पिछले दिनों एक सम्मेलन में जाना हुआ जहाँ नामचीन लेखकों का जमावड़ा था। इस सम्मेलन को आयोजित किया था फाउंडेशन आफ सार्क राइटर्स एण्ड लिटरेचर संस्था ने। इस संस्था की कर्ता-धर्ता अजित कौर जी है। इनकी और इनके साथियों की मेहनत का ही नतीजा है कि यह संस्था आज भी सार्थक काम कर रही हैं। और मेरा सौभाग्य था कि मुझे बेहतरीन से बेहतरीन रचनाएं सुनने को मिलीं और नए नए विचारों की रौशनी से रुबरु भी हुआ। उन्हीं में से कुछ रचनाएं जो मैं इक़टठी कर पाया हूँ। उन्हें अपने ब्लोगगर साथियों और उन पाठकों के लिए पेश कर रहा हूँ जो नई नई रचनाओं को पढने के लिए मुझ पागल की तरह बैचेन रहते हैं। और नई नई रचनाएं इन पागलों के लिए दवा का काम करती हैं। तो साथियों आज पेश हैं सुरजीत पातर जी की पंजाबी में लिखी कविताएं "भाषा के परथाए" के नाम से। मैं पातर जी का शुक्रगुजार हूँ उन्होंने अपने कीमती समय में से समय निकालकर यह कविता भेजी। यह कविता मुझे बहुत पसंद आई। और उम्मीद आपको भी बहुत पसंद आऐगी।
भाषा के परथाए
1.
मर रही है। मेरी भाषा शब्द-शब्द
मर रही हैं। मेरी भाषा वाक्य वाक्य
अमृत वेला
नूर पहर दा तड़का
मूंह हनेरा
पहु फुटाला
धम्मी वेला
छाह वेला
सूरज सवा नेज़े
टिकी दुपहर
डीगर वेला
लोए लोए
तरकालाँ
दीवा वटी
खौपीआ
कोड़ा सोता
ढलदीआँ खित्तीआँ
तारे दा चढाअ
चिड़ी चूकणा
साझरा, सुवखता, र्सघी वेला
घड़िआँ, पहर, पल छिण, बिन्द, निमख बेचारे
मारे गये अकेले टाईम के हाथों
ये शब्द सारे
शायद इस लिए
कि टाईम के पास टाईमपीस था
हरहट की माला, कुत्ते की टिकटिक, चन्ने की ओट, गाठी के हूटे
काँजण, निसार, चककलियाँ, बूढ़े
भर भर कर खाली होती टिंडे
इन सब को तो बह जाना था
टिऊब वैल की धार में
मुझे कोई हैरानी नहीं
हैरानी तो यह है कि
अम्मी और अब्बा भी नहीं रहे
बीजी और भापा जी भी चले गये
और कितने रिशतें
अकेले आँटी और अँकल कर दिये हाल से बेहाल
और कल पंजाब के एक आँगन में
कह रहा था एक छोटा सा बाल:
पापा अपणे ट्री दे सारे लीव्ज कर रहे ने फाल
हाँ पुत्तर अपणे ट्री दे सारे लीव्ज कर रहे ने फाल
मर रही है अपणी भाषा पत्ता-पत्ता शब्द शब्द
अब तो रब ही रखा हैं अपनी भाषा का
पर रब?
रब तो खुद पड़ा है मरनहार
दोड़ी जा रही हैं उस की भूखी सँतान
उसे छोड़
गौड की पनाह में
मर रही है मेरी भाषा
मर रही हैं बाई गौड
2.
मर रही है मेरी भाषा
क्योंकि जीना चाहते है
मेरी भाषा के लोग
जीना चाहते हैं
मेरी भाषा के लोग
इस शर्त पर भी
कि मरती हैं तो मर जाये भाषा
क्या बँदे का जीते रहना
ज्यादा जरुरी हैं
कि भाषा?
हाँ जानता हूँ
आप कहेंग़े
इस शर्त पर
जो बँदा जीवित रहेगा
वह जीवित तो रहेगा
पर क्या वह बँदा रहेगा?
आप मुझे जजबाती करने की कोशिश मत करे
आप खुद ही बताएँ
अब
जब आपका रब भी
दाने दाने पर
खाने वाले का नाम
अँगरेजी में ही लिखता हैं
तो कौन बेरहम माँ बाप चाहेगा
कि उस की सँतान
डूब रही भाष के जहाज में बैठी रहे
जीता रहे मेरा बच्चा
मरती हैं तो मर जाए
तुम्हारी बूढ़ी भाषा
3.
