Saturday, November 7, 2009

प्रभाष जी, क्या सचमुच आप इस रविवार "कागद कारे" लेकर नही आऐंगे?

रविवार की सुबह "कागद कारे" का ऐसे इंतजार होता था।  
रविवार की सुबह देर तक मैं चाहकर भी सो नही पाता। क्योंकि रविवार है। और किसी चीज का इंतजार है। आँख खुलते ही मुँह से आवाज निकलती है पेपर। नीचे से कोई पेपर लेकर आता। पाँच पेपरों में से जिस पेपर की तलाश है उसे सबसे पहले निकाल संपादकीय पेज खोलता हूँ। जिस रविवार यह पेपर नही मिलता तो सुबह बासी सी लगती है। फिर बस एक आवाज निकलती है "जीतू"(छोटा भाई) वो पेपर कहाँ है।" नीचे से ही आवाज आती है "आज नही आया, पेपर वाला कह रहा था कि आज ये पेपर नही आया।" (पेपर वाला अक्सर यह पेपर नही लाता) मैं बिस्तर से निकल पड़ता हूँ। ना बाथरुम जाने की जरुरत, ना ही टूथ ब्रश करने की जरुरत। और ना ही नाशता करने की इच्छा। बस एक ही काम कि ये पेपर कैसे लाया जाए। फिर से जीतू को आवाज लगती। और वो पैर पटकता हुआ आता है और पैसे लेकर पेपर लाने के लिए बाईक से निकल जाता है। अक्सर घर में चर्चा रहती है कि ऐसा क्या है इस पेपर में जो हमें धक्के खाने पड़ते है। जब तक पेपर नही आऐगा ये बैचेन क्यों रहता है? थोडी देर बाद मेरी आवाज फिर से गूँजती है "क्या हुआ अभी तक पेपर नही आया। कितनी देर हो गई। पेपर लेने गया है या अमेरिका गया है। कल से इस पेपर वाले को बदल दो, .... एक यही पेपर नही लाता बाकी सब ले आता है, नही चाहिए मुझे ऐसा पेपरवाला.....................। फिर घर का एक सदस्य कहेगा कि "तसल्ली भी रखा करो।" फिर दूसरा सदस्य कहेगा "पेपर पेपर पेपर..., पेपर हो गए या ......."पर माँ तो माँ होती है ना" आ गई अपने बड़े बेटे का पक्ष लेने। और बोलने लगेगी "एक पेपर नही ला सकते तुम, मैं तो अनपढ ठहरी, नही तो खुद जाकर ले लाती।" वो पेपर कोई और नही "जनसत्ता" है। और उस पेपर के जिस कालम को पढने के लिए मैं सुबह सुबह बैचेन रहता हूँ वो कालम है "कागद कारे" बाकी के सारे काम इसको पढने के बाद .................

आज का दिन

आज "जनसत्ता" आया हुआ है। पर प्रभाष जी के जाने की खबर सुबह किसी समाचार चैनल से मिली। एकदम से स्तम्भ रह गया। और एकटक टीवी को देखता रहा। पर फिर अपनी भावानाओं पर काबू पाया। ना जाने कैसा रिश्ता था मेरा और उनका। कभी कभी सोचता हूँ तो लगता है कि शब्दों और विचारों का एक रिश्ता है। एक भावनात्मक रिश्ता। पता नही कब कैसे "कागद कारे" से परिचय हुआ और एक रिशतें में बदल गया। उनके लिखे "कागद कारे" कभी होंसला दे जाते, कभी कुछ सीखा जाते, कभी अनदेखी तस्वीर को देखा जाते, कभी आँखो में आँशु ले आते और कभी जीने का जज़्बा दे जाते। उनके लिखे शब्दों से मिट्टी की खूशबू आती है। उनका "अपन" शब्द अपना सा लगता है। उनकी खरी खरी बातों ऊँचे ओहदों पर बैठे लोगो की जमीन को हिला जाती है। पता नही उनके लिखे कितने लेखों की कटिंग आज भी फाईल में लगी हुई है। आज जब उस फाईल को निकाला तो उनके शब्दों और विचारों की लहरों में बहता चला गया। कई बार प्रभाष जी से आमना सामना पर कभी बात नही हुई। सोच रहा हूँ कि परसो रविवार है। क्या सचमुच "कागद कारे" नही आऐगा? क्या अब भी मैं रविवार की सुबह का बेसर्बी से इंतजार करुँगा? उस बैचेनी का अब क्या होगा? प्रभाष जी अब कौन हर रविवार सुबह मेरे संग बैठकर चाय पीऐगा। इस रविवार सुबह जनसत्ता तो आऐगा, प्रभाष जी क्या आप सचमुच नही आऐंगे?...................................

प्रभाष जी की खरी खरी जिसके हम कायल थे।


कहते है आज अगर बालको उधोग खड़ा किया जाता तो उसमें कम से कम पाँच हजार करोड़ रुपय लगते। बालको के इक्यावन प्रतिशत शेयर यानी उसकों चलाने की मिलकियत और उस पर नियंत्रण साढे पाँच सौ करोड रुपयों में स्टारलाइट कंपनी को सौंप दिया गया। इस उधोग के पास अपने दो बिजली घर है जिनमें प्रत्येक पाँच सौ करोड़ का माना जाता है। विनिवेश मंत्री अरुण शौरी ने सब आंकड़े बताए लेकिन मानने वाले नहीं मानते कि यह सौदा साफ और पारदर्शी है। छतीशगढ के मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री निवास के एक असंवैधानिक सत्ता केंद्र ने सौ करोड़ रुपय इस सौदे में लिए है। लेकिन अरुण शौरी इसे बकवास बताते है। वीपी सिंह और बोफर्स वीर अरुण शौरी अब तक नहीं बता सके कि वे चौंसठ करोड़ किसने खाए? पंद्रह साल हो गए। लेकिन बालको के सौदे में कोई गडबड वे नही देखते। अरुण शौरी जब पत्रकार हुआ करते थे तो गाँधी के लंबे-लंबे उद्धरण दे-देकर राजनेताओं को कोड़े मारा करते थे। क्या बालको स्टरलाइट कंपनी को इसलिए सौंपा गया है कि उसके मालिक ने गाँधी के टृस्टीशिप सिद्धांत को मान लिया है? तब एक लेख में नेताओं को दुतकारते हुए अरुण शौरी ने लिखा था- काके ये थूक के चाट जाएंगे। उनके मुहावरे और मंतव्य को अब उन्हीं पर लागू किया जाए तो कहना पड़ॆगा- काके, ये विश्व बैंक के पले-पनपे एडम स्मिथ के सपूत है। ये गाँधी को थूक कर हेडगेवार को चाट जाएंगे। बालको, तुम देखना ये बड़ी ईमानदारी से देश को बेच खाएंगे।


नोट- ऊपर बाक्स में लिखा हुआ अंश प्रभाष जी के एक लेख से लिया गया है जो जनसत्ता में छपा था। जिसकी कटिंग मेरे पास है और वहाँ से उतारा गया है। इसलिए "जनसत्ता" पेपर का शुक्रिया। और फोटो गूगल और रविवार डाट काम से लिया गया है। साथ ही ये पोस्ट कल लिखी गई थी पर किन्हीं कारणों से आज पोस्ट की जा रही है।

Monday, November 2, 2009

जिंदगी के रंग- विजय जी के संग

जिंदगी खूबसूरत रंगो से भरी हुई है। हर रंग निराला है, प्यारा है। और हर रंग हर दूसरे से जुड़ा हुआ है जैसे सुख से दुख। इसलिए जिंदगी में संघर्ष के रंग के बाद खुशी का रंग आता है। और जीवन में रस घोल जाता है। आज हम भी आ गए अपनी जिदंगी के रंगो को लेकर।




संघर्ष का रंग : बुर्जुगों की दुआ काम कर जाती है। 

बात बहुत साल पहले की है. जब मैं पढाई किया करता था और किराये के घर पर रहता था. उस घर में अक्सर बिजली नही रहती थी तब मैं रात को स्ट्रीट लाईट  के नीचे बैठकर पढाई करता था. और सपने देखा करता था। ऐसे ही एक दिन मैं पढ़ रहा था तो एक बुढा बाबा आया और मेरे पास बैठाकर बातें करने लगा. हम कुछ बात कर रहे थे. रात को मैं चाय पीने ,पास के मोहल्ले की एक कैंटीन में जाता था . उस दिन उस बुढे के लिए भी चाय ले आया . थोडी देर बाद मैंने ऊपर स्ट्रीट लाईट को देख कर उस से कहापता नहीं मैं अपने घर की बिजली में कब पढ़ पाऊंगा....... उस बुढे ने मेरे सर पर हाथ फेरा और कहा , फ़िक्र न कर बेटा , एक दिन तू इन्ही खम्बों को बिजली बेचेंगा. मैं हंस पढ़ा .....और उससे कहा कि ये होने वाला नहीं है .. बुढे ने हंसते हुए कहाहोंगा. देखते रह, जरुर होंगा. आज करीब २० बरस बाद मैं अपनी कंपनी के बने हुए लाईटिंग स्टिम बहुत से मुनिस्पल कारपोरेशन को बेचता हूँ तो उस बुढे बाबा की याद आ जाती है. और मुँह से ये ही शब्द निकलते है। 


ज़िन्दगी के अपने जादू होते है और सपने यही इसी दुनिया में सच होते है......”



