Monday, November 16, 2009

जिंदगी के रंग-सुशील के संग




संघर्ष का रंग- अभी हाथ नही गड़े धरती में मेरे







जिंदगी की शुरुआत संघर्ष रंग से ही होती है। बाकी के रंग जिंदगी में आते जाते रहते हैं। पर ये रंग आपकी जिंदगी से ऐसा रंग जाता है कि छूटता ही नहीं। फीका हो जाता है पर छुटता नही है। जिस घटना की इस रंग के रुप चर्चा कर रहा हूँ उससे ज्यादा मुझे किसी चीज के लिए संघर्ष नही करना पड़ा। बात उन दिनों की हैं। जब छोटी बहन की तबीयत ऐसी खराब हुई कि खिलखिलाते चेहरों पर उदासी का रंग चढ़ गया था। और जिस घर में खूब चहल पहल हुआ करती थी वो घर अब खामोश सा रहने लगा था। बसों में धक्के खाते हुए, सरकारी अस्पताल की लम्बी लाईनों में घंटो खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार करना। काफी दिन तो अलग अलग टेस्टों में ही गुजर गए। बस चंद दिनों में एक स्वस्थ बहन एक लकड़ी सी बन गई थी। सब कुछ छोड़कर बस मुझे यही सूझता था कैसे भी इसे बचाना है। तीन महीनों के बाद एक टेस्ट की रिपोर्ट आई जिससे बीमारी और दवाई का पता चला। खैर डाक्टर साहब ने दवाई लिख दी। जब दवाई लेने गए तो पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। इतनी तो इनकम भी नही जितनी की दवाईय़ाँ लिखी गई है। और ऊपर से तनखा भी समय पर नही मिलती थी पिताजी को। मुझे याद है जिस दिन तनखा मिलती थी पिताजी को उसी दिन आते ही मेरे हाथ में तनखा रखकर कहते थे "कल सुपर बाजार जाकर दवा ले आना" खैर दवाईयाँ चलती रही। नौकरी कर नही सकता था क्योंकि अस्पताल बहुत जाना पड़ता था। दिमाग में आया कि टयूशन पढ़ाया जाए और सरकारी नौकर बनने के लिए तैयार करनी चाहिए। उन दिनों जब भी वक्त मिलता था मैं हरदयाल लाईब्रेरी भी जाया करता था पेपरों की तैयारी के लिए। उस वक्त शायद मैं बीकाम की आखिरी साल की परीक्षा दे चुका था। समझ नही आता था जब सारी तनखा दवाईयों और दूसरे अस्पताल के खर्चों में चली जाती है तो घर कैसे चलता है। और टयूशन पढ़ाकर भी ज्यादा पैसे कमा नही पाता था। इसी बीच मुझे एक छोटा लड़का मिला जिसने मुझे ईमानदारी का पाठ पढाया वो भी उस वक्त जब पैसे की खातिर मेरे भटकने की गुंजाईश ज्यादा थी साथ ही गलत रास्ते पर भी जा सकता था क्योंकि पैसो की बहुत जरुरत थी। बात कुछ यूँ थी कि वह लड़का मेरे पास आया और बोला अंकल जी एक रुपया दे दो। भूख लगी है ब्रेड खाऊँगा। मैंने उसे दो रुपये का सिक्का दे दिया। फिर वह ब्रेड लेकर आया और मुझे इक रुपये का सिक्का वापिस देकर चला गया। भूख की खातिर भी वह लड़का नही भटका। और मुझे जिंदगी का एक नया पाठ और एक नया रंग दिखा गया। खैर दवाई चलती रही। पर बहन की तबीयत में बहुत मामूली सुधार दिख रहा था पर जैसी उम्मीद डाक्टर को थी वो सुधार कहीं नजर नही आ रहा था। डाक्टर के पास दवाई बदलने का चारा भी नही था। कोई सात महीने बाद अचानक मेरी निगाह नीचे पडी एक गोली पर पड़ी जोकि बहन के स्कूल बस्ते के पास थी। बस्ते को खोला गया तो आँखे फटी की फटी रह गई। उसके अंदर काफी गोली और केप्सूल रखे हुए थे। डाँट कर बहन से पूछा तो पता चला कि वो हमारे सामने एक ही गोली को खाती थी बाकी गोलियों को नहीं। बची दवाईयों को नाली में बहा देती थी और जिनको नही फैंक पाती थी उसे बस्ते में डाल देती थी। क्योंकि उसे वो दवाईयाँ कड़वी लगती थी। अजीब सी हालत हो गई थी हम सब की। खासकर पिताजी की। सारा पैसा पानी में चला गया। पहले ही इतना कर्ज हो चुका था। मैं सोचने लगा अब आगे क्या होगा। अगले दिन हम सब बैठे हुए थे तब मैंने पिताजी से पूछा अब क्या होगा पापा? उनका जवाब एक लाईन में आया अभी हाथ नही गड़े धरती में मेरे और बाहर निकल गए। आज भी कोई परेशानी आती है तो पिताजी के कहे ये शब्द मुसीबतों से लड़ने का ज़ज़्बा दे जाते है। बाद में डाक्टर ने कहा कि ये ही दवाईयाँ चलेगी उतने ही दिन। खैर छोटी बहन तब जी गई..............


