हम बाप-बेटी और पत्नी किसी एक्सीडेंट पर चर्चा कर रहे थे. बात एक्सीडेंट से होते हुए ना जाने किधर-किधर चली गई. फिर आखिर में किसी बात पर मेरे द्वारा एक दोस्त का जिक्र आ गया.
और फिर चर्चा के बिल्कुल आखिर में बेटी मेरे से मुखातिब होकर कहने लगी कि 'जब भी हम किसी रिश्ते-दोस्ती की बातें करने लगते हैं तो आपकी तरफ से आपके इन दोस्त का जिक्र आ ही जाता है. जैसे आज फिर से आ गया '
अभी फेसबुक पर आया तो पता लगा आज तो 'फ्रेंडशिप डे' है. तब से सोच रहा हूं 'फ्रेंडशिप डे' के दिन किसी दोस्त का याद आना. एक अच्छे दोस्ती की निशानी कहा जाएगा है या नहीं?
चाहे अब संपर्क ना होता हो. और ना ही अब किसी तरह की बातचीत भी होती हो!
पर मैं सोच रहा हूं कि आज के दिन वो दोस्त हो या ना हो. क्या ही फर्क पड़ता है यार. जिंदगी में बहुत कुछ घटता ही है. बहुत लोग जुड़ते हैं. कुछ लोग छूट जाते ही हैं. पर उनसे जुड़ी यादें और उनसे जुड़े किस्से तो याद ही किए जा सकते हैं. संग-संग बिताए पुराने दिनों की खुशबू को तो महसूस किया ही जा सकता है. उनमें रंग भरा जा ही सकता है. उनसे एक पेंटिंग बनाई ही जा सकती है. और फिर दिल के किसी कोने में वो सजाई भी जा ही सकती है. जिसमें जब हम लड़ते-झगड़ते हुए भी साथ-साथ 234, 108, 262, 269, 212 नंबर की बसों से सफर किया करते थे.. साथ ही स्कूल की आधी छूट्टी में रूपनगर के एक पार्क में साथ साथ बैठकर ही खाना खाया करते थे. जिसमें घर के खाने के साथ 'नैन सिंह' के छोले जरुर हुआ करते थे. वहीं साथ-साथ ही पार्क से थोड़ी दूर ही 'साधू बेला' में जाकर ठंडा-ठंडा पानी पिया करते थे. इवन बाद में साथ-साथ ही बाथरूम भी जाया करते थे क्लास के बाकी साथी इस बात का खूब मजाक भी बनाया करते थे
और हम दोनों की जोड़ी को 'जय-वीरू' की जोड़ी कहा करते थे
खैर...
पुरानी जींस और गिटार
मोहल्ले की वो छत
और मेरे यार.......

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