शब्दों का रंग : गाँधी जी के संग|

"Be the change you want to see in the world."
                                           Mahatma Gandhi



हंसी का रंग : इस फिल्म के गायक हम है।

दोस्तों, मेरे जीवन की दो लाइफलाइंस है, एक म्यूजिक और दूसरा कॉमेडी. मैं हर परिस्थिती में कॉमेडी देख लेता हूँ. एक वाक्या बताता हूँ. मैं Mining Engineering कर रहा था. हम सब Civil Engineering की लड़कियों पर खूब मरते थे. मैं तब बहुत अच्छा गाना गाता था. मेरे क्लास का एक बन्दा सिविल की एक लड़की पर मरता था. उसने कहा कि यार मैं Lip-Movement करूँगा, तुम गा लेना. मैं तैयार हो गया. हम लड़कियों के रूम के सामने पहुँच गए और उस लड़की को देखकर गाने लग गाये. “प्यार दीवाना होता है, मस्ताना होता है.........”लड़की दूर थी, वो सोची की यही बन्दा गा रहा है. वो खुश, बन्दा खुश, हमारी टीम खुश. अचानक , इस बन्दे को खांसी आ गयी. वो खांसने लगा, और मेरा गाना चालू ही था. जब तक उसकी खांसी रूकती और मुझे बात समझ में आती तब तक गाने का अन्तरा ख़त्म हो चुका था . और लड़की को सब कुछ पता चल गया था. वो बाहर आई, बन्दे को, मुझे और सारी टोली को खूब खरी खरी बाते सुनाई. और आज उन पलों को याद करता हूँ तो आज भी हँसी छूट जाती है।

विजय जी के ब्लोग का पता- विजय जी की कविताएं

Monday, October 26, 2009

अब वह मरीज कभी दरवाजा खटखटाने नहीं आएगा।

लतिका रेणु जी का फणीश्वरनाथ 'रेणु' जी पर लिखा अंतरंग संस्मरण ।

भागलपुर जेल से कुछ राजनीतिक-बन्दी पटना अस्पताल में इलाज के लिए भेजे गए थे। मैं यहाँ नर्स-इंचार्ज थी। थोडे दिनों में इलाज कराकर वापस भेज दिए गए। एक दिन वार्ड का चक्कर लगाते हुए देखती हूँ, भागलपुर जेल से आए कुछ सिपाही आपस में गप्पें मार रहे है। मैंने उनसे पूछा, "आप लोगो के साहब लोग तो चले गए, फिर आप सब अब तक यही हैं?" "एक साहब अभी है" एक सिपाही ने बेड की तरफ इशारा करते हुए कहा। मैंने देखा एक बढ़ी दाढी और बालवाला दुबला-पतला नौजवान आँखे बन्द किए पड़ा है। मेरे कुछ पूछने पर उसने आँखें खोलीं, और मुझे मिनटों देखता रहा। कुछ बोला नहीं। मैं आगे बढ गई। शाम को एक नर्स ने आकर बताया- भागलपुर जेल से आया राजयक्ष्मा का वह बन्दी मरीज मेरे बारे पूछ रहा था। पहले तो मरीज खुद ही पूछ लिया करता था, बाद में कुछ स्वास्थ्य सुधरा तो पर्ची पर लिखकर किसी के मार्फत भिजवाता-" आप मुझे देखने क्यों नही आतीं।" मैं जाती। बहुत पूछने पर अपनी तबीयत के बारें में दो एक बात बतलाता और चुप। उसकी आँखो में जी पाने की लालसा झलकती होती थी और कई बार तो उस मासूम से चेहरे को देखकर मैं सोचती यह आदमी, इस कदकाठी और उम्र का क्रांतिकारी भी हो सकता है? डा. बनर्जी की देखरेख में मरीज एक दिन ठीक-ठाक होकर वापस भेज दिया गया। बाद को, साल छह महीने में कभी अस्पताल में ही वह दिख जाता। देखकर सोचती, किसी को देखने आया होगा, लेकिन तब क्या जानती थी कि वह मुझे ही देखने पूर्णिया से यहाँ चला आता है। बस, वैसे ही चुप, नि:शब्द वार्ड के इधर-उधर विचरकर वापस हो जाता। कभी नजरें मिलतीं तो मैं महज औपचारिकतावश पूछ लिया करती,"आपनी ठीक-ठाक तो?" " हाँ..." बहुत संक्षिप्त सा उत्तर। एक बार मिला तो कहने लगा-" देखिए, मैं स्वस्थ नजर आने लगा हूँ न? डाक्टर ने कहा था, घर जाकर खूब आम, दही, दूध, मछली खाओ, सो मैंने अपनी खुराक बढ़ा दी है और ....... मरीज सचमुच स्वस्थ नजर आ रहा था। मैंने कहा " इसी तरह खाने पीने पर ध्यान रखना होगा।" और वह हँसने लगा था। चार वर्ष बाद एक दिन एक नर्स ने मुझे एक पुर्जा थमाया-" मैं फिर बीमार होकर अस्पताल में भर्ती हूँ, आप मुझे देखने नही आएँगी?" और देखने गई, सुना बीमारी अबकी बढ गई है, मुँह से खून गिरता है, मैंने कहा-" आपने बदपरहेजी की?" " इस बार मैं बचूँगा नहीं" -मेरे सवाल के बदले हताश होकर उसने कहा। तो मैंने सांत्वना दी-" ठीक-ठाक रहिए, आप जरुर बचेंग़े" जाने दुबारा उसे देखकर मन को कैसा तो लगा था, शायद यही कुछ कि इसे बचना चाहिए। पिछली बीमारी से वापस जाने के बाद, बीच-बीच में उसका आकर मिलना, अपने स्वास्थय के बारें मेरे हल्के फुल्के निष्कषों पर खुश होना उसे अच्छा लगता था और अच्छी लगने वाली उस बात ने ही शायद उसके मन में मेरे लिए स्नेह के बीज बो दिए थे। दुबारा भर्ती होने पर मेरी सांत्वना के बदले कहा- " इस बार बच गया तो फिर जीवन में कभी बदपरहेजी नहीं करुँगा।"

