किसी को फसल के अच्छे दाम की तलाश,किसी को काम की तलाश,किसी को प्यार की तलाश, किसी को शांति की तलाश, किसी को खिलौनों की तलाश,किसी को कहानी की तलाश,किसी को प्रेमिका की तलाश, किसी को प्रेमी की तलाश,................ तलाश ही जीवन है
Monday, December 29, 2008
कभी कभी ऐसा भी होता हैं। कैसा। अजी ऐसा।
1. आप किसी बस स्टेड़ पर खड़े उस लड़की के आने का इंतजार कर रहे हैं। जो आपको अच्छी लगने लगी हैं। जिधर से वह आती हैं बस उधर ही देखते जा रहे हैं और जब वह काफी देर तक ना आए। फिर आप अपने पर गुस्सा करे कि पाँच मिनट पहले आ जाता। और एकदम गुस्सें में पीछे मुड़े और देखे कि वही लड़की आपके पीछे ही खड़ी हैं। तो ....................................................................................................................................................।
एक घबराहट की लहर पूरे शरीर में दोड़ जाती हैं।
2.आपका दोस्त कहे चल यार बाहर चलते हैं बहुत पढ लिए। आप कहे कि तू चल मैं आया। और आप दो मिनट के बाद पहुँचते है। फिर आपका दोस्त कहे कि यार लेडिज बाथरुम कोई लड़का घुसा हैं मामला कुछ गड़बड़ लगता है जरा आवाज तो मार। आप आवाज मारते हैं। और फिर एकदम से एक लड़की निकल आए।
तो.....................................................................................................................................................।
आप अपनी गलती पर शर्मिदा होते हैं दोस्त को भला बुरा कहते हैं और उस लड़की से जाकर सारी बात बता देते हैं।
3. एक अप्रैल के दिन आप कई दोस्तों का अप्रैल फूल बनाने के बाद एक लड़की का अप्रैल फूल बनाने के लिए उसके पास जाए और कहे कि आपको फला लड़की बुला रही हैं। वापस हँसते हुए अपनी सीट पर आकर मद मद मुस्कराते हैं। और फिर वही लड़की रुहाँसी सी सूरत लेकर आपके पास आकर कहे कि आपको ऐसा नही करना चाहिए था और आप कहे कि क्या हुआ, और वह बोले कि हम दोनों के बीच बातचीत नही रही और वो कह रही हैं कि " मुझे कोई पागल कुत्ते ने काटा है जो तुझे बुलाँऊगी"।
तो....................................................................................................................................................।
आप माफी माँगते हैं और कहते हैं कि मुझे नही पता था कि आप दोनो के बीच बातचीत नही रहीं।
4. आप किसी मार्किट( मान लो सरोजनी नगर की मार्किट) में शापिंग कर रहे हैं और सामने कुछ दूरी पर आपकी तरफ पीठ किए हुए आपकी गर्ल फ्रेंड खड़ी हो और आप उसके पास जाए और कंधे पर हाथ मारकर कहे अरे.... तुम यहाँ क्या कर रही हो? और फिर वो मुड़े तो वो कोई ओर निकले। तो ..................................................................................................................................................।
आपके मुँह से कुछ नही निकलता हैं और घबराए से चल पड़ते हैं।
5. आप अपने दोस्त के साथ कहीं ( मान लो मंसूरी मानने में क्या जाता हैं) घूमने जाए। और किसी मार्किट में घूमने निकल जाए। तभी आपका पेट धोखा दे जाए और आप समान ढूंढने के बजाय पखाना ढूंढने लग जाए और जब पखाना नजर आए तो आप उधर ही दोड़ जाए। और आपका दोस्त पास ही बैठे चाय वाले से दो चाय बोल दें। कुछ देर बाद आप सड़ा सा मुँह बनाते हुए बाहर आए। और चाय वाले को बोले यार तू कैसे करता होगा यहाँ.....। तुम्हारा पखाना तो बहुत ही गंदा हैं। मैं तो बेहोश होते-होते बचा, मजबूरी ना हो तो मैं यहाँ मूतू भी नही। और बाद में आपका दोस्त कहे कि जिससे तू बात कर रहा था वह पेंट कमीज पहने लड़का नही लड़की हैं। देख जरा गौर से।
