Thursday, September 5, 2013

शिक्षक दिवस पर एक सीख गुरु की यह भी...


मेरी घरवाली ने और मैंने पांच बेटियां जन्मी, पाली, पढ़ाई, बिआही। अब वे जोरावर इंसान हैं। बढ़िया नौकरियां कर रही हैं। अपने बच्चे प्यार से पाल रही हैं। इस लिहाज से, थोड़े नानी-नाना होंगे जो हम दोनों जितने खुशकिस्मत होंगे। हमारे पड़ोसी हैरान हैं कि हमारे बच्चे हम बुड्ढों का इतना अच्छा ध्यान रखते हैं। हमारी हर जरुरत को चाव से पूरी करते हैं। पांच बेटियां जन्मने और पालने का हमारा तजुर्बा कैसा रहा? अगर हम ने पांच पुत्र जन्में होते, पाले होते, तो क्या फर्क होता हमारी जिंदगी में? ये सवाल हमसे अक्सर हमारे यार दोस्त पूछते हैं। हमारी हर बेटी ने अपना जीवन साथी अपने आप चुना। बेटे बेटियों ने, कम से कम खर्च करके, खुद बिआह रचाये। दाज-दहेज का धेला नहीं। बरसों पहले हो चुकीं उनकी शादियां कामयाब कही जा सकती हैं। इसलिए लोग ज्ञान कौर को और मुझे महाभाग्यशाली समझते हैं।

लेकिन हम ऐसे मनहूस समाज में बस रहे हैं जहां बेटी के पैदा होने को बहुत बुरा समझा जाता है। यहां लड़का जमाने के वास्ते हर यत्न करते हैं। वैध हकीमों से लेकर, साधु-संतो की, ओझा जादूगरों की, मुट्ठी चापी करते हैं। राजा जन्में चाहे रंक, औरत को मंदा ही बोला जाता है। बेटियां को गर्भ के अंदर ही कत्ल करना हमारे मुल्क में सदियों से चल रहा है। आज भी रोज अखबार के अंदर स्त्रियों के ऊपर हो रहे जुलमों की बाबत पढ़कर रूह कांप जाती है। सदियों पहले किसी मूर्ख ब्राह्म्ण ने लिख दिया- " पुत्र के बगैर हिंदू की गति नहीं होती। उसके पित्रों को पानी नहीं पहुंचता।" इससे बड़ा झूठ और कोई नहीं। कोरा वहम! लोगों को डराकर पूजा-पाठ का पाखंड रचकर, रकमें ठगने का प्रपंच। जूते मारो इस तरह के झूठे पुजारियों के!  आज का कानून मानो। आज लड़का और लड़की बराबर के नागरिक है। हर पहलू से बेटी और पुत्र को एक समान प्यार से, एक जैसे खर्च से, पालो पोसो। हमारी बेटियां-बहनें हर धंधे में मर्दों के बराबर काम कर सकती है। हर प्रकार से पुरुषों की बराबरी कर रही है।

बेटियों का पालन पोषण करते वक्त हमें कोई विशेष कठिनाई नहीं झेलनी पड़ी। हां, मैं एक बात से, रिश्तेदारों से, दोस्तों से, मर्द-प्रधान समाज से, हमेशा दुखी रहा हूं। मुझे अब तक बार-बार लड़के पेश किए जाते रहे हैं कि हम गोद ले लें। हमारे नजदीकी रिश्तेदारों ने चोखी कोशिश की कि हम उनका पुत्र मुतबन्ना बना लें। ताकि इस तरह वे हमारा घर घाट संभाल सकें। मैंने इस तरह के दगाबाज रिश्तेदारों को हमेशा जूती दिखाई है। शेर बनकर, अपनी हर बेटी की रक्षा की है। वहमी मौसियों-फूफियों को, सलाहकार मामा-मामियों को, अपनी बेटियों के दुश्मन समझकर, हमेशा घर बाहर धकेला है। लड़कियों को हीन समझने वालों के सिर सौ जूते!  इस पहलू से, तगड़ा बाप बनने के वास्ते, मुझे कईयों की धुनाई करनी पड़ी। मैंने किसी कंजर की उल्टी नसीहत नहीं सुनी। बेटियां पालने में कोई कोताही नहीं बरती। नतीजा? आज जीवन भर का सुख मेरे और ज्ञानकौर के पल्ले है।

