलाता हूँ
लगता है, तुम खड़ी थीं सिरहाने
खुद से ही कहता हूँ-
'कब तक यों ही खड़ी रहोगी
मैं आज सारी रात नहीं सोने वाला
इसी तरह कटती है हर रात।'
इस बार दोनों पत्र साथ ही उठाया
एक बात फिर याद नहीं कर पा रहा था
कि आने के लिए किसने लिखा है
कि 'देखने को मन करता है'
कई-कई बार छान मारा तुम्हारा पत्र
कहीं नहीं मिला
तो किसने लिखा ऐसा?
लिख ही कौन सकता है और?
हार कर
बाबूजी का पत्र उठाया
दूसरी ही पंक्ति थी-
"माँ बुला रही हैं
आ जाओ एक बार
तुम्हें देखने को मन करता है ।"
अजीब-सा अवसाद
छा जाता है मन पर
बुझा देता हूँ बत्ती
छुपा देता हूँ दोनों पत्र
तुमने क्यों नहीं लिखा आने को?
यही चाहती हो, कि नहीं आऊँ ?
अंधेरे में धीरे से कहता हूँ-
'अभी नहीं आऊँगा बाबूजी
छुट्टी नहीं है
ख़ूब जोरों पर है पढ़ाई।'
अंधेरा हँसता है मुझ पर
तकिए में मुँह गाड़ लेता हूँ
हिल रहा है पिंजर-पिंजर
रो रहा हूँ मैं
बँधा हुआ है गला
भर्रा रही है आवाज़
फिर भी चीख़ कर कहता हूँ -
'एक बार
तुम्हें देखने को मन करता है
आना चाहता हूँ मैं '
                         
                         विपिन कुमार शर्मा
                         जेएनयू, नई दिल्ली
                         
यह सुन्दर रचना "बया" के जून-नवम्बर 2008 के अंक में छपी थी। तब पढ़कर आनंद आ गया था। दो एक दिन पहले फिर से पढ़ी तो वही आनंद आया। सोचा चलो अपनी ब्लोग की दुनिया के साथियों को भी इस सुन्दर रचना से रुबरु करा दूँ। विपिन जी से अनुमति माँगी तो उन्होंने झटपट हाँ  कह दी और वादा किया कि कुछ और अच्छी रचनाए दूँगा आपको।  तो साथियों हो जाईए तैयार उनकी लिखी रचनाओं को पढ़ने के लिए।

Monday, February 2, 2009

बेटी की उम्र बढ़ने लगी है।

शुक्रवार को बैठे बैठे पत्नी की कही एक बात याद आ गई जो किसी दिन किसी बात पर कही गई थी कि " हे भगवान अगर बेटी दे तो धन भी दिया कर" इस बात में छिपा दर्द शब्द बनकर कलम से कागज पर उतर गया। पर भाव पूरी तरह से उभर नहीं पाए तो रंजू जी को याद किया गया और उन्हें वो तुकबंदी मेल कर दी गई। इस विनती के साथ कि अगर समय हो तो इसको अपने हाथों से तराश दें। फिर शाम को ईमेल चैक की तो वह तुकबंदी एक सुन्दर भावपूर्ण रचना में बदल चुकी थी। जो बात मैं कहना चाहता था वो बात यह रचना कह रही है इसलिए ज्यादा कुछ ना कहते हुए बस रंजू जी  को दिल से शुक्रिया।
     
बढ़ रही है बेटी की उम्र जैसे जैसे
ढ़लती उम्र के पिता की
कदमों की चाल तेज हो रही है
बढ़ती माँगो को देखकर
उतर रहे हैं माँ के तन से जेवर धीरे-धीरे
आँखो से बेबसी बयान हो रही है
तक रही है आसमान को
बेटी नि:शब्द होकर
भाई के हाथ
बहन को दे रहे हैं दिलासा
घर के कोने-कोने में
खामोशी जज्ब हो रही है
हँसता नही अब यहाँ
कोई खिलखिला कर
मुस्कान की भी जैसे
कीमत तय हो रही है
गूँजते है बस अब
कुछ ही लफ्ज़ घर में
"सो गए क्या?"
"नही तो"
यह ज़िंदगी बस अब यूँ
नाम की व्यतीत हो रही है

Saturday, January 24, 2009

बचपन में मैं गाता था, आज बेटी गाती है "नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ बोलो बच्चों मेरे संग जय हिंद जय हिंद...." और गणतंत्र दिवस की ढेरों शुभकामनाएं।