शब्दों के रंग- जूझोगे तो जीओगे। 
आदमी को चाहिए वह जूझे, 

परिस्थितयों से लड़े 
एक स्वप्न टूटे, तो दूसरे गढ़े। 
                  -अज्ञात


हँसी का रंग- बंदर की पूछ 

किस्सा तब का है जब मैं 12वी क्लास में "धनपतमल बिरमानी स्कूल रुपनगर" में पढ़ा करता था। बात दिवाली के दिनों के बाद की हैं। जिस क्लास को दिवाली से पहले सजाया गया था। दिवाली के बाद उसी क्लास को सजाने में लगे समान को उतारा और खराब किया जा रहा था। मैं ज्यादा कुछ ना करके रंगीन कागज के रीबीन तोड़कर छुट्टी होने पर चुपके से दोस्तों के पीछे पेंट में लगा देता था और मैं गले में हाथ डालकर बस स्टेंड तक ले जाता था। स्कूल से लेकर स्टेण्ड तक के रास्ते में जो भी देखता वही हँसता। और मैं हँसी को ऐसे रोक रहा था जैसे छोटे बच्चे को शरारत करने से रोकते है। रोज कोई ना कोई मेरा शिकार बन रहा था। पर एक दिन क्या देखता हूँ। मैं बस स्टेण्ड पर खड़ा हूँ लड़कियाँ हँस रही है। मेरे अगल बगल खड़े साथी भी हँस रहे है। मामला समझते देर नही लगी, देखा तो आज मेरे पीछे बंदर जैसी पूँछ (कागज के रीबन) लगी हुई थी।

21 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

बहुत ही प्रेरक प्रसंग , खासकर माध्यम निम्न वर्ग में तो हर पांच घरो में से एक घर की यही कहानी होती है ! लेकिन कुछ ही लोग है जो वसूलो पर टिक पाते है !

अमिताभ श्रीवास्तव said...

क्या मार्मिक कह कर अपनी बात खत्म की जा सकती है? कतई नहीं, और उसके लिये तो कतई नहीं जो अपनी बहन और जिसका परिवार खास कर माता-पिता आज भी अपनी लडकी की गम्भीर बीमारी से दो हाथ कर रहे हैं, महीनों के राशन से ज्यादा खर्च दवाइयों पे हो रहा है। किंतु चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं क्योंकि ' अभी हाथ नहीं गडे धरती में मेरे"...। सुशीलजी ईश्वर की एक बहुत खास पहचान है, वो यदि दुख देता है तो उससे लडने की शक़्ति भी देता है, या कोई एसा माध्यम देता है जो हमे हमारी शक़्ति को बढा देता है। कब कमाल उसी का है। आदमी के हाथ में सिर्फ जूझना ही लिखा है। या इसे कह सकते हैं हमे ईश्वर ने जूझने के लिये ही बनाया है। दुख मेरे लिये दूसरा मायना रखता है। मैं मानता हूं सुख जैसा कोई तत्व इस प्रकृति ने नहीं बनाया, दुख ही दुख है बस्स। अटपटी लगेगी बात मेरी या इस पर ढेरों तर्क दिये जा सकते हैं किंतु जन्म या जन्म के प्रोसेस से लेकर अंत तक आदमी को एक तो संघर्ष ही करते रहना होता है दूसरे दुखो से भी दो हाथ करते रहना होता है। सुख अंशमात्र का एक अहसास होता है, जैसे हम दो क्षण के लिये किसी चीज से मुक्त हो गये, वो पल क्षणिकभर का होता है और मज़ा देखिये वो भी दुख का जन्मदाता ही है। यानी कोई सुख सुख बना ही नहीं रह सकता, हां दुख दुख बना रहता है जिससे लडने की स्वभावगत फितरत इंसानों में मौज़ूं रहती है। कुलमिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि इंसान पैदा हुआ है तो उसे सिर्फ और सिर्फ दुखों से लडते हुए अपना रास्ता चुनते जाना होता है। जैसे पैदा होने के लिये लडा और नये जीवन में कदम रखा, अब प्रोसेस में उम्र का बढना, स्वतह ही, यानी स्वतह ही दुख भी.......ये दुख अपने कई प्रकारों में होता है, कई नामों में होता है और संसार का हरेक प्राणी दुखी है यानी लड रहा है क्योंकि यह प्रकृति प्रदत्त है।
आपके जीवन के रंग से यदि आंखे नम होती है तो सिर्फ भावनाओं के कारण, वरन ये बहुत कुछ सिखाती है, सिखाती क्या है..वही संघर्ष, लडना, लडते रहना, जूझते रहना.....। वाह क्या जीवन है हम सारे प्राणियों का, ईश्वर धन्य है।