उसके ठीक-ठाक होकर अस्पताल से निकलने तक जाने क्यों मेरे मन में भी मोह पैदा हो गया, और हम दोनों एक-दूसरे को ज्यादा समझने लगे थे। वह अनजान मरीज मेरे मन में अपने लिए श्रद्धा जगाकर खुद वह यह पालने लगा था कि मरणांतक दौरे से उसे डाक्टर और दवा ने नही, मैंने बचाया है। वह वापस अपने गाँव लौट गया। इस बार बीच-बीच में उसके पत्र मिलते रहे। कभी मैं भी लिख देती। फिर एक दिन परिवार वाले उसे अस्पताल ले आए। सुन-देख कर पहले तो गुस्सा आया लेकिन उसका सूना, सपाट और म्लान चेहरा देख, खुद ही सहम गई। "इस बार, अब और बचने की उम्मीद नहीं"- मेरे आक्रोश के बदले उसकी आँखो से आँसू झरने लगे थे। होंठ नि:शब्द। एकांत मे जाकर आदिशक्ति माँ को याद किया-"या तो इसे पूर्ण स्वस्थ कर दो, या उठा लो माँ। बार बार क्यों?" पिछले वर्षों में आत्मीयता का एक रिश्ता जुड़ा था सो साधिकार डाँटा-डपटा-" हर बार मरने लगते हो तो यहीं एक जगह देखी है?" "और कहाँ जाऊँ?" भरे गले से उसकी आवाज निकली थी। नही कह सकती, उसके इस एक वाक्य ने मुझे किस गहराई तक बाँध डाला था मैं करती भी क्या सेवा में जुटी। डयूटी के अलावा जो समय बचता, उसी के पास बैठी होती। अपने हाथ का बना खाना उसे खिलाती, उसके कपड़ॆ, शरीर साफ करती, उसके लिए प्रार्थनाएँ करती-बचा लो माँ। और बचा, यानी स्वस्थ हुआ तो एक दिन जिद पकड़ बैठा-" अब कहीं नहीं जाऊँगा। यही रहूँगा, तुम्हारे पास।" मैंने समझा, भावुकता में बोल रहा है।  एक शाम डेरे से खाना लेकर अस्पताल जाने की तैयारी में थी, कि वह अपना सामान रिक्शा पर लादे पहुँचा-"अस्पताल से डिस्चार्ज-सर्टिफिकेट ले लिया है, और सचमुच मुझे अब कहीं नहीं जाना है।" उस बाल सुलभ जिद का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था- ठीक है बाबा। शादी की बात तय हुई तो मैंने अपने बड़े भाई को खबर की। उन्हें सारी जानकारी मिली तो समझाया-" इतने भयानक मरीज के साथ शादी मत करो।" लेकिन मुझे अपने निर्णय पर अडिग देख वह झुके और 5 फरवरी 1952 को मेरे मकान पर हम दोनों की विधिवत शादी हो गई। शादी के दिन उनकी शारीरिक हालत कैसी थी -जानते है "इतने कमजोर, कि शादी की तमाम रस्में उन्होंने दीवार से टिककर पूरी कीं। हम कुछ महीनों के लिए औराही-हिंगना गए। मैंने पहली बार उनका गाँव-घर देखा। पटना आए तो जिद पकड़ ली- "तुम नौकरी छोड़ दो।" लेकिन जब तक कोई आर्थिक विकल्प नहीं मिलता, मैं नौकरी कैसे छोड़ देती? अजीब पसोपेश में थी कि एक दिन उन्होंने फैसला सुनाया-" अब मैं लिखूँगा। जीने के लिए विकल्प तो ढूढ्ना ही होगा, लेकिन मुझे तुम्हारी नौकरी पसन्द नहीं।" और "मैला आँचल" लिखने की शुरुआत वहीं हुई- सब्जी बाग स्थित मकान पर। "मैला आँचल" के डा. प्रशांत की कल्पना उन्होंने डा. प्रसून बनर्जी- डा. टी.एन. बनर्जी के लड़के, जो तब हाऊस सर्जन थे, के व्यक्तितव, चलने, हँसने, बोलने के अन्दाज से ली। ममता के रुप में मुझे खींचा और कमली के रुप में गाँव वाली पत्नी पदमा जी को। बाकी की पृष्ठभूमि रही उनका ग्रामीण क्षेत्र। एक वर्ष में जब लेखन पूरा हो गया तब समस्या खड़ी हुई उसके प्रकाशन की। उन दिनों यहाँ रामेश्वर बाबू का यूनियन प्रेस हुआ करता था। तय हुआ, खुद ही छापेंगे। रामेश्वर बाबू छापने पर सहमत हुए। शर्त यह रखी गई कि सात सौ रुपए का कागज पहले देंगे, छपाई के नौ सौ रुपय धीरे धीरे उपनयास बेच कर सधा देंगे। और "मैला आँचल" छप गया।

छपने के बाद रामेशवर बाबू के पैंतरे बदले। कहा, रुपए दीजिए तब उपन्यास को हाथ लगाने देंगे। एक शाम लौटे तो दुखी थे- "मैला आँचल" बिक रहा है, और मुझे बताया नहीं जाता। कोई बात नहीं, दूसरा लिख दूँग़ा। मैंने कोई सलाह दी तो खीझ उठे- "पैसा ही तुम्हारे पास कि बची प्रतियाँ उठा लाऊँ? दो हजार रुपए की माँग करते हैं वे।" मैंने इधर उधर से रुपए जुगाड किए और 'मैला आँचल' की सही सलामत और दीमक खाई प्रतियाँ तक घर में रख दी गई। एक दोपहर राजकमल प्रकाशन के मालिक ओमप्रकाश जी घर ढूँढ़ते हुए पहुँचे। रेणु थे नहीं, ओमप्रकाश जी स्लिप छोड़कर चले गए- "वह आएँ तो कहिऐगा, मैं डेढ़ दो घंटे में फिर आऊँगा। दिल्ली से उन्हीं से मिलने आया हूँ। लौटे तो ओमप्रकाश जी की स्लिप देखकर कूदने लगे " बहुत बड़े प्रकाशक 'मैला आँचल' छापने की अनुमति लेने आए हैं।" शाम को ओमप्रकाश जी, मैं और इनमें बातचीत हो ही रही थी कि नागार्जुन जी श्री श्यामू सन्यासी को लेकर पहुँचे। 'मैला आँचल' इन्हें चाहिए। और लीजिए, मोल-भाव शुरु। दो दो प्रकाशक इकटठे - किस दें न दें। वह मुझे अन्दर के कमरे में ले गए। कहा- फैसला तुम्हीं पर छोड़ दूँगा। तुम्हारा पैसा लगा है। कहना-'मैला आँचल' हम ओमप्रकाश जी को ही देंगे। बाहर आकर कहा- "छपवाने में सारा पैसा लतिका जी का खर्च हुआ है, सो यही जाने, किसे देंगी।" मैंने फैसला सुनाया तो नागार्जुन जी दुखी हुए। सन्यासी जी दुगनी रायल्टी देने पर तैयार हो गए, लेकिन मैने कहा- "जो हो गया, हो गया।" और रात को ओमप्रकाश जी ने बची प्रतियों का बंडल बाँधा, रिक्शे पर लादा, स्टेशन चले गए। इस तरह वह उपन्यास लोगों के सामने आया। 1973 में दिल्ली गए। डा आत्मप्रकाश ने इलाज किया। कहा आपरेशन करवा लीजिए। वापिस आए तो चीर-फाड़ के डर से फिर वहाँ नही गए। 4 नवम्बर को घर जाने लगे। मैंने कहा -"आज गुरुवार है, यात्रा पर निकलना शुभ नहीं।" "घर जाने में यात्रा का शुभ अशुभ कैसा?" कहकर मुझे तो चुप कर दिया, लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ था। अच्छे बुरे का योग मानने वाले उनको आज यह कैंसी झक सवार हो गई? शुभ अशुभ बहुत मानते थे। घर गए तो चुप्पी लगा दी- न चिट्ठी न पत्री। जैसी पुरानी आदत थी। किसी ने आकर खबर दी, गाँव में बुरी तरह बीमार है, फार्बिसगंज लाया गया है खून चढ़ाया जा रहा है। बाद को टैक्सी में पटना लाए गए। देखा- स्लाइन की बोतलें साथ लगी हैं, साथ में डाक्टर, कम्पाउण्डर, घर का नौकर, दो एक और लोग। पेट कड़ा हो गया था, पाखाना-पेशाब बन्द। डाक्टर ने कहा है "तुरंत आपरेशन।" तो मन में हुआ इतनी जल्दी आपरेशन क्यों? थोड़ा ठहर लेते हैं। 1969 में भी हालत ऐसी ही हो गई थी- लगातार तीन दिन, तीन रात हिचकी आती रही, खून-ग्लूकोज चढ़ाया गया तो ठीक हो गये। इस बार भी मैंने ग्लूकोज चढ़्वाया तो पेशाब हुआ। लगा ठीक हो रहे हैं। पर होमोग्लोबिन बहुत कम था। डाक्टर ने कहा " होमोग्लोबिन सौ प्रतिशत हो जाए तब आपरेशन करेंगे।" हीमोग्लोबिन ठीक हुआ तो आपरेशन की तारीख तय कर दी गई। चुनाव की घोषणा हो चुकी थी, सो कहा- अब चुनाव के बाद ही। आपरेशन की तारीख से पहले अस्पताल से भागकर डेरे आ गए। काफी हाऊस जाना, चुनाव-कार्यालय में बैठना। चुनाव को लेकर बहुत उत्साहित थे। चार दिनों तक यह सब चला और फिर पाँचवे दिन उल्टी शुरु। फिर अस्पताल पहुँचाया गया। आपरेशन से बहुत डरते थे, सो इरादा था किसी तरह छुटकारा मिले, लेकिन कष्ट बढ़ा तो कहा- "नहीं, अब करा ही दूँगा।"

