एक अजीब हादिसा हुआ है। मंटो मर गया है, गो वह एक अर्से से मर रहा था। कभी सुना कि वह पागलखाने में हैं,कभी सुना कि बहुत ज्यादा शराब पीने के कारण अस्पताल में पड़ा है, कभी सुना कि यार-दोस्तों ने उससे सम्बंध तोड़ लिया है। कभी सुना कि वह और उसके बीबी-बच्चे फ़ाकों गुजर रहे हैं। बहुत-सी बातें सुनीं। हमेशा बुरी बातें सुनीं,लेकिन यकीन न आया, क्योंकि इस अर्से में उसकी कहानियाँ बराबर आती रहीं। अच्छी कहानियाँ भी और बुरी कहानियाँ भी। ऐसी कहानियाँ भी जिन्हें पढ़कर मंटो का मुँह नोचने को जी चाहता था, और ऐसी कहानियाँ भी, जिन्हें पढ़कर उसका मुँह चूमने को भी जी चाहता था। मैं समझता था,जब तक ये खत आते रहेंगे,मंटो खैरियत से है। क्या हुआ अगर वह शराब पी रहा है, क्या शराबखोरी सिर्फ साहित्यकारों तक ही सीमित है? क्या हुआ अगर वह फाके कर रहा है, इस देश की तीन चौथाई आबादी ने हमेशा फाके किये है। क्या हुआ अगर वह पागलखाने चला गया है, इस सनकी और पागल समाज मे मंटो ऐसे होशमंद का पागलखाने जाना कोई अचम्भे की बात नहीं। अचम्भा तो इस बात पर है कि वह आज से बहुत पहले पागलखाने क्यों नहीं चला गया। मुझे इन तमाम बातों से न तो कोई हैरत हुई, न कोई अचम्भा हुआ। मंटो कहानियाँ लिख रहा है, मंटो खैरियत से है, खुदा उसके कलम में और जहर भर दें। मगर आज जब रेडियो पाकिस्तान यह खबर सुनायी कि मंटो दिल की धड़कन बंद होने के कारण चल बसा तो दिल और दिमाग चलते चलते एक लमहे के लिए रूक गए। दूसरे लमहे में यह यकीन न आया। दिल और दिमाग ने विश्वास न किया कि कभी ऐसा हो सकता है। निमिष भर के लिए मंटो का चेहरा मेरी निगाहों में घूम गया। उसका रोशन चोड़ा माथा,वह तीखी व्यंग्य भरी मुस्कराहट, वह शोले की तरह भड़कता हुआ दिल कभी बुझ सकता है? दूसरे क्षण यकीन करना पड़ा।....आज सर्दी बहुत है और आसमान पर हल्की हल्की सी बदली छायी हुई है, मगर इस बदली में बारिश की एक बूंद भी नहीं है। मंटो को रोने—रूलाने से इंतहाई नफरत थी। आज मैं उसकी याद में आंसू बहाकर उसे परेशान नहीं करूंगा। मैं आहिस्ता से अपना कोट पहन लेता हूं और घर से बाहर निकल जाता हूं…घर के बाहर वही बिजली का खम्भा है, जिसके नीचे हम पहली बार मिले थे। यह वही अंडरहिल रोड है,जहां आल इंडिया रेडियो का दफतर था, जहां हम दोनो काम किया करते थे। यह मेडन होटल का बार है,यह मोरी गेट,जहां मंटो रहता था, यह जामा मस्जिद की सीढ़ियां है, जहां हम कबाब खाते थे, यह उर्दू बाजार है। सब कुछ वही है,उसी तरह है। सब जगह उसी तरह से काम हो रहा है। आल इंडिया रेडियो भी खुला है,मेडन होटल का बार भी और उर्दू बाजार भी, क्योंकि मंटो एक बहुत मामूली आदमी था। वह एक गरीब साहित्यकार था। वह मंत्री न था कि कहीं कोई झंडा उसके लिए झुकता.… वह एक सतायी हुई जबान का गरीब और सताया हुआ साहित्यकार था। वह मोचियों,तवायफों और तांगेवालों का साहित्यकार था। ऐसे आदमी के लिए कौन रौयेगा, कौन अपना काम बंद करेगा? इसलिए आल इंडिया रेडियो खुला है,जिसने उसके डरामे सैकड़ो बार ब्राडकास्ट किये है। उर्दू बाजार भी खुला है, जिसने उसकी हजारों किताबें बेची है और आज भी बेच रहा है। आज मैं उन लोगों को भी हंसता देख रहा हूं,जिन्होने मंटो से हजारों रूपयों की शराब पी है। मंटो मर गया तो क्या हुआ, बिजनेस बिजनेस है? क्षण भर को भी काम नहीं रूकना चाहिए। वह जिसने हमें अपनी सारी जिंदगी दे दी, उसे हम अपने समय का एक क्षण भी नहीं दे सकते। सिर झुकाये क्षण भर के लिए उसकी याद को हम अपने दिलों में ताजा नहीं कर सकते। ....हमने मंटो पर मुकदमे चलाये, उसे भूखा मारा,उसे पागलखाने में पहुंचाया, उसे अस्पतालों में सड़ाया और आखिर में उसे यहां तक मजबूर किया कि वह इंसान को नहीं, शराब की एक बोतल को अपना दोस्त समझने पर मजबूर हो गया। यह कोई नयी बात नहीं। हमने गालिब के साथ यही किया था, प्रेमचंद के साथ यही किया था, हसरत के साथ यही किया था और आज मंटो के साथ भी यही सलूक करेंगे, क्योंकि मंटो कोई उनसे बड़ा साहित्यकार नहीं है, जिसके लिए हम अपने पांच हजार साल की संस्कृति की पुरानी परम्परा को तोड़ दें। हम इंसानो के नहीं, मकबरों के पुजारी हैं….
मंटो एक बहुत बड़ी गाली था। उसका कोई दोस्त ऐसा नहीं था,जिसे उसने गाली न दी हो। कोई प्रकाशक ऐसा न था, जिससे उसने लड़ाई मोल न ली हो,कोई मालिक ऐसा न था, जिसकी उसने बेइज्जती न की हो। प्रकट रूप से वह प्रगतिशीलों से खुश नहीं था, न अप्रगतिशीलों से, न पाकिस्तान से,न हिंदुस्तान से, न चचा साम से, न रूस से। जाने उसकी बेचैन और बेकरार आत्मा क्या चाहती थी। उसकी जबान बेहद तल्ख थी। शैली थी तो कसैली और कंटीली,नश्तर की तरह तज और बेरहम,लेकिन आप उसकी गाली को,उसकी कड़ी बातों को,उसके तेज,नोकीले,कंटीले शब्दों को जरा—सा खुरच कर तो देखिए,अंदर से जिंदगी का मीठा—मीठा रस टपकने लगेगा। उसकी नफरत में मुहब्बत थी, नग्नता में आवरण,चरित्रहीन औरतों की दास्तानों में उसके साहित्य की सच्चरित्रता छिपी थी। जिंदगी ने मंटो से इंसाफ नहीं किया,लेकिन तारीख जरूर उससे इंसाफ करेगी। ....शाम के वक्त तांगे से मैं,जोय अंसारी,एडीटर शाहराह के साथ जामा मस्जिद से तीस हजारी अपने घर को आ रहा था। रास्ते में मैं और जोय अंसारी आहिस्ता—आहिस्ता मंटो की शख्सियत और उसके आर्ट पर बहस करते रहे। सड़क पर बहुत गढ़े थे,इसलिए बहस में बहुत—से— नाजुक मुकाम भी आए। एक बार पंजाबी कोचवान ने चौंककर पूछा—क्या कहा जी, मंटो मर गया? जोय अंसारी ने आहिस्ता से कहा, हां भाई! और फिर अपनी बहस शुरू कर दी। कोचवान धीरे—धीरे अपना तांगा चलाता रहा। लेकिन मोरी गेट के पास उसने अपने तांगे को रोक लिया और हमारी तरफ घूमकर बोला— साहब, आप लोग कोई दूसरा तांगा कर लीजिए। मैं आगे नहीं जाउंगा। —उसकी आवाज में एक अजीब—सा दर्द था। इसके पहले कि हम कुछ कह सकते,वह हमारी तरफ देखे बगैर अपने तांगे से उतरा और सीधा सामने की बार में चला गया।
नोट— यह संस्मरण मंटो:मेरा दुश्मन किताब—लेखक अश्क जी,से लिया गया है। इस संस्मरण को कृष्ण चंद जी ने लिखा है। आप मंटो पर लिखी पिछली पोस्टों को भी नीचे दिए लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं।
किसी को फसल के अच्छे दाम की तलाश,किसी को काम की तलाश,किसी को प्यार की तलाश, किसी को शांति की तलाश, किसी को खिलौनों की तलाश,किसी को कहानी की तलाश,किसी को प्रेमिका की तलाश, किसी को प्रेमी की तलाश,................ तलाश ही जीवन है
Monday, January 17, 2011
मंटो मरा नहीं, जिंदा है हम सबके दिलों में!
Monday, January 3, 2011
सुख हासिल करने का राज !