'जैसी करनी वैसी भरनी' यूं ही कहावत थोडी बनाई गई है सुशीलजी, बन्दर की पूंछ खुद पर भी लग (उग) सकती है। बचपन के दिन.....आह। कैसे रंगीन होते थे...।

नैना बिटिया- पापा को अच्छे से पढाना, उन्हे अभी कुछ समझ नहीं आता है। जरा पूछ कर देखो..बगैर पैन्दी की तपेली में आलू की साग कैसे बनती है? हा हा हा...।

डॉ .अनुराग said...

तभी तो कहते है पिता एक विशाल बरगद की माफिक होते है .....दुःख ओर मुश्किलों को अपनी बांहों में छिपाए ..

वन्दना said...

kabhi kabhi halat insaan ko majboor kar dete hain magar uski aatmshakti hi uska sambal banti hai.

jyada to kahne ki sthiti mein nhi hun...........sirf itna hi ye zindagi ke rang aise hi hote hain na jaane kab badal jaayein.

वन्दना said...

naina bitiya
papa ko achche se padhana........bahut bhavuk hain.

मीत said...

कहीं पे पढ़ा है की जब यक्ष ने युधिष्टर से पुछा था की आकाश से भी ऊँचा क्या है...
तो युधिष्टर ने कहा था की आकाश से भी ऊँचा पिता है... आपके लेख में यह बात साबित हो गयी है... वही पिता तो आकाश से ऊँचा है जो अपनी बेटी को मौत के मूह से खींच लाया....
मर्मस्पर्शी होने के साथ-साथ बहुत सी प्रेरणाएं देता हुआ है आपका यह ज़िन्दगी का रंग आज की पोस्ट सतरंगी है....
और पूंछे तो हमने भी खूब लगे हैं, पर हमारे आज तक कोई नहीं लगा पाया क्योंकि ध्यान हमेशा अपने पीछे ही रखते थे.. अगर कोई लगता तो तभी हटा देते थे...
@ नैना
बिटिया आप तो पापा को पढ़ा देंगी और मम्मा बच्चो को तो चाचू को कौन पढाएगा... हम भी आ रहे हैं ट्यूशन लेने....
मीत

गौतम राजरिशी said...

सच कहा सुशील जी कि संघर्ष का रंग ऐसा होता है जिंदगी में जो कभी नहीं उतरता...

उस भूखे लड़के की कहानी ने हतप्रभ कर दिया।

और पिताजी के शब्द "अभी हाथ गड़े नहीं धरती में मेरे"...आह!

ये जिंदगी के रंग खूब चमक बिखेर रहे हैं आपकेब्लौग पर...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

ज़िन्दगी के सही सच्चे रंगों को बिखेर रहे हैं आप सुशील जी ..यह बहुत कुछ होंसला और प्रेरणा दे रहे हैं ..आज की आपकी लिखी पिता जी की बता हमेशा याद रहेगी ...शुक्रिया

Harkirat Haqeer said...