नहीं इस तरह नही मरेगी मेरी भाषा
इस तरह नहीं मरा करती कोई भाषा
कुछ शब्दों के मरने से
नहीं मरती कोई भाषा
रब नहीं तो न सही
सतगुरु इस के सहाई होगे
इसे बचाऐगे सूफी सँत फकीर
शायर
आशिक
नाबर
योद्धे
मेरे लोग, हम, आप
हम सब के मरने के बाअद ही
मरेगी हमारी भाषा
बलकि
यह भी हो सकता है कि मारनहार हालात में घिर कर
मारनहार हालात से टक्कर लेने के लिए
और भी जीवँत हो उठे मेरी भाषा॥
सुरजीत पातर जी को दिल से शुक्रिया।
किसी को फसल के अच्छे दाम की तलाश,किसी को काम की तलाश,किसी को प्यार की तलाश, किसी को शांति की तलाश, किसी को खिलौनों की तलाश,किसी को कहानी की तलाश,किसी को प्रेमिका की तलाश, किसी को प्रेमी की तलाश,................ तलाश ही जीवन है
Monday, April 19, 2010
Tuesday, April 13, 2010
12 अप्रैल
आज का दिन खास हैं
सबको प्यारा सा अहसास हैं
आज के दिन खिली थी एक कली
एक गाँव के गौबर से पूते आँगन में।
देखकर दुनिया यह हल्की सी मुस्कराई थी
चारपाई पर लेटे-2 नन्हें पैरों से फिर साईकिल चलाई
पग-पग चलती रही, धीरे-धीरे बढ़ती रही ।
सहेलियों संग गिटों से खेलती रही
आईस-पाईस में छिपते छिपाते
गाँव की पाठशाला में क ख ग घ पढती रही
गुड्डे गुडिया की दुनिया भी बसाती रही।
जब आई बाली उम्र
छोटे बड़े सपने सतरंगी बुनती रही
पर जब देखी परम्परा की रीति
सीखी कढ़ाई-बुनाई और खाने की विधि
माँ ने याद दिलाई दादी की बातें
"बेटियाँ होती हैं पराई"
डोली में बैठकर फिर सजन घर चली।
पर उसने दूसरी राह भी सपनों में रची थी
जब वह अपने नाम से जानी जाऐगी
रुढ़ियों की छाया से दूर होकर
अपनी एक अलग पहचान बनाऐगी
इसलिए साथ उसने यह दूसरी राह भी चुनी
करके एम. ए, लगी वो फिर बच्चों को पढ़ाने।
फिर वो दिन भी खास होगा
जब गर्व का अहसास होगा
जब ये कली पूरा फूल बनेगी
मैडम से प्रिंसीपल मैडम बनेगी।
सबको प्यारा सा अहसास हैं
आज के दिन खिली थी एक कली
एक गाँव के गौबर से पूते आँगन में।
देखकर दुनिया यह हल्की सी मुस्कराई थी
चारपाई पर लेटे-2 नन्हें पैरों से फिर साईकिल चलाई
पग-पग चलती रही, धीरे-धीरे बढ़ती रही ।
सहेलियों संग गिटों से खेलती रही
आईस-पाईस में छिपते छिपाते
गाँव की पाठशाला में क ख ग घ पढती रही
गुड्डे गुडिया की दुनिया भी बसाती रही।
जब आई बाली उम्र
छोटे बड़े सपने सतरंगी बुनती रही
पर जब देखी परम्परा की रीति
सीखी कढ़ाई-बुनाई और खाने की विधि
माँ ने याद दिलाई दादी की बातें
"बेटियाँ होती हैं पराई"
डोली में बैठकर फिर सजन घर चली।
पर उसने दूसरी राह भी सपनों में रची थी
जब वह अपने नाम से जानी जाऐगी
रुढ़ियों की छाया से दूर होकर
अपनी एक अलग पहचान बनाऐगी
इसलिए साथ उसने यह दूसरी राह भी चुनी
करके एम. ए, लगी वो फिर बच्चों को पढ़ाने।
फिर वो दिन भी खास होगा
जब गर्व का अहसास होगा
जब ये कली पूरा फूल बनेगी
मैडम से प्रिंसीपल मैडम बनेगी।
Thursday, April 1, 2010
अमिताभ जी की नजर में नाटककार डा. चरणदास सिंद्धू जी (अंतिम भाग)