मैं सुखी होना चाहता हूँ। घंटे भर के लिए नहीं। न ही एक या दो दिनों के लिए। बल्कि पूरी जिंदगी के वास्ते। मेरा ख्याल है हर इंसान सुख प्राप्त करना चाहता है।... दुनिया के अंदर सुख हासिल करने के उतने ही तरीके है जितने इस धरती पर इंसान हैं। पहले तो मुझे दो चीजों में फ़र्क बता लेने दीजिए। पहली, सुखी जीवन, या स्थायी सुख की अवस्था । दूसरी, कुछ क्षणों का मजा या स्वादिष्ट अहसास। मैं बड़ा सुखी महसूस करता हूँ जब मुझे शाहाना खाना मिल जाए या बढिया फिल्म देख लूं , या पुराना यार-दोस्त मिल जाए या जब मौसम सुहाना हो जाए। मगर इन सब चीजों को मैं सुखी जीवन का आदि और अंत बिल्कुल नहीं मानता। ये तो तेज उड़ जाने वाले क्षण हैं। इनसे उस दिमाग का अंधेरा कतई दूर नहीं हो सकता जो दुखी रहने का आदी हो चुका है। मेरे विचार में, सुख तो एक सोचने की आदत हैं,स्थायी तौर पर अच्छा महसूस करने की हालत है। यह छोटी-मोटी तकलीफों से आजाद हैं; जैसे खराब मौसम, या ज्यादा सैंक लगा हुआ भोजन। सुख तो कभी न छूटने वाली वो आदत है जिसके जरिए आप हमेशा चीजों के रौशन रुख को ताकते हैं। ...वे कौन-सी चीजें हैं जिनकी मुझे जरुरत है,या कौन-से कार्य हैं जो मुझे करने चाहिएं,ताकि मेरा जीवन सुखी व्यतीत हो सके?...सबसे अधिक महत्व मैं देता हूं अपनी बुनियादी जरुरतों की पूर्ति को। सुखी होने के लिए लाजमी है कि आदमी के पास उचित आराम के साधनों के वास्ते धन हो। वे वस्तुएं जो धन से खरीदी जा सकती हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि मेरे पास करोड़ो रुपए हों, धन दौलत हो-ताकि मैं निठल्लों वाली सुस्त और ऐशो इशरत वाली जिंदगी काट संकू। नहीं! मैं पैसे का गुलाम ,ऐशपरस्ती का कैदी नहीं बनना चाहता । अकेली दौलत इंसान को सुखी नहीं बना सकती। धन से मुझे सिर्फ दो चीजें चाहिएं। पहली, सुरक्षित होने की भावना। दूसरी, फ़ुर्सत, खाली समय। मैं यूनानी फिलासफर डाओजनीज नहीं हूं -जिसने सिकंदर महान से अपनी धूप के सिवा और कुछ नहीं था मांगा। मेरा ख्याल है, धन के बगैर बंदा सुखी नहीं हो सकता। खुराक और पोशाक और सिर पर छत संपूर्ण जीवन के वास्ते उतने ही आवश्यक हैं जितनी हमारे सांस लेने के वास्ते हवा। अगर डाओजनीज ने लंबे-चौड़े परिवार के पेट भरने होते, मगर गांठ में धेला न होता, उसको अपनी सुख प्राप्त करने की फिलासफी के अंदर की मूर्खता झट पता लग जाती।... जैसा मैंने पहले कहा, फालतू धन हमें अधिक सुख देने की बजाए हमारे सुख को घटा भी सकता है। आदमी की इच्छाओं का कोई अंत नहीं। धन उसके जीवन को आलसी और निकम्मा बना सकता है। इसी वजह से, इंसान को चौकन्ना रहना चाहिए। वह अपनी ख्वाहिशों को न बढ़ाए। क्योंकि हमारी सारी-की-सारी तमन्नाएं कभी पूरी नहीं हो सकतीं,अक्ल इसी में है कि हम ख्वाहिशों को घटा के रखें।नहीं तो यकीनी तौर पर हम निराश और दुखी हो जाएंग़े।
अपनी बुनियादी जरुरतों के पूरा होने के बाद, जिस चीज की हमें सुख प्राप्ति के हेतु, सबसे ज्यादा जरुरत है वह है: सब्र ! संतोष ! संतुष्टि के अंदर वह भेद छुपा हुआ है जो हमें चिरंजीव सुख प्रदान करा सकता है। मुझे याद आ रहा है गांधीजी का जवाब जो उन्होंने एक अग्रेंज लड़्की को दिया था। लड़की ने पूछा: सुख हासिल करने का राज क्या है?..."यह तो बहुत सरल है", गांधीजी बोले। "जिस दिन तुम्हें रोज सवेरे मिलने वाला दूध का प्याला नहीं मिलता, तुम पानी का गिलास पी लो और उसी से संतुष्ट महसूस करो।" इसका मतलब यह नहीं कि गांधीजी कहते हैं तुम हर रोज का दूध पीना बंद कर दो, तो ही सुखी रहोगे। सिर्फ एक दिन , जब तुम्हें दूध नहीं मिलता, हल्ला मत मचाओ। संक्षेप में: अपनी जिंदगी में सब्र संतोष से रहना सीखो। नन्ही-नन्ही मुशिकलों के कारण , दुखी मत हो। एक और चीज जो मैं सुखी जीवन के लिए अनिवार्य समझता हूं, वह है : काम-लगातार मेहनत। जो सुख अत्यंत दिलचस्प काम दे सकता है, वह और कहीं से नहीं मिल सकता। नाट्ककार बरनर्ड शॉ ने एक बार लिखा: " दुखी होने का भेद जानना चाहते हो? बेकार बैठो और सोचो: मैं सुखी हूं कि दुखी हूं ?" -यह सही है। निठल्लेपन से जनमते हैं दुखद विचार, जैसे टिड्डी द्लों से जनमते हैं टिडिडयों के बादलो के बादल। इंसान को किसी लाभदायक कार्य में जुटे रहना चाहिए। महान वैज्ञानिक न्यूटन के बारे में एक कहानी सुनाई जाती है। एक बार न्यूटन ने कुछ दोस्तों को खाने पर बुलाया। वह शराब की बोतल लाने के लिए मेज से उठ गया। लेकिन वह लौटकर नहीं आया। चौबीस घंटो के बाद , उसके नौकर ने देखा, न्यूटन अपनी प्रयोगशाला के अंदर तजुरबे करने में मग्न है। वह अपने मेहमानों को, खाने को,आराम और नींद को,पूरी तरह भूल चुका है। इस तरह का हर्षोन्माद हर कामगार को हासिल नहीं होता। लेकिन इससे यह जरुर जाहिर हो जाता है कि हमारे ढेर सारे फिक्र और मुशिकलें कभी पैदा ही नहीं होते अगर हमारे जीवन में महान लक्ष्य हो तथा करने के वास्ते अंतहीन काम हो।
जिस काम को आदमी करे वो काम अपने फायदे के वास्ते तो होना ही हुआ। साथ ही यह कार्य समाज की भलाई के वास्ते भी हो। एक खुदगर्ज बंदा कभी सुखी नहीं हो सकता । मिसाल के तौर एक चोर को ले लो। दूसरों को लूटने के वास्ते जितनी मुशक्कत चोर करता है, उसमें से उसे सुख कभी हासिल नहीं हो सकता। सुखी जीवन स्वार्थहीन जीवन होता है। जरुरतमंदो की मदद करने से, इंसानियत की खुशियों में बढोतरी करने से आनंद प्राप्त होता है। किसी मुजरिम को, डाकू को, गरीबों का शौषण करने वाले को, कभी मन की शांति नहीं मिल सकती । और इसके उलट अपने आपकी कुर्बानी हमें नेक बनाती है। हमारा आत्मसम्मान बढ़ाती है। दूसरों के लिए जीने वाला महापुरुष सदा के लिए सुखी रहेगा। गांधीजी और नेहरु ने अपनी जिंदगियां अपने देशवासियों को सुखी बनाने के वास्ते खर्च कर दी। उन्होंने कई बरस फिरंगी की जेलों में काटे। अनगिनत कष्ट झेले। लेकिन वे दुखी नहीं थे। जालिम उनके शरीरों को यातना दे सकते थे मगर उनकी रुहें स्थायी उजाले में रहती थीं। दूसरों की भलाई के लिए काम करने की ललक उनको हर वेला सुखी और उत्साहित रखती थी। भगत सिंह को अंग्रेंजो ने फांसी पर चढ़ाया, लेकिन उससे ज्यादा सुखी मौत और किसी को भी नसीब नहीं हुई। सुख वह शै है जो आपको मिलती है जब आप इसे दूसरों में बांट देते हैं। स्वार्थी बनो और दूसरों का सुख छीनने की कोशिश करो, तुम कभी सुख प्राप्त नहीं कर सकते। असल में सुख और दिल की नेकी एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। जो मनुष्य दूसरों से नफरत करता है और नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है, वह अवश्य ही दुखी होगा। दूसरों को दुख देने का एक भी विचार आपकी खुशी तबाह कर सकता है। "अपने पड़ोसियों से प्यार करो।" यह मात्र धार्मिक शिक्षा नहीं है। यह तो जीवन का सदाबहार सत्य है। इसको सुखी जीवन का सूत्र स्वीकार करना चाहिए।"किसी से नफरत नहीं, हर एक से प्यार।"(अब्राहम लिंकन)
जीवन के लिए प्यार जरुरी है। सिर्फ बाहर की दुनिया के लिए प्यार नहीं चाहिए। केवल पराए लोगों के वास्ते ही जीना नहीं चाहिए। बल्कि,इंसान को अपने यारों-दोस्तों से, सगे-संबंधियों से भी घनिष्ट प्रेम-बंधन गांठने चाहिए। अपने परिवार के सदस्यों की मुहब्बत के बगैर इंसान सुखी नहीं हो सकता । वह सबका प्रेम प्राप्त करे। और सबको मोह प्यार दे। दोस्ती जैसी सुखदायक वस्तु दुनिया में दूसरी कोई नहीं। हमारे मित्र हमें सैकड़ो दुखो तकलीफो से बचा सकते हैं। जबकि मित्रहीन जिंदगी कइयों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर देती है।
संक्षेप में: मेरी दृष्टि में, एक सुखी जिंदगी वो होती है जिसमें जरुरी आराम की चीजें हों, मगर ऐशपरस्ती न हो। इसमें किसी किस्म का अभाव महसूस न हो। सब्र संतोष हो। इसके लिए आवश्यक है कि आदमी तगड़ा काम करे जो इंसानियत की भलाई की खातिर हो। सबसे अहम बात-एक सुखी जीवन रिश्तेदारों और दोस्तों की संगत में, दूसरों के वास्ते जिया जाए।
