Monday, June 1, 2009

गली गली वह घूमता हैं।

कबाड़ी

चिड़ियों का अलार्म सुनकर
कूड़ॆ के ढेर में से वह उठता है।

डाल कंधे पर प्लास्टिक का बोरा
बिना खाये वह गली-गली घूमता है।

देख उसे कुत्ते भोंकते है
लोग नाक मुँह सिकोड़ते है।

कड़ी धूप हो या ठुठरती ठंड़
बोरे से अपना शरीर वह ढकता फिरता है।

जिन जगहों को देख हम मुँह पर रुमाल रखते है
ऐसी जगहों को देख वह मचल उठता है।

दोपहर बाद अपने घर की राह चलता है
करके बोरे को खाली वह गत्ते, प्लास्टिक और लोहे को छाँटता है।

बेचकर उस कबाड़ को कुछ रुपये कमाता है
घर आकर फिर वह चूल्हा सुलगाता है।

ना वो मोहन, ना वो हुसैन
ना वो बेदी, ना वो जोसफ कहलाता है
वो तो बस एक कबाड़ी पुकारा जाता है।

38 comments:

Manvinder said...

itni suder rachana....or bhaaw bhi esse ki man sochne ko majboor ho jae...bahut sunder....arse baad kuch achcha padne ko mila....bahut bahur bhadaaee

अमिताभ श्रीवास्तव said...

antim 3 line me saar he, aour vo is bhartiyata ka stya he/
bahut sundar likha he, saral shbdo me apni baat kahne ka jo zazbaa aapme he vo taref ke layak he/
tukbandi to nahi lagi, hnaa behtreen rachna, yatharthvadi drashtikon ko lekar he/

अल्पना वर्मा said...

'ना वो मोहन, ना वो हुसैन
ना वो बेदी, ना वो जोसफ कहलाता है
वो तो बस एक कबाड़ी पुकारा जाता है। '
एक कबाडी का खूब सही चित्रण किया है आप ने अपनी कविता में.
पेट भरने के लिए इंसान क्या क्या नहीं करता.
ख़ास कर कबाड़ बीनने वाले बच्चों की स्थिति वाकई दयनीय है.

अनिल कान्त : said...

dil ko chhoo lene wali kavita
behtreen hai bhai ji

नीरज गोस्वामी said...

वाह सुशील जी वाह...सच्चाई को उधेड़ती रचना....अद्भुत
नीरज

मीत said...

यह बेहद सच भरी रचना की है आपने...
कितने ही मोहन, सोहन ऐसे ही गली-कूंचों में कबाड़ के ढेरों में अपनी किस्मत की खाक छानते फिरते हैं...
बहुत ही संवेदनशील रचना...
मीत

रंजना [रंजू भाटिया] said...

एक सच कहती है यह आपकी लिखी रचना ..बच्चों को यह काम करते देख अधिक दुःख होता है

Nirmla Kapila said...

अंतिम चार पंक्तियों ने दिल को छू लिया एक सार्थक रचना बधाई

vandana said...

ek katu satya kahti rachna.........hum sab roj dekhte hain........bas mehsoos nhi karna chahte us satya ko.
kuch time pahle maine bhi isse milti julti rachna likhi thi aapko yaad hogi.........bachpan ke wo masoom hath.
bahut hi dil ko choo gayi aapki ye rachna.

Jayant Chaudhary said...

"ना वो मोहन, ना वो हुसैन
ना वो बेदी, ना वो जोसफ कहलाता है
वो तो बस एक कबाड़ी पुकारा जाता है। "

That is fantastic.
I do not have words.
Truly amazing.
Truth written so beautifully.

!Jayant

ताऊ रामपुरिया said...

नितांत मार्मिक और सटीक.

रामराम.

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही संवेदन शील रचना..........लम्बे समय के बाद आपने कुछ likhaa है.......... बहुत ही सच, kaduaa सच

रंजना said...

Marmik saty ka sundar udghatan....

Marmsparshi sundar rachna hetu aabhar.

रावेंद्रकुमार रवि said...

एक कबाड़ी का अच्छा काव्य-रेखाचित्र है!

मुसाफिर जाट said...

जिन जगहों को देख हम मुँह पर रुमाल रखते है
ऐसी जगहों को देख वह मचल उठता है।
...
क्या बात लिखी है जी!!!!

डॉ .अनुराग said...

जानते हो...आज ही गुलज़ार की एक नज़्म पढ़ रहा था मै....'अपना मजहब अपने आप चुना नहीं था उसने 'ठीक वैसे ही कोई मुफलिसी नहीं चुनता .कौन चुनता है फिर ?कैसे ?क्या पैमाने है........जवाब ढूँढने में लगता है एक उम्र ओर बीत जायेंगी...

योगेन्द्र मौदगिल said...

सार्थक संवेदनामयी कविता के लिये साधुवाद

Harkirat Haqeer said...

जिन जगहों को देख हम मुँह पर रुमाल रखते है
ऐसी जगहों को देख वह मचल उठता है।

वाह......कमाल का लिखने लगे हैं आप .....!

ना वो मोहन, ना वो हुसैन
ना वो बेदी, ना वो जोसफ कहलाता है
वो तो बस एक कबाड़ी पुकारा जाता है।

सच कहूँ तो सही मायने में कवि तो आप हैं जो समाज के बीच से कविता तलाशते हैं ....!