पचहत्तर बरस की उम्र तक मुझे कोई मर्द नहीं टकराया जो दिल से, बेटियों को पुत्रों के बराबर समझता हो। हर मर्द बोलेगा, मेरे इस नाटक की नायिका गुरदेव कौर की मां बनने की इच्छा सही होगी, लेकिन उसको गर्भ वही मर्द कर सकता है जो विवाह के भांवरों से बांधा गया हो। अगर देबो दूसरे मर्द के नजदीक खुद चलकर जाती है, यह है उसके चाल-चलन की गिरावट ! मैं इसका गिरावट नहीं मानता। रिगवेद के अंदर युवती यमी की भांति, हर औरत का मां बनने का हक है। उसका यत्न सही है। हर प्रकार से जायज है।

कुछ संतरे जीवन के यथार्थ को नाटकीय रूप देने की बाबत।

इस नाटक की मूल घटना, गांव वहमोवाल में, 1955 को घटी थी। उस समय मेरी आयु 17 साल की थी। गुरदेव कौर और पाखंडी स्वामी के बारे में मुझे हर किस्म की जानकारी थी।  इस नाटक का पहला ड्राफ्ट मैने 1991 में पूरा किया। मूल घटना के 36 बरस बाद। असली नायिका और रघुनाथ बुरी मौत मरे थे। क्या मैं उनकी मौतों से नाटक का अंत करुं ? बीस एक बरस मैं इस दोचित्ती में फंसा रहा। बीस एक सल अधिकतर सोच मैंने इस खर्रे पर खर्च की। मेरा निर्णय था: मैं नाटक का सुखद प्रभाव छोडूं। अगर तुम ने कहानी असली जीवन से भी उठाई हो उसमें अदला-बदली करना तुम्हारा अधिकार है। अपनी नायिका को मैंने आखिर में दिलेर मां बनने के वास्ते हल्लाशेरी दी है। देबो और उसका बच्चा जिंदा रहेंग़े! यही सच्चा धर्म है। आज की हर बेटी बहन के वास्ते मैं सुखी जीवन की मिसाल पेश करना चाहता था।

इस ड्रामे को बेटियों बहनों के नजरिये से पढ़ो।

-चरणदास सिद्धू

[ सुन रहे हो ना तुम...बेटियों ना चाहने वालों ]

नोट- अभी पिछले ही दिनों मिली थी यह नाटक की किताब " मेरा बच्चा और मैं " , जिसके लेखक हैं डॉ. चरणदास सिद्धू और जिसे प्रकशित किया है " श्री गणेश प्रकाशन " ने। आप भी पढ़िए इस अच्छी किताब को।

Saturday, August 31, 2013

तेरी याद

तेरी याद
बहुत देर हुई, जलावतन हो चुकी
मैं नहीं जानती
वह जीती है या मर गई...

पर एक बार एक घटना हुई

ख्यालों की रात बहुत गहरी थी
और इतनी खामोश थी
कि एक पत्ता हिलने से भी
बरसों के कान चौंक जाते थे ...

फिर तीन बार लगा

कोई छाती का द्वार खटखटाता है
नाखूनों से दीवार को खरोंचता है
और लगता है, कोई दबे पांव
घर की छत पर जा रहा है ...
तीन बार उठकर - मैंने सांकल टटोली
अंधेरा -कभी कुछ कहता-सा लगता था

और कभी बिल्कुल खामोश हो जाता था

फिर एक आवाज आई

" मैं एक स्मृति हूं
बहुत दूर से आई हूं
सब के आंख से बचती हुई
अपने बदन को चुराती हुई
सुना है - तेरा दिल आबाद है
पर कहीं कोई सूना-सा कोना मेरे लिए होगा...

[ ये रचना अमृता प्रीतम द्वारा लिखित " अज्ञात का निमंत्रण'' नामक किताब से ली गई हैं। इस किताब को प्रकाशित किया है " किताब घर" ने। आज अमृता प्रीतम जी का जन्मदिन भी है। ]

Tuesday, June 4, 2013

बाबा बुल्लेशाह


चुप करके करीं गुज़ारे नूं।

सच सुण के लोक न सैंहदे ने,
सच आखिये तां गल पैंदे ने,
फिर सच्चे पास न बैंहदे ने,
सच्च मिट्ठा आशक़ प्यारे नूं।

सच शरा करे बर्बादी ए,
सच आशक़ दे घर शादी ए,
सच करदा नवीं अबादी ए ,
जेहा शरा तरीक़तहारे नूं।

चुप आशिक़ तों ना हुंदी ए,
जिस आई सच सुगंधी ए,
जिस माहल सुहाग दी गुंदी ए,
छड दुनिया कूड़ पसारे नूं।

- बाबा बुल्लेशाह

अनुवाद- सत्य का कहना और सच सुनकर सह लेना, दोनों ही कठिन हैं। इसलिए साधक को बुल्लेशाह की सलाह है कि चुप रहकर गुजर-बसर करो।