नोट-यह अंश सी.डी सिंद्धू सर की किताब-नाट्ककार चरणदास सिंद्धू शब्द-चित्र से लिया गया है जिसका संपादन रवि तनेजा सर ने किया है और श्री प्रकाशन ने इस किताब को प्रकाशित किया है। इस अंश को यहाँ पोस्ट करने का मकसद केवल ये है कि अक्सर यार दोस्तों और नजदीकीयों से सुनने को मिलता है " यार जिंदगी में मजा नहीं आ रहा। " उनके पास सवाल है जवाब नहीं। इसलिए मुझे लगा इस लेख में कुछ हद तक जवाब है। इंसान जिंदगी मजे से जीए बस यही चाहते है हम।
अपनी बुनियादी जरुरतों के पूरा होने के बाद, जिस चीज की हमें सुख प्राप्ति के हेतु, सबसे ज्यादा जरुरत है वह है: सब्र ! संतोष ! संतुष्टि के अंदर वह भेद छुपा हुआ है जो हमें चिरंजीव सुख प्रदान करा सकता है। मुझे याद आ रहा है गांधीजी का जवाब जो उन्होंने एक अग्रेंज लड़्की को दिया था। लड़की ने पूछा: सुख हासिल करने का राज क्या है?..."यह तो बहुत सरल है", गांधीजी बोले। "जिस दिन तुम्हें रोज सवेरे मिलने वाला दूध का प्याला नहीं मिलता, तुम पानी का गिलास पी लो और उसी से संतुष्ट महसूस करो।" इसका मतलब यह नहीं कि गांधीजी कहते हैं तुम हर रोज का दूध पीना बंद कर दो, तो ही सुखी रहोगे। सिर्फ एक दिन , जब तुम्हें दूध नहीं मिलता, हल्ला मत मचाओ। संक्षेप में: अपनी जिंदगी में सब्र संतोष से रहना सीखो। नन्ही-नन्ही मुशिकलों के कारण , दुखी मत हो। एक और चीज जो मैं सुखी जीवन के लिए अनिवार्य समझता हूं, वह है : काम-लगातार मेहनत। जो सुख अत्यंत दिलचस्प काम दे सकता है, वह और कहीं से नहीं मिल सकता। नाट्ककार बरनर्ड शॉ ने एक बार लिखा: " दुखी होने का भेद जानना चाहते हो? बेकार बैठो और सोचो: मैं सुखी हूं कि दुखी हूं ?" -यह सही है। निठल्लेपन से जनमते हैं दुखद विचार, जैसे टिड्डी द्लों से जनमते हैं टिडिडयों के बादलो के बादल। इंसान को किसी लाभदायक कार्य में जुटे रहना चाहिए। महान वैज्ञानिक न्यूटन के बारे में एक कहानी सुनाई जाती है। एक बार न्यूटन ने कुछ दोस्तों को खाने पर बुलाया। वह शराब की बोतल लाने के लिए मेज से उठ गया। लेकिन वह लौटकर नहीं आया। चौबीस घंटो के बाद , उसके नौकर ने देखा, न्यूटन अपनी प्रयोगशाला के अंदर तजुरबे करने में मग्न है। वह अपने मेहमानों को, खाने को,आराम और नींद को,पूरी तरह भूल चुका है। इस तरह का हर्षोन्माद हर कामगार को हासिल नहीं होता। लेकिन इससे यह जरुर जाहिर हो जाता है कि हमारे ढेर सारे फिक्र और मुशिकलें कभी पैदा ही नहीं होते अगर हमारे जीवन में महान लक्ष्य हो तथा करने के वास्ते अंतहीन काम हो।
जिस काम को आदमी करे वो काम अपने फायदे के वास्ते तो होना ही हुआ। साथ ही यह कार्य समाज की भलाई के वास्ते भी हो। एक खुदगर्ज बंदा कभी सुखी नहीं हो सकता । मिसाल के तौर एक चोर को ले लो। दूसरों को लूटने के वास्ते जितनी मुशक्कत चोर करता है, उसमें से उसे सुख कभी हासिल नहीं हो सकता। सुखी जीवन स्वार्थहीन जीवन होता है। जरुरतमंदो की मदद करने से, इंसानियत की खुशियों में बढोतरी करने से आनंद प्राप्त होता है। किसी मुजरिम को, डाकू को, गरीबों का शौषण करने वाले को, कभी मन की शांति नहीं मिल सकती । और इसके उलट अपने आपकी कुर्बानी हमें नेक बनाती है। हमारा आत्मसम्मान बढ़ाती है। दूसरों के लिए जीने वाला महापुरुष सदा के लिए सुखी रहेगा। गांधीजी और नेहरु ने अपनी जिंदगियां अपने देशवासियों को सुखी बनाने के वास्ते खर्च कर दी। उन्होंने कई बरस फिरंगी की जेलों में काटे। अनगिनत कष्ट झेले। लेकिन वे दुखी नहीं थे। जालिम उनके शरीरों को यातना दे सकते थे मगर उनकी रुहें स्थायी उजाले में रहती थीं। दूसरों की भलाई के लिए काम करने की ललक उनको हर वेला सुखी और उत्साहित रखती थी। भगत सिंह को अंग्रेंजो ने फांसी पर चढ़ाया, लेकिन उससे ज्यादा सुखी मौत और किसी को भी नसीब नहीं हुई। सुख वह शै है जो आपको मिलती है जब आप इसे दूसरों में बांट देते हैं। स्वार्थी बनो और दूसरों का सुख छीनने की कोशिश करो, तुम कभी सुख प्राप्त नहीं कर सकते। असल में सुख और दिल की नेकी एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। जो मनुष्य दूसरों से नफरत करता है और नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है, वह अवश्य ही दुखी होगा। दूसरों को दुख देने का एक भी विचार आपकी खुशी तबाह कर सकता है। "अपने पड़ोसियों से प्यार करो।" यह मात्र धार्मिक शिक्षा नहीं है। यह तो जीवन का सदाबहार सत्य है। इसको सुखी जीवन का सूत्र स्वीकार करना चाहिए।"किसी से नफरत नहीं, हर एक से प्यार।"(अब्राहम लिंकन)
जीवन के लिए प्यार जरुरी है। सिर्फ बाहर की दुनिया के लिए प्यार नहीं चाहिए। केवल पराए लोगों के वास्ते ही जीना नहीं चाहिए। बल्कि,इंसान को अपने यारों-दोस्तों से, सगे-संबंधियों से भी घनिष्ट प्रेम-बंधन गांठने चाहिए। अपने परिवार के सदस्यों की मुहब्बत के बगैर इंसान सुखी नहीं हो सकता । वह सबका प्रेम प्राप्त करे। और सबको मोह प्यार दे। दोस्ती जैसी सुखदायक वस्तु दुनिया में दूसरी कोई नहीं। हमारे मित्र हमें सैकड़ो दुखो तकलीफो से बचा सकते हैं। जबकि मित्रहीन जिंदगी कइयों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर देती है।
संक्षेप में: मेरी दृष्टि में, एक सुखी जिंदगी वो होती है जिसमें जरुरी आराम की चीजें हों, मगर ऐशपरस्ती न हो। इसमें किसी किस्म का अभाव महसूस न हो। सब्र संतोष हो। इसके लिए आवश्यक है कि आदमी तगड़ा काम करे जो इंसानियत की भलाई की खातिर हो। सबसे अहम बात-एक सुखी जीवन रिश्तेदारों और दोस्तों की संगत में, दूसरों के वास्ते जिया जाए।
नोट-यह अंश सी.डी सिंद्धू सर की किताब-नाट्ककार चरणदास सिंद्धू शब्द-चित्र से लिया गया है जिसका संपादन रवि तनेजा सर ने किया है और श्री प्रकाशन ने इस किताब को प्रकाशित किया है। इस अंश को यहाँ पोस्ट करने का मकसद केवल ये है कि अक्सर यार दोस्तों और नजदीकीयों से सुनने को मिलता है " यार जिंदगी में मजा नहीं आ रहा। " उनके पास सवाल है जवाब नहीं। इसलिए मुझे लगा इस लेख में कुछ हद तक जवाब है। इंसान जिंदगी मजे से जीए बस यही चाहते है हम।
Tuesday, September 14, 2010
यमुना, हम और मीडिया
हर सुबह की तरह आदत से मजबूर होकर जब न्यूज सुनने के लिए टीवी चलाया तो वहाँ नीचे एंकर में एक न्यूज दौड़ रही थी कि तीसरा पुस्ता (उस्मानपुर) पानी में डूब गया है। एक पल को तो डर ही गया था। फिर मैं सोचने लगा, पर हमारी गली सूखी, ये चमत्कार कैसे हो गया? क्योंकि हमारे घर से तीसरे पुस्ते की पैदल दूरी बस दस मिनट की ही होगी। खैर जब कई घंटो के बाद भी पानी नहीं आया तो शाम को हम खुद ही निकल गए, ये देखने कि आखिर देखे तो माजरा क्या। ( पिछली बार अगस्त में भी कई न्यूज चैनल वालों ने पुल के नीचे की पार्किग को बस अड्डा बना दिया था।) जब पुस्ता रोड़ पर गया तो देखा कि लोगों का इतना तांता लगा हुआ है। ( सब टीवी देखकर ही आ रहे है) कि हर पुस्ते पर पुलिस तैनात है। यमुना को ऐसे देख रहे हैं कि जैसे आज से पहले यमुना देखी ही नही हो। सच तो यही है कि दिल्ली के लोगों ने यमुना देखी ही कहाँ है वो तो सिमट कर रह गई है एक छोटे से दायरे में और कहीं तो बिल्कुल ही सूख गई। जहाँ-जहाँ थोड़ा बहुत पानी है, उसे मैला कर दिया दिल्ली वालों ने कूड़ा-करकट डालकर और रही-सही कसर दिल्ली सरकार पूरा कर देती है गंदे नालों का पानी डालकर। और साथ ही उसकी खाली पड़ी जमीन को बेकार समझकर सरकार ने उस पर कहीं मेट्रो का डिपो बना दिया, कहीं खेलगाँव बना दिया, कहीं अक्षरधाम मंदिर बनावा दिया.............। आखिर कब तक यमुना चुप रहेगी...............