बहुत-बहुत बधाई ....!!

गौतम राजरिशी said...

आह...!
मार्मिक
निराला की पंक्तियां याद हो आयीं
वह आता दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता

राजीव तनेजा said...

पेट भरने के लिए क्या-क्या पापड़ नहीं बेलने पड़ते?....

अच्छी रचना

Prem Farrukhabadi said...

dil dimag ko jhakjhorati rachna apne aap mein samasya ke samaadhan ko tarsati hui. mahatvpoorn visay chunane ke liye dhanybaad ke patr hain aap.

Prem Farrukhabadi said...

dil dimag ko jhakjhorati rachna apne aap mein samasya ke samaadhan ko tarsati hui. mahatvpoorn visay chunane ke liye dhanybaad ke patr hain aap.

Udan Tashtari said...

वाह! बहुत उम्दा!!

sandhyagupta said...

Kaphi asar chodti hai aapki yah rachna.Badhai

Vijay Kumar Sappatti said...

susheel ji deri se aane ke liye maafi chahunga . aap to jaante hi hai sabkuch.

maine us din aapki is post ko ghar me padhkar sunaya tha .. poora ghar bahut der tak shaant baitha raha ..phir maine aapse baat karwaai ...

mera salaam hai aapko is post ke liye .. ye ek sadhaaran post nahi hai .. ye ek jaagruti hai .. ek sandesh hai ..ek vichaar hai ..

samaaj ke kuch hisso ka dard aapne bayan kar diya .

susheel ji mera naman hai aapko ..

bus aur kuch nahi kahunga ..

vijay

हर्षवर्धन said...

क्या बात है

Ratan Singh Shekhawat said...

मै भी इसे डालना चाहता हूँ। आज लिनक्स की मैगजीन में इसकी एक सीडी मिली है ubuntu live 9.04 | इस सीडी में क्या है? आप इसकी सुरक्षा सम्बधी खासियत भी बताए। सुना है इसकी सुरक्षा बहुत अच्छी होती है यानिकी एक्स पी से अच्छी। मै इसके बारें ज्यादा जानना चाहता हूँ। क्या आप मार्गदर्शन करेगे।

उबंटू इस्तेमाल व इंस्टालेशन में बहुत आसन है | आपको मिली सी डी में उबंटू लिनक्स ओपरेशन सिस्टम है यह वाइरस फ्री होता है इसी वजह से इसे विण्डो से ज्यादा सुरक्षित कहा जाता है | आप इसे इस्तेमाल करने के लिए विण्डो में ही इंस्टाल करे ताकि जरुरत के हिसाब दोनों सिस्टम इस्तेमाल कर सके | यदि कोई दिक्कत परेशानी हो तो आप मुझे दिल्ली में ही 9899059508 पर फोन कर सहायता ले सकते है |
सादर
रतन सिंह शेखावत

प्रकाश गोविन्द said...

अच्छी कविता
बधाई !!

क्या सरकार और समाज की इनके प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है ?
क्या हमारी और आपकी कोई जवाबदेही नहीं है इनके प्रति ?

ऐसे बच्चे जो न तो अपना बचपना जानते हैं और न ही जवानी बस सीधे बुढापा ही आता है इनकी जिंदगी में ! पूरी जिंदगी कूड़े से शुरू होकर कूड़े पर ही ख़त्म हो जाती है !

भुवनेश शर्मा said...

आप थोड़ा लिखते हैं पर अच्‍छा लगता है...जाने कहां कहां आपकी नजर जाती है

ओम आर्य said...

काफी मजी हुई रचना .......खुब्सूरत ख्याल के साथ उच्च्कोटि की रचना

सुशील कुमार छौक्कर said...
This comment has been removed by the author.
सुशील कुमार छौक्कर said...
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सुशील कुमार छौक्कर said...
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Ratan Singh Shekhawat said...

सुशील जी
उबुन्तु के बारे में कल हुई अपनी फ़ोन पर बातचित के बाद उन्बुन्तु कैसे इंस्टाल किया जाता है के बारे में ज्ञान दर्पण पर पुरे विवरण सहित पोस्ट प्रकाशित हो चुकी है आशा है इस पोस्ट को पढने के बाद आप उबुन्तु इंस्टाल करने में सफल रहेंगे |

शोभना चौरे said...

ak kabadi ke liye sndar bhavna .kabdi koham blkul hlke se lete hai
kintu vo kachre mese hi apne privar ka pet bhrta hai jiske liye use bhi athak mehnat krni pdti hai .
ghri rchna .

Dev said...

Bahut sindar kavita...nice and touching...

Regards.

DevPalmistry |Lines tell the story of ur life

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

"ना वो मोहन, ना वो हुसैन
ना वो बेदी, ना वो जोसफ कहलाता है
वो तो बस एक कबाड़ी पुकारा जाता है"
रचना बहुत अच्छी लगी....बहुत बहुत बधाई....
एक नई शुरुआत की है-समकालीन ग़ज़ल पत्रिका और बनारस के कवि/शायर के रूप में...जरूर देखें..आप के विचारों का इन्तज़ार रहेगा....

विजेंद्र एस विज said...

यथार्थ...आज की कविता..

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