Monday, December 15, 2008

पंजाब की प्रेम कविताएं का आखिरी भाग

प्यार और कविता

प्यार करने

और किताब पढ़ने में

कोई अंतर नहीं होता

कुछ किताबों का हम

मुख-पृष्ट देखते हैं

अदंर से बोर करती हैं

पन्ने पलट देते हैं

और रख देते हैं

कुछ किताबें हम रखते हैं

तकिए तले

अचानक जब नींद खुलती हैं

तो पढ़ने लगते हैं

कुछ किताबों का

शब्द-शब्द पढ़ते हैं

उनमें खो जाते हैं

बार-बार पढ़ते हैं

रुह तक घुल-मिल जाते हैं

कुछ किताबों पर

रंग-बिरंगे निशान लगाते हैं

और कुछ किताबों के

नाजुक पन्नो पर

निशान लगाने से भी

भय खाते हैं

प्यार करने और किताब पढ़ने में

कोई अतंर नही होता

   

                   सतिंदर सिंह

साभार- किताब का नाम - "ओ पंखुरी" ,चयन व अनुवाद राम सिहं चाहल, प्रकाशन - संवाद प्रकाशन मेरठ (जिन जिन के सहयोग से ये कविताएं हमारे तक पहुँची उन सभी को दिल से शुक्रिया)

16 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत आभार आपका इस कविता को पढवाने के लिये !

राम राम !

मीत said...

सही कहा है कविता में,
प्रेम भी तो एक किताब ही है, ढाई अक्षर की किताब...
तभी तो कहा गया है ...
पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भयो न कोय...
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े तो पंडित होय...
क्यों सही कहा ना...?
अच्छा रचना से परिचय करवाने के लिए आभार...
---मीत

डॉ .अनुराग said...

इस कविता को पढ़कर जाने क्यों रात का वाकया याद आ गया जब मैंने खाली वक़्त बिताने ओर नींद की खुमारी में धर्मवीर भारती की लम्बी कहानी "इस गली का आखिरी मकान "पढ़ना शुरू की.....ओर एक साँस में पढता रहा......लगा जैसे भाषा शिल्प से कई बार संवेदनाये बड़ी होती है.....देर रात तक वो कहानी मेरे साथ रही

रंजना [रंजू भाटिया] said...

इन कविताओं को पढ़वाने का शुक्रिया सुशील जी ..बहुत अच्छी लिखी गयीं हैं यह

मोहिन्दर कुमार said...

सुन्दर कविता पढवाने के लिये आपका आभार..

कभी कभी जिन्दगी कब बीत जाती है पता ही नहीं चलता और कभी कभी एक एक पल भारी लगता है...दोनों ही प्यार या गम के कारण के कारण हो सकते हैं..

शिव बटालवी ने लिखा है
किन्नी वीती ते किन्नी वाकी है
मैनू एयीहो हिसाव ले बैठा
"शिव" नूं इस गम ते ही भरोसा सी
गम तो कोरा जबाब ले बैठा

अल्पना वर्मा said...

कुछ किताबों के

नाजुक पन्नो पर

निशान लगाने से भी

भय खाते हैं
-kitna sundar likha hai--
satinder ji ko badhayee aur aap ko dhnywaad.
punjaabi bhaasha mein likhi kavita hindi mein anuvadit ho kar bhi apni bhaav-sundarta banaye hue hai.

sandhyagupta said...

Achchi kavita hai.Badhai.

Dr.Bhawna said...

बहुत सुन्दर रचना है ...धन्यवाद...

हिमांशु said...

बडी़ प्यारी कविता पढ़वाई आपने . धन्यवाद.

नीरज गोस्वामी said...

नाजुक पन्नो पर
निशान लगाने से भी
भय खाते हैं
बेहतरीन नज़्म...बहुत बहुत शुक्रिया सुशील जी ऐसी कमाल की नज़्म पढ़वाने के लिए...वाह.
नीरज

राज भाटिय़ा said...

बहुत बहुत धन्यवाद इस कविता को हम तक पहुचाने का

शिवराज गूजर. said...

bahut bahut shukriya susheel ji itani badiya rachana se do char karwane ka. aap hamesha achhi rachna lekar aate hai.

bhoothnath said...

सुशील जी.....आपके गुरुवर ने बिल्कुल ठीक कहा था आपके बारे में....मैं भी इससे सहमत हूँ....आपका टेस्ट वाकई अद्भुत है....आपकी रचनाएं और आपके द्वारा पसंद की गई रचनाये सब-की-सब बड़ी ही अच्छी लगीं....आपके ब्लॉग के इस पृष्ठ को समूचा ही देख गया मैं....सब कुछ ही तो पसंद आया मुझे....सच....!!

Meenakshi Kandwal said...

वाह! क्या तुलनात्मक चित्रण था। प्यार और किताब के साथ इंसानी जज़्बातों को जिस तरह से आपने जोड़ा है... अद्भुत...

Vijay Kumar Sappatti said...

aapne bahut hi bada kaam kiya hai , jo in rachnao ko hamse milwa diya hai ...

kavitayeen padkar man bhaavpoorn ho gaya...

aapko bahut dhanyawad aur badhai


pls visit my blog for some new poems....

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

vandana said...

aapka bahut dhanyavaad aapne yeh kavita padhwayi.........kabhi kabhi aise anokhe tulnatmak mishran milte hain ..........kitab aur pyar........bahut achche

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