पहले तो रुला दिया गमजदा पोस्ट से फिर हंसाने की कोशिश ......ऐसे कोई हंसता है क्या .....?

सोच रही हूँ उस पिता और भाई पर क्या गुजारी होगी फेंकी हुई दवाइयां देख कर ....उस पिता को नमन जिसने इस अप्रत्याशित स्थिति में भी ये कहा ,....''अभी हाथ नही गड़े धरती में मेरे” .....!!

अल्पना वर्मा said...

जीवन में ऐसे मोड़ आते हैं और बहुत से लोग ऐसे मिलते हैं जिन से हमें सीख मिलती है.
पिताजी की कही बात "अभी हाथ गड़े नहीं धरती में मेरे"मन को छू गयी .सच में ऐसे शब्द मुसीबतों से लड़ने का ज़ज़्बा दे जाते है

-जिंदगी के रंग bhee खूब हैं!

राज भाटिय़ा said...

पिता का बहुत बडा सहारा होता है बच्चो को, ओर हिम्मत भी पिता से ही मिलती है, कई बार कोई रास्ता नही होता, लेकिन पिता फ़िर भी हिम्मत हीदेता है ओर कोई ना कोई रास्ता नजर आ ही जाता है, मां बाप दोनो ही होने चाहिये, सुशील कुमार छौक्कर जी आप की यह रचना बहुत अच्छी लगी धन्यवाद

अभिषेक ओझा said...

ओह !

कुश said...

वे अभी है... बस यही काफी है!

Savita Khari said...

Pahele tu mere blog per aane ke liye aapka bahut-2 dhanaywad.
aaj paheli bar aapke blog per aai padh ker accha laga bahut hi accha likhte hai aap, jindgi ke rango ki talash me aapki rachnaye dil ko chu gyi........very nice

thanks again

रचना दीक्षित said...

बहुत भावुक कर गयी आपकी ये कृति और साथ ही प्रेरणा भी दे गयी हिम्मत न हारने की इससे ज्यादा कुछ कहने लायक छोड़ा ही कहाँ है आपने

Udan Tashtari said...

ओह!! भावुक कर दिया!!

Manish Kumar said...

हर परिस्थिति में जूझने की शक्ति रखना बहुत बड़ी खूबी है। पिता हों तो ऍसे.. हमारे पिताजी भी ऐसी किसी हालात पर यही कहकर हमारा हौसला बढ़ाया करते हैं
हारिए ना हिम्मत
बिसारिए ना हरि को नाम
जाहे विधि राखे राम
ताहे विधि रहिए

नीरज जाट जी said...

सुशील जी,
अभी हाथ नहीं गड़े धरती में मेरे
पढ़कर मन झन्ना गया. काश मेरे पास भी आपके जैसी लिखने की 'कला' होती तो मैं भी जाने कितने वाकये निकाल लेता. सही में.

योगेन्द्र मौदगिल said...

'होते कहां हैं आजकल बरगद नसीब में......'

अभी महफूज अली की पोस्ट भी पढ़ी. आप लोग भाग्यशाली हैं.. बधाई..

शरद कोकास said...

ऐसे ही प्रसंग प्रेरणा देते है।

Vijay Kumar Sappatti said...

प्रिय सुशील जी ;
नमस्कार !!!

सबसे पहले मैं तो अपने दोनों कान पकड़ कर आपसे माफ़ी मांगता हूँ की , मैं इतने दिन बाद आपके पोस्ट पर कमेन्ट दे रहा हूँ . मैंने ये पोस्ट तो पढ़ ली थी लेकिन समय नहीं मिल पा रहा था .

आपकी ज़िन्दगी , हम सभी की तरह संघर्ष के रंगों से भरी हुई है . आपके पिता को मेरा प्रणाम , जिन्होंने इतनी बड़ी और सच्ची बात कहकर ज़िन्दगी भर के लिए एक हौसला दिया ..

सुशील जी , अब आपसे मेरी एक गुजारिश है की एक प्यारी सी प्रेम कविता लिखे ..

आपने जो शब्दों का रंग लिखा है :

परिस्थितयों से लड़े
एक स्वप्न टूटे, तो दूसरे गढ़े।

ये भी मुझे बहुत प्रेरनादायाक लगा ..

नैना