दो किलकारी
दो किलकारीयाँ घर में गूँजने से पहले
बीच रास्तें में ही कहीं दफ़न हो गई
कोई अनदेखी अनजानी डोर उन्हें खींच ले गई
बहना काका काका पुँकारती रही
माँ दर्द में कराहती हुई आवाज़ लगाती रही
दादी कहती मेरे दो फूल आओ और खिल जाओ
दादा रुँधे गले से बोल रहे
ओ मेरे राम लक्ष्मण मेरे बुढ़ापे के साथी बन जाओ
मैं ना आवाज़ मार सका, ना हाथ ही बढ़ा सका
मैं दो दो हाथ लिए भी पत्थर की मूर्ति बना खड़ा
बस देखता रहा, बस देखता रहा, बस देखता रहा ....