14.3.1997 को डॉ. राजेन्द्र पाल को दिये गये एक साक्षात्कार में डॉ.चरणदास सिद्धू ने नास्तिकता पर अपने विचार प्रकट किये हैं। ( नाट्यकला और मेरा तजुरबा, पृ.141) यह मुद्दा वाकई गम्भीर है। डॉ.सिद्धू नास्तिक हैं। पहले नहीं थे, बाद में हुए। ( इंगलिश ऑनर्स करते समय मैने, प्राइवेट कैंडिडेट के तौर पर, प्रभाकर ( हिन्दी) तथा विद्वानी (पंजाबी) के इम्तिहान पास किये। तब तक मैं आम लोगों जैसा वहमी था...।' इसी पुस्तक से , पृ.142) यह जो होना होता है उसे मैं ठीक वैसे ही लेता हूं जैसे कोई पहले पढाई किसी विषय की कर रहा होता है और बाद में करियर कोई दूसरा चुन लेता है। उन्होनें एक जगह कहा है- "मैं नास्तिक हूं। बिना झिझक हर एक को बताता हूं कि मुझे कल्पित रब में विश्वास नहीं है।..... मैं मुश्किल से मुश्किल घडी में भी किसी दैवी ताकत से, प्रार्थना करके, भीख नहीं मांगता। मगर मैं जानबूझकर आस्तिक लोगों की बेइज्जती नहीं करता। मुझे कमजोर वहमी लोगों से हमदर्दी है। काश उनके पल्ले सोच समझ होती। अंदरूनी शक्ति होती...।" मुझे याद आते हैं सर्वपल्ली राधाकृष्णन, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गान्धी, विनोबा भावे आदि। मुझे सोचना होगा कि क्या ये कमजोर थे? या वहमी थे? या फिर इनमे अन्दरूनी शक्ति का अभाव था? इस मुद्दे पर ज्यादा कुछ कतई नहीं लिखना चाहुंगा, क्योंकि मैने जाना है कि दुनिया के जितने भी नास्तिक हैं वे तमाम लोग बहुत बडे आस्तिक होते हैं। अपने नास्तिक होने के लिये वे जिस रब या ईश्वर का विरोध करते रहते हैं उम्रभर, तर्क देते हैं, अमान्य करने की कोशिश करते हैं और बहुत कुछ आस्तिकता पर कहते हुए यह भी कहते हैं कि जानबूझकर आस्तिक लोगों को बेइज्जत नहीं करता तब उससे लगता है कि ये 'रब' काल्पनिक तो कतई नहीं हो सकता। वरना इतना विरोध क्यों? खैर..। ऐसे में मेरी आस्तिकता और अधिक दृढ हो जाती है। बरनर्ड शॉ, बरट्रेंड रसल, सैमुअल बटलर, टॉमस हार्डी तथा कई यूरोप व अमेरिका के लेखक व चिंतक-खासकर कार्ल मार्क्स की विचारधारा के प्रशंसक। मनोविज्ञान की किताबें और मिथिहास के बारे में फ्रेज़र जैसे विद्वानों के खोज ग्रंथ आदि ने डॉ सिद्धू को तर्कशील बनाया। भारत देश सनातन काल से आध्यात्मिक रहा है, ऐसा माना जाता है। वेद-पुराण, शास्त्र और कई तरह के दर्शनयुक्त साहित्य रचे गये, बडे से बडे साहित्यकारों द्वारा....। शायद सब फिज़ुल? मैने कहीं पढा था कि भारत जैसे अतिबुद्धिवादी देश और इसकी परम्पराओं को नष्ट करने के लिये भी विदेशों में काफी काम हुआ है। विदेशी साहित्यकारों का एक पूरा जमघट लगा..।खैर.., यह विषय सचमुच बहस के लायक नहीं है क्योंकि मेने हमेशा माना है कि तर्क समाधान नहीं देता, सिर्फ उलझाता है, भ्रमित रखता है। आखिर इस 'तर्क' का रूप भी तो ऐसा है कि इसे उल्टा कर पढे तो होता है 'कर्त', यानी 'काटना'। बस तर्क सिर्फ काट है। काट कब समाधानी हुआ? बहरहाल, इस बहस में उज्जवल पक्ष जो जीवन की प्रेरणा हो सकता है, उसे कतई नहीं भूला जा सकता।