और जब ये अपना उग्र रुप धारण करेगी तब लोग कहेंगे हाय यमुना तुने ये क्या किया? फिर मुख्यमंत्री जी आकर कहेंगी भगवान से दुआ करो कि सब ठीक हो जाए। गलतियां इंसान करे और ठीक भगवान करें अजीब लोग हैं? खैर आगे बढ़ा तो देखा कि पानी तो अभी भी पुस्ता रोड़ से लगभग आठ नौ फुट नीचे ही होगा, जो पहले के मुकाबले थोड़ा ज्यादा तो है पर इतना भी नही कि हाय-तोबा मचाई जाए । धीरे-धीरे पानी को देखता हुआ आगे बढ़ा जा रहा हूँ। मेरे आगे बच्चों की एक टोली चल रही है अपनी मस्ती में। आगे एक आदमी पेशाब कर रहा है यमुना की तरफ मुँह करके। तभी एक बच्चा अपने दोस्तों से कहता है ओए...... धक्का दे दूँ इसे.....? दूसरा बच्चा अबे सा............ ले................खैर बच गई जान इस आदमी की :) और बच्चे निकल गए साईड से। पर हम भी अभी बच्चे ही ठहरे इसलिए बोल पड़े अरे भाई पुस्ता टूट जाऐगा, ज्यादा पेशाब मत करना, वो मुस्कराया :) । ( वैसे हमने उन महाश्य का फोटो खींच मारा, मोबाइल कैमरा भी क्या कमाल की चीज है जी :)
पुस्ता रोड के दोनों तरफ टेंट और तीरपाल लगे हुए हैं। उसके अंदर लोग अपना-अपना समान लेकर बैठे-लेटे हुए हैं। कोई बैठा बतिया रहा है, कोई चारपाई पर सोया हुआ है, दो बच्चे कबाड़ को छाँट रहे है, छोटी लड़कियाँ मेहंदी लगाने में मस्त हैं। एक बीमार स्त्री सड़क पर बोरी बिछाए लेटी हुई है, उसका पति सिरहाने पर बैठा उसे ही निहार रहा है। बैबसी उसके चेहरे पर साफ़ नजर आ रही है। आगे बढ़ता हूँ तो देखता कुछ सरकारी बाबू लिखा पढ़ी में लगे हुए है। दिल्ली जल बोर्ड का पानी का टेंकर खड़ा है और उसका पानी यूँ बह रहा है। उसका ड्राइवर कहाँ है कुछ पता नहीं। दो औरतें सड़क पर बैठी लूडो खेल रही है। पास ही एक लाली-पोप बेचने वाला खड़ा है, बच्चें खड़े होकर, लाली-पोप बिकने वाले का मुँह ताक रहे है ना जाने अंदर ही अंदर क्या सोच रहे हैं। इसके साथ लगे टेंट में एक बुजुर्ग चारपाई पर लेटा लम्बी-लम्बी साँसे ले रहा है, एक बच्चा हाथ के पंखे से उसकी हवा कर रहा है। कुछ लोग तीरपाल का आशियाना बना रहे है। उसके आगे दो बच्चे मछली पकड़ रहे हैं। शायद शाम के खाने में ये मछलियां ही पकेगी आज। आगे चलकर देखता हूँ सूअर अपनी मस्ती में मस्त हैं, शायद टीवी नही देखते है। फिर सोचता हूँ कि आज से पहले कब देखे थे मैंने सूअर......पर आप ये मत सोचो, आप सोचो कि हम एक विकसित अर्थव्यवस्था या एक महाशक्ति बनने का सपना देख रहे है पर किसी आपदा के आने पर दिल्ली जैसे शहर में लोगो को सड़को पर रहना पड़ता है। कोई भी ऐसी जगह नही जहाँ प्रभावित लोगो को रखा जाए , कोई मशीनरी नजर नही आती...... आपदा प्रबधन नाम की कोई चीज नहीं....... है तो बस कागजों में......... हाँ आफिस जरुर है सफदरजंग एनकलेव में......और इसी विकसित होने के गुमान में क़ॉमनवेल्थ खेल करा रहे हैं और कैसी फजीयत हो रही, वो आप देख ही रहे हैं।
क्या इतने जरुरी थे ये खेल? भाई आपके यहाँ लोग दो रोटी की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं, पता नही कितने लोग भूखे सोते? और कितने किसान खुदकुशी कर रहे है।..............मेरी मम्मी जी अक्सर कहती है कि "भूखे पेट तो ढोल भी अच्छे नहीं लगते हैं"...........अब मैं तीसरा पुस्ता पहुँच गया हूँ। देखता हूँ कि जिस तीसरे पुस्ते की बात चैनल वाले कर रहे है वो तो खादर की तरफ है और जिसे सही में तीसरा पुस्ता कहते है वो उसके ठीक सामने। यानिकी जब भी यमुना में ज्यादा पानी आता है तो इधर आता ही। इसके साथ ही गुर्जरों का उस्मानपुर का पुराना गाँव है वैसे तो गाँव में काफी घर है पर जो भी वहाँ के रहने वाले थे वो इधर आ गए है तीसरे पुस्ते और पहले पुस्ते के बीच की क़ॉलोनी में इसको भी उस्मानपुर कहते हैं। पर इन लोगो ने वहाँ भी अपना आशियाने बना रखे हैं, क्योंकि जब दिल्ली में भैंस रखने के लिए सरकार ने मना किया, ( क्योंकि दिल्ली को दिल्ली नहीं, लंदन बनाना चाहती है दिल्ली सरकार ) तो इन्होंने यहाँ अपना खरक ( जहाँ भैंस रहती है) बना लिया। इन्हीं गुर्जरों ने कुछ जगह कबाडियों को दे दी। कुछ खेत के मजदूरों को जो वहाँ सब्जी बगैरा उगाते हैं। और सड़क पर टेंट लगाकर ये ही लोग है। बाकी तो खाली जमीन है, देखना धीरे-धीरे इस पर कंक्रीट के जंगल बना दिए जाऐंगे।
और बिल्कुल यही हाल आगे गढ़ी मेढू का है, वो भी गुर्जरों का गाँव है। पर जिस तीसरे पुस्ते को लोग जानते है और वो इधर है पुस्ता रोड़ से पूर्व की तरफ है ना कि पश्चिम में खादर की तरफ। और ये तीसरा पुस्ता आगे जाकर मिलता है ब्रहमपुरी में। और इस पुस्ता रोड़ पर कुल आठ पुस्ता है जीरो से लेकर पांच तक। अब सोचिए जिनके रिश्तेदार दूसरे शहरों में रहते है वो जब इस खबर को देखेंगे तो परेशान होंगे कि नहीं? और ऐसी ही एक स्टोरी को देखकर पिछले दिनों एक आदमी ने आफिस से घर फोन किया और बोला कि " वो स्कूल से बच्चों को ले आओ सुना है बस-अड्डे में पानी भर गया है टीवी में खबर आ रही है।" हेल्लो यार सुना है तुम्हारे बगल के पुस्ते पर पानी आ गया है, तुम्हारे यहाँ का क्या हाल है? मेरे खुद के गाँव से रिश्तेदारों के फोन आ रहे हैं। अब आप उन्हें समझाए और बताए कि ऐसा नहीं हैं। पर ये पत्रकार लोग परेशानी को कहाँ समझेंगे , इन्हें तो "बस स्टोरी बनानी है और सनसनी फैलानी है", जिसके कारण ज्यादा से ज्यादा दर्शक इनके चैनल को देखे, जिससे इनके चैनल की टीआरपी ज्यादा रहे, जब टीआरपी ज्यादा रहेगी तब विज्ञापन ज्यादा मिलेंगे और जब विज्ञापन ज्यादा मिलेंगे तो ज्यादा मुनाफा होगा और भाई जब मुनाफा ज्यादा होगा तो मालिक खुश होगा। सोच रहा हूँ आखिर ये मालिक लोग कितना खुश होना चाहते हैं?
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सुशील कुमार छौक्कर
Monday, August 30, 2010
परदेसन
ना जाने किस देश की थी वो
पर लगती थी अपनी सी वो।
मैक्समूलर भवन में टकराई थी
"सॉरी" की मीठी आवाज़
कानों में मेरे आई थी।
चेहरे पर उसके लाली थी
कानों में उसके बाली थी,
बालों की दो चोटी झूले से झूल रही थी,
नाक की नथ सूरज सी चमक रही थी।
गले में चेग्वारा टंगा था
इक पैर सूना,
दूजे में पाजेब सा कुछ पहना था।
आकर मेरे सामने की कुर्सी पर
आलथी-पालथी मार बैठ गई थी।
गाँधी की फोटो लगे झोले से निकाल एक किताब
सिमोन द बोवुआर के काले अक्षरों में डूब गई थी
उसकी ये अपूर्व तस्वीर मेरी आँखो में बस गई थी।
याद उसकी रह-रह कर आती रही
सपनों में आकर बार-बार बुलाती रही।
ना जाने किस देश की थी वो
पर लगती थी अपनी सी वो।
एक बार मिली
दो बार मिली,
अलग-अलग राहों पर,
बार-बार मिली।
उस दिन मिली थी
इंडिया हैबिटेट की कला दीर्घा में,
"बावली लड़की" टाइटल वाली पेंटिंग में खोई,
शायद अपना अक्स ढूढ़ रही थी,
मैं भी पेंटिंग के बावरी रंगो में खो गया।
कुछ पल बाद मुझे देख वो चौंकी,
और इंगलिश टच हिंदी जबान में बोली,
"गॉड कुछ चाहता है,
इसलिए बार-बार मिलाता है,
लगता है वो दोस्ती कराना चाहता है,
आओ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं,
मैं ........................ और आप।
ना जाने किस देश की थी वो
पर लगती थी अपनी सी वो।
आँखो को मटकाकर
बालों को फूँक से उड़ाती थी।
भरकर चिकोटी मेरे
जीभ निकाल चिढ़ाती हुई दौड़ जाती थी।
मेरी सी बातूनी थी
देर रात तक बतलाती थी,
कभी मेरे ख्वाबों के रंगो की पेंटिंग बनाती थी,
कभी अपने सपनों के घुँघरु बाँध नाचती थी,
मैं देखता-सुनता जाता और अच्छा- अच्छा ..... कहता जाता,
"अच्छे की ऐसी-की-तैसी सुबह हो गई है।" वो कहती थी।
ना जाने किस देश की थी वो
पर लगती थी अपनी सी वो।
अल्हड़ थी
घूमक्कड़ थी।
टाँग पीठ पर पिटठू बैग
दूर गाँवों में,
अकेले ही निकल जाती थी।
आकर फिर पास मेरे
लोगों के किस्से,
दर्द सुनाती थी।
बीच-बीच में सुनाते-सुनाते
कभी मुस्कराती थी,
कभी उदास हो जाती थी,
ना जाने ज़िंदगी से क्या चाहती थी।
ना जाने किस देश की थी वो
पर लगती थी अपनी सी वो।
आखिर वो दिन आ ही गया
जिस दिन उसे अपने देश जाना था।
उस दिन
ऊपर-ऊपर हँस रही थी,
अंदर-अंदर रो रही थी,
रखकर मेरी गोद में सिर अपना
घंटो रोती रही थी,
फिर आँसू पोंछकर बोली,
"प्यार का मतलब साथ-साथ रहना ही नहीं,
साथ-साथ जीना भी होता है,
और हम साथ-साथ जीएगें।
ना जाने किस देश की थी वो
पर लगती थी अपनी सी वो।
-सुशील कुमार छौक्कर
पर लगती थी अपनी सी वो।
मैक्समूलर भवन में टकराई थी
"सॉरी" की मीठी आवाज़
कानों में मेरे आई थी।
चेहरे पर उसके लाली थी
कानों में उसके बाली थी,
बालों की दो चोटी झूले से झूल रही थी,
नाक की नथ सूरज सी चमक रही थी।
गले में चेग्वारा टंगा था
इक पैर सूना,