तो .................................................................................................................................................।
आप सकपका जाते हैं और दूसरी तरफ मुँह करके चाय पीने लगते हैं। और बाद में खूब हँसते हैं।
6. आप अपने दोस्त के साथ किसी मार्किट(मान लो कमला नगर की मार्किट) में बर्गर और पेटीज खा रहे हैं। तभी एक लड़की बर्गर वाले से पूछे कि भईया 100 रुपये के खुलले हैं और बर्गर वाला मना कर दे और लड़की आगे बढ़ जाए पर आपका दोस्त कहे कि मेरे पास है खुलले तू बुला तो सही उस लड़की को और आप उस लड़की आवाज मारकर बुलाते हैं। वह 100 का नोट आपकी तरफ बढा दे और फिर आपका दोस्त कह दे मेरे पास खुलले नही हैं।
तो .................................................................................................................................................।
आप झेंप जाए और लड़की के जाने के बाद आप दोस्त को खूब गालियों दें। और आपका दोस्त हँसते हँसते अपना पेट ही पकड़ ले।
7. आप अपनी बाईक पर अपनी दोस्त को पीछें बैठा कही घूमने जा रहे। किसी रेड लाईट पर आपको रुकना पड़े और पीछे से आपकी दोस्त कहे कि ..... आगे वाली गाड़ी पापा की हैं और वो मुंड मुंड के पीछे ही देख रहे हैं क्या करे फंस गए बुरे। ना ही आगे भाग सकते हैं ना ही पीछे भाग सकते हैं और आपकी दोस्त मुंह छुपाए बैठी हो और तभी उनके पापा गेट खोल कर उतर जाए और पीछे की तरफ आए।
तो ..................................................................................................................................... ...........।
उनके पापा पीछे के टायर को फटाफट देख कर अपनी सीट पर बैठ जाते हैं। और एकदम ग्रीन लाईट हो जाती हैं। और आप दोनों की सांस में सांस आती हैं।
8. आपकी कोई नई नई दोस्त बनी हो और उसका फोन आ जाए कि घर से कुछ खाने की चीजें लेते आना। आप मारे खुशी के उछलने लगे और ढेरों ख्वाब बुनने लगे। और जब वह मिले हाय हेल्लो हो और वो कहे कि घर से क्या क्या लाए हो मुझे दे दो घर जाके खाऊँगी अभी घर से फोन आ गया हैं। जल्दी घर जाना हैं।
तो .................................................................................................................................................।
आप बस उसे जाते हुए देखते रह जाते हैं।
9. आप किसी दिन अपनी छोटी चचेरी बहन के साथ बस में बैठे कहीं जा रहे हो। और आपके आगे वाली सीट पर एक सुन्दर मार्डन लड़की बेठी हो एक बड़ा सा जूड़ा बनाए हुए। और वह पलट पलट के बार बार आपको देखे। और आपकी समझ में ना आए कि बात क्या हैं? फिर अचानक वह लड़की उठे और इंगलिश में उल्टा सीधा कहने लगे। और बस में बैठी सारी सवारी की आँखे आपको देखने लगे।
तो..................................................................................................................................................।