अभी परसों की ही तो बात है बेटी नैना "नन्हा मुन्ना राही हूँ" गा रही थी। मैंने पूछा "बेटा ये किसने बताया" वो बोली "दादू ने।" ये गाना कुछ दिन से इसकी छोटी सी जबान पर है। गाती बस इतना ही है कि "नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ।" फिर इसके लिए यह गाना यूटयूब से डाऊनलोड़ किया और इसे सुनाया तो यह खुश हो गई। और मैं अपने बचपन में चला गया। तब यह गाना अक्सर 26 जनवरी के आसपास टीवी और रेडियो पर बजता था। मैं बड़े चाव से इस गाने को सुना करता था। तब नही पता था कि जय हिंद क्या होता है?  देश क्या होता?  देशभक्ति क्या होती हैं? सोचता हूँ क्या अब पता चल गया है इन सबके बारें में? 25 जनवरी को स्कूलों में भी बड़े चाव से जाते थे, स्कूल के कार्यक्रम में  देश भक्ति गाने खूब सुनाए और बजाए जाते थे। और 26 जनवरी को सुबह जल्दी नहा धो तैयार होकर पड़ोसी के टीवी पर परेड देखा करते थे। कमरा लोगों से भर जाया करता था। बच्चे नीचे और बड़ॆ चारपाई पर बैठ जाते थे। और आज ...............................। और फिर बेटी को 26 जनवरी के बारे में बताया एक बच्चा बनकर। फिर बेटी से पूछा कि कल 23 जनवरी है क्या आप देखोगे परेड। घूमने के मामले में बाप पर गई बेटी भला कहाँ चूकती झट कह दिया पापा मैं भी जाऊँगी इंडिया गेट परेड देखने। फिर सोचा ये क्या कह दिया कल की तो छुट्टी भी नही हैं खैर..........। 8 बजे उठने वाली बेटी परेड का नाम लेते ही झट से 7 बजे उठ गई। और हम पहुँच गए राजपथ। पर चाव ही चाव में हम ये भूल गए कि परेड देखने के लिए पास की जरुरत होती है। मोबाईल भी नही की किसी को कहके पास मँगवाए जाए। और भला सुबह सुबह 9 बजे कौन पास देने आऐगा?  ये भी अजीब रुल है कि परेड देखने के लिए पास की जरुरत पड़े वो भी अपने ही देश में?  जी में तो आया कि अभी जाकर किसी पुलिस अफसर से भिड़ जाऊँ। फिर पता नही क्यों गुस्सा शांत हो गया?  वैसे कभी कभी सोचता हूँ कि जो आपकी ताकत होती वही कभी आपकी कमजोरी क्यों बन जाती है?  खैर फिर सोचा कि चलते हैं यार किसी अफसर से विनती करके देख लेगे। फिर वही हुआ जो अक्सर हम सभी के साथ हो जाता है। और हम उसे किस्मत कह कर उस ऊपर वाले को शुक्रिया कहते हुए उसे याद करते है जिसे हमने आजतक देखा नहीं। फिर हम रेल भवन से कृषि भवन की तरफ जाने के लिए रोड पार करने लगे गाडियों की आवाजाही के बीच। तभी किसी ने रुकने के लिए आवाज देकर हमें रोक लिया और हम रुक गए। आवाज देने वाला भी अपने परिवार के साथ परेड देखने जा रहा था पास आकर बोला कि "गाडियों को निकल जाने दो क्यों रिस्क लेते हो।" ऐसे इंसान को क्या कहते है जो आपको नही जानता पर आपकी परवाह कर जाता हैं?  आप सोचो, मैं आगे बढ़ता हूँ उसी इंसान के साथ। वह मेरे से पूछ बैठता है कि ये वी एन ब्लाक किधर पड़ेगा। मैं कहता हूँ कि वही जाकर पुलिस वालों से पता चलेगा। बात बात में वो कहता है कि उसके पास दो कार्ड है वी आई पी कैटिगरी के और हम तीन है इसलिए एक तो अडजैस्ट हो जाऐगा। और मैं कहता हूँ कि कोई बात नही, चलते है वहाँ बैठे अफसर से बात कर लेंगे। फिर शुरु के गेट से इसी पास से अदंर हो जाते है। तभी कुछ दूर चलकर उनकी जानकार एक लेडिज आती है जिसके पास एक पास ज्यादा है और वह हमें वो पास दिलावा देते है। पर वह पास किसी और ब्लोक का होता है। और हम पास लेके निकल पड़ते है धन्यवाद कहते हुए। और मैं उन्हें भी शुक्रिया कह देता हूँ जिसे सभी नीली छतरी वाला कहते हैं। और भावुक अपनी बेटी के माथे को चूम लेता हूँ। सेकड़ो खाली कुर्सियों पर बैठे चंद लोग। एक बेटा बुजुर्ग हो चुकी अपनी माँ को परेड दिखाने लाया हुआ है। यह माँ किस्मत वाली है। नहीं तो आजकल कौन परवाह करता है माँ बाप और उनकी इच्छाओं की?  वही इनसे चंद कुर्सियों दूर एक परिवार गर्व से बैठा है क्योंकि उनका बेटा परेड में शामिल है देश का सिपाही बनकर। और इधर मेरी बेटी बड़े चाव से परेड देख रही है। और बीच बीच में पूछती है कि पापा ये क्या है पापा ये क्या है। जब जब वह कुछ पूछती है मुझे ना जाने क्यों खुशी महसूस होती? कमाड़ो की पद चाप की आवाजें और दिल में जोश भरती उनकी आवाजें से लेकर आकाश में लड़ाकू विमान के रोमांच तक परेड में सब सुन्दर लगा। बेटी से पूछा क्या क्या अच्छा लगा आपको तो उसकी लिस्ट तो देखिए जरा, पी पी, जहाज, Horse,Camel,Helicopter, Balloon,.......................लिस्ट लम्बी है उसकी पसंद की। जाने क्यों एक संतुष्टि का भाव लिए हम घर की तरफ हो लिए?  बहुत दिनों के बाद संतुष्टि भरा दिन। और अब सुनो  सभी शहीदों को नमन करते हुए  हम बाप बेटी की पसंद का ये गाना। साभार-  YouTube ।


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