20 बरसों के लगातार लेखन, अनुभवों को समेटने का प्रतिफल है डॉ सिद्धू की यह किताब"नाट्यकला और मेरा तजुरबा"। डॉ. सिद्धू गम्भीर चिंतक हैं। जो व्यक्ति 7वीं जमात में परिपक्व विचार पाल लेता हो उसका पूरा जीवन कैसा होगा इसकी कल्पनाभर करके समझा जा सकता है। " कुछ बन्दे मौत को जीत लेते हैं। अपने कारनामों के जरिये, कलाकृतियों द्वारा, वे अपनी जिन्दगी को अमर बना जाते हैं। मुझे चाहिये, मैं भी अपनी मेहनत सदका, दिमागी ताक़त के भरोसे, कुछ इस तरह का काम कर जाऊं, लोग मेरा काम और मेरा नाम सदियों तक याद रखें।" फिर 32 वर्ष में प्रवेश करते करते उन्होंने साध लिया कि आखिर उन्हें करना क्या है? 'कॉलेज में पढाने के साथ-साथ मैं नाटक पढने, देखने, लिखने और खेलने पर शेष जिन्दगी लगाउंगा।' आप सोच सकते हैं कि जिला होशियारपुर का एक देहाती लडका, प्रोफेसर बनता है, नाटक लिखता है, खेलता है, आई ए एस के इम्तिहान में सफल होता है किंतु नाटक के शौक में वो उसे त्यागता है, अमेरिका जाता है, अंग्रेज़ी का डबल एमए, फर्स्टक्लास, पीएचडी और तमाम नाटककारों का गहन अध्ययन करता हुआ युरोप की यात्रा करता है, तेहरान होते हुए स्वदेश लौटता है। और इस बीच अपने लक्ष्य को बेधने के लिये पूरी तरह तैयार हो जाता है...। क्या यह सब सहज हो सका? नहीं। लगन, मेहनत और दृढ विश्वास का नतीजा था कि डॉ. सिद्धू ने जो ठाना था उस दिशा में वे अपना वज़ूद ले, निकल पडे थे, संघर्ष खत्म नहीं बल्कि नये नये सिरे से उठ खडे हुए थे। अपनी पूरी जिंदगी कभी हार नहीं मानी। उन्होने जो देखा वो लिखा, देहात का परिवेश, सामाजिक समस्यायें, धर्म, कर्म आदि तमाम गूढ बातों का चिंतन-मनन उनके नाटकों में उतरता रहा। मंचित होता रहा। उनकी धुन, लगन, मेहनत देख देख कर उनके छात्र, दोस्त आदि जो उनके करीब आया सबके सब उनके मुरीद होते चले गये। आलोचना नहीं हुई, ऐसा भी कभी नहीं हुआ, या यूं कहें ज्यादा आलोचनायें ही हुई और सिद्धू साहब कभी डिगे नहीं। उनका पूरा परिवार उनके साथ सतत लगा रहा। और जीवन भी क्या, कि जो देखा वो कहा, कोई लाग-लपेट नहीं, कोई भय नहीं, कोई चिंता नहीं। थियेटर का यह बिरला कलाकार धनी नहीं था, न हुआ और न ही इसका कोई उपक्रम किया। वो सिर्फ नाटक के लिये पैदा हुए। पूरी इमानदारी से नाटक को समर्पित रहे। जीवन में, अपने काम में जब भी आप इमानदार होते हैं तो सफलता भी इमानदार ही प्राप्त होती है जो लगभग आदमी को अमर कर देती है। तभी तो मुझ जैसा भी उन पर कुछ लिखता है, उन्हें याद करता है और राह बनाता है कुछ ऐसे ही जीवन जीने या हौसले के साथ रहने की। यह व्यक्ति के कार्य ही हैं जो जग में विस्तारित होते चले जाते हैं।
अपने कई नाटकों का विशेष ज़िक्र किया है चरणदासजी ने, जैसे इन्दूमती सत्यदेव, स्वामीजी, भजनो आदि, बस यह जान सका हूं कि नाटक क्या हैं, किस पर आधारित है और उसका मूल क्या है। मगर वो कैसे हैं यह तो देख कर या उसे पढकर ही पता लग सकता है इसलिये नाटकों पर मैं कुछ नहीं लिख सकता। सिद्धू साहब की दूसरी पुस्तक जो मेरे पास है (नाटककार, चरणदास सिद्धू, शब्द-चित्र), उसका सम्पादन रवि तनेजा ने किया है और कुल 29 लोग, जिनमें साहित्यकार, नाटककार, समीक्षक, लेखक, छात्र आदि सब कोई समाहित हैं जिन्होंने एकमत से सिद्धू साहब के जीवन के पहलुओं को अपने-अपने तरीके से व्यक्त किया है। अपने संस्मरण व्यक्त किये हैं। असल में यही सब तो होती है, जीवन की पूंजी। जीवन की सफलता। सिर ऊंचा उठा कर चलते रहने की शक्ति। ऐसे व्यक्ति दुर्लभ होते है। बिरले होते हैं। आप कह सकते हैं कि सचमुच के इंसान होते हैं। ताज्जुब और विडम्बना यह कि 'इंसान' को पढने, जानने, समझने वाले आज कम होते चले जा रहे हैं।