काफी कुछ सुनने के बाद पता चले कि आपकी छोटी बहन उसके जूड़े को बार बार छेड़ रही थी और वो लड़की समझ रही थी कि आप उसके जूड़े को छेड़ रहे थे।
10. किसी दिन आपका टीचर आपकी शैतानी पर सजा के तौर मुर्गा बनने को कहे और वो भी लड़कियों की क्लास के गेट के सामने।
तो .................................................................................................................................................।
आप मुँह उठा उठा कर देखते हैं कि कुछ लड़कियाँ हँस रही हैं और आप पानी पानी हो रहे हैं। पर उसमें एक लड़की की हँसी आपको अपनी सी लगती हैं। और हर रोज की प्रार्थना सभा में आप हाथ जोड़कर प्रार्थना करें और आँखे खोलकर उसके चेहरे को निहारते रहे।
इन खट्टी मिटठी यादों को लिखने का विचार अनुराग जी की एक पोस्ट जिदंगी की दोड़ मगर बदस्तूर जारी हैं। और विजय जी की एक पोस्ट कुछ महान कार्य इन्हें अवश्य आजमाएं। से आया। कभी कभी संगत का भी असर हो जाता हैं। फिर अपनी और दोस्तों की यादों को यहाँ साझा कर दिया। यह साल जा रहा हैं इसलिए कुछ ऐसा याद किया जिसे पढकर हँसी भी आए, एक ठंड़ी आह भी निकले, ..........................................।
आप सभी से गुजारिश हैं टिप्पणी के साथ आप भी अपनी खट्टी मिटठी यादें यहाँ अवश्य बाँटे।
Saturday, December 27, 2008
बस स्टैड़ वाली लड़की
मोरी गेट के बस स्टैंड से अपनी लाइब्रेरी जाने को
तुम भी बस पकड़ती थी अपने ऑफिस जाने को
हर सुबह नौ बजकर बीस मिनट पर।
इससे पहले मेरी आँखे तुम्हें तलाशती इधर- उधर
तुम्हारी एक झलक पाने को।
कभी- कभी तुम दिखती नही
तब रह-रह कर तुम्हारी याद आती थी।
वो तुम्हारा सुंदर साधारण चेहरा
और उस पर तोते सी नाक।
वो तुम्हारी गोल लम्बी सुराई सी गर्दन
और जिस पर एक सुन्दर रेशम का धागा
वो रेशम का धागा मैं भी ले आया था।
वो तुम्हारे पहनावे में पूरब,पश्चिम का सुंदर मिलन
जो मेरे दिल को बहुत भाया था।
जब कभी मैं तुम्हारी इन यादों के किनारे
अमृता प्रीतम को पढ़ता था
तो मेरे प्यार का फूल खिलता था।
परन्तु
नहीं थी हिम्मत इतनी भी कि पूछ सकता नाम तुम्हारा।
नोट- यह तुकबंदी ब्लोग की शुरुआत में पोस्ट की थी। तब कम ही ब्लोगर इसको पढ पाए थे। इसलिए दुबारा से पोस्ट की हैं।
Monday, December 15, 2008
पंजाब की प्रेम कविताएं का आखिरी भाग
प्यार और कविता
प्यार करने
और किताब पढ़ने में
कोई अंतर नहीं होता
कुछ किताबों का हम
मुख-पृष्ट देखते हैं
अदंर से बोर करती हैं
पन्ने पलट देते हैं
और रख देते हैं
कुछ किताबें हम रखते हैं
तकिए तले
अचानक जब नींद खुलती हैं
तो पढ़ने लगते हैं
कुछ किताबों का
शब्द-शब्द पढ़ते हैं
उनमें खो जाते हैं
बार-बार पढ़ते हैं
रुह तक घुल-मिल जाते हैं
कुछ किताबों पर
रंग-बिरंगे निशान लगाते हैं
और कुछ किताबों के
नाजुक पन्नो पर
निशान लगाने से भी
भय खाते हैं
प्यार करने और किताब पढ़ने में
कोई अतंर नही होता
सतिंदर सिंह
साभार- किताब का नाम - "ओ पंखुरी" ,चयन व अनुवाद राम सिहं चाहल, प्रकाशन - संवाद प्रकाशन मेरठ (जिन जिन के सहयोग से ये कविताएं हमारे तक पहुँची उन सभी को दिल से शुक्रिया)
Thursday, December 11, 2008
पंजाब की प्रेम कविताएं भाग-2
रोशनी की तलवार
और हर बार मुझसे
मेरा घर छीनकर चौराहे पर खड़ा होकर कहता हैं
देखो कितनी आवारा-गर्द है
कभी घर नही लौटती ......
