कभी-कभी आपकी ख़राब चीज भी आपकी पहचान बन जाती है. दरअसल हुआ कुछ यूं कि एक काफी महंगी दवा थी, जोकि कुछ महीने तक चलनी थी. इसलिए दिमाग में ख़याल आया कि कहीं से थोड़ी छूट मिल जाए तो सहारा-सा लग जाए. कुछ देर यूं ही सोचता रहा. दिमाग पर फिर थोड़ा जोर डाला तो एक मेडिकल स्टोर वाले राजू जी की की तरफ ध्यान चला गया. उनसे दुआ-सलाम थी बस. जब भी दवा लेने जाता था. तो उनसे दवा लेने के अलावा भी बातचीत हो जाती थी. कभी आम बात. कभी राजनीतिक वाली बातें. लेकिन उनके मेडिकल स्टोर तक जाना मेरे लिए तब संभव नहीं था. उनका फोन नंबर तो था. वहीं समस्या ये भी थी कि वे मुझे शक्ल से तो जानते थे लेकिन नाम से नहीं. खैर मैंने फोन मिला ही दिया. और कोई चारा भी नहीं था.
फोन उठाते ही वे बोले, ' हेल्लो.'
इधर से मैं बोला,' राजू भाई, मैं सुशील बोल रहा हूं. आप मुझे शायद नाम से नहीं जानते हैं लेकिन शक्ल से पहचानते हैं. कैसे हैं आप?
वे बोले, 'मैं ठीक हूं. आप बताएं.'
'दरअसल अब कैसे कहूं.अगर आप पहचान जाते तो मैं कुछ बोल पाता.' मैं बोला.
वे तुरंत ही बोले, 'आप बोलिए. मैं आपको पहचान गया हूं.'
'मैं झट से बोल पड़ा, ' आपने कैसे पहचान लिया?
'वे बोले, 'आपकी आवाज से.'
'सच में आपने आवाज से पहचान लिया.' मैं अचम्भे से बोला.
'हां, आपकी आवाज ही आपकी पहचान है.' वे हंसते हुए बोले.
अब मेरे लिए आसान हो गया था बात करना. और फिर उनसे काफी देर तक बातें हुईं. जैसे पहले होती थीं. उसी लहजे में. बातचीत में पता चला कि इनको मेडिकल लाइन छोड़े हुए करीब डेढ़ साल हो गया. वे अब दूसरा काम करने लगे हैं. लेकिन इन्होंने कहा कि आप एक काम कीजिए. मैं आपको एक फोन नंबर दे रहा हूं. आप इनसे बात कर लीजिए. आपको दवा पर उतनी छूट मिल जाएगी, जितनी मैं देता. मैं उनको फोन कर देता हूं. आप जब चाहे तब जाकर दवा ले लेना. आखिर में उन्हें नए काम की शुभकामनाएं देने के बाद बात खत्म हो गई.
बाद में यही बात मैं बेटी को बताने लगा कि वो मेडिकल स्टोर वाले राजू जी से बात हो गई है. बातचीत जैसे-जैसे हुई. वैसे-वैसे बता दी दी.
बेटी मेरी बातें सुनकर कहने लगीं कि 'फिर तो आप बहुत खुश होंगे?'
मैंने पूछा,' वो क्यों?'
तो वे मजाक वाले लहजे में कहने लगीं,' अब तो लोग आपको आपकी आवाज से भी पहचानते हैं!'
मैं इस बात पर थोड़ी देर तक हंसता रहा! जैसे बेटी ने कोई चुटकला सुनाया हो!
फिर बाद में बैठा-बैठा सोचने लगा कि पहचान क्या होती है? आदमी किस-किस चीज से पहचाना जा सकता है. क्या वह अपने नाम से पहचाना जाता है? या अपने काम से? या फिर अपने व्यवहार से. लोग उसको उसके नाम की वजह से याद रखते हैं या फिर उसके व्यवहार की वजह से. पहचान या याद रह जाने में पद और पैसा कितना रोल अदा करता है? फिर बाद में बैठे-बैठे ऐसी ही सोचते-सोचते अपने आप से पूछने लगा. बेटा, क्या खोया, क्या पाया, क्या कमाया, आज तक?
जवाब मिला. कुछ भी तो नहीं. ना ही पैसा बना पाया. ना नाम ही कमा पाया. गाड़ी-बंगला, बैंक बैलेंस...हा हा. मन ही मन में मैं हंसने लगा. यह हंसी वो हंसी नहीं थी. जो बेटी की बात सुनकर आई थी. ये हंसी कुछ और ही कहानी कह रही थी.
फिर जब बिस्तर पर सोने के लिए गया. तब किसी रात को कही बेटी की बात याद आ गई. सोने से पहले एक बार किसी टॉपिक पर चर्चा हो रही थी, जैसी हम बाप-बेटी के बीच अक्सर चर्चा होती रहती है. अब याद नहीं किस बात पर चर्चा थी. लेकिन ये याद है कि आखिर में मैं ऐसी ही बातें बेटी से कहने लगा था. शब्दों का हेर-फेर रहा होगा. परंतु भाव यही था. बेटी काफी देर तक मुझे सुनती रहीं. मैं अपने दिल के अंदर का सारा गुबार निकालता रहा.
फिर जब थोड़ा गुबार निकालकर चुप हुआ. थोड़ी-सी सांस ली.
तभी मौक़ा देखकर बेटी बोलीं,' अब मैं कुछ बोलूं.'
'हां बोलो' मैं बोला.
'ये जो पढ़े लिखे लोगों के बीच आपकी जान-पहचान का सर्किल है और ये जो आपके दोस्त हैं ना. वो सब के सब बिना बड़े पद, बिना पैसे, बिना गाड़ी के बने हैं. इन सबने जो आपके अंदर देखो होगा. आप समझो कि वही आपकी कमाई है. वही आपने अब तक कमाया है. बस सीधा सिंपल.' वे बोलीं.
मैं अपनी आदतनुसार फिर से सोचने लगा. 'क्या ये बात सच में इतनी सिंपल है?'
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