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Monday, November 30, 2009

जिंदगी के रंग- नीरज जी के संग


संघर्ष का रंग- उंगली का दर्द 
बचपन के कितने अच्छे होते हैं। इन पंक्तियों को पढ़ते समय हम केवल बचपन की शरारतों को ही याद रखते हैं, संघर्षों को भूल जाते हैं। मेरा बचपन शरारत कम, संघर्षों में ज्यादा बीता है। पिताजी उन दिनों ट्रक चलाया करते थे। महीने-डेढ़ महीने से पहले नहीं लौटते थे। दो - चार दिन रुककर फिर चले जाते थे। घर पर रहते थे हम दोनों भाई और मम्मी। गाँव के बाहरी हिस्से में खेतों को छूता हुआ हमारा घर है। घर का खूंटा कभी खाली नहीं रहा। प्राईमरी स्कूल में पढ़ते थे। घर का और खेतों का सारा काम हम तीनों ही करते थे। दिन कब गुजर जाता पता ही नही चलता था काम करते हुए। हमारे घर में हाथ से चलाने वाली चारा काटने की मशीन (गंडासा) लगी थी। दोनों भाइयों में से एक मशीन में चारा लगाता था और मम्मी उसे घुमाकर चारा काटती थीं। एक दिन गलती से मैंने ज्यादा चारा लगा दिया। मम्मी में इतनी ताकत नहीं थी कि उसे काट दें। उन्होंने कहा -"बेटे, ज्यादा चारा लग गया है। आ, जरा हाथ लगा देना।" उस दिन नन्हे हाथों ने पहली बार मशीन का हत्था पकडा था। जैसे ही घुमाना शुरू किया, अचानक हाथ फिसल गया और हथेली सीधे गंडासे पर जा लगी। अभी तक मशीन घूम ही रही थी कि बाएँ हाथ की छोटी उंगली मशीन में जा फंसी और तुंरत ही कट गयी। मुझे उस समय तो दर्द भी नहीं हुआ। आधी उंगली कटकर नीचे कटे पड़े चारे में गिरकर खो गयी। मम्मी ने तुंरत ही कहा," हे भगवान्! मेरा लाल!!" कहते हुए आधी उँगली ढूंढी। उन्होंने इस घोर संकट में भी धैर्य व हिम्मत बनाये रखी। मेरी उँगली से तो खून निकल ही रहा था। मम्मी ने नल पर ले जाकर दोनों उँगलियाँ धोयीं- मेरी आधी बची उँगली भी और आधी कटी उँगली भी। उन्हें यथास्थान मिलाकर एक कपडे से बांध दिया और गोद में उठाकर गाँव के एकमात्र डॉक्टर के पास ले गयीं। डॉक्टर ने दवाई-पट्टी की। हड्डी नरम होने की वजह से उँगली जुड़ गयी। आज यह बाकी सभी उँगलियों की तरह ही काम करती है। हाँ, कटे का निशान जरूर अभी भी है। जाडों में कभी-कभी इसमें दर्द भी होने लगता है जो उन दिनों के संघर्षों व परिस्थितियों की याद दिला जाता है। 


शब्दों का रंग- सुख-दुख की झोली 
हर यात्री को अपनी झोली खोलकर यात्रा करनी चाहिए, जो न मिले उसका दुःख न करके, जो मिले उसे समेटकर ही अपने भाग्य की सराहना करनी चाहिए। क्योंकि सुख का अभाव कभी दुःख का कारण नहीं बनता, उलटे एक नए, अपरिचित सुख को जन्म देता है। -निर्मल वर्मा, चीडों पर चांदनी 