मैं चौराहे पर खड़े हर ऐरे गैरे से
अपने घर का पता पूछती हूँ
भीड़ में से
एक निकलकर कहता हैं
मेरे जेहन में कई कमरे हैं
एक कमरे का दूसरे कमरे की तरफ
कोई दरवाजा नही खुलता
तू एक कमरे में रह सकती हैं
मैं उसकी चोर निगाह की ओर घूर कर देखती हूँ
इतने में दूसरा खड़ा होकर कहता हैं
किसी के साथ गुज़रे हुए कुछ खूबसूरत पल
क्या काफ़ी नही होते बची हुई उम्र के लिए
फिर घर के बारें में क्या सोचना हुआ
इतने में तीसरा खड़ा होकर कहता हैं
हर मर्द चोरी छिपे अपने घर से दूर भागता रहता हैं
उस शून्य घर का क्या करोगी
मैं उसकी ओर गौर से देखती हूँ
इतने में चौथा खड़ा होकर कहता हैं
घर तो झूठे रिश्तों पर सुनहरी लेबल हैं
मस्तक की लपट को 'झूठ' लेबल के साथ
कैसे रौशनाएगी? मैं घबरा जाती हूँ
इतने में पाचँवा खड़ा होकर कहता हैं
घर तो जेल का दूसरा नाम हैं
पंछी, पवन एंव पवित्र विचारों को
घर की मोहताजी की ज़रुरत नही होती
घर का साथ छोड़ो
और फिर तेरी रोशनी की तलवार
जो सच माँगती हैं
उस का वार भला कौन झेल सकता है
मैं चौराहे पर ही
चीख चीख कर कह रही हूँ
मुझे मेरा घर चाहिए
वह पता नही
किस किस का जिस्म पहनकर आता हैं
हर बार मुझसे मेरा घर छीनकर
चौराहे पर खड़ा होकर कहता हैं
देखो कितनी आवारा-गर्द हैं
कभी घर ही नही लौटती
मनजीत टिवाणा
साभार- किताब का नाम - "ओ पंखुरी" ,चयन व अनुवाद राम सिहं चाहल, प्रकाशन - संवाद प्रकाशन मेरठ (जिन जिन के सहयोग से ये कविताएं हमारे तक पहुँची उन सभी को दिल से शुक्रिया)
Tuesday, December 9, 2008
बहुत हो चुका, अब कुछ कर जाना
अब कुछ कर जाना हैं
यह वक्त नहीं शौक मनाने का
अब वक्त हैं कुछ कर जाने का।
अब इंतजार नहीं करेंगे हम
और जिदंगीयों के जाने का।
इन नेताओं में तो अब जंग लग चुका
अब वक्त हैं खुद ही जंग लड़ जाने का।
आओ अपने अदंर भी झांक लें
अपने कर्तव्यों को पहचान लें।
हिंदू-मुस्लिम, जात-पात, छोटा-बड़ा से ऊपर उठकर
आओ मिलकर रखें एक नये भारत की नींव हम।
26 नवम्बर की घटना के बाद तीन दिन तक तो आँख, कान न्यूज चैनल पर ही लगे रहे। अलग अलग भावों से गुजरा। जब लिखने बैठा तो ये चंद पंक्तियाँ काग़ज पर उतर गई। ऐसे ही कुछ मिलते जुलते ज़ज़्बात 7 अगस्त की पोस्ट में पेश किये थे। उन्हें भी नीचे पेश कर रहा हूँ।
बुत
देखो उस बुत को
कैसा चमक रहा है
कितनी जगह घेरे है
कितना पैसा खर्च किऐ हैं
अपनी शान के नाम पर
बिल्कुल तुम्हारी तरह
कुछ समय बाद देखना उस बुत को
कोई थूकेगा
पक्षी बीट करेंगे
बच्चे पत्थर से हिट करेंगे
इसलिए
नेताओं
अब भी समय है
संभल जाओ
कुछ ऐसा कर जाओ
आने वाली पीढ़ियाँ नाज़ करें