नोट- इस सीरीज के तीन भाग है जिन्हें पढने के लिए आप नीचे दिए लिंक पर क्लीक करें।
पहला भाग
अमिताभ जी की नजर में नाटककार डा. चरणदास सिंद्धू जी ( पहला भाग)
दूसरा भाग
अमिताभ जी की नजर में नाटककार डा. चरणदास सिंद्धू जी ( दूसरा भाग)
और इस सीरिज के लेखक श्री अमिताभ श्रीवास्तव जी का ब्लोग पता हैं।
अमिताभ श्रीवास्तव जी का ब्लोग
20 बरसों के लगातार लेखन, अनुभवों को समेटने का प्रतिफल है डॉ सिद्धू की यह किताब"नाट्यकला और मेरा तजुरबा"। डॉ. सिद्धू गम्भीर चिंतक हैं। जो व्यक्ति 7वीं जमात में परिपक्व विचार पाल लेता हो उसका पूरा जीवन कैसा होगा इसकी कल्पनाभर करके समझा जा सकता है। " कुछ बन्दे मौत को जीत लेते हैं। अपने कारनामों के जरिये, कलाकृतियों द्वारा, वे अपनी जिन्दगी को अमर बना जाते हैं। मुझे चाहिये, मैं भी अपनी मेहनत सदका, दिमागी ताक़त के भरोसे, कुछ इस तरह का काम कर जाऊं, लोग मेरा काम और मेरा नाम सदियों तक याद रखें।" फिर 32 वर्ष में प्रवेश करते करते उन्होंने साध लिया कि आखिर उन्हें करना क्या है? 'कॉलेज में पढाने के साथ-साथ मैं नाटक पढने, देखने, लिखने और खेलने पर शेष जिन्दगी लगाउंगा।' आप सोच सकते हैं कि जिला होशियारपुर का एक देहाती लडका, प्रोफेसर बनता है, नाटक लिखता है, खेलता है, आई ए एस के इम्तिहान में सफल होता है किंतु नाटक के शौक में वो उसे त्यागता है, अमेरिका जाता है, अंग्रेज़ी का डबल एमए, फर्स्टक्लास, पीएचडी और तमाम नाटककारों का गहन अध्ययन करता हुआ युरोप की यात्रा करता है, तेहरान होते हुए स्वदेश लौटता है। और इस बीच अपने लक्ष्य को बेधने के लिये पूरी तरह तैयार हो जाता है...। क्या यह सब सहज हो सका? नहीं। लगन, मेहनत और दृढ विश्वास का नतीजा था कि डॉ. सिद्धू ने जो ठाना था उस दिशा में वे अपना वज़ूद ले, निकल पडे थे, संघर्ष खत्म नहीं बल्कि नये नये सिरे से उठ खडे हुए थे। अपनी पूरी जिंदगी कभी हार नहीं मानी। उन्होने जो देखा वो लिखा, देहात का परिवेश, सामाजिक समस्यायें, धर्म, कर्म आदि तमाम गूढ बातों का चिंतन-मनन उनके नाटकों में उतरता रहा। मंचित होता रहा। उनकी धुन, लगन, मेहनत देख देख कर उनके छात्र, दोस्त आदि जो उनके करीब आया सबके सब उनके मुरीद होते चले गये। आलोचना नहीं हुई, ऐसा भी कभी नहीं हुआ, या यूं कहें ज्यादा आलोचनायें ही हुई और सिद्धू साहब कभी डिगे नहीं। उनका पूरा परिवार उनके साथ सतत लगा रहा। और जीवन भी क्या, कि जो देखा वो कहा, कोई लाग-लपेट नहीं, कोई भय नहीं, कोई चिंता नहीं। थियेटर का यह बिरला कलाकार धनी नहीं था, न हुआ और न ही इसका कोई उपक्रम किया। वो सिर्फ नाटक के लिये पैदा हुए। पूरी इमानदारी से नाटक को समर्पित रहे। जीवन में, अपने काम में जब भी आप इमानदार होते हैं तो सफलता भी इमानदार ही प्राप्त होती है जो लगभग आदमी को अमर कर देती है। तभी तो मुझ जैसा भी उन पर कुछ लिखता है, उन्हें याद करता है और राह बनाता है कुछ ऐसे ही जीवन जीने या हौसले के साथ रहने की। यह व्यक्ति के कार्य ही हैं जो जग में विस्तारित होते चले जाते हैं।