हँसी का रंग- ना सोऐंगे ना सोने देंगे
मैं और मेरा दोस्त अमित साथ-साथ ही रहते हैं। कमरे में एक ही फोल्डिंग है, इसलिए हममे से एक को नीचे फर्श पर ही बिस्तर लगाना होता है। उस दिन अमित तो फोल्डिंग पर सो रहा था और मैं नीचे पड़ा हुआ था। नींद नहीं आई तो एक शरारत सूझी और मैंने अमित का मोबाइल उठा लिया। देखा कि इसने कौन सी रिंग टोन लगा रखी है- "आने से उसके आये बहार, जाने से उसके जाए बहार।" अलार्म कितने बजे का लगा रखा है- सुबह सात बजे का। तभी मैंने सुबह तीन बजे का 'रिमाइंडर' भी लगा दिया। एक दूसरा रिमाइंडर लगाया आधे घंटे बाद का यानी साढे तीन बजे का, तीसरा रिमाइंडर चार बजे का, चौथा साढे चार का और पांचवां पांच बजे का.................। सभी की टोन भी रिंगटोन वाली ही सेट की- आने से उसके आये बहार। फोन उसके कान के पास रखकर सो गया। तीन बजे गाना सुनकर मेरी आँख खुली। अमित कुनमुनाया और फोन 'काट' दिया। साढे तीन बजे भी गाना बजा और अमित ने इसे भी काट दिया। चार बजे फिर बजा। अमित बडबडाया -"पता नहीं कौन मर रहा है इतनी रात को?" इस बार फोन 'रिसीव' कर लिया और बोला -"हेलो, हाँ जी कौन?...कौन बोल रहे हैं आप?... अबे चुप क्यों है? ... अगर तुझे बात ही नहीं करनी तो फोन क्यों मिलाया? ... कुत्ते कमीने अब फोन मत कर देना। अगर करना ही है तो सुबह दस बजे के बाद करना।" फिर साढे चार वाला रिमाइंडर बजा। इस बार तो उसने 'स्विच ऑफ़' ही कर दिया। सुबह को जब मैं साढे सात बजे उठा तो देखा कि फोन को हाथ में लिए कुछ चेक कर रहा था। बोला -"यार नीरज, पता नहीं, फोन में क्या गड़बड़ हो गयी। साले ने सोने ही नहीं दिया।"





"क्यों, क्या हो गया?"
"पता नहीं, बारह बजते ही अपने आप बजने लगा।"
"अपने आप कैसे बज जायेगा? कोई फोन कर रहा होगा।"
"मैंने भी तो यही सोचा था कि कोई फोन कर रहा है लेकिन अब चेक किया है। किसी की कॉल तो क्या, मिस्ड कॉल तक नहीं है।"
"अबे बावली पूंछ, कहीं तूने बारह बजे का अलार्म तो नहीं भर दिया था?"
"नहीं यार, अलार्म भी सात बजे का ही है, ये देख। चल, अलार्म भी होता तो एक बार ही तो बजता। लेकिन यह तो बार-बार ही बजने लगा। आखिर में स्विच ऑफ़ करना पड़ा।"
"कमाल कर रहा है, इतनी बार बजा, और मुझे पता तक नहीं लगा? किसी और का बेवकूफ बनाना।"
"तुझे कहाँ पता चलेगा। तुझे अपने अलार्म का ही पता नहीं चलता। आज सारी नींद खराब हो गयी। सुबह सवेरे की जो नींद होती है, साले ने सारी ख़राब कर दी।"


सोने के शौकीन और घूमने के आदी नीरज जी के ब्लोग पर भी घूम आईए मुसाफिर हूँ यारों

Monday, November 2, 2009

जिंदगी के रंग- विजय जी के संग

जिंदगी खूबसूरत रंगो से भरी हुई है। हर रंग निराला है, प्यारा है। और हर रंग हर दूसरे से जुड़ा हुआ है जैसे सुख से दुख। इसलिए जिंदगी में संघर्ष के रंग के बाद खुशी का रंग आता है। और जीवन में रस घोल जाता है। आज हम भी आ गए अपनी जिदंगी के रंगो को लेकर।