शान से तुम्हारी बात करें
Wednesday, November 26, 2008
पंजाब की प्रेम कविताएं
मेरी कविता
मेरी माँ को मेरी कविता समझ न आई
बेशक मेरी मातृभाषा में लिखी हुई थी
वह तो केवल इतना समझी
पुत्र की रुह को दुख हैं कोई
मगर उसका दुख
मेरे होते हुए
आया कहाँ से
ध्यान लगाकर देखा
मेरी अनपढ़ माँ ने मेरी कविता
"देखो लोगों,
अपने कोख से जन्में
माँ को छोड़
अपने दुख काग़ज़ों को कहते हैं
मेरी माँ ने काग़ज़ों को उठाकर
सीने से लगाया
क्या पता इस तरह ही
कुछ मेरे नज़दीक हो जाए
मेरा बेटा
सुरजीत पातर
साभार- किताब का नाम - "ओ पंखुरी" ,चयन व अनुवाद राम सिहं चाहल, प्रकाशन - संवाद प्रकाशन मेरठ (जिन जिन के सहयोग से ये कविताएं हमारे तक पहुँची उन सभी को दिल से शुक्रिया)
Thursday, November 6, 2008
कोई हिजड़ा कह बुलाता और कोई किन्नर कह पुकारता , लेकिन कोई भी अपना कह नही दुलारता हमें।
एक ही खून से बनें हम
भूख लगती तो खाना खातें हम
दुख होने पर रोते हम
खुश होने पर हँसते हम
एक ही मिट्टी में मिलते आखिर में हम
परंतु

अपने परिवार से ठुकराए जाते सिर्फ हम
बाहर निकलकर मजाक बनते सिर्फ हम
सब रिश्तों की आँखो में चुभते सिर्फ हम
ताली बजाकर पेट की आग बुझाते सिर्फ हम
प्यार, दुलार को तरसते सिर्फ हम
सदियों से लेकर आजतक उपेक्षित रहें सिर्फ हम
नोट: ऊपर दिये फोटो http://www.pijushphotography.blogspot.com/ और गूगल से लिए गए। इसलिए इस पोस्ट के लिए उनका भी शुक्रिया।
Monday, November 3, 2008
यह दीपावली भी आई और चली गई।
नीचे गया देखूँ कि शाम के खाने के लिए क्या तैयारी चल रही हैं। देखा तो मम्मी नही थी, पूछा तो बताया कि " वो है ना .... उसके साले को किसी ने मार दिया पैसे की खातिर, कल सुबह पैसे लेके निकला था और आज सुबह लाश मिली गटर में।" चंद पैसे की खातिर एक जान, कितनी सस्ती हो गई हैं एक जान। जिदंगी भर हर दिवाली याद आऐगी इस परिवार को इस इंसान की।
शाम के खाने का मेन्यू तैयार हो चुका था मैं बोला पत्नी से "यार उसके यहाँ हो आता हूँ इस बार वह लेट हो गया, मैं ही आज पहले निकल जाता हूँ दिवाली की मुबारक दे आता हूँ।" वो बोली " कि ठीक है आप चले जाओ पर फोन कर लो एक बार जाने से पहले कहीं भाई साहब हमारे घर ही ना आ रहे हो।" मैं बोला " हाँ ये ठीक रहेगा।" फोन किया गया तो पहले तो बधाईयों का आदान प्रदान हुआ। फिर वो बोला " यार मैं यहाँ मेरठ में शिफ्ट हो गया हूँ राजेन्द्र नगर से" मैं एकदम दंग रह गया बोल उठा " तुने पहले क्यों नही बताया" वो बोला "यार तू परेशान होता इसलिए नही बताया बस और बताने को था ही क्या जो बताता, ये बताता कि यार कर्जा बहुत हो गया है घर दुकान बेच कर मेरठ जा रहा हूँ। " मेरी जुबान चुप हो गई और उसकी आवाज भारी हो गई, कुछ पल की दोनो के बीच की चुप्पी बहुत कुछ कह रही थी।