सच सुनकर लोग उसे सहन नहीं करते। सच कड़वा होता है, अत: आमतौर पर सच कहें, तो लोग झगड़ने लगते हैं। और सच कहने वाले के निकट बैठते तक नहीं। लेकिन साधक और प्रभु-प्रेमी को सच बहुत मीठा लगता है।

सच दुनियादारी को बर्बाद कर देता है, किंतु सच आशिक को प्रसन्न करता है। सच से व्यक्ति के भावना-जगत में बहुत कुछ नया फूट उठता है। तरीकत के मुकाम पर पहुंचे हुए सूफी के लिए सच ही शाह है।

आशिक चुप नहीं रह सकता। उसके पास सच सुगंध की तरह पहुंचता है। उसने सुहाग ( प्रभु-मिलन) के लिए हार गूंथ रखे हैं। सच की खातिर वह दुनिया को त्याग देता है, जो कि सर्वत्र फैला हुआ झूठ है।
 नोट- यह रचना "  हिंद पॉकेट बुक्स  " की एक किताब  " बुल्लेशाह  " से ली गई है। 

Tuesday, February 26, 2013

मोहन राकेश की यादें...



अगर कहीं एक ऐसा शख्स दिखाई पड़े, जो सिल्क की निहायत लंबे कालरवाली कमीज पहने हो, जिसके कफ कोट की बांहों से छह अंगुल बाहर निकले हों और उनमें एकदम पुरानी चाल के कफ-बटन हों, जिसकी टाई की गांठ ढीली मुट्ठी की तरह गर्दन में बेतरतीबी से कसी हो, कीमती कपड़े की पैंट जिस पहननेवाले से पनाह मांग रही हो और जो गोल्ड फ्लैक की सिगरटें जला-जलाकर खा रहा हो और माचिस की तीलियां, राख और टुकड़े निहायत साफ-सुथरी और सजी जगहों में फेंकता जा रहा हो और बात-बात पर आसमान-फाड़ ठहाके लगाता हो और लेखक के बजाय किसी बार का रईस, पर पहली नजर एकदम गावदी प्रोपराइटर लगता हो, तो समझ लीजिए कि वह राकेश है। अगर वह राकेश न भी हुआ तो वह राकेशनुमा आदमी आपको उसका अता-पता बता देगा, आप उन साहब को पूछ रहे हैं! जी हां, कल ही उन्होंने यहां टेबल रिजर्व कराई थी, चार-पांच दोस्तों के लिए ... पैसे भी दे गए थे, पर आए नहीं! .......  
दिल्ली से कटा हुआ कीर्तीनगर इधर-उधर खाली पड़ॆ हुए प्लॉट, जहां शाम सात बजे से खामोशी छा जाती थी। जब भी वहां बैठता, तो कुछ देर के लिए उसके ठहाकों से दीवारें हिलने लगतीं, पर के क्षण बाद ही बड़ी गहरी खामोशी छा जाती। भीतर से बुलावा आता, राकेश जी.... और जब वह लौटता, तो उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में एक अजीब-सा बेगानापन दिखाई पड़ता और फिर अपनी परेशानी को दबाता हुआ कहता, चलो डियर, कनॉट प्लेस चलते हैं! और घर से बाहर आते ही वह अपने फॉर्म में आ जाता। वही चुभती हुई बातें, यारों के किस्से और ठहाके! वह हंसता, तो तारों पर बैठी हुई चिड़ियां पंख फड़फड़ाकर उड़ जातीं, और राह चलते ऐसे चौंककर देखते, जैसे किसी को दौरा पड़ गया हो ! .......
7 फरवरी 62 की सर्द सुबह जब वह मेरे घर आया, तो एकदम टूटा हुआ था, पैसे के दुश्मन ने अपना पर्स देखा और साठ-सत्तर रुपए देखकर बोला, राजपाल से पैसे लेने हैं! जेब में आज पाई नहीं है...... मै गौर से उसे देख रहा था, अभी-अभी उसने अपनी आंखे चोरी से सुखाई थी, कुछ क्षण खामोश रहकर सोचा था और तंगद्स्ती में भी टैक्सी लेकर मेरे साथ निकल पड़ा था.... टैक्सी से उतरते ही उसने टैक्सी वाले को पांच रुपए इनाम के थमा दिए थे और आगे बढकर गोल्ड फ्लैक का एक टिन खरीद लिया था। दोपहर में हम अलग हो गए। वापस घर आया, तो राकेश की एक चिट पड़ी थी और बियर की दो बोतलें- दोनों खाली- एक