दूजे में पाजेब सा कुछ पहना था।
आकर मेरे सामने की कुर्सी पर
आलथी-पालथी मार बैठ गई थी।
गाँधी की फोटो लगे झोले से निकाल एक किताब
सिमोन द बोवुआर के काले अक्षरों में डूब गई थी
उसकी ये अपूर्व तस्वीर मेरी आँखो में बस गई थी।
याद उसकी रह-रह कर आती रही
सपनों में आकर बार-बार बुलाती रही।
ना जाने किस देश की थी वो
पर लगती थी अपनी सी वो।
एक बार मिली
दो बार मिली,
अलग-अलग राहों पर,
बार-बार मिली।
उस दिन मिली थी
इंडिया हैबिटेट की कला दीर्घा में,
"बावली लड़की" टाइटल वाली पेंटिंग में खोई,
शायद अपना अक्स ढूढ़ रही थी,
मैं भी पेंटिंग के बावरी रंगो में खो गया।
कुछ पल बाद मुझे देख वो चौंकी,
और इंगलिश टच हिंदी जबान में बोली,
"गॉड कुछ चाहता है,
इसलिए बार-बार मिलाता है,
लगता है वो दोस्ती कराना चाहता है,
आओ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं,
मैं ........................ और आप।
ना जाने किस देश की थी वो
पर लगती थी अपनी सी वो।
आँखो को मटकाकर
बालों को फूँक से उड़ाती थी।
भरकर चिकोटी मेरे
जीभ निकाल चिढ़ाती हुई दौड़ जाती थी।
मेरी सी बातूनी थी
देर रात तक बतलाती थी,
कभी मेरे ख्वाबों के रंगो की पेंटिंग बनाती थी,
कभी अपने सपनों के घुँघरु बाँध नाचती थी,
मैं देखता-सुनता जाता और अच्छा- अच्छा ..... कहता जाता,
"अच्छे की ऐसी-की-तैसी सुबह हो गई है।" वो कहती थी।
ना जाने किस देश की थी वो
पर लगती थी अपनी सी वो।
अल्हड़ थी
घूमक्कड़ थी।
टाँग पीठ पर पिटठू बैग
दूर गाँवों में,
अकेले ही निकल जाती थी।
आकर फिर पास मेरे
लोगों के किस्से,
दर्द सुनाती थी।
बीच-बीच में सुनाते-सुनाते
कभी मुस्कराती थी,
कभी उदास हो जाती थी,
ना जाने ज़िंदगी से क्या चाहती थी।
ना जाने किस देश की थी वो
पर लगती थी अपनी सी वो।
आखिर वो दिन आ ही गया
जिस दिन उसे अपने देश जाना था।
उस दिन
ऊपर-ऊपर हँस रही थी,
अंदर-अंदर रो रही थी,
रखकर मेरी गोद में सिर अपना
घंटो रोती रही थी,
फिर आँसू पोंछकर बोली,
"प्यार का मतलब साथ-साथ रहना ही नहीं,
साथ-साथ जीना भी होता है,
और हम साथ-साथ जीएगें।
ना जाने किस देश की थी वो
पर लगती थी अपनी सी वो।
-सुशील कुमार छौक्कर
Tuesday, August 10, 2010
जीने की खातिर
बनिहारन
एक बच्चा छोटा सा,
मैले-कुचैले कपड़े पहने,
रोज़ मुझे सड़क किनारे,
मिट्टी में पत्थरों संग,
खेलता मिलता हैं।
कभी देख मुस्कराता हैं,
कभी देखता ही जाता हैं।
माँ इसकी पत्थर तौड़ती है,
रख तसले में फिर उन्हें ढ़ोती है।
माथे पर आती पसीने की बूंदों को,
अपने फटे हुए पल्लू से पोंछती हैं।
बीच-बीच में तिरक्षी निगाहों से,
अपने लाडले को भी देखती है।
बताती है ये पेट की खातिर,
दूर गाँव से इस शहर आई है।
फुटपाथ बनाऐगी,
कुछ पैसा कमाऐगी।
चौमासे में गाँव वापस चली जाऐगी,
और ज़मीनदार के खेत में धान लगाऐगी।
इधर हम शहर की चमक में,
खूब तरक्की की बात करेंगे।
उधर ये लालटेन की रोशनी में,
चूल्हा सुलगाऐगी।
- सुशील कुमार छौक्कर
मैले-कुचैले कपड़े पहने,
रोज़ मुझे सड़क किनारे,
मिट्टी में पत्थरों संग,
खेलता मिलता हैं।
कभी देख मुस्कराता हैं,
कभी देखता ही जाता हैं।
माँ इसकी पत्थर तौड़ती है,
रख तसले में फिर उन्हें ढ़ोती है।
माथे पर आती पसीने की बूंदों को,
अपने फटे हुए पल्लू से पोंछती हैं।
बीच-बीच में तिरक्षी निगाहों से,
अपने लाडले को भी देखती है।
बताती है ये पेट की खातिर,
दूर गाँव से इस शहर आई है।
फुटपाथ बनाऐगी,
कुछ पैसा कमाऐगी।
चौमासे में गाँव वापस चली जाऐगी,
और ज़मीनदार के खेत में धान लगाऐगी।
इधर हम शहर की चमक में,
खूब तरक्की की बात करेंगे।
उधर ये लालटेन की रोशनी में,
चूल्हा सुलगाऐगी।
- सुशील कुमार छौक्कर
Monday, June 21, 2010
बम्बई वाला मेरा दोस्त
कुछ इंसान यूँ मिलते हैं कि उस नीली छतरी वाले की तरफ मुँह उठाकर पूछना पड़ता हैं कि यार गज़ब खेल है तुम्हारा। और फिर उस इंसान से ऐसा तालमेल बैठता है कि आप याद करें या वो, मोबाइल की घंटी बज ही उठती हैं। जैसे अभी अभी हवाओं के साथ संदेश गया हो कि यार आपका दोस्त याद कर रहा हैं आपको। और हम फिर से मुँह उठाकर उस नीली छतरी वाले की तरफ देखते हैं। तो आज उन्हीं दोस्त की एक रचना पेश कर रहा हूँ जो मेरे जन्मदिन पर पिछले साल लिखी गई थी। और यह रचना मुझे हर वक्त हौंसला देती है.
तुम निडर हो, तुम अडिग हो
पथिक तुम, चलते जाना।
जीवन पथ की दुख व्यथा से
तनिक भी न तुम घबराना।
इस प्रलय के वक्ष स्थल पर
चढ़कर तुम हुंकार लगाना।
हँसते रहना, चलते रहना
दुख को अमृत सा पी जाना।
तुम शक्ति हो, तुम भक्ति हो
धर विश्वास तुम बढ़ते जाना।
सच्चे मन से मीत तुम्हारे लिए
मेरी बस यहीं शुभकामना।
-अमिताभ श्रीवास्तव
पथिक तुम, चलते जाना।
जीवन पथ की दुख व्यथा से
तनिक भी न तुम घबराना।
इस प्रलय के वक्ष स्थल पर
चढ़कर तुम हुंकार लगाना।
हँसते रहना, चलते रहना
दुख को अमृत सा पी जाना।
तुम शक्ति हो, तुम भक्ति हो
धर विश्वास तुम बढ़ते जाना।
सच्चे मन से मीत तुम्हारे लिए
मेरी बस यहीं शुभकामना।
-अमिताभ श्रीवास्तव
Monday, April 19, 2010
मर रही है मेरी भाषा शब्द शब्द- सुरजीत पातर
पिछले दिनों एक सम्मेलन में जाना हुआ जहाँ नामचीन लेखकों का जमावड़ा था। इस सम्मेलन को आयोजित किया था फाउंडेशन आफ सार्क राइटर्स एण्ड लिटरेचर संस्था ने। इस संस्था की कर्ता-धर्ता अजित कौर जी है। इनकी और इनके साथियों की मेहनत का ही नतीजा है कि यह संस्था आज भी सार्थक काम कर रही हैं। और मेरा सौभाग्य था कि मुझे बेहतरीन से बेहतरीन रचनाएं सुनने को मिलीं और नए नए विचारों की रौशनी से रुबरु भी हुआ। उन्हीं में से कुछ रचनाएं जो मैं इक़टठी कर पाया हूँ। उन्हें अपने ब्लोगगर साथियों और उन पाठकों के लिए पेश कर रहा हूँ जो नई नई रचनाओं को पढने के लिए मुझ पागल की तरह बैचेन रहते हैं। और नई नई रचनाएं इन पागलों के लिए दवा का काम करती हैं। तो साथियों आज पेश हैं सुरजीत पातर जी की पंजाबी में लिखी कविताएं "भाषा के परथाए" के नाम से। मैं पातर जी का शुक्रगुजार हूँ उन्होंने अपने कीमती समय में से समय निकालकर यह कविता भेजी। यह कविता मुझे बहुत पसंद आई। और उम्मीद आपको भी बहुत पसंद आऐगी।
भाषा के परथाए
1.
मर रही है। मेरी भाषा शब्द-शब्द
मर रही हैं। मेरी भाषा वाक्य वाक्य
अमृत वेला
नूर पहर दा तड़का
मूंह हनेरा
पहु फुटाला
धम्मी वेला
छाह वेला
सूरज सवा नेज़े
टिकी दुपहर
डीगर वेला
लोए लोए
तरकालाँ
दीवा वटी
खौपीआ
कोड़ा सोता
ढलदीआँ खित्तीआँ
तारे दा चढाअ
चिड़ी चूकणा
साझरा, सुवखता, र्सघी वेला
घड़िआँ, पहर, पल छिण, बिन्द, निमख बेचारे
मारे गये अकेले टाईम के हाथों
ये शब्द सारे
शायद इस लिए
कि टाईम के पास टाईमपीस था
हरहट की माला, कुत्ते की टिकटिक, चन्ने की ओट, गाठी के हूटे
काँजण, निसार, चककलियाँ, बूढ़े
भर भर कर खाली होती टिंडे
इन सब को तो बह जाना था
टिऊब वैल की धार में
मुझे कोई हैरानी नहीं
हैरानी तो यह है कि
अम्मी और अब्बा भी नहीं रहे
बीजी और भापा जी भी चले गये
और कितने रिशतें
अकेले आँटी और अँकल कर दिये हाल से बेहाल
और कल पंजाब के एक आँगन में
कह रहा था एक छोटा सा बाल:
पापा अपणे ट्री दे सारे लीव्ज कर रहे ने फाल
हाँ पुत्तर अपणे ट्री दे सारे लीव्ज कर रहे ने फाल
मर रही है अपणी भाषा पत्ता-पत्ता शब्द शब्द
अब तो रब ही रखा हैं अपनी भाषा का
पर रब?
रब तो खुद पड़ा है मरनहार
दोड़ी जा रही हैं उस की भूखी सँतान
उसे छोड़
गौड की पनाह में
मर रही है मेरी भाषा
मर रही हैं बाई गौड
2.
मर रही है मेरी भाषा
क्योंकि जीना चाहते है
मेरी भाषा के लोग
जीना चाहते हैं
मेरी भाषा के लोग
इस शर्त पर भी
कि मरती हैं तो मर जाये भाषा
क्या बँदे का जीते रहना
ज्यादा जरुरी हैं
कि भाषा?
हाँ जानता हूँ
आप कहेंग़े
इस शर्त पर
जो बँदा जीवित रहेगा
वह जीवित तो रहेगा
पर क्या वह बँदा रहेगा?
आप मुझे जजबाती करने की कोशिश मत करे
आप खुद ही बताएँ
अब
जब आपका रब भी
दाने दाने पर
खाने वाले का नाम
अँगरेजी में ही लिखता हैं
तो कौन बेरहम माँ बाप चाहेगा
कि उस की सँतान
डूब रही भाष के जहाज में बैठी रहे
जीता रहे मेरा बच्चा
मरती हैं तो मर जाए
तुम्हारी बूढ़ी भाषा
3.
नहीं इस तरह नही मरेगी मेरी भाषा
इस तरह नहीं मरा करती कोई भाषा
कुछ शब्दों के मरने से
नहीं मरती कोई भाषा
रब नहीं तो न सही
सतगुरु इस के सहाई होगे
इसे बचाऐगे सूफी सँत फकीर
शायर
आशिक
नाबर
योद्धे
मेरे लोग, हम, आप
हम सब के मरने के बाअद ही
मरेगी हमारी भाषा
बलकि
यह भी हो सकता है कि मारनहार हालात में घिर कर
मारनहार हालात से टक्कर लेने के लिए
और भी जीवँत हो उठे मेरी भाषा॥
सुरजीत पातर जी को दिल से शुक्रिया।
भाषा के परथाए
1.