डाक्टर से 24 अप्रैल की तारीख तय कर दी। 24 तारीख गुरुवार था। मैंने याद दिलाया तो बोलें- "कोई बात नहीं, हो लेने दो। मुझे कुछ नहीं होगा।" ऊपर-ऊपर बुलन्दी थी लेकिन अन्दर ही अन्दर नर्वस हो रहे थे। सुबह में कहा-" कोकाकोला पीऊँगा।" मैंने मना किया। "कोकाकोला पी लेने में क्या है? आपरेशन में तो पेट चीर कर डाक्टर निकाल ही देगा।" फिर भी मैंने नहीं दिया तो बोले-"रामवचन जी को कह दिया है, आइसबैग ले आने को। कोकाकोला उसमें रखना, होश आने पर पीऊँग़ा।" और होश क्यों कर आता? सप्ताह से ज्यादा बेहोशी की हालत में गुजर गए तो एक दिन कोकाकोला की दो चार बूँदे मैंने होठों पर टपकाई। वे इधर उधर होकर फैल गई। उसके खाने पीने की बच्चों वाली जिद। क्या कहूँ? दो चार दिन बीमार होकर उठते तो जिद पकड़ लेते- कई दिन हो गए चिकन मँगवाओ। नहीं मँगवाओ तो पथ्य नहीं लूँगा, यह नहीं खाऊँगा, वह नहीं खाऊँगा और न जाने क्या क्या ......... अब सोचती हूँ तो लगता है अब से तैंतीस वर्ष पहले मृत्यु के कगार पर खड़े एक मरीज को मैंने देखा था। उसकी सेवा की थी। यह नहीं कहती कि उसे जीवन दिया था। मैं ऐसा कहने वाली कौन होती हूँ? तब से लेकर आज 11 अप्रैल की 1977 रात तक उसे अनवरत सेती रही और अंतत: वह चला गया। मैं किससे कहूँ कि इतने वर्षों की इस सेवा ने मुझे क्या दिया? जब तक जीवित हूँ, उनकी याद सेती रहूँगी- दो कमरों का यह फ्लैट , दीवारों पर लगी उनकी तस्वीरें, उनके दैनिक उपयोग के सामान और पुस्तकें...... यही सब छोड़ कर तो गए हैं वह - पिछले तैंतीस वर्षों की भुलाई न भूलने वाली यादें। आज भी लोग आते है। दरवाजे की कुण्डी खटकती है लगता है शायद वह ही हों।
"के?".............. पूछती हूँ।
जवाब में "आमि.... आमरा....... जैसे शब्द नहीं होते। अब वह मरीज कभी यह दरवाजा खटखटाने नहीं आएगा। दरवाजा, चाहे तीमारदार लतिका का हो, या खुद फणीश्वरनाथ 'रेणु' का।

नोट- लतिका रेणु जी का फणीश्वरनाथ 'रेणु' जी पर लिखा यह अंतरंग संस्मरण "रेणु का जीवन" किताब से लिया गया है जिसका संपादन किया है "भारत यायावर जी" ने और छापा है "वाणी प्रकाशन" ने। इन सबका शुक्रिया कहते हुए साथ में माफी भी चाहूँगा क्योंकि पोस्ट ज्यादा बड़ी हो रही थी इसलिए कुछ लाईनों को हटाना पड़ा। पर जब से इस संस्मरण को पढ़ा तो तब से बैचेन हो रहा था इसे ब्लोग साथियों से बाँटने के लिए।

एक सूचना- आगे से "जिदंग़ी के रंग" वाली पोस्ट महीने के पहले और तीसरे सोमवार को ही पेश की जाऐगी।

Monday, October 12, 2009

जिंदगी के रंग - मीत जी के संग़

आज मीत जी अपनी "जिंदगी के रंगो" से हमें मिलवा रहे है। 

जिंदगी रंग बिरंगी 


ज़िन्दगी में रंग ही रंग भरे हुए हैं. अगर ये रंग ज़िन्दगी से निकाल दिए जाएँ, तो फिर जीवन का मतलब ही कुछ नहीं रह जायेगा. इन्हीं रंगों को हम दर्द, ख़ुशी, गम, आँसू, और संघर्ष जैसे नामों से पुकारते हैं.....  हर इंसान की ज़िन्दगी में कभी ना कभी ऐसा मोड़ आता है जब वो अपने जीवन में हो रही घटनाओ के सामने मजबूर सा महसूस करने लगता है. उस पल उसे लगता है कि उसने यह जन्म लिया ही क्यों? लेकिन फिर उसी पल एक नयी तुलिका उसके जीवन में एक नया रंग भर देती है. और वह उसी रंग से अपनी जिदंगी की पेटिंग्स में खुशियों के रंग भरने लगता है.

संघर्ष का रंग- कोशिश करने वालों का साथ भगवान भी देता है.

जब मैं रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा था. एक नौकरी की तलाश के लिए सुबह घर से निकल जाना और शाम को खाली हाथ लौट आना. रोज की यह दैनिकचर्या मुझे अंदर ही अदंर घुन की तरह खाए जा रही थी. मम्मी पापा के चेहरो पर उदासी का रंग देखा नही जाता था. शायद ज़िन्दगी के दुखों ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए थे. पता नही क्या क्या सोचते हुए पूरी रात यूँ ही बीत जाती थी. और फिर सुबह वही नौकरी की तलाश के लिए दिल्ली की गलियों में भटकना. पर कुछ दिनों के बाद दिल्ली पुलिस की भर्ती की सूचना का दीपक सूरज सा उजाला लेके आया. मैंने दिल्ली पुलिस भर्ती के लिए फार्म भर दिया. मन ही मन में खुद को हर पल पुलिस वर्दी में देखने लगा. रोज सुबह उठकर दौड़ने जाने लगा. पर एक दिन मुसीबत से भरी बिजली फिर से गिर पड़ी. मेरे फिजिकल टेस्ट से कुछ दिन पहले ही प्रेक्टिस के दौरान दौड़ते समय मेरे पांव में मोच आ गयी. मुझे लगा की जैसे भगवान मेरे साथ यह सब जानबूझकर कर रहे हैं. मैंने गुस्से में प्रेक्टिस बँद कर दी. टेस्ट में अब 5 दिन बाकि थे. एक दिन मैं घर से टहलने के लिए निकला. घर के सामने ही काफी बड़ा पार्क हैं, मैं पार्क में जाकर बैठ गया, वहाँ कुछ बच्चे खेल रहे थे, उन्हीं को देखने लगा. कुछ दी दूरी पर एक लड़की अपनी माँ के साथ बैठी थी. उस लड़की के पाँव में कुछ तकलीफ थी, क्योंकि वो ठीक से चल नहीं पा रही थी. शायद यह परेशानी उसे जन्म से थी. मैं भगवान को कोसता हुआ अपने टेस्ट के बारे में सोच रहा था. तभी कुछ २-३ उच्चकों (अफीमचीयों) ने उस लड़की की माँ का मंगलसूत्र खींचा और वहाँ से भागने लगे. मैं देख कर हैरान रह गया कि जो लड़की ठीक से चल भी नहीं सकती थी. वो मुश्किल से भागी और एक को पकड़ लिया. कुछ पल के लिए हाथापाई भी हुई। यह देखकर आसपास के लोग मदद के लिए आ गए. कुछ देर बाद पुलिस भी आ गई और चोर उच्चके को अपने साथ ले गई. शाम को मैं फिर से पार्क गया. वो लड़की और उसकी माँ अब भी टहलने आये थे. मैंने उस लड़की के पास जाकर उस से बात की. मैंने कहा की आपको डर नहीं लगा अगर वो चोर आपको नुकसान पहुँचा देता तो? वो बोली- नुक्सान पहुँचा देता तो पहुँचा देता. मैंने कहा "आप मदद के लिए शोर मचा सकती थी." वो बोली- भगवान भी उसी की मदद करता है, जो कोशिश करता है. मैंने कोशिश की और देखो भगवान ने मेरी मदद की. वो देखो मेरी माँ के गले में मंगलसूत्र .... उसके उन शब्दों ने मेरी सोच को ही बदल दिया. अब वही पार्क था, वही लड़की थी, वही उसकी माँ थी और उसकी माँ के गले में उस लड़की के संघर्ष द्बारा वापस दिलाया हुआ मंगलसूत्र चमक रहा था. साथ ही मैं भी वही था लेकिन अब मेरे मन में वो भावनाएं नहीं थी, जो सुबह तक थी. मैं मन ही मन निश्चय कर चुका था कि बेशक दौड़ में अंतिम ही क्यों ना आँऊ, पर दौडूंगा जरुर. मैं दोड़ा और छ्ठे स्थान पर भी आया। मुझे दौड़ते वक्त पाँव में बेहद दर्द हुआ, लेकिन दौड़ में छठा स्थान प्राप्त करने के बाद भी जो अनुभूति, जो एहसास, जो ख़ुशी आज तक मेरे दिल में बसी है वो शायद मरते दम तक यूँ ही रहेगी और साथ में उस लड़की द्वारा कही गयी बात भी कि - भगवान भी उसी की मदद करता है, जो कोशिश करता है. मैंने कोशिश की और देखो भगवान ने मेरी मदद की. और ज़िन्दगी का एक रंग और देखिए कि आज में एक पुलिसवाला ना होकर एक डिजाइनर हूँ.


