Monday, September 8, 2025

सुनो...आ जाती हो अक्सर तुम मेरे सपनों में...

1.

सुनो 

आ जाती हो अक्सर तुम मेरे सपनों में

इसका क्या मतलब है?

मैं ज्यादा याद करता हूं तुम्हें 

या फिर 

तुम ज्यादा याद करती हो मुझे?


2.


सुनो 

जब सपने में आया करो 

कम से कम इनमें तो 

पल दो पल ही सही

बातें कर लिया करो 

सच बिना तुमसे बात किए  

ये सपने भी अच्छे नहीं लगते हैं.


3.


सुनो 

तमाम परेशानियों के बावजूद

‘कैसी हो तुम?’

पूछने पर

‘अच्छी हूं.’

क्या तुम आज भी कहती हो!


4.


सुनो 

रात सपने में 

मैंने तुमसे चाय मांगी थी

देखो ना तुम 

सपने में भी 

मैं तुम्हारे हाथों से बनी

फीकी चाय ना पी सका. 


5.


सुनो 

अच्छा एक बात तो बताओ 

क्या बारिशों में तुम आज भी 

अपना पसंदीदा गीत 

'मौसम है आशिकाना

ऐ दिल कहीं से उनको 

ऐसे में ढूंढ लाना....'

गुनगुनाती हो ?

Tuesday, August 26, 2025

प्यार के फूल किताबों में...

एक दिन अस्पताल में अपनी बाईं गाल बार-बार दबा रहा था. उसने (गीता ने) पूछा: क्या हुआ? मैंने कहा : दांत दर्द. जो गीता तीन बार मेरे नरक-प्रवेश की कोशिश से नहीं डरी, जो गीता मेरे चालीस परसेंट जलने के कारण मुझे नहलाने से नहीं डरी, क्योंकि जले हुए शरीर से घिन आती है, दांत-दर्द की बात सुन उसके कंधे झुक गए. यह शायद उसकी अंतिम पराजय का एक अस्थायी क्षण था. मुझसे कहा: ओ दीपक, मैं क्या-क्या करूँ तुम्हारे लिए!

~'स्वदेश दीपक' के लिखे 'मैंने मांडू नहीं देखा' से  



अगले सप्ताह दफ्तर के पते पर 'कला' का पत्र मिला. बिना किसी संबोधन के उसने लिखा था. मैं ठीक-ठाक पहुंच गई थी. इजा को मैंने आपके सारे उधार के बारे में बतला दिया है. टिकट से लेकर हाथ-खर्च तक. और हाँ, आपका शाल आपके आदेशानुसार पहुंचा दिया है. मुझे बुरा लगा. 

मैं धीरे-धीरे पत्र मोड़ रहा था कि पिछली ओर कुछ लिखे पर नजर पड़ी. लिखा था, ‘बुरा लगा! नहीं रे! शाल उसने रख लिया है, जिसके लिए था. थैंक्यू! 


~'पंकज बिष्ट' के लिखे उपन्यास ‘लेकिन दरवाजा’ से.




'कहां जा रहा? किससे हो रहा नाराज?' नायिका पूछती है. 
'अपने से. मुझे जाने दे. मैं कहीं अकेला बैठना चाहता हूं.'
'मैं भी बैठना चाहती हूं और वहीं जहां तू. मैं कुछ नहीं करूंगी, बस तुझे नाराज बैठा देखती रहूंगी.' 

~'मनोहर श्याम जोशी' के लिखे उपन्यास 'कसप' से. 