मर रही है। मेरी भाषा शब्द-शब्द
मर रही हैं। मेरी भाषा वाक्य वाक्य
अमृत वेला
नूर पहर दा तड़का
मूंह हनेरा
पहु फुटाला
धम्मी वेला
छाह वेला
सूरज सवा नेज़े
टिकी दुपहर
डीगर वेला
लोए लोए
तरकालाँ
दीवा वटी
खौपीआ
कोड़ा सोता
ढलदीआँ खित्तीआँ
तारे दा चढाअ
चिड़ी चूकणा
साझरा, सुवखता, र्सघी वेला
घड़िआँ, पहर, पल छिण, बिन्द, निमख बेचारे
मारे गये अकेले टाईम के हाथों
ये शब्द सारे
शायद इस लिए
कि टाईम के पास टाईमपीस था
हरहट की माला, कुत्ते की टिकटिक, चन्ने की ओट, गाठी के हूटे
काँजण, निसार, चककलियाँ, बूढ़े
भर भर कर खाली होती टिंडे
इन सब को तो बह जाना था
टिऊब वैल की धार में
मुझे कोई हैरानी नहीं
हैरानी तो यह है कि
अम्मी और अब्बा भी नहीं रहे
बीजी और भापा जी भी चले गये
और कितने रिशतें
अकेले आँटी और अँकल कर दिये हाल से बेहाल
और कल पंजाब के एक आँगन में
कह रहा था एक छोटा सा बाल:
पापा अपणे ट्री दे सारे लीव्ज कर रहे ने फाल
हाँ पुत्तर अपणे ट्री दे सारे लीव्ज कर रहे ने फाल
मर रही है अपणी भाषा पत्ता-पत्ता शब्द शब्द
अब तो रब ही रखा हैं अपनी भाषा का
पर रब?
रब तो खुद पड़ा है मरनहार
दोड़ी जा रही हैं उस की भूखी सँतान
उसे छोड़
गौड की पनाह में
मर रही है मेरी भाषा
मर रही हैं बाई गौड
2.
मर रही है मेरी भाषा
क्योंकि जीना चाहते है
मेरी भाषा के लोग
जीना चाहते हैं
मेरी भाषा के लोग
इस शर्त पर भी
कि मरती हैं तो मर जाये भाषा
क्या बँदे का जीते रहना
ज्यादा जरुरी हैं
कि भाषा?
हाँ जानता हूँ
आप कहेंग़े
इस शर्त पर
जो बँदा जीवित रहेगा
वह जीवित तो रहेगा
पर क्या वह बँदा रहेगा?
आप मुझे जजबाती करने की कोशिश मत करे
आप खुद ही बताएँ
अब
जब आपका रब भी
दाने दाने पर
खाने वाले का नाम
अँगरेजी में ही लिखता हैं
तो कौन बेरहम माँ बाप चाहेगा
कि उस की सँतान
डूब रही भाष के जहाज में बैठी रहे
जीता रहे मेरा बच्चा
मरती हैं तो मर जाए
तुम्हारी बूढ़ी भाषा
3.
नहीं इस तरह नही मरेगी मेरी भाषा
इस तरह नहीं मरा करती कोई भाषा
कुछ शब्दों के मरने से
नहीं मरती कोई भाषा
रब नहीं तो न सही
सतगुरु इस के सहाई होगे
इसे बचाऐगे सूफी सँत फकीर
शायर
आशिक
नाबर
योद्धे
मेरे लोग, हम, आप
हम सब के मरने के बाअद ही
मरेगी हमारी भाषा
बलकि
यह भी हो सकता है कि मारनहार हालात में घिर कर
मारनहार हालात से टक्कर लेने के लिए
और भी जीवँत हो उठे मेरी भाषा॥
सुरजीत पातर जी को दिल से शुक्रिया।
Tuesday, April 13, 2010
12 अप्रैल
आज का दिन खास हैं
सबको प्यारा सा अहसास हैं
आज के दिन खिली थी एक कली
एक गाँव के गौबर से पूते आँगन में।
देखकर दुनिया यह हल्की सी मुस्कराई थी
चारपाई पर लेटे-2 नन्हें पैरों से फिर साईकिल चलाई
पग-पग चलती रही, धीरे-धीरे बढ़ती रही ।
सहेलियों संग गिटों से खेलती रही
आईस-पाईस में छिपते छिपाते
गाँव की पाठशाला में क ख ग घ पढती रही
गुड्डे गुडिया की दुनिया भी बसाती रही।
जब आई बाली उम्र
छोटे बड़े सपने सतरंगी बुनती रही
पर जब देखी परम्परा की रीति
सीखी कढ़ाई-बुनाई और खाने की विधि
माँ ने याद दिलाई दादी की बातें
"बेटियाँ होती हैं पराई"
डोली में बैठकर फिर सजन घर चली।
पर उसने दूसरी राह भी सपनों में रची थी
जब वह अपने नाम से जानी जाऐगी
रुढ़ियों की छाया से दूर होकर
अपनी एक अलग पहचान बनाऐगी
इसलिए साथ उसने यह दूसरी राह भी चुनी
करके एम. ए, लगी वो फिर बच्चों को पढ़ाने।
फिर वो दिन भी खास होगा
जब गर्व का अहसास होगा
जब ये कली पूरा फूल बनेगी
मैडम से प्रिंसीपल मैडम बनेगी।
सबको प्यारा सा अहसास हैं
आज के दिन खिली थी एक कली
एक गाँव के गौबर से पूते आँगन में।
देखकर दुनिया यह हल्की सी मुस्कराई थी
चारपाई पर लेटे-2 नन्हें पैरों से फिर साईकिल चलाई
पग-पग चलती रही, धीरे-धीरे बढ़ती रही ।
सहेलियों संग गिटों से खेलती रही
आईस-पाईस में छिपते छिपाते
गाँव की पाठशाला में क ख ग घ पढती रही
गुड्डे गुडिया की दुनिया भी बसाती रही।
जब आई बाली उम्र
छोटे बड़े सपने सतरंगी बुनती रही
पर जब देखी परम्परा की रीति
सीखी कढ़ाई-बुनाई और खाने की विधि
माँ ने याद दिलाई दादी की बातें
"बेटियाँ होती हैं पराई"
डोली में बैठकर फिर सजन घर चली।
पर उसने दूसरी राह भी सपनों में रची थी
जब वह अपने नाम से जानी जाऐगी
रुढ़ियों की छाया से दूर होकर
अपनी एक अलग पहचान बनाऐगी
इसलिए साथ उसने यह दूसरी राह भी चुनी
करके एम. ए, लगी वो फिर बच्चों को पढ़ाने।
फिर वो दिन भी खास होगा
जब गर्व का अहसास होगा
जब ये कली पूरा फूल बनेगी
मैडम से प्रिंसीपल मैडम बनेगी।
Thursday, April 1, 2010
अमिताभ जी की नजर में नाटककार डा. चरणदास सिंद्धू जी (अंतिम भाग)
14.3.1997 को डॉ. राजेन्द्र पाल को दिये गये एक साक्षात्कार में डॉ.चरणदास सिद्धू ने नास्तिकता पर अपने विचार प्रकट किये हैं। ( नाट्यकला और मेरा तजुरबा, पृ.141) यह मुद्दा वाकई गम्भीर है। डॉ.सिद्धू नास्तिक हैं। पहले नहीं थे, बाद में हुए। ( इंगलिश ऑनर्स करते समय मैने, प्राइवेट कैंडिडेट के तौर पर, प्रभाकर ( हिन्दी) तथा विद्वानी (पंजाबी) के इम्तिहान पास किये। तब तक मैं आम लोगों जैसा वहमी था...।' इसी पुस्तक से , पृ.142) यह जो होना होता है उसे मैं ठीक वैसे ही लेता हूं जैसे कोई पहले पढाई किसी विषय की कर रहा होता है और बाद में करियर कोई दूसरा चुन लेता है। उन्होनें एक जगह कहा है- "मैं नास्तिक हूं। बिना झिझक हर एक को बताता हूं कि मुझे कल्पित रब में विश्वास नहीं है।..... मैं मुश्किल से मुश्किल घडी में भी किसी दैवी ताकत से, प्रार्थना करके, भीख नहीं मांगता। मगर मैं जानबूझकर आस्तिक लोगों की बेइज्जती नहीं करता। मुझे कमजोर वहमी लोगों से हमदर्दी है। काश उनके पल्ले सोच समझ होती। अंदरूनी शक्ति होती...।" मुझे याद आते हैं सर्वपल्ली राधाकृष्णन, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गान्धी, विनोबा भावे आदि। मुझे सोचना होगा कि क्या ये कमजोर थे? या वहमी थे? या फिर इनमे अन्दरूनी शक्ति का अभाव था? इस मुद्दे पर ज्यादा कुछ कतई नहीं लिखना चाहुंगा, क्योंकि मैने जाना है कि दुनिया के जितने भी नास्तिक हैं वे तमाम लोग बहुत बडे आस्तिक होते हैं। अपने नास्तिक होने के लिये वे जिस रब या ईश्वर का विरोध करते रहते हैं उम्रभर, तर्क देते हैं, अमान्य करने की कोशिश करते हैं और बहुत कुछ आस्तिकता पर कहते हुए यह भी कहते हैं कि जानबूझकर आस्तिक लोगों को बेइज्जत नहीं करता तब उससे लगता है कि ये 'रब' काल्पनिक तो कतई नहीं हो सकता। वरना इतना विरोध क्यों? खैर..। ऐसे में मेरी आस्तिकता और अधिक दृढ हो जाती है। बरनर्ड शॉ, बरट्रेंड रसल, सैमुअल बटलर, टॉमस हार्डी तथा कई यूरोप व अमेरिका के लेखक व चिंतक-खासकर कार्ल मार्क्स की विचारधारा के प्रशंसक। मनोविज्ञान की किताबें और मिथिहास के बारे में फ्रेज़र जैसे विद्वानों के खोज ग्रंथ आदि ने डॉ सिद्धू को तर्कशील बनाया। भारत देश सनातन काल से आध्यात्मिक रहा है, ऐसा माना जाता है। वेद-पुराण, शास्त्र और कई तरह के दर्शनयुक्त साहित्य रचे गये, बडे से बडे साहित्यकारों द्वारा....। शायद सब फिज़ुल? मैने कहीं पढा था कि भारत जैसे अतिबुद्धिवादी देश और इसकी परम्पराओं को नष्ट करने के लिये भी विदेशों में काफी काम हुआ है। विदेशी साहित्यकारों का एक पूरा जमघट लगा..।खैर.., यह विषय सचमुच बहस के लायक नहीं है क्योंकि मेने हमेशा माना है कि तर्क समाधान नहीं देता, सिर्फ उलझाता है, भ्रमित रखता है। आखिर इस 'तर्क' का रूप भी तो ऐसा है कि इसे उल्टा कर पढे तो होता है 'कर्त', यानी 'काटना'। बस तर्क सिर्फ काट है। काट कब समाधानी हुआ? बहरहाल, इस बहस में उज्जवल पक्ष जो जीवन की प्रेरणा हो सकता है, उसे कतई नहीं भूला जा सकता।