शब्दों का रंग-सूरज का टुकड़ा


"तोड़ के सूरज का टुकड़ा,
ओप में ले आऊं मैं!
हो जलन हांथों में, तो क्या!
कुछ अँधेरा कम तो हो..
                         मीत


हँसी का रंग- एक युवराज इधर भी 

मोरी गेट के क्रिकेट ग्राउंड से लगा हुआ एक गर्ल्स इंजीनियरिंग कालेज है. अपने २-3 मैच से ही मैंने वहाँ युवराज की तरह काफी नाम कमा लिया था :) लड़कियाँ मुझे पहचानने लगी थी " यही है वो जिसने उस दिन ८० गेंदों में ११९ रन बनाये थे." एक सुन्दर सी लड़की की सुरीली आवाज कानों में पड़ी थी. उस दिन भी हमारा मैच था. पहले फिल्डिंग करनी थी, मैं थर्ड मेन पर फिल्डिंग कर रहा था, उस दिन भी लड़कियाँ हमारा मैच (खासकर मेरा मैच) देखने के लिए ग्राउंड की दीवार पर बैठी थी. उस दिन ग्राउँड में बरसात की वजह से जगह जगह काफी कीचड़ था.... जहाँ मैं फिल्डिंग कर रहा था वहाँ भी छोटे-छोटे गड्ढों में कीचड का पानी था. मेरी हर फिल्डिंग पर लड़कियाँ तालियाँ बजा रहीं थी. तभी मेरे पास एक बहुत मुश्किल कैच आया जिसे मैंने ना जाने कैसे लपक लिया...लड़कियाँ उछल-उछल कर मेरे लिए तालियाँ बजा रही थी और वेव्स कर रही थी. मैं भी ख़ुशी से उन्हें वेव्स करते हुए पीछे की ओर चल रहा था, मैं वेव्स करते हुए भूल गया कि ग्राउंड में पानी भरा हुआ है कई लड़कियाँ मुझे इशारे से समझा भी रहीं थी पर मैं अति उत्साह में ध्यान ही नहीं दे पाया और कीचड़ से भरे हुए पानी के गड्ढे में गिर गया.. मेरी पूरी सफेद ड्रेस कीचड़ से सन गई...और चारो तरफ सब हँसने लगे. वही बैठी लड़कियों की हँसी जो फूटी बस पूछो मत. शायद उनकी हँसी की आवाज आप तक भी पहुँच रही होगी......

मीत जी के ब्लोग का डाक पता तुम्हारा मीत

Monday, October 5, 2009

जिंदगी के रंग अनिल जी के संग।

आज अनिल जी अपनी "ज़िदगी के रंगो" से हमारी मुलाकात करा रहे हैं।


जीने के लिए साँसों की जरूरत होती है, हर एक नया पल जीने के लिए आपको नयी साँसे चाहिए और अगर आपको किसी एक ऐसी छोटी सी जगह बँद कर दिया जाए जहाँ साँस लेने के लिए कोई आवागमन न हो, उस पर से एक दो महीने के बाद बारीक छेदों को भी धीरे धीरे बंद कर दिया जाने लगे तब या तो आप हार मानकर मौत को गले लगा लो या फिर उसमें नए सुराख बना लो या पुराने बंद सुराखों को पूरी ताकत से खोल दो.

संघर्ष का रंग : "हार को जीत में बदलने के लिए डटे रहो"


5 साल पहले मेरे लिए भी ऐसा ही हाल था, हाँ ठीक बिल्कुल ऐसा ही. अचानक जिंदगी ने करवट ली और सब कुछ बदल गया. मेरे साथ बस माँ थी, भाई और बहन थे. वो मेरे एम.सी.ए. का अंतिम वर्ष था. और फीस भरने के लिए बस 15 दिन शेष थे, जिनमें से 10 दिन बैंक मैनेजर के सामने लोन के लिए गिड़गिड़ाने में और सगे सम्बन्धियों के मुँह फेरने में जा चुके थे. मैंने भी   सोच लिया था कि चाहे जो हो जाए हार नहीं मानूँगा. फीस के इंतज़ाम के सिलसिले में मैं अपने एक पुराने दोस्त के पास जाने का कह कर घर से सर्दियों की गुनगुनी धूप में पैंट और शर्ट में निकल गया. जब आगरा पहुँचा तो जिस दोस्त के घर गया था उसके पिताजी का तबाबला हो गया और वो बनारस पहुँच गए थे. उनके पड़ोसियों से उनका पता मालूम किया तो बस इतना पता चला कि दोस्त के पिताजी बनारस के फलाँ पुलिस स्टेशन में हैं. रात के अंधेरे ने अपनी दस्तक देना शुरू कर दिया था. मेरे पास अब एक फूटी कौडी नहीं बची थी. अचानक से मेरे कदम आगरा के रेलवे स्टेशन की ओर मुड़ गए, खाली पेट और खाली जेब के साथ में मरुधर एक्सप्रेस में चढ़ गया जो बनारस जा रही थी. सर्दियों की ठंडी रातों का ट्रेन के जनरल डिब्बे में कैसा एहसास होता है ये मुझे उस रात पता चला जब ठिठुरते-काँपते हुए हाथ पैर और कपड़ो के नाम पर शर्ट-पेंट. मन ही मन ख्याल आता कि घर से गर्म कपड़े पहन कर क्यों ना चला. जब रात को ठंड़ बर्दाश्त से बाहर होने लगी तो सीट के नीचे अखबार बिछा कर लेट गया. चलती हुई ट्रेन की आवाज़ के साथ जब बदन का कोई हिस्सा ट्रेन के लोहे को छू जाता तो जान सी निकल जाती और उस पर से ट्रेन की खुली खिड़कियों से आती हुई हवा. वो रात थी कि बीतने का नाम ही नहीं ले रही थी. जब अगले रोज़ बनारस के रेलवे स्टेशन पर उतरा तो मुँह में जाने के लिए बस पानी ही था जो मुझे सबसे पहले नसीब हुआ. स्टेशन से बाहर निकल कर उस पुलिस स्टेशन का पता किया जो कि वहाँ से 6-7 किलोमीटर दूर था. वहाँ से तेज़ क़दमों से चलता हुआ मैं उस थाने जैसे तैसे पहुंचा, वहाँ मालूम करने पर पता चला कि सिंह साहब तो दूसरे थाने में चले गए हैं जो वहाँ से 8-9 किलोमीटर दूर था. धक्के खाता हुआ मैं उस थाने पहुंचा और वहाँ मालूम करने पर पता चला कि सिंह साहब तो अपने घर पर होंगे इस वक़्त. उनका घर वहाँ से करीब 4-5 किलोमीटर रहा होगा. कदम ठीक से साथ नहीं दे रहे थे. बुरी तरह से थक गया था बीच रास्ते में कुछ सीढियां थी उन पर बैठ गया. सर को अपने घुटनों में झुकाए. पास ही आकर एक साधू बैठ गया और अपने थैले से निकाल कर कुछ खाने लगा. मेरी नज़र उस पर गयी तो उसने प्रसाद के नाम पर मुझे दो लड्डू दिए. जो उस वक़्त मेरे लिए अमृत सामान थे.कुछ देर बैठे रहने के बाद वहाँ से उठ मैं गिरता पड़ता अपने दोस्त के घर पहुँच गया. उसे मैंने अपने घर के हालात, उन हालातों की वजह बताई और अपने आने का कारण भी बताया. उसने मुझे अगले रोज़ ना जाने कहाँ से लाकर 20,000 रुपये दिए. जो मेरे लिए एक बहुत बड़ी मदद थी. अगले रोज़ जब लौटा तो उसने एक मोटा कम्बल और एक स्वेटर मुझे दिया. इन चंद दिनों के संघर्ष ने मुझे ये सिखा दिया था कि हार को जीत में बदलने के लिए डटे रहना और संघर्ष करते रहना बहुत जरूरी है.
शब्दों का रंग : संघर्ष और साँसे साथ साथ चलती है। 