अपने कई नाटकों का विशेष ज़िक्र किया है चरणदासजी ने, जैसे इन्दूमती सत्यदेव, स्वामीजी, भजनो आदि, बस यह जान सका हूं कि नाटक क्या हैं, किस पर आधारित है और उसका मूल क्या है। मगर वो कैसे हैं यह तो देख कर या उसे पढकर ही पता लग सकता है इसलिये नाटकों पर मैं कुछ नहीं लिख सकता। सिद्धू साहब की दूसरी पुस्तक जो मेरे पास है (नाटककार, चरणदास सिद्धू, शब्द-चित्र), उसका सम्पादन रवि तनेजा ने किया है और कुल 29 लोग, जिनमें साहित्यकार, नाटककार, समीक्षक, लेखक, छात्र आदि सब कोई समाहित हैं जिन्होंने एकमत से सिद्धू साहब के जीवन के पहलुओं को अपने-अपने तरीके से व्यक्त किया है। अपने संस्मरण व्यक्त किये हैं। असल में यही सब तो होती है, जीवन की पूंजी। जीवन की सफलता। सिर ऊंचा उठा कर चलते रहने की शक्ति। ऐसे व्यक्ति दुर्लभ होते है। बिरले होते हैं। आप कह सकते हैं कि सचमुच के इंसान होते हैं। ताज्जुब और विडम्बना यह कि 'इंसान' को पढने, जानने, समझने वाले आज कम होते चले जा रहे हैं।
नोट- इस सीरीज के तीन भाग है जिन्हें पढने के लिए आप नीचे दिए लिंक पर क्लीक करें।
पहला भाग
अमिताभ जी की नजर में नाटककार डा. चरणदास सिंद्धू जी ( पहला भाग)
दूसरा भाग
अमिताभ जी की नजर में नाटककार डा. चरणदास सिंद्धू जी ( दूसरा भाग)
और इस सीरिज के लेखक श्री अमिताभ श्रीवास्तव जी का ब्लोग पता हैं।
अमिताभ श्रीवास्तव जी का ब्लोग
Tuesday, March 30, 2010
अमिताभ जी की नजर में डा. चरणदास सिंद्धू जी ( भाग-2)
अनुभव जब एकत्र हो जाते हैं तो वे रिसने लगते हैं। मस्तिष्क में छिद्र बना लेते हैं और ढुलकने लगते हैं, कभी-कभी हमे लगता है अपनी खूबियों को बखानने के लिये व्यक्ति लिख रहा है, बोल रहा है या समझा रहा है। किंतु असल होता यह है कि अनुभव बहते हैं जिसे रोक पाना लगभग असम्भव होता है। नदियां बहुत सारी हैं, कुछ बेहद पवित्र मानी जाती है इसलिये उसमें डुबकी लगाना जीवन सार्थक करना माना जाता है। हालांकि तमाम नदियां लगभग एक सी होती हैं, कल कल कर बहना जानती हैं, उन्हें हम पवित्र-साधारण-अपवित्र आदि भले ही कह लें किंतु किसी भी नदी को इससे कोई मतलब नहीं होता कि उसे कैसा माना जा रहा है या वो कैसी है? वो तो निरंतर बहती है, सागर में जा मिलती है। आप चाहे तो उसके पानी का सदुपयोग कर लें या उसे व्यय कर लें, या फिर नज़रअंदाज़ कर लें, यह सब कुछ हम पर निर्भर होता है। ठीक ऐसे ही आदमी के अनुभव होते हैं, जो रिसते हैं, कलम के माध्यम से या प्रवचन के माध्यम से या किसी भी प्रकार के चल-अचल माध्यम से। कौन किसका अनुभव, किस प्रकार गाह्य करता है यह उसकी मानसिक स्थिति या शक़्ति पर निर्भर है। " मेरी दृष्टि में, एक सुखी जिन्दगी वो होती है जिसमें जरूरी आराम की चीज़े हों, मगर ऐशपरस्ती न हो। इसमें किसी किस्म का अभाव महसूस न हो। सब्र संतोष हो। इसके लिये आवश्यक है कि आदमी तगडा काम करे जो इंसानियत की भलाई की खातिर हो। सबसे अहम बात-एक सुखी जीवन