इन सबके बीच बेटी उछल खुद माचती रही, जो भी डिब्बा नजर आता उसे खुलवाती और थोड़ा खाकर फिर उस डिब्बे को हाथ भी नही लगाती। बेटी पास आकर बोली कि " पापा मार्किट चलो" उसे लेकर घर के पास वाली मार्किट में गया जहाँ भीड़ ही भीड़ थी। और मेरी बेटी हाथ के इशारे मुझे समझाती जाती। एक दुकान पर रुका एक जानी पहचानी 10 या 15 साल की लड़की को देखकर । उससे पूछा "बेटा क्या हाल हैं कैसे चल रही है दुकान।" वो बोली "ठीक ठाक हैं बस" और उसका बाबा हाफंता हुआ खड़ा था एक तरफ। वो बोला कि बस काट रहे है जिदंगी को। ये लडकी और एक इसका भाई वो भी 10 या 15 के बीच का होगा। ( दोनो की सही उम्र का मुझे पता नहीं) अपने दादा दादी और एक छोटी बहन का पेट पाल रहे हैं। इस लड़की का पिता कभी मेरे साथ क्रिकेट खेला करता था। कुछ के साल पहले किसी बिमारी से निधन हो गया था उसका । और फिर चंद महीनों बाद ही लड़की की माँ भी गम करती करती यह दुनिया छोड़ गई। और फिर इन तीनों बच्चों के पालने का जिम्मा आ गया इनके बुढे दादा दादी पर जिन्हें खुद ही जरुरत थी किसी के सहारे की। धीरे धीरे ये बच्चे बडे हुए और अपने पापा की दुकान सभांल ली । इनकी दादी से चला नही जाता और दादा चल फिर रहा है बस वो भी कापंता हाफंता। एक इन बच्चों का ताऊ है पर ........। अगर आज इनका बाप होता तो ये भी नये नये कपडे पहने होते और इनके चेहरे खुशी से चमक रहे होते। और मैं अपनी बेटी को देखने लगा पता नही क्या सोचकर ......।
शाम हुई तो मम्मी नही आई इसलिए पापा , बहन और पत्नी दीये जलाने लगे। पर उनकी सख्या कम थी पहले की अपेक्षा और मोमबतियाँ तो और भी कम थी। छत पर जाकर देखा छतों पर दिये नही थे ना ही मोमबतियां बस एक आध नजर आ रहे थी । जिधर देखो बिजली की लडियाँ थी वो भी पहले से कम । क्या हो रहा था पता नहीं, दिवाली की पहले वाली रौनक कहाँ चली गई । दिये रखकर नीचे आए तो देखा कि जो परात कभी खिल और मीठे खिलोनो से भरी होती थी वो आज आधी भी नही थी। समझ नही आ रहा था इस दिवाली क्या हो रहा हैं। दिये नही, मोमबतियां नही, खिल नही, मीठे खिलोने नही, है भी तो बस शगुन के लिए। खाना खाकर छत पर गए कि एक आध अनार छोड़ेगे। छोटा भाई खरीद लाया था मेरा मन कभी हुआ नही कि बम फोडू। चारों तरफ आकाश में आतिशबाजी चमक रही थी और मेरी बेटी अनार, फुलझड़ी, फिरकनी को देखकर झूम रही थी।

नीचे आए सोने के लिए तो वो कुर्ता पजामा खुंटी पर टंगे हुए थे और ऐसा लग रहा जैसे मुझे घुर रहे हो और पूछ रहे क्यूँ जी हमें पहना क्यों नहीं।