 हार को जीत में बदलने के लिए
संघर्ष करते रहना उतना ही जरूरी है
जितना कि साँस लेते रहना"
                       अनिल कान्त  

हँसी का रंग : मिश्रा जी क्या मैं हँस सकता हूँ

हम छटवीं कक्षा में पढ़ते थे. पी.टी. के अध्यापक मिश्रा सर जो कि उप प्रधानाचार्य की हर बात में बिना सोचे समझे हाँ में हाँ मिलाते थे. परीक्षाएं चल रही थीं. कुछ छात्र परीक्षाओं में पानी पीने और मूत्राशय के बहाने नक़ल करने की कोशिश करते. हर कमरे में उप प्रधानाचार्य ने आकर कहा कि मेरी बिना अनुमति के किसी को भी कोई अनुमति न दी जाए.  संयोगवश हमारे कमरे में मिश्रा सर थे. कुछ देर बाद एक लड़के को जो कि दोनों हाथ से लिख सकता था, उसको ना जाने क्या सूझी. वो खड़ा होकर पूँछने लगा कि सर क्या मैं अब बायें हाथ से लिख सकता हूँ. मिश्रा जी ने बिना सोचे समझे बोल दिया कि अभी पूँछ कर आता हूँ और बाहर निकल गए. उनके बाहर जाते ही पूरी क्लास जोर से हँस पड़ी.( अब आप भी हँसने के लिए ये मत कह देना कि मिश्रा जी से पूँछकर आते है।) 


कैसे लगे अनिल जी की ज़िंदगी के रंग। अगर आपको इनकी जिंदगी के और भी रंग देखने है तो मेरा अपना जहान पर घूम आईए।

Monday, September 28, 2009

ज़िंदगी के रंग - अमिताभ जी के संग।

आज अमिताभ जी अपनी "ज़िदगी के रंगो" से हमें रु-ब-रु करा रहे हैं।


जीवन का नाम ही संघर्ष है। जो प्रकृति प्रद्त्त सनातन है। इसलिये संघर्ष कब किसका खत्म हुआ जो मेरा होगा। हाँ, इसके रूप में समय के साथ बदलाव आते रहे। पहले खोने के लिये कुछ नहीं था तो संघर्ष में अपना शतप्रतिशत झौक देता था, आज खोने के लिये बहुत कुछ है सो फूँक फूँक कर कदम रखना ही बुद्धिमानी है। आप देखिये कि यह संघर्ष का ही परिणाम है जो आज थोड़ा इत्मिनान से बैठ कर "ज़िंदगी के रंग" के इस नये मँच का श्री गणेश करने लायक हुआ हूँ। जीवन में घटनायें तमाम हैं जो प्रेरणायें बनीं। मुझे लगता है घटनायें ही आदमी को आदमी बनाती हैं। 

संघर्ष का रंग-"बाबु पीठ नहीं दिखाने का" 

बात लगभग 20 साल पहले की है जब मैं मुम्बई आया था। क्यों, कैसे आया? इसके पीछे की कहानी भी नाट्कीय है किंतु वो फिर कभी। दो महीने से एक फिल्मी पत्रिका में बतौर रिपोर्टर कार्य कर रहा था, किंतु मेहनताना नहीं मिल रहा था। रोज़ एक उम्मीद कि आज मिलेगा, किंतु खाली हाथ ही लौटता। जेब में महज 10 रुपये शेष रह गये थे, पिछले तीन दिनो से भूखा था। अपनी भूख और मेहनताने की आस दोनो लगभग मुझे तोड़ती जा रही थी। सुबह से रात हो जाती, खूब लिखता-पढ़ता काम करता, दौड़ता-भागता। किंतु आर्थिक रूप से नतीजे में सिफर ही हाथ लगता। अब अपने शहर लौट जाने का ख़्याल सिर चढ़ने लगा था। एक रात कोई 9 साढ़ॆ नौ बज रहे होंगे मैं ऐसे ही खाली हाथ, थका-हारा, लगभग पस्त हाल में लौट रहा था। 10 रुपये जेब में थे, आज "पंचम पुरी"  (वीटी स्टेशन के सामने सस्ता किंतु फेमस भोजनालय, अब काफी अच्छा निर्माण हो चुका है और थाली की कीमत भी ज्यादा हो गई है, तब लगभग 10 रुपये में थाली मिल जाया करती थी) होटल में डट के खाना खाऊँगा और ट्रेन में बिना टिकट बैठ कर घर लौट जाऊँगा, ख़्याल कर फुटपाथ से गुजर रहा था कि एक कोई 18-19 साल की लड़की एक कोने में बैठ सुबक रही थी। सुन रखा था, इस तरह की लड़कियों और भिखारियों के बारे में कि इनसे बच के रहना। सो अनदेखा कर जाने लगा। फुटपाथ खाली था, उसने पीछे से आकर मेरी शर्ट पकड़ बड़े कातर भाव से देखते हुए कहा 'बाबु कुछ पैसा दे दे।' मैने झिड़कते हुए शर्ट को छुडाया और आगे बढ़ गया। वो पीछे-पीछे। कुछ दूर ऐसा ही चला अंत में मैने डाँटते हुए कहा-'नहीं है पैसा।' वो चुपचाप फिर वहीं जाकर बैठ गई और सुबकने लगी। पता नहीं अपने भोले और नरम दिल की वजह से कुछ आगे जाकर मेरे कदम रुक गये और मैं उसके पास जाकर बोला-' कोई काम वाम नहीं करती क्या, क्यों माँग रही है पैसा, मैं खुद 3 दिनों से भूखा हूँ तो क्या पैसा माँग रहा हूँ?' वो कुछ नहीं बोली। मैने अपनी जेब से वो आखिरी 10 रुपये निकाल कर उसके हाथों में रख दिये और कहा- 'ये ले, और कुछ अच्छा काम करना शुरू कर, भीख मत माँग।' उसने रुपये लेते हुए सामने चल रहे निर्माण कार्य की ओर इशारा करते हुए कहा, 'काम ही करती हूँ बाबु, 5 रोज़ से काम रुका हुआ है, मेरा बाप बीमार है दवा लेनी थी और कोई पैसा नहीं दे रहा, सेठ कहता कि आज लेना, कल लेना। वो देख मेरा बाप वहाँ लेटा है..। 'मैं चुपचाप देखने लगा। उसने अपना बोलना जारी रखा, 'बाबु कल तुझे तेरा पैसा लौटा दूंगी...। 'मैने कहा-' जरुरत नहीं है इसकी, तू रख।' उसने कहा-'बाबु आज और भूखा रह लेना।' मैंने आश्चर्य से उसे देख कर पूछा-'तुझे क्या पता मैं भूखा हूँ।' तो वो हँसते हुए बोली- 'अभी तो तू कह रहा था। तुझे भी पैसा नहीं मिला है न?' उसने पूछा, तो मैंने भी कह दिया-'हाँ, नहीं मिला, और अब तेरी ये बम्बई छोड़ कर जा रहा हूँ।' उसने कहा- 'बाबु हार गया क्या? बाबु पीठ नहीं दिखाने का, पीठ दिखायेगा ना तो मरियल सा कुत्ता भी तुझे काट लेगा, समझा क्या।' मैं हैरत से उसे देखने लगा और हँसते हुए बोला- 'बड़ी बात बोलती है, पढ़ती लिखती भी है क्या?' 'बाबु, फीस होती तो पढती भी।' उसने कहा। 'चल अब जाता हूं, अपने पिता का ख्याल रख।' उसने भी दूसरी दिशा में जाते हुए कहा- 'छोड़ कर भागना मत बाबु, कल फिर पैसा माँग कर देखना अपने सेठ से। 'मैं हँस दिया, और कहने लगा- 'मैं माँगता नहीं..और हाँ कल फिर आऊँगा..2000 रुपये मिलने है, यदि मिले तो तुझे 1000 दूँगा, पढ़ने के लिये, समझी।' उस दिन मैं फिर भूखा रहा और इस उम्मीद के साथ कि आज तो पैमेंट मिल ही जायेगा, तब डट कर अच्छी होटल में खाना खाऊँगा। दूसरे दिन फिर अपने आफिस गया। किंतु फिर वही निराशा। अबके सोच लिया नहीं करुँगा यहाँ काम। दिमाग भारी था, थकान और आस की टूटन। बोझिल मन। लौट रहा था कि सामने वही लड़की आ धमकी जो कल रात मिली थी। 'बाबु ला मेरे एक हज़ार रुपये।' मैं हक्काबक्का उसे देखने लगा, कुछ बोलता इतने में उसने ही मेरी हालत देख कर कहा- 'बाबु ले तेरे 10 रुपये, पहले खाना खा। और मायूस मत हो। जब कमाये तब मुझे पढ़ने के लिये एक हजार दे देना..समझा।' मैने मना करते हुए कहा, 'नहीं लेना मुझे तेरे पैसे.., लेकिन पीठ नहीं दिखाऊँगा..समझी न।' दोनों हँसने लगे। उसने कहा- 'बाबु..तेरे को बुरा नही लगे तो चल अपन साथ में खाना खाते हैं..बाद में तू चले जाना...।' मैंने  पूछा- 'तेरे पिता की हालत कैसी है?' उसने कहा-'ठीक है। और आज मुझे मेरे सेठ ने पैसा भी दे दिया, इसिलिये तो कह रही हूँ चल खाना खायेंगे। बिन्दास रहने का बाबु। लड़ने का। ' भूख से  हालत खराब थी ही, मगर मैंने उसे मना कर दिया और कहा- 'मैं तुझे खिलाऊँगा, कुछ दिन रुक तो। और देखना तुझे पढ़ने के लिये भी पैसा दूँगा ' मैं उसे छोड़ चला गया। फिर कुछ ऐसा रहा कि काम की तलाश और काम की व्यस्तताओं ने मुझे जल्दी उस रास्ते पर जाने नहीं दिया जहाँ वो मिली थी। मगर उसकी बात कानों में गूंजती रही, "बाबु पीठ नहीं दिखाने का।" काम मिला। पद मिला। प्रतिष्ठा मिली। पैसा मिला। किंतु वो उसके बाद से आज तक नहीं मिली। आज भी गुजरता हूँ उस रास्ते से कि कहीं वो मिल जाये मगर उसकी आवाज़ ही कानों से टकराती है-पीठ मत दिखाना। आज तक और अभी तक भी लड़ता हूँ। थकता हूँ। हारता हूँ। मगर पीठ नहीं दिखाता। मैं समझता हूँ घटनायें आदमी को जिन्दा रखती हैं। हौसला देती है। उसे संघर्ष करने की नई दिशायें देती हैं। हारकर बैठ जाना, आदमी की फितरत नहीं है। फितरत तो है कि 'पीठ मत दिखाना'। इसे मैं उस दिन का संयोग मानूं? तो मुझे 'वालतेर' का वाक्य याद आ जाता है।

