वह
रोज इंतजार किया करता था वह मेरा
डी.टी.सी की बस नम्बर 234 में
पहनकर काली पेंट और सफेद कमीज़
लगाकर आँखो पर काला चश्मा
लेकर साथ अपने एक काला बैग
चढ़ते ही बस में मेरे
बैठने की जगह बना दिया करता था
बतलाता था
खिलखिलाता था
यूँ तो शादीशुदा था
पर बातें बच्चों सी किया करता था
ना जाने कैसे और कहाँ से
सारे जहान के दुखों की खबर भी रखा करता था
खड़ा होकर स्टैण्ड से पहले ही
गेट पर पहुँच जाया करता था
उतर कर स्टैण्ड पर
छड़ी बैग से निकाल
सड़क पार किया करता था
सोचता हूँ तो सिरह उठता हूँ
कैसे हर पल वह जिया करता था