दो चार दिन पहले यूँ ही चार लाईने दिमाग में घूम रही थी। हम ठहरें आलसी आदमी, सोचा चलो घूमने दो काहे उन्हें परेशान करें। पर जब संडे के दिन बेटी को चिड़ियाघर घुमाकर आए। तो हम थक गए थे सोचा वो चार लाईने भी घूमते घूमते थक गई होंगी इसलिए अब उन्हें आराम दे देना चाहिए। कागज़ कलम लेकर बैठे तो उन चार लाईनों से इतनी लाईने बनती ही चली गई। फिर नजर मारी तो देखा ये लाईने तो ठीक ठाक बन गई है,फिर दिल नही माना कि इनसे छेड़छाड की जाए। पर दिमाग हिचक रहा था इन्हें पोस्ट करने से। पर दिल है कि माना नहीं। फिर दोनों ने मीटिंग की और प्रस्ताव पारित कर दिया कि यह तुकबंदी पोस्ट कर दी जाए, बिना छेड़छाड़ के। छेड़छाड़ की तो "सखी" नाराज हो जाऐगी। तो साथियों पेश आज की पोस्ट।
चल मेरी सखी
एक आशियाना बनाते हैं।
आ फिर मिलकर तिनके बिनते हैं
अपने हाथों से उसकी नींव रखते हैं।
जहाँ
चमके सूरज की पहली किरणें
खिले फूलों की ढेरों कलियाँ
गूँजे चिडिय़ों की चहचाहटें।
आ मेरी सखी
ऐसा ही एक आशियाना बनाएं।
वहाँ
ना तेरी
ना मेरी
हो हमारी आवाजें।
मैं तुझको चलने की जमीन दूँ
तू मुझको उड़ने का आकाश दे।
तू मेरे सपनों को पानी से सींचे
मै तेरे ख्वाबों में पंख लगाऊँ।
मैं ना खींचू कोई लक्ष्मण रेखा
तू ना डाले बेड़िया।
आ मेरी सखी
ऐसा ही एक आशियाना बनाएं।