में दो घूंट बियर और सिगरेट के टिन में एक सिगरेट – बाकी वह सब पी गया था और चिट पर लिखकर छोड़ गया था, कोशिश करुंगा कि रात नौ-साढे नौ बजे फिर आऊं। स्थिति काफी गंभीर है। तुम्हें एक काम अवश्य करना है। सुबह फ्रंटियर मेल पर पुरानी दिल्ली स्टेशन से अम्मा को रिसीव कर लेना और उन्हें साथ यहीं ले आना... मैं किसी भी समय आकर मिल लूंग़ा ! और इस मुसीबत के समुद्र में डूबते-उतरते हुए भी उसकी विनोद वृति मरी नहीं थी, अंत में चिट पर लिख गया था, तुम्हारे हिस्से की बियर और सिगरेट छोड़े जा रहा हूं।  उसे उस वक्त कोसकर सिगरेट तो मैंने सुलगा ली थी, पर तली में पड़ी हुई दो घूंट बियर बोतल समेत फेंक दी थी।......
वह इस बात का भूखा है कि कोई उसका है! यही उसकी अनवरत तलाश है ... कोई उसका है और वह किसी का है – चाहे वह मां हो, दोस्त हो, बीवी हो, या दो दिन का मुलाकाती ! वह एकाएक अपना सब कुछ दे बैठता है, कहता कुछ भी नहीं, पर जिससे एक बार मिल लेता है, उसे वह गैर नहीं समझता। वह उसकी जिंदगी के दायरे में आ जाता है। अगर ऐसा न होता, तो कश्मीर में वह तीन दिन परेशान न घूमता। राकेश जब पहलगाम पहुंचा, तो तय यही था कि सब दोस्त तम्बू लगाकर रहेंगे और सबके तम्बू अलग-अलग होंगे। राकेश पिछले साल भी पहलगाम आ चुका था और एक तम्बूवाले से तम्बू लगवाकर रह चुका था। पहलगाम पहुंचने पर पता लगा कि वह तम्बूवाला श्रीनगर गया हुआ है। वहां और भी बहुत-से तम्बूवाले थे, जो उसे घेर रहे थे, पर वह तीन दिन तक उस जरा-सी जान-पहचान के तम्बूवाले के लिए इंतजार करता रहा और जब वह वापस आया, तभी उसने अपना तम्बू लगवाया। और गुरुद्वारा रोड के टैक्सी स्टैंड पर जब आठ महीने बाद एक दिन फिर वह मेरे साथ पहुंचा, तो वह उसी टैक्सीवाले को खोज रहा था, जिसने उसे मुसीबतजदा दिनों में बहिफाजत पूरी दिल्ली घुमाई थी और जिसका नाम तक उसे याद नहीं था। और इस मायने में कम्बख्त की किस्मत भी जोरदार है – जिसे वह चाहता है, वह मिल भी जाता है।......... 
जिंदगी की गंभीर-से-गंभीर और अहम बातों को सुलझाने के लिए उसके पास कई नुसखे हैं। एक नुसखा बहुत ही लाजवाब है और उन सभी साहित्यकारों के लिए फायदेमंद है, जो नौकरियों में लगे हुए हैं और हर क्षण नौकरी छोड़ने की बात करते हैं। वह आपसे गंभीरता से पूछेगा, नौकरी छोड़ने की बात सोच रहे थे?
हां !
कुछ तय नहीं कर पा रहे हो ?
हां !
सुबह दस बजे कपड़े पहनकर दफ्तर जाने का उत्साह मन में होता है ?
इसका क्या मतलब ?
अगर कपड़े बदलकर दफ्तर जाने को मन करता हो, तो तुम्हें नौकरी करनी चाहिए, अगर न करता हो , तो छोड़ देनी चाहिए! और कुछ सोचने की जरुरत नहीं है- सीधा-सादा नुसखा है....
भविष्य की चिंता कीजिए तो एक और नुसखा उसके पास है, कम-से-कम पांच सौ में गुजारा हो जाएगा ! है ना ? तो सूद पर तीन हजार कर्ज लो और आराम से बेफिक्र होकर छह महीने में छह हजार का काम करो, फिक्र किस  बात की है। ........