20 बरसों के लगातार लेखन, अनुभवों को समेटने का प्रतिफल है डॉ सिद्धू की यह किताब"नाट्यकला और मेरा तजुरबा"। डॉ. सिद्धू गम्भीर चिंतक हैं। जो व्यक्ति 7वीं जमात में परिपक्व विचार पाल लेता हो उसका पूरा जीवन कैसा होगा इसकी कल्पनाभर करके समझा जा सकता है। " कुछ बन्दे मौत को जीत लेते हैं। अपने कारनामों के जरिये, कलाकृतियों द्वारा, वे अपनी जिन्दगी को अमर बना जाते हैं। मुझे चाहिये, मैं भी अपनी मेहनत सदका, दिमागी ताक़त के भरोसे, कुछ इस तरह का काम कर जाऊं, लोग मेरा काम और मेरा नाम सदियों तक याद रखें।" फिर 32 वर्ष में प्रवेश करते करते उन्होंने साध लिया कि आखिर उन्हें करना क्या है? 'कॉलेज में पढाने के साथ-साथ मैं नाटक पढने, देखने, लिखने और खेलने पर शेष जिन्दगी लगाउंगा।' आप सोच सकते हैं कि जिला होशियारपुर का एक देहाती लडका, प्रोफेसर बनता है, नाटक लिखता है, खेलता है, आई ए एस के इम्तिहान में सफल होता है किंतु नाटक के शौक में वो उसे त्यागता है, अमेरिका जाता है, अंग्रेज़ी का डबल एमए, फर्स्टक्लास, पीएचडी और तमाम नाटककारों का गहन अध्ययन करता हुआ युरोप की यात्रा करता है, तेहरान होते हुए स्वदेश लौटता है। और इस बीच अपने लक्ष्य को बेधने के लिये पूरी तरह तैयार हो जाता है...। क्या यह सब सहज हो सका? नहीं। लगन, मेहनत और दृढ विश्वास का नतीजा था कि डॉ. सिद्धू ने जो ठाना था उस दिशा में वे अपना वज़ूद ले, निकल पडे थे, संघर्ष खत्म नहीं बल्कि नये नये सिरे से उठ खडे हुए थे। अपनी पूरी जिंदगी कभी हार नहीं मानी। उन्होने जो देखा वो लिखा, देहात का परिवेश, सामाजिक समस्यायें, धर्म, कर्म आदि तमाम गूढ बातों का चिंतन-मनन उनके नाटकों में उतरता रहा। मंचित होता रहा। उनकी धुन, लगन, मेहनत देख देख कर उनके छात्र, दोस्त आदि जो उनके करीब आया सबके सब उनके मुरीद होते चले गये। आलोचना नहीं हुई, ऐसा भी कभी नहीं हुआ, या यूं कहें ज्यादा आलोचनायें ही हुई और सिद्धू साहब कभी डिगे नहीं। उनका पूरा परिवार उनके साथ सतत लगा रहा। और जीवन भी क्या, कि जो देखा वो कहा, कोई लाग-लपेट नहीं, कोई भय नहीं, कोई चिंता नहीं। थियेटर का यह बिरला कलाकार धनी नहीं था, न हुआ और न ही इसका कोई उपक्रम किया। वो सिर्फ नाटक के लिये पैदा हुए। पूरी इमानदारी से नाटक को समर्पित रहे। जीवन में, अपने काम में जब भी आप इमानदार होते हैं तो सफलता भी इमानदार ही प्राप्त होती है जो लगभग आदमी को अमर कर देती है। तभी तो मुझ जैसा भी उन पर कुछ लिखता है, उन्हें याद करता है और राह बनाता है कुछ ऐसे ही जीवन जीने या हौसले के साथ रहने की। यह व्यक्ति के कार्य ही हैं जो जग में विस्तारित होते चले जाते हैं।
अपने कई नाटकों का विशेष ज़िक्र किया है चरणदासजी ने, जैसे इन्दूमती सत्यदेव, स्वामीजी, भजनो आदि, बस यह जान सका हूं कि नाटक क्या हैं, किस पर आधारित है और उसका मूल क्या है। मगर वो कैसे हैं यह तो देख कर या उसे पढकर ही पता लग सकता है इसलिये नाटकों पर मैं कुछ नहीं लिख सकता। सिद्धू साहब की दूसरी पुस्तक जो मेरे पास है (नाटककार, चरणदास सिद्धू, शब्द-चित्र), उसका सम्पादन रवि तनेजा ने किया है और कुल 29 लोग, जिनमें साहित्यकार, नाटककार, समीक्षक, लेखक, छात्र आदि सब कोई समाहित हैं जिन्होंने एकमत से सिद्धू साहब के जीवन के पहलुओं को अपने-अपने तरीके से व्यक्त किया है। अपने संस्मरण व्यक्त किये हैं। असल में यही सब तो होती है, जीवन की पूंजी। जीवन की सफलता। सिर ऊंचा उठा कर चलते रहने की शक्ति। ऐसे व्यक्ति दुर्लभ होते है। बिरले होते हैं। आप कह सकते हैं कि सचमुच के इंसान होते हैं। ताज्जुब और विडम्बना यह कि 'इंसान' को पढने, जानने, समझने वाले आज कम होते चले जा रहे हैं।
नोट- इस सीरीज के तीन भाग है जिन्हें पढने के लिए आप नीचे दिए लिंक पर क्लीक करें।
पहला भाग
अमिताभ जी की नजर में नाटककार डा. चरणदास सिंद्धू जी ( पहला भाग)
दूसरा भाग
अमिताभ जी की नजर में नाटककार डा. चरणदास सिंद्धू जी ( दूसरा भाग)
और इस सीरिज के लेखक श्री अमिताभ श्रीवास्तव जी का ब्लोग पता हैं।
अमिताभ श्रीवास्तव जी का ब्लोग
20 बरसों के लगातार लेखन, अनुभवों को समेटने का प्रतिफल है डॉ सिद्धू की यह किताब"नाट्यकला और मेरा तजुरबा"। डॉ. सिद्धू गम्भीर चिंतक हैं। जो व्यक्ति 7वीं जमात में परिपक्व विचार पाल लेता हो उसका पूरा जीवन कैसा होगा इसकी कल्पनाभर करके समझा जा सकता है। " कुछ बन्दे मौत को जीत लेते हैं। अपने कारनामों के जरिये, कलाकृतियों द्वारा, वे अपनी जिन्दगी को अमर बना जाते हैं। मुझे चाहिये, मैं भी अपनी मेहनत सदका, दिमागी ताक़त के भरोसे, कुछ इस तरह का काम कर जाऊं, लोग मेरा काम और मेरा नाम सदियों तक याद रखें।" फिर 32 वर्ष में प्रवेश करते करते उन्होंने साध लिया कि आखिर उन्हें करना क्या है? 'कॉलेज में पढाने के साथ-साथ मैं नाटक पढने, देखने, लिखने और खेलने पर शेष जिन्दगी लगाउंगा।' आप सोच सकते हैं कि जिला होशियारपुर का एक देहाती लडका, प्रोफेसर बनता है, नाटक लिखता है, खेलता है, आई ए एस के इम्तिहान में सफल होता है किंतु नाटक के शौक में वो उसे त्यागता है, अमेरिका जाता है, अंग्रेज़ी का डबल एमए, फर्स्टक्लास, पीएचडी और तमाम नाटककारों का गहन अध्ययन करता हुआ युरोप की यात्रा करता है, तेहरान होते हुए स्वदेश लौटता है। और इस बीच अपने लक्ष्य को बेधने के लिये पूरी तरह तैयार हो जाता है...। क्या यह सब सहज हो सका? नहीं। लगन, मेहनत और दृढ विश्वास का नतीजा था कि डॉ. सिद्धू ने जो ठाना था उस दिशा में वे अपना वज़ूद ले, निकल पडे थे, संघर्ष खत्म नहीं बल्कि नये नये सिरे से उठ खडे हुए थे। अपनी पूरी जिंदगी कभी हार नहीं मानी। उन्होने जो देखा वो लिखा, देहात का परिवेश, सामाजिक समस्यायें, धर्म, कर्म आदि तमाम गूढ बातों का चिंतन-मनन उनके नाटकों में उतरता रहा। मंचित होता रहा। उनकी धुन, लगन, मेहनत देख देख कर उनके छात्र, दोस्त आदि जो उनके करीब आया सबके सब उनके मुरीद होते चले गये। आलोचना नहीं हुई, ऐसा भी कभी नहीं हुआ, या यूं कहें ज्यादा आलोचनायें ही हुई और सिद्धू साहब कभी डिगे नहीं। उनका पूरा परिवार उनके साथ सतत लगा रहा। और जीवन भी क्या, कि जो देखा वो कहा, कोई लाग-लपेट नहीं, कोई भय नहीं, कोई चिंता नहीं। थियेटर का यह बिरला कलाकार धनी नहीं था, न हुआ और न ही इसका कोई उपक्रम किया। वो सिर्फ नाटक के लिये पैदा हुए। पूरी इमानदारी से नाटक को समर्पित रहे। जीवन में, अपने काम में जब भी आप इमानदार होते हैं तो सफलता भी इमानदार ही प्राप्त होती है जो लगभग आदमी को अमर कर देती है। तभी तो मुझ जैसा भी उन पर कुछ लिखता है, उन्हें याद करता है और राह बनाता है कुछ ऐसे ही जीवन जीने या हौसले के साथ रहने की। यह व्यक्ति के कार्य ही हैं जो जग में विस्तारित होते चले जाते हैं।
अपने कई नाटकों का विशेष ज़िक्र किया है चरणदासजी ने, जैसे इन्दूमती सत्यदेव, स्वामीजी, भजनो आदि, बस यह जान सका हूं कि नाटक क्या हैं, किस पर आधारित है और उसका मूल क्या है। मगर वो कैसे हैं यह तो देख कर या उसे पढकर ही पता लग सकता है इसलिये नाटकों पर मैं कुछ नहीं लिख सकता। सिद्धू साहब की दूसरी पुस्तक जो मेरे पास है (नाटककार, चरणदास सिद्धू, शब्द-चित्र), उसका सम्पादन रवि तनेजा ने किया है और कुल 29 लोग, जिनमें साहित्यकार, नाटककार, समीक्षक, लेखक, छात्र आदि सब कोई समाहित हैं जिन्होंने एकमत से सिद्धू साहब के जीवन के पहलुओं को अपने-अपने तरीके से व्यक्त किया है। अपने संस्मरण व्यक्त किये हैं। असल में यही सब तो होती है, जीवन की पूंजी। जीवन की सफलता। सिर ऊंचा उठा कर चलते रहने की शक्ति। ऐसे व्यक्ति दुर्लभ होते है। बिरले होते हैं। आप कह सकते हैं कि सचमुच के इंसान होते हैं। ताज्जुब और विडम्बना यह कि 'इंसान' को पढने, जानने, समझने वाले आज कम होते चले जा रहे हैं।
नोट- इस सीरीज के तीन भाग है जिन्हें पढने के लिए आप नीचे दिए लिंक पर क्लीक करें।
पहला भाग
अमिताभ जी की नजर में नाटककार डा. चरणदास सिंद्धू जी ( पहला भाग)
दूसरा भाग
अमिताभ जी की नजर में नाटककार डा. चरणदास सिंद्धू जी ( दूसरा भाग)
और इस सीरिज के लेखक श्री अमिताभ श्रीवास्तव जी का ब्लोग पता हैं।