रिश्तेदारों और दोस्तों की संगत में, दूसरों के वास्ते जिया जाय।" ( 'नाटककार चरणदास सिद्धू, शब्द चित्र', - सुखी जीवन-मेरा नज़रिया पृ.17) डॉ. चरणदास सिद्धू अब जाकर यह कह सके, यानी 44-45 वर्षों बाद, तो इसे क्या उनके जीवन का निचोड नहीं माना जा सकता? मगर ये ' दूसरों के वास्ते जिया जाय' वाला कथन मुझे थोडा सा खनकता है क्योंकि पूरी जिन्दगी उन्होंने नाटक को समर्पित की, उनका परिवार उनके समर्पण में सलंग्न रहा तो इसे मैं दूसरों के वास्ते जीना नहीं बल्कि अपने लक्ष्य के वास्ते जीना ज्यादा समझता हूं। वैसे भी जब आप किसी लक्ष्य पर निशाना साधते हैं तो शरीर की तमाम इन्द्रियां आपके मस्तिष्क की गिरफ्त में होती है और आपको सिर्फ और सिर्फ लक्ष्य दिखता है, ऐसे में दूसरा कुछ कैसे सूझ सकता है? यह सुखद रहा कि सिद्धू साहब को जैसा परिवार मिला वो उनके हित के अनुरूप मिला। यानी यदि जितने भी वे सफल रहे हैं उनके परिवार की वज़ह भी उनकी सफलता के पीछे है और यह उन्होंने स्वीकारा भी है। खैर..। पर यह तो नीरा दर्शन हुआ, जिसमें जीवन के लौकिक रास्तों से हटकर बात होती है। पर असल यही है कि सिद्धू साहब बिरले व्यक्ति ठहरे जिनका अपना दर्शन किसी गीता या कुरान, बाइबल से कम नहीं। यथार्थवादी दर्शन। और यह सब भी इसलिये कि उन्होंने जिन्दगी को जिया है, नाटकों में नाटक करके, तो यथार्थ में उसे मंचित करके। उनकी पुस्तक 'नाट्य कला और मेरा तजुरबा' जब पढ रहा था तो उसमे पहले पहल लगा कि व्यक्ति अपनी महत्ता का बखान कर रहा है, या करवा रहा है। किताब सबसे उत्तम जरिया होता है। मगर बाद में लगा कि व्यक्ति यदि अपनी महत्ता बखान भी रहा है तो फिज़ुल नहीं, बल्कि वो वैसा है भी। और यदि वो वैसा है तो उसका फर्ज़ बनता है कि वैसा ही लिखे या लिखवाये। कोई भी कलाकार हो, उसे अपनी कला का प्रतिष्ठित प्रतिफल मिले, यह भाव सदैव उसके दिलो दिमाग में पलता रहता है। यानी यह चाहत कोई अपराध नहीं। सामान्य सी चाहत है। इस सामान्य सी चाहत में रह कर असामान्य जिन्दगी जी लेने वाले शख्स को ही मैरी नज़र महान मानती है। महान मानना दो तरह से होता है, एक तो आप उक्त व्यक्ति से प्रभावित हो जायें, दूसरे आप व्यक्ति का बारिकी से अध्ययन करें, उसके गुण-दोषों की विवेचना करें। मैं दूसरे तरह को ज्यादा महत्व देता हूं। इसीलिये जल्दी किसी से प्रभावित भी नहीं होता, या यूं कहें प्रभावित होता ही नहीं हूं, क्योंकि यहां आपका अस्तित्व शून्य हो जाता है, आप अपनी सोच से हट जाते हैं और प्रभाववश उक्त व्यक्ति के तमाम अच्छे-बुरे विचार स्वीकार करते चले जाते हैं। ऐसे में तो न उस व्यक्ति की सही पहचान हो सकती है, न वह व्यक्ति खुद अपने लक्ष्य में सफल माना जा सकता है। फिर एक धारणा यह भी बनाई जा सकती है कि आखिर मैं किस लाभ के लिये किसी व्यक्ति के सन्दर्भ में बात कर रहा हूं? और क्या मुझे ऐसा कोई अधिकार है कि किसी व्यक्ति के जीवन को लेकर उसकी अच्छाई-बुराई लिखूं? नहीं, मुझे किसी प्रकार का कोई अधिकार नहीं है। न ही ऐसा करने से मुझे कोई लाभ है। फिर? आमतौर पर आदमी लाभ के मद्देनज़र कार्य करता है। उसे करना भी चाहिये। जब