संघर्ष का रंग : बुर्जुगों की दुआ काम कर जाती है। 

बात बहुत साल पहले की है. जब मैं पढाई किया करता था और किराये के घर पर रहता था. उस घर में अक्सर बिजली नही रहती थी तब मैं रात को स्ट्रीट लाईट  के नीचे बैठकर पढाई करता था. और सपने देखा करता था। ऐसे ही एक दिन मैं पढ़ रहा था तो एक बुढा बाबा आया और मेरे पास बैठाकर बातें करने लगा. हम कुछ बात कर रहे थे. रात को मैं चाय पीने ,पास के मोहल्ले की एक कैंटीन में जाता था . उस दिन उस बुढे के लिए भी चाय ले आया . थोडी देर बाद मैंने ऊपर स्ट्रीट लाईट को देख कर उस से कहापता नहीं मैं अपने घर की बिजली में कब पढ़ पाऊंगा....... उस बुढे ने मेरे सर पर हाथ फेरा और कहा , फ़िक्र न कर बेटा , एक दिन तू इन्ही खम्बों को बिजली बेचेंगा. मैं हंस पढ़ा .....और उससे कहा कि ये होने वाला नहीं है .. बुढे ने हंसते हुए कहाहोंगा. देखते रह, जरुर होंगा. आज करीब २० बरस बाद मैं अपनी कंपनी के बने हुए लाईटिंग स्टिम बहुत से मुनिस्पल कारपोरेशन को बेचता हूँ तो उस बुढे बाबा की याद आ जाती है. और मुँह से ये ही शब्द निकलते है। 


ज़िन्दगी के अपने जादू होते है और सपने यही इसी दुनिया में सच होते है......”



शब्दों का रंग : गाँधी जी के संग|

"Be the change you want to see in the world."
                                           Mahatma Gandhi



हंसी का रंग : इस फिल्म के गायक हम है।

दोस्तों, मेरे जीवन की दो लाइफलाइंस है, एक म्यूजिक और दूसरा कॉमेडी. मैं हर परिस्थिती में कॉमेडी देख लेता हूँ. एक वाक्या बताता हूँ. मैं Mining Engineering कर रहा था. हम सब Civil Engineering की लड़कियों पर खूब मरते थे. मैं तब बहुत अच्छा गाना गाता था. मेरे क्लास का एक बन्दा सिविल की एक लड़की पर मरता था. उसने कहा कि यार मैं Lip-Movement करूँगा, तुम गा लेना. मैं तैयार हो गया. हम लड़कियों के रूम के सामने पहुँच गए और उस लड़की को देखकर गाने लग गाये. “प्यार दीवाना होता है, मस्ताना होता है.........”लड़की दूर थी, वो सोची की यही बन्दा गा रहा है. वो खुश, बन्दा खुश, हमारी टीम खुश. अचानक , इस बन्दे को खांसी आ गयी. वो खांसने लगा, और मेरा गाना चालू ही था. जब तक उसकी खांसी रूकती और मुझे बात समझ में आती तब तक गाने का अन्तरा ख़त्म हो चुका था . और लड़की को सब कुछ पता चल गया था. वो बाहर आई, बन्दे को, मुझे और सारी टोली को खूब खरी खरी बाते सुनाई. और आज उन पलों को याद करता हूँ तो आज भी हँसी छूट जाती है।

विजय जी के ब्लोग का पता- विजय जी की कविताएं

Monday, October 12, 2009

जिंदगी के रंग - मीत जी के संग़

आज मीत जी अपनी "जिंदगी के रंगो" से हमें मिलवा रहे है। 

जिंदगी रंग बिरंगी 


ज़िन्दगी में रंग ही रंग भरे हुए हैं. अगर ये रंग ज़िन्दगी से निकाल दिए जाएँ, तो फिर जीवन का मतलब ही कुछ नहीं रह जायेगा. इन्हीं रंगों को हम दर्द, ख़ुशी, गम, आँसू, और संघर्ष जैसे नामों से पुकारते हैं.....  हर इंसान की ज़िन्दगी में कभी ना कभी ऐसा मोड़ आता है जब वो अपने जीवन में हो रही घटनाओ के सामने मजबूर सा महसूस करने लगता है. उस पल उसे लगता है कि उसने यह जन्म लिया ही क्यों? लेकिन फिर उसी पल एक नयी तुलिका उसके जीवन में एक नया रंग भर देती है. और वह उसी रंग से अपनी जिदंगी की पेटिंग्स में खुशियों के रंग भरने लगता है.