अमिताभ श्रीवास्तव जी का ब्लोग
Tuesday, March 30, 2010
अमिताभ जी की नजर में डा. चरणदास सिंद्धू जी ( भाग-2)
अनुभव जब एकत्र हो जाते हैं तो वे रिसने लगते हैं। मस्तिष्क में छिद्र बना लेते हैं और ढुलकने लगते हैं, कभी-कभी हमे लगता है अपनी खूबियों को बखानने के लिये व्यक्ति लिख रहा है, बोल रहा है या समझा रहा है। किंतु असल होता यह है कि अनुभव बहते हैं जिसे रोक पाना लगभग असम्भव होता है। नदियां बहुत सारी हैं, कुछ बेहद पवित्र मानी जाती है इसलिये उसमें डुबकी लगाना जीवन सार्थक करना माना जाता है। हालांकि तमाम नदियां लगभग एक सी होती हैं, कल कल कर बहना जानती हैं, उन्हें हम पवित्र-साधारण-अपवित्र आदि भले ही कह लें किंतु किसी भी नदी को इससे कोई मतलब नहीं होता कि उसे कैसा माना जा रहा है या वो कैसी है? वो तो निरंतर बहती है, सागर में जा मिलती है। आप चाहे तो उसके पानी का सदुपयोग कर लें या उसे व्यय कर लें, या फिर नज़रअंदाज़ कर लें, यह सब कुछ हम पर निर्भर होता है। ठीक ऐसे ही आदमी के अनुभव होते हैं, जो रिसते हैं, कलम के माध्यम से या प्रवचन के माध्यम से या किसी भी प्रकार के चल-अचल माध्यम से। कौन किसका अनुभव, किस प्रकार गाह्य करता है यह उसकी मानसिक स्थिति या शक़्ति पर निर्भर है। " मेरी दृष्टि में, एक सुखी जिन्दगी वो होती है जिसमें जरूरी आराम की चीज़े हों, मगर ऐशपरस्ती न हो। इसमें किसी किस्म का अभाव महसूस न हो। सब्र संतोष हो। इसके लिये आवश्यक है कि आदमी तगडा काम करे जो इंसानियत की भलाई की खातिर हो। सबसे अहम बात-एक सुखी जीवन रिश्तेदारों और दोस्तों की संगत में, दूसरों के वास्ते जिया जाय।" ( 'नाटककार चरणदास सिद्धू, शब्द चित्र', - सुखी जीवन-मेरा नज़रिया पृ.17) डॉ. चरणदास सिद्धू अब जाकर यह कह सके, यानी 44-45 वर्षों बाद, तो इसे क्या उनके जीवन का निचोड नहीं माना जा सकता? मगर ये ' दूसरों के वास्ते जिया जाय' वाला कथन मुझे थोडा सा खनकता है क्योंकि पूरी जिन्दगी उन्होंने नाटक को समर्पित की, उनका परिवार उनके समर्पण में सलंग्न रहा तो इसे मैं दूसरों के वास्ते जीना नहीं बल्कि अपने लक्ष्य के वास्ते जीना ज्यादा समझता हूं। वैसे भी जब आप किसी लक्ष्य पर निशाना साधते हैं तो शरीर की तमाम इन्द्रियां आपके मस्तिष्क की गिरफ्त में होती है और आपको सिर्फ और सिर्फ लक्ष्य दिखता है, ऐसे में दूसरा कुछ कैसे सूझ सकता है? यह सुखद रहा कि सिद्धू साहब को जैसा परिवार मिला वो उनके हित के अनुरूप मिला। यानी यदि जितने भी वे सफल रहे हैं उनके परिवार की वज़ह भी उनकी सफलता के पीछे है और यह उन्होंने स्वीकारा भी है। खैर..। पर यह तो नीरा दर्शन हुआ, जिसमें जीवन के लौकिक रास्तों से हटकर बात होती है। पर असल यही है कि सिद्धू साहब बिरले व्यक्ति ठहरे जिनका अपना दर्शन किसी गीता या कुरान, बाइबल से कम नहीं। यथार्थवादी दर्शन। और यह सब भी इसलिये कि उन्होंने जिन्दगी को जिया है, नाटकों में नाटक करके, तो यथार्थ में उसे मंचित करके। उनकी पुस्तक 'नाट्य कला और मेरा तजुरबा' जब पढ रहा था तो उसमे पहले पहल लगा कि व्यक्ति अपनी महत्ता का बखान कर रहा है, या करवा रहा है। किताब सबसे उत्तम जरिया होता है। मगर बाद में लगा कि व्यक्ति यदि अपनी महत्ता बखान भी रहा है तो फिज़ुल नहीं, बल्कि वो वैसा है भी। और यदि वो वैसा है तो उसका फर्ज़ बनता है कि वैसा ही लिखे या लिखवाये। कोई भी कलाकार हो, उसे अपनी कला का प्रतिष्ठित प्रतिफल मिले, यह भाव सदैव उसके दिलो दिमाग में पलता रहता है। यानी यह चाहत कोई अपराध नहीं। सामान्य सी चाहत है। इस सामान्य सी चाहत में रह कर असामान्य जिन्दगी जी लेने वाले शख्स को ही मैरी नज़र महान मानती है। महान मानना दो तरह से होता है, एक तो आप उक्त व्यक्ति से प्रभावित हो जायें, दूसरे आप व्यक्ति का बारिकी से अध्ययन करें, उसके गुण-दोषों की विवेचना करें। मैं दूसरे तरह को ज्यादा महत्व देता हूं। इसीलिये जल्दी किसी से प्रभावित भी नहीं होता, या यूं कहें प्रभावित होता ही नहीं हूं, क्योंकि यहां आपका अस्तित्व शून्य हो जाता है, आप अपनी सोच से हट जाते हैं और प्रभाववश उक्त व्यक्ति के तमाम अच्छे-बुरे विचार स्वीकार करते चले जाते हैं। ऐसे में तो न उस व्यक्ति की सही पहचान हो सकती है, न वह व्यक्ति खुद अपने लक्ष्य में सफल माना जा सकता है। फिर एक धारणा यह भी बनाई जा सकती है कि आखिर मैं किस लाभ के लिये किसी व्यक्ति के सन्दर्भ में बात कर रहा हूं? और क्या मुझे ऐसा कोई अधिकार है कि किसी व्यक्ति के जीवन को लेकर उसकी अच्छाई-बुराई लिखूं? नहीं, मुझे किसी प्रकार का कोई अधिकार नहीं है। न ही ऐसा करने से मुझे कोई लाभ है। फिर? आमतौर पर आदमी लाभ के मद्देनज़र कार्य करता है। उसे करना भी चाहिये। जब वो ईश्वर को अपने छोटे-मोटे लाभ के लिये पटाता नज़र आता है तो किसी व्यक्ति के बारे में लिख पढकर लाभ क्यों नहीं कमाना चाहेगा? मुझे भी लाभ है। वो लाभ यह कि मुझे सुख मिलता है। किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में लिख कर जिसके माध्यम से अन्य जीवन को किसी प्रकार का रास्ता प्राप्त हो सके, बस इसका सुख। न कभी मैं सिद्धू साहब से मिला, न ही दूर दूर तक ऐसी कोई सम्भावना है कि मिलना हो। और मैं जो भी लिख रहा हूं वो सारा का सारा उनकी किताब में ही समाहित है। मैं तो सिर्फ उस लिखे को सामने रख अपनी व्याख्या कर रहा हूं, जो किसी भी प्रकार से गलत नहीं माना जा सकता। यह मैरा धर्म है कि जब किसी पुस्तक को पढता हूं तो उसे सिर्फ पढकर अलमारी के किसी कोने में सजाकर नहीं रख देता बल्कि उसके रस से अपनी छोटी ही बुद्धि से सही, सभी को सराबोर या अभिभूत करा सकने का प्रयत्न करता हूं क्योंकि कोई भी पुस्तक किसी पाठक से यही चाहती है। यह मेरी, नितांत मेरी एक ईमानदार सोच है। और मेरा कर्म, धर्म लिखना ही तो है सो मैं इसे निसंकोच निभाता हूं। और लाभ यह कि सुख मिलता है। जैसा कि सिद्धू साहब ने लिखा- " सुख तो एक सोचने की आदत है, स्थाई तौर पर अच्छा महसूस करने की हालत। सुख कभी न छूटने वाली वो आदत है जिसके जरिये आप हमेशा चीज़ों के रौशन रुख को ताकते रहें...।" मेरा रुख यही है। सुख की सोच। रोशन रुख को ताकते हुए। तो क्या, सिद्धू साहब दार्शनिक हैं? नहीं। उनका जीवन दार्शनिक है। उनके अनुभव दर्शन है। मैने उनकी किताबों से जो व्यक्तित्व पाया है उसके आधार पर ही मैं कुछ कह सकता हूं। वरना लिखना तो उन लोगों के बारे में होता है जिन्हें आप अच्छी तरह से जानते हों। और यदि मैं कहूं, मैं उनके बारे में कैसे लिख रहा हूं तो वो सिर्फ इसलिये कि मेरी जिन्दगी में उनकी किताबे आईं और उन्हीं किताबों के जरिये अपनी छोटी सी बुद्धि के सहारे बतौर समीक्षक शब्दों में उतार रहा हूं। "नाटक लिखा नहीं जाता नाटक गढा जाता है" ( नाट्य कला और मेरा तजुरबा,मुलाकातें-पृ.165) सिद्धू साहब बताते हैं। जब अपनी धुन, अपने तरह का जीवन जिसने गढ रखा हो वो कोई चीज कैसे लिख सकता है? गढ ही सकता है। काश के मुझे उनके नाटक देखने का सौभाग्य प्राप्त हो पाता? भविष्य में ही सही इंतजार किया जा सकता है। किंतु इधर 1973 से 1991 तक के सफर में उनके द्वारा जो करीब 33 नाटक रचे, लिखे गये हैं उन्हें पढने की उत्सुकता बढ गई है और यह भी तय है कि सबको धीरे धीरे पढ लूंगा। शायद तब डॉ. सिद्धू सर के नाटकों पर लिखा जा सकता है, अभी तो उनके जीवन पर ही लिखी गई किताबें मेरे पास है सो मैं सिर्फ वही लिख सकता हूं। जैसी किताब है। तो अगली पोस्ट में मिलिये और यह भी जानिये कि, हां आदमी जो ठान लेता है, वो करके ही दम लेता है। और जब दम लेता है तो उसके वो दम में बला की तसल्ली होती है। किंतु इस दम लेने के बीच उसे उम्र का बहुत बडा भाग तपा देना होता है। " स्वर्ण तप-तप कर ही तो निखरता है।" कैसे तपे सिद्धूजी? और कैसे निखरे? जरूर पढिये अगली पोस्ट में।
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