वो ईश्वर को अपने छोटे-मोटे लाभ के लिये पटाता नज़र आता है तो किसी व्यक्ति के बारे में लिख पढकर लाभ क्यों नहीं कमाना चाहेगा? मुझे भी लाभ है। वो लाभ यह कि मुझे सुख मिलता है। किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में लिख कर जिसके माध्यम से अन्य जीवन को किसी प्रकार का रास्ता प्राप्त हो सके, बस इसका सुख। न कभी मैं सिद्धू साहब से मिला, न ही दूर दूर तक ऐसी कोई सम्भावना है कि मिलना हो। और मैं जो भी लिख रहा हूं वो सारा का सारा उनकी किताब में ही समाहित है। मैं तो सिर्फ उस लिखे को सामने रख अपनी व्याख्या कर रहा हूं, जो किसी भी प्रकार से गलत नहीं माना जा सकता। यह मैरा धर्म है कि जब किसी पुस्तक को पढता हूं तो उसे सिर्फ पढकर अलमारी के किसी कोने में सजाकर नहीं रख देता बल्कि उसके रस से अपनी छोटी ही बुद्धि से सही, सभी को सराबोर या अभिभूत करा सकने का प्रयत्न करता हूं क्योंकि कोई भी पुस्तक किसी पाठक से यही चाहती है। यह मेरी, नितांत मेरी एक ईमानदार सोच है। और मेरा कर्म, धर्म लिखना ही तो है सो मैं इसे निसंकोच निभाता हूं। और लाभ यह कि सुख मिलता है। जैसा कि सिद्धू साहब ने लिखा- " सुख तो एक सोचने की आदत है, स्थाई तौर पर अच्छा महसूस करने की हालत। सुख कभी न छूटने वाली वो आदत है जिसके जरिये आप हमेशा चीज़ों के रौशन रुख को ताकते रहें...।" मेरा रुख यही है। सुख की सोच। रोशन रुख को ताकते हुए। तो क्या, सिद्धू साहब दार्शनिक हैं? नहीं। उनका जीवन दार्शनिक है। उनके अनुभव दर्शन है। मैने उनकी किताबों से जो व्यक्तित्व पाया है उसके आधार पर ही मैं कुछ कह सकता हूं। वरना लिखना तो उन लोगों के बारे में होता है जिन्हें आप अच्छी तरह से जानते हों। और यदि मैं कहूं, मैं उनके बारे में कैसे लिख रहा हूं तो वो सिर्फ इसलिये कि मेरी जिन्दगी में उनकी किताबे आईं और उन्हीं किताबों के जरिये अपनी छोटी सी बुद्धि के सहारे बतौर समीक्षक शब्दों में उतार रहा हूं। "नाटक लिखा नहीं जाता नाटक गढा जाता है" ( नाट्य कला और मेरा तजुरबा,मुलाकातें-पृ.165) सिद्धू साहब बताते हैं। जब अपनी धुन, अपने तरह का जीवन जिसने गढ रखा हो वो कोई चीज कैसे लिख सकता है? गढ ही सकता है। काश के मुझे उनके नाटक देखने का सौभाग्य प्राप्त हो पाता? भविष्य में ही सही इंतजार किया जा सकता है। किंतु इधर 1973 से 1991 तक के सफर में उनके द्वारा जो करीब 33 नाटक रचे, लिखे गये हैं उन्हें पढने की उत्सुकता बढ गई है और यह भी तय है कि सबको धीरे धीरे पढ लूंगा। शायद तब डॉ. सिद्धू सर के नाटकों पर लिखा जा सकता है, अभी तो उनके जीवन पर ही लिखी गई किताबें मेरे पास है सो मैं सिर्फ वही लिख सकता हूं। जैसी किताब है। तो अगली पोस्ट में मिलिये और यह भी जानिये कि, हां आदमी जो ठान लेता है, वो करके ही दम लेता है। और जब दम लेता है तो उसके वो दम में बला की तसल्ली होती है। किंतु इस दम लेने के बीच उसे उम्र का बहुत बडा भाग तपा देना होता है। " स्वर्ण तप-तप कर ही तो निखरता है।" कैसे तपे सिद्धूजी? और कैसे निखरे? जरूर पढिये अगली पोस्ट में।
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