Saturday, August 23, 2025

'ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर' और हम बाप-बेटी

कल कनॉट प्लेस (सीपी) किसी काम से जाना हुआ. काम खत्म होने के बाद बेटी कहने लगी कि चलो पापाजी 'ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर' चलते हैं. और हम उधर की ओर चल दिए. सालों के बाद जाना हुआ 'ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर'. पहले की अपेक्षा यह अब थोड़ा खुला-खुला सा लग रहा था.घुसते ही बेटी चहक-सी गई. फिर इसके बाद इसने ना जाने कितनी किताबों और लेखकों से परिचय कराया,जिनके बारे में मुझे पता नहीं था.सबके सब विदेशी लेखक थे. दो-चार नाम जो याद रह गए. 'Fredrik Backman', 'Haruki Murakami', 'Khalid Hoosseini', 'Kristin Hannah' आदि आदि. बल्कि बेटी 'Before the Coffee Gets Cold-Toshikazu Kawaguch (आजकल इसी किताब को पढ़ रही है.) किताब को उठाकर मुझे दिखाते हुए बोली,'पापाजी देखो मेरी किताब भी यहां है.' मैं बीच ही में बोल उठा,' ये किताब आप ऐसे दिखा रही है जैसे आप ही की लिखी  हो.' वो कहां रुकने वाली थी झट से बोलीं,' ओ हो पापाजी! पता है जब आप किसी चीज या आदमी को पसंद करने लगते हैं तो वो चीज अपनी और इंसान अपना ही लगने लगता है.' 'हां ये बात तो है. जैसे शाहरुख खान मुझे अपना-सा लगता है. उनकी फिल्म हीट हो जाए तो अच्छा लगता है. बेशक वो फिल्म आपने देखी हो या ना देखी हो.'

फिर वो बीच-बीच में अपनी पसंद की किताबें दिखाती रही. फिर एक जगह रुकी और बोली,' पापाजी ये देखो 'Rom-Com Books'.' 'Rom-Com Books' मतलब.' मैं बोला. ' सच आपको 'Rom-Com Books' का नहीं पता. 'Rom-Com Books' मतलब 'रोमांटिक कॉमेडी' वाली किताबें.' वो बोली. सच मुझे आज से पहले 'Rom-Com' किताबों के बारे में नहीं पता था.और सच बताऊं तो मैंने विदेशी लेखकों की ज्यादा किताबें नहीं पढ़ी हैं, जिन्हें पढ़ा है उन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता है. लेकिन हां हिंदी के लेखकों को तो खूब पढ़ा है. और उनका परिचय बेटी से भी कराया था. उनके किस्से बेटी को सुनाएं भी थे. लेकिन तब जब उसे इतनी समझ नहीं थी,जितनी आज अब है. इसे यूं ही भी कह सकते हैं, मैंने पहले बेटी को हिंदी के लेखकों से मिलवाया था. बेटी कल विदेशी लेखकों से परिचय करवा रही थी.

बाद में जब हम 'ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर' से निकलने लगे तो मैंने 'ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर'वालों के नोटिस में अपनी यह बात डाली कि यहां हिंदी की किताबें कम है.अगर हो सके इनकी संख्या को बढ़ा जाए. वहां के कर्मचारी ने यह विश्वास दिलाया कि आपकी बात को प्रबंधकों तक पहुंचा दिया जाएगा. सच में 'ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर' में हिंदी किताबों की संख्या कम थी. बल्कि  यूं कहूं कि उससे ज्यादा हिंदी की किताबें तो मेरे कमरे में हैं. ये कहना ज्यादा सही होगा. 

Wednesday, June 25, 2025

पिता

1.
हांफती सांसों से
कांपते हाथों से
एक बुजुर्ग पिता
सुबह से शाम तक
लगा रहता है
एक मजदूर की तरह
कुछ पुराना तोड़ता हुआ
कुछ नया रचता हुआ
वहीं मैं बस
खड़ा रहता हूं
एक गिल्ट के सहारे.


















2.
बहुत से पिता अपनी जरूरतों के बारे में नहीं बताते. दरअसल उन्होंने शुरू से घर चलाने के चक्कर में अपनी जरूरतों को कम करके जीना सीख लिया होता है.  उनकी जरूरतों को समझने के लिए आपको उन्हें समय देना होता है.  उनसे बात करनी होती है. फिर बातों में से बातें निकालकर थोड़ा-थोड़ा समझना पड़ता है. फिर उनके लिए उन चीजों को बिना बताए लाना होता है. क्योंकि पूछने पर वे मना कर देते हैं. कहते हैं  'इसकी क्या जरूरत है.'  लेकिन एक बार चीज आ जाती है तो वे खुशी-खुशी उसका उपयोग करने लग जाते हैं. वरना तो वे समझते हैं कि बुढ़ापा है, बुढ़ापे में क्या ही करना इन सब चीजों का. बुढ़ापा है धीरे-धीरे कट जाएगा. [ तस्वीर प्रतीकात्मक है.]

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