संघर्ष का रंग- कोशिश करने वालों का साथ भगवान भी देता है.

जब मैं रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा था. एक नौकरी की तलाश के लिए सुबह घर से निकल जाना और शाम को खाली हाथ लौट आना. रोज की यह दैनिकचर्या मुझे अंदर ही अदंर घुन की तरह खाए जा रही थी. मम्मी पापा के चेहरो पर उदासी का रंग देखा नही जाता था. शायद ज़िन्दगी के दुखों ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए थे. पता नही क्या क्या सोचते हुए पूरी रात यूँ ही बीत जाती थी. और फिर सुबह वही नौकरी की तलाश के लिए दिल्ली की गलियों में भटकना. पर कुछ दिनों के बाद दिल्ली पुलिस की भर्ती की सूचना का दीपक सूरज सा उजाला लेके आया. मैंने दिल्ली पुलिस भर्ती के लिए फार्म भर दिया. मन ही मन में खुद को हर पल पुलिस वर्दी में देखने लगा. रोज सुबह उठकर दौड़ने जाने लगा. पर एक दिन मुसीबत से भरी बिजली फिर से गिर पड़ी. मेरे फिजिकल टेस्ट से कुछ दिन पहले ही प्रेक्टिस के दौरान दौड़ते समय मेरे पांव में मोच आ गयी. मुझे लगा की जैसे भगवान मेरे साथ यह सब जानबूझकर कर रहे हैं. मैंने गुस्से में प्रेक्टिस बँद कर दी. टेस्ट में अब 5 दिन बाकि थे. एक दिन मैं घर से टहलने के लिए निकला. घर के सामने ही काफी बड़ा पार्क हैं, मैं पार्क में जाकर बैठ गया, वहाँ कुछ बच्चे खेल रहे थे, उन्हीं को देखने लगा. कुछ दी दूरी पर एक लड़की अपनी माँ के साथ बैठी थी. उस लड़की के पाँव में कुछ तकलीफ थी, क्योंकि वो ठीक से चल नहीं पा रही थी. शायद यह परेशानी उसे जन्म से थी. मैं भगवान को कोसता हुआ अपने टेस्ट के बारे में सोच रहा था. तभी कुछ २-३ उच्चकों (अफीमचीयों) ने उस लड़की की माँ का मंगलसूत्र खींचा और वहाँ से भागने लगे. मैं देख कर हैरान रह गया कि जो लड़की ठीक से चल भी नहीं सकती थी. वो मुश्किल से भागी और एक को पकड़ लिया. कुछ पल के लिए हाथापाई भी हुई। यह देखकर आसपास के लोग मदद के लिए आ गए. कुछ देर बाद पुलिस भी आ गई और चोर उच्चके को अपने साथ ले गई. शाम को मैं फिर से पार्क गया. वो लड़की और उसकी माँ अब भी टहलने आये थे. मैंने उस लड़की के पास जाकर उस से बात की. मैंने कहा की आपको डर नहीं लगा अगर वो चोर आपको नुकसान पहुँचा देता तो? वो बोली- नुक्सान पहुँचा देता तो पहुँचा देता. मैंने कहा "आप मदद के लिए शोर मचा सकती थी." वो बोली- भगवान भी उसी की मदद करता है, जो कोशिश करता है. मैंने कोशिश की और देखो भगवान ने मेरी मदद की. वो देखो मेरी माँ के गले में मंगलसूत्र .... उसके उन शब्दों ने मेरी सोच को ही बदल दिया. अब वही पार्क था, वही लड़की थी, वही उसकी माँ थी और उसकी माँ के गले में उस लड़की के संघर्ष द्बारा वापस दिलाया हुआ मंगलसूत्र चमक रहा था. साथ ही मैं भी वही था लेकिन अब मेरे मन में वो भावनाएं नहीं थी, जो सुबह तक थी. मैं मन ही मन निश्चय कर चुका था कि बेशक दौड़ में अंतिम ही क्यों ना आँऊ, पर दौडूंगा जरुर. मैं दोड़ा और छ्ठे स्थान पर भी आया। मुझे दौड़ते वक्त पाँव में बेहद दर्द हुआ, लेकिन दौड़ में छठा स्थान प्राप्त करने के बाद भी जो अनुभूति, जो एहसास, जो ख़ुशी आज तक मेरे दिल में बसी है वो शायद मरते दम तक यूँ ही रहेगी और साथ में उस लड़की द्वारा कही गयी बात भी कि - भगवान भी उसी की मदद करता है, जो कोशिश करता है. मैंने कोशिश की और देखो भगवान ने मेरी मदद की. और ज़िन्दगी का एक रंग और देखिए कि आज में एक पुलिसवाला ना होकर एक डिजाइनर हूँ.