भारतीय डेलीगेशन का अपना लीडर चुना जा रहा है। कोई साहब कहते हैं – मिनिस्ट्री की राय है कि अमुक को चुना जाए। वह अमुक अभी अनुपस्थित है। आने वाला है। राकेश भन्नाता हुआ सिगरेट का पैकेट निकालता है । उसमें सिगरेट नहीं है। एक क्षण वह सिगरेट के लिए झुंझलाता है, फिर वहीं से बहुत ऊंची आवाज में नाराजी से बोलता है- अगर सरकार ही सब तय करेगी तो हम यहां किसलिए हैं? हम जो लीडर चुगेंगे वह लीडर होगा। अगर इस तरह सरकार के डिक्टेट्स माने जाऐंगे तो मैं इसके विरोध में वाकआऊट करता हूं। मैं उसे हाथ के दवाब से समझाकर बैठा लेता हूं। धीरे से कहता हूं- सिगरेट लाने के लिए वाकआउट करने की जरुरत नहीं है। वह यों भी आ सकती है। वह हंस देता है- तू नस पकड़ लेता है, पर यहां दूसरा मसला भी है.......
एयरपोर्ट –चलने से पहले वह परेशान है -पुरवा के लिए खिलौना लेना है। इतवार। बाजार बंद है। सोचा, दादर से होते हुए निकल जाऐंगे। वह खुला होगा। फिर वक्त नहीं रहा। सीधे एयरपोट पहुंच गए। लाऊंज में पहली कतार की आखिरी तीन कुर्सियों में से अतिंम वाली छोड़कर शेष दो पर बैठे हम कॉफी पी रहे है। वह बहुत उदास है। भरा-भरा, थका-थका।
इस बार बहुत थक गया हूं, दिल्ली जाकर खूब सोऊंगा।
-मैं शायद पहली तारीख को आऊं।
-आना तो जगा लेना। वह फिर चश्मे के भीतर से झांककर कहता है।.......
फोन पर एक आवाज –दिल्ली में कुछ हो गया है। फौरन मालूम करिए......
दिल्ली का वही एयरपोर्ट है। वही रास्ता है। और वही राजेन्द्रनगर है। शायद जिंदगी की हलचल भी वही रही हो। पर भयानक सन्नाटा है। आज हलचल में कोई आवाज नहीं है। पेड़ो में हवा नहीं है। हवा में जान नहीं है। वही छोटा-सा फाटक। वही टूटी हुई प्राम, बाईं दीवार से लगी खड़ी। जीने का दरवाजा खुला हुआ। ऊपर घर का दरवाजा खुला हुआ। जैसे यहां कोई नहीं रहता। गलत घर तो नहीं है? मैं अपने इस घर का पता तो नहीं भूल गया? पहला कमरा- सब हैं। जैसे कोई नहीं पहचानता। दूसरा कमरा-वहां भी कुछ हैं। वे भी नहीं पहचानते। बरामदा- दो-तीन लोग वहां भी हैं, वे भी नहीं पहचानते। मैं ही किसी को कहां पहचान पा रहा हूं।  आखिरी कमरा- उसमें सफेद चादर ओढ़े कोई लेटा है-वह भी नहीं पहचानता। शायद देख नहीं पाया। मैं सिरहाने बैठकर चादर हटाता हूं।
सुन!
राकेश नहीं सुनता।
-देख तो..
 वह नहीं देखता।
-अरे जाग तो।
वह नहीं जागता....
कुछ भी बीता नहीं है।  लोग कहते हैं, वह सैंतालीस साल का था। दोस्त की कोई उम्र होती है? दोस्त और मां- ये  हमेशा अपनी उम्र के होते हैं। बाकी सबकी उम्रों में फर्क होता है।.....
और जो अपने वक्त की उम्र हासिल कर ले, वह क्या होता है। उसका क्या नाम होता है ? एक नाम मोहन राकेश होता है। 

( नोट- मोहन राकेश पर लिखा कमलेश्वर का यह संस्मरण " मेरा हमदम मेरा दोस्त " किताब से लिया गया है। इस किताब का प्रकाशन " किताबघर" ने किया है। और यह संस्मरण 14 पेज का है इसलिए इसके कुछ हिस्से लाया हूँ।)

Monday, September 10, 2012

मैं जिंदा हूँ



ये मेरी परछाई है। ये जो बीच में सफेद चीज है वो चिंटियों के लिए डाला गया है। और एक हरा पत्ता ।


मन होता नहीं, किसी से मिलने के लिए
दिल पसीजता नहीं, जरुरतमंदो के लिए
खुली आंखें देखती हैं, जुल्म होते हुए
हाथ उठते नहीं, जुल्मी लोगों के लिए
जुबान खुलती नहीं, अपने हक के लिए
पैर चलते नहीं, सत्य की आवाज़ के लिए
दिमाग सोचता नहीं, अपने देश के लिए
फिर भी लोग कहते हैं कि, मैं जिंदा हूँ !


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