शब्दों का रंग- "संयोग" 
 
"संयोग एक अर्थहीन शब्द है, अकारण कुछ भी नहीं हो सकता।"
                                                                                     -वालतेर



हँसी का रंग- "गलती इन ढोरों की ही है।"

 अल्हड़, फक्कड़, अलमस्त, हुडदंगी जैसा मस्त जीवन था कालेज जमाने तक। मैं जितना बदमाश, उतने ही कायदे, अनुशासन वाले मेरे बड़ॆ भाईसाहेब। वो साथ रहते तो मुझे शराफत की चादर ओढ़ कर रहना पड़ता, अन्यथा डाँट सुनता। उन दिनो देवास में था जब बड़े भाई मुझसे मिलने आये थे, और मैं उन्हें छोड़ने रेलवे स्टेशन जा रहा था। रास्ते में कुछ गायों का झुंड मिला, जिसमें एक गाय ने अपनी आदतानुसार मुझे कीचड़ सनी पूँछ मार दी। बस फिर क्या था, भैया ने कहना शुरू कर दिया, चलना भी नहीं आता, अरे..देख कर नहीं चल सकते क्या?, इतने बड़े हो गये हो कोई तमीज़ नहीं चलने की, पैर कहीं जाते हैं तो हाथ कहीं जाते है, कायदे से सीधे चलना भी नहीं आता, आदि आदि। मैं चुपचाप उनके साथ चला जा रहा था। क्योंकि कुछ कहता तो और डाँट सुनता। स्टेशन तक वे मुझे समझाते रहे कि...अचानक एक भैंस उनके पास से गुजरी और उसने उन्हें अपनी गोबर से सनी पूँछ मार दी। एकदम से वो चुप हो गये किंतु मुझे तो हँसी छूट गई, बावज़ूद अपने मुँह को दबाये स्टेशन की सीढियां चढ़ने लगा। उन्होने मुझे देखा और कहा- 'गलती इन ढोरों की ही है।' उन्हें विदा किया और स्टेशन के बाहर आकर सीढ़ियों पे बैठ बहुत हँसा। आज भी हम जब साथ होते हैं तो वो वाक्या याद कर बहुत हँसते हैं।

सभी ब्लोगर साथियों को दशहरा की बधाई।

नोट- कैसे लगे अमिताभ जी की ज़िंदगी के रंग। अगर आपको इनकी लेखनी के रंग देखने है तो अमिताभ -कुछ खास ब्लोग पर घूम आईए।

Thursday, September 24, 2009

एक सूचना आप सभी साथियों को।

"जिदंगी के रंग"
 जब जान लेती थकान के बाद भी आपको नींद ना आए तो ख्याल जरुर आ जाते हैं। और इन्हीं ख्यालों की गलियों में आवारागर्दी करते हुए आप कब सो जाते है पता ही नहीं चलता। इन्हीं गलियों में पिछले दिनों मुझे एक ख्याल मिला जिससे मिलकर बहुत ही अच्छा लगा। फिर सोचा आप साथियों से भी साँझा कर लूँ। हमारी जिदंगी के चारों तरफ पता नही कितने रंग बिखरे हुए है। बस उन्हीं रंगो में से तीन रंगों को मिलाकर एक रंगीन पोस्ट बनाई जाऐगी। पहला रंग होगा संघर्ष का, दूसरा रंग हँसी का, और तीसरा रंग साहित्य का।
                                          पहला रंग होगा संघर्ष का।

हम सब की जिदंगी में संघर्ष ही संघर्ष है। बस इन्ही संघर्षों में से किसी एक संघर्ष का वर्णन होगा जिसको हम आज भी याद करते है। और वही संघर्ष किसी ना किसी के लिए प्ररेणा स्त्रोत बन जाते है इंसानी संघर्ष के दिनों में। और इंसान मुशीबत के सामने उससे मुकाबला करने के लिए फौलादी दीवार की तरह खड़ा हो जाता है। 




                                                     
दूसरा रंग होगा हँसी का

हम सब की जिदंगी में कभी ऐसा क्षण भी आता है जब  हमारे साथ घटी किसी घटना पर हम सब हँसे हो और आज भी याद करके हमको हँसी आती हो। वही हँसी हम सब ब्लोगर साथियों के चेहरे पर भी आ जाए। और हम सब पेट पकड़कर खूब हँसे।  



अब तीसरा रंग साहित्य का।
हम सब पढ़ते है और जो अच्छा लगता है उसे दिमाग के किसी कोने में रख देते है। और जब कभी कुछ पल खाली मिलते है तो उनसे मुलाकात करते है। कभी कभी साँझा कर लेते हैं किसी के सामने। चाहे वो कोई सूक्ति हो, चाहे वो किसी कविता की चार लाइनें हो, या फिर किसी कहानी और उपन्यास का एक डायलाग।
ओड़क ता टूट जाणे, सारे रिश्ते नाते।
फेर क्यों न बणा, अम्बर दा तारा टूंटा? 
                                 श्री चरणदास सिंधू


हर सोमवार को किसी ना किसी ब्लोगर के दिल और दिमाग से मुलाकात की जाऐगी और आप साथियों के सामने पेश की जाऐगी। पोस्ट का टाईटल होगा "जिदंगी के रंग" अब बताईए साथियों कैसा लगा ये ख्याल। आप सभी साथी अपनी अपनी राय से जरुर अवगत कराए । और ऊपर के फोटो अमिताभ जी की पोटली में से चुराए गए हैं।

Wednesday, September 9, 2009

रिश्तें नाते

रिश्तें

रिश्तों के धागे उधड़ने लगे हैं
ना जाने कैसे रिश्तें बनने लगे हैं।

खेले थे जिनकी गौद में कभी
अब वही भारी होने लगे है।

सोचा था बुढ़ापे में मिल जाऐगी दो रोटी
अब तो रोटी के साथ ताने भी मिलने लगे हैं।

कैसी अजब समय की घड़ी है
पैसे रिश्तों को सीँचने लगे है।

कल मिला "सुशील" रास्तें में, बोला
"अब तो माँ बाप के भी बँटवारे होने लगे हैं।"


कुछ दिनों से कुछ घटनाओं को देख कर मन विचलित सा था। सोच रहा था आप साथियों से साँझा कर लूँ। पर दिमाग में शब्द घूम रहे थे पर कागज पर उतरने से मना कर रहे थे। पर कल रात 1 बजे अचानक ही ये शब्द निकलते चले गए और ये तुकबंदी बन गई। पहले सोच रहा था एक लेख लिखूँगा इन घटनाओं पर, पर लिख नही पाया। उससे पहले ही ये तुकबंदी बन गई। देखिए वो लेख कब आता है?