शब्दों का रंग-सूरज का टुकड़ा


"तोड़ के सूरज का टुकड़ा,
ओप में ले आऊं मैं!
हो जलन हांथों में, तो क्या!
कुछ अँधेरा कम तो हो..
                         मीत


हँसी का रंग- एक युवराज इधर भी 

मोरी गेट के क्रिकेट ग्राउंड से लगा हुआ एक गर्ल्स इंजीनियरिंग कालेज है. अपने २-3 मैच से ही मैंने वहाँ युवराज की तरह काफी नाम कमा लिया था :) लड़कियाँ मुझे पहचानने लगी थी " यही है वो जिसने उस दिन ८० गेंदों में ११९ रन बनाये थे." एक सुन्दर सी लड़की की सुरीली आवाज कानों में पड़ी थी. उस दिन भी हमारा मैच था. पहले फिल्डिंग करनी थी, मैं थर्ड मेन पर फिल्डिंग कर रहा था, उस दिन भी लड़कियाँ हमारा मैच (खासकर मेरा मैच) देखने के लिए ग्राउंड की दीवार पर बैठी थी. उस दिन ग्राउँड में बरसात की वजह से जगह जगह काफी कीचड़ था.... जहाँ मैं फिल्डिंग कर रहा था वहाँ भी छोटे-छोटे गड्ढों में कीचड का पानी था. मेरी हर फिल्डिंग पर लड़कियाँ तालियाँ बजा रहीं थी. तभी मेरे पास एक बहुत मुश्किल कैच आया जिसे मैंने ना जाने कैसे लपक लिया...लड़कियाँ उछल-उछल कर मेरे लिए तालियाँ बजा रही थी और वेव्स कर रही थी. मैं भी ख़ुशी से उन्हें वेव्स करते हुए पीछे की ओर चल रहा था, मैं वेव्स करते हुए भूल गया कि ग्राउंड में पानी भरा हुआ है कई लड़कियाँ मुझे इशारे से समझा भी रहीं थी पर मैं अति उत्साह में ध्यान ही नहीं दे पाया और कीचड़ से भरे हुए पानी के गड्ढे में गिर गया.. मेरी पूरी सफेद ड्रेस कीचड़ से सन गई...और चारो तरफ सब हँसने लगे. वही बैठी लड़कियों की हँसी जो फूटी बस पूछो मत. शायद उनकी हँसी की आवाज आप तक भी पहुँच रही होगी......

मीत जी के ब्लोग का डाक पता तुम्हारा मीत

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