Monday, October 20, 2008
एक लड़की की कहानी
कहने को तो इसकी ढ़ेरों सहेली थी
फिर भी यह अकेली थी।
मुस्कराती थी, खिलखिलाती थी, देर तक बतियाती थी
पर ना जाने अकेले में किस सोच में डूब जाती थी।
कभी-कभी वह बच्चों सी बातें करती थी
और कभी वो फ्रायड को भी मात दे जाती थी।
जब कोई बात ना होती थी
तब वह अपने कोमल हाथों से सपने बुनने लगती थी
कभी आसमान को छूने के सपने
कभी सुन्दर, प्यारे घर के सपने
परंतु अपनो के सपने पूरे करने में वह अपने सपने भूल जाती थी।
आज मिली वही रस्तें में बोली "कैसे हो तुम"
मैं पहचान ना सका, बस एकटक देखता रहा
उसके खुरदरे हाथों को
उसकी आँखो के नीचे के काले घेरों को
उसकी हडिडयों की काया को
उसकी आँखों में आये एक आँशू को
मैं बोला "तुम वही हो ना जिसका नाम मैंने "पहेली" रख दिया था"
वो बोली "हाँ वही पहेली, जिदंगी की पहेली सुलझाते सुलझाते सच में ही एक पहेली बन कर रह गई
यह बात कहते ही वह जार जार रो पड़ी, जो कभी बात बात पर हँसती थी।
Thursday, October 16, 2008
प्रेम करने वाली लड़की
प्रेम करने वाली लड़की अक्सर हो जाती है खुद से गाफ़िल और दुनिया को अपने ही ढ़ग से बनाने-सँवारने की करती है कोशिश।
प्रेम करने वाली लड़की हवा में खूशबू की तरह बिखर जाना चाहती है उड़ना चाहती है स्वच्छंद पंछियों की तरह धूप सी हँसी ओढ़े।
वह लड़की भर देना चाहती है उजास चँहु ओर।
प्रेम करने वाली लड़की सोना नही, चाँदी नही,गाड़ी नही, बँगला नही।
चाहती है बस किसी ऐसे का साथ जो समझ सके उसकी हर बात और अपने प्रेम की तपिश से उसे बना दे कुंदन सा सच्चा व पवित्र।
अब वह आईना भी देखती है तो किसी दूसरे की नजर से परखती है स्वंय को और अपने स्व को दे देती है तिलांजलि।
प्रेम करने वाली लड़की के पाँव किसी नाप की जूती में नही अटते, समाज के चलन से अलग होती है उसकी चाल।
माँ की आँख में अखरता है उसका रंग-ढ़ग, पिता का संदेह बढ़ता जाता है दिनों दिन और भाई की जासूस निगाहें करती रहती है पीछां ।
गाँव-घर के लोग देने लगते है नसीहतें समझाने लगते है ऊँच-नीच अच्छे-बुरे के भेद मगर प्रेम करने वाली लड़की जानना समझना चाहती है दुनिया को
और एक माँ की तरह उसे और सुंदर बनाना चाहती है ।
रचनाकार- रमण सिहँ
(यह कविता सामयिक वार्ता में छपी थी )
महेश सिँह जी( प्रबधंक संपादक सामयिक वार्ता) की अनुमति से इस प्यारी रचना की पोस्ट डाली जा रही हैं।
आजकल समय अभाव के कारण कुछ लिख नहीं पा रहा हूँ इसलिए अपनी पसंद की कुछ रचनाएं डाल रहा हूँ जो पहले ही फाईल में सेव हैं।