नोट- नैना की पोस्ट को भी देखा जाए जोकि सीधे हाथ पर सबसे ऊपर हैं।

Wednesday, August 19, 2009

दो बीघा का किसान

किसान

मैं दो बीघा का किसान
पालता तीन मवेशी, पाँच इंसान
एक कच्चा मकान टूटा सा
जिसमें खड़ा एक पेड़ बुढ्ढा सा
रामजी हमारे रुठे है
खेत हमारे सूखे है
कुएँ सूखने लगे
चूल्हे बुझने लगे
चारा खत्म
दाना खत्म
पेट उधारी से भरता है
पंसारी रोज तगादा करता है
पत्नी यह देख रोती है
बच्चों की जबान सोती है
फटी धोती, टूटी जूती में मेरी टाँगे
सूखे खेत का रुख करती हैं
धोक लगाकर अपने देवताओं की
मैं बस यही पुकार करता हूँ
रामजी अगर तुम बरस जाओ
खेत हमारे जी जाऐगे
फसल हमारी खिल जाऐगी
कर्ज की गठरी उतर जाऐगी
सपनो की पतंग आसमान छू जाऐगी

अमिताभ जी रोज कहते कुछ लिखो यार तो जी हाजिर है आपके लिए।

Monday, August 10, 2009

बेटी की बातें

बिल्ली दौड़ चूहा आया

साथियों नैना बेटी ने मेरा नया नाम बिल्ली ही रख दिया है। जब भी मेरे साथ खेलती है बस बिल्ली ही पुकारती है। बिल्ली अब दूसरा गेम खेलते है। बिल्ली अब चीडिया उड़ी,भैंस उड़ी खेलते है। बिल्ली अब चूहा दोड़ बिल्ली आई खेलते है ..........। जैसे ही खेल कर खत्म फिर से वही पापा जी। अजी मेरा नाम ही नही उसने तो अपने चाचा का नाम भी मीना रख दिया है। एक दिन शाम को जब आया तो देखा नैना अपने चाचा को बुढढा( उनके बाल अभी से सफेद होने लगे है) कह रही थी मैंने कहा "बेटा ऐसे नही कहते वो आपके चाचा है।" कहने लगी "पापा जी जब वो मेरे को मोटी बोलेगे तो क्या मैं बुढ्ढा ना बोलूँ। अगर वो मुझे नैना जी कहेंगे तो मैं भी उन्हें चाचा जी बोलूँगी।" खैर उनकी ये लड़ाई ऐसे ही चलती रहती है। जिस बचपन को हम जिदंग़ी की गलियों में भूल जाते है उसे हम अपने बच्चों के बचपन में देखते है। कुछ ऐसा ही है हो रहा है आजकल। उसकी छोटी छोटी बातें, शरारतें, जिद सब देखता सुनता हूँ। कभी देखकर हँसता हूँ। कभी गुस्सा भी हो जाता हूँ। और कभी भावुक हो जाता हूँ। और फिर अपने बचपन को याद करने की कोशिश करता हूँ तो बस दो यादें ही आँखो के पर्दे पर चलती है नर्सरी क्लास की। एक हम बच्चों को खूब सारे बिस्कुट खाने को मिलते थे। दूसरी एक दिन मै पापा जी की घंडी बाँध कर चला गया। मैडम ने देख लिया और घड़ी उतार ली। फिर जो मार पड़ी मम्मी से बस पूछो नही। बस इन दो यादों के अलावा कुछ याद नहीं। पर मैं इसकी खूब सारी यादें संजोकर रख लेना चाहता हूँ। जिस दिन स्कूल गई सब खुश थे क्योंकि घर में और बच्चें नही है और नैना बच्चों के साथ खेलने के लिए कई बार रोती है। कोई बच्चा अगर हमारे घर किसी काम से आ जाए तो समझो उसे वह नही जाने देती है। हमको इस बात की तसल्ली है कि इस बहाने कम से कम बच्चों के संग खूब खेल सकेगी। उनसे खूब सारी बातें भी कर सकेगी। उसकी मासूम सी बातें मेरे दिल को छू जाती है। एक दिन तबीयत ठीक नही थी मैं लेटा हुआ था वो आई और कहने लगी "पापा जी ये लो चने खा लो" मैंने कहा "बेटी मैं बाद में खा लूँगा मेरी तबीयत ठीक है थोडी देर सोने दो" और चने रखकर मेरे पैरों के पास रखी चदर को मुझे उढ़ाने की कोशिश करने लगी। पर मैने कहा बेटी रहने दो मैं खुद ही ओढ लूँगा। यह देख आँखे भर आई। ऐसे ही काफी दिनों पहले मैं पी सी पर बैठा कुछ काम कर रहा था। उसे बेड पर रखा केला नजर आ गया वह उसे उठाकर छीलने लगी। अक्सर उससे केला छिलता नही था पर उस दिन उसने वह केला छील दिया तो मेरे पास आकर बहुत खुश होकर बोली "पापा जी मैंने केला छील दिया मैं बड़ी हो गई।" देखो जिदंगी कैसी है हम बच्चें होना चाहते है और बच्चें बड़े होना चाहते है। सच वो अब बड़ी हो गई है दादी माँ सी बातें करने लगी है। एक दिन इसका चाचा इसके लिए छोटा सा केक ले आया तो मैंने कहा "बेटी मुझे भी दे दो" तो कहने लगी "इसे बड़े नही खाते बच्चें खाते है" और जल्दी जल्दी सारा केक खा गई। जब से स्कूल जाने लगी है मैडम भी हो गई है। अपनी मम्मी से कहती है "मैं मैडम हूँ बताओ ऐ फोर क्या होता है। उसकी मम्मी बोलेगी ऐ फोर आलू होता है।" फिर नैना बोलेगी "अरे बुद्धु ये भी नही आता ऐ फोर एप्पल होता है।" ऐसे ही वो हम सबको पढ़ाती फिरती है। स्कूल जाने के दो तीन बाद उसे छोटे छोटे बाल गीत याद होने लगे। फिर क्या हर रोज एक नया बाल गीत सुनाती है हम सबको। पर सबसे पहले वह अपनी पसंद के दो बाल गीत सुनाती है फिर बाकी के बाद में। तो लीजिए आप भी पढ़िए उसकी पसंद के दो बाल गीत।












बन्दर मामा
देखो आये बन्दर मामा,
कुर्ता ढीला तंग पजामा।
ठुमक-ठुमक कर नाच दिखाते,
माँग-माँग कर पैसे लाते।

चन्दा के घर जाऐगी गुड़िया
चन्दा के घर जायेगी गुड़िया
दूध मलाई खायेगी गुड़िया,
ब्यूटीफुल बन जायेगी गुड़िया।
तारों के संग आयेगा दूल्हा,
चन्दा के घर जायेगी गुड़िया।

सच एक दिन नैना ऐसे ही हँसती खेलती हुई अपने चंदा के घर चली जाऐगी अपने बाबुल का घर छोड़कर। और हमारे पास बस उसकी यादें रह जाऐगी कभी खूब हँसाने के लिए, कभी उसकी याद दिलाने के लिए और कभी क्या अक्सर रुलाने के लिए। इससे पहले कि मेरी आँखे बोलने लगे जल्दी से उसकी एक पहेली का जवाब दीजिए जो वो मेरे से अक्सर पूछती रहती है और उसकी माँ उसे बताती रहती है।
"कटोरे में कटोरा बेटा बाप से भी गौरा" बताओ बताओ जल्दी से सोच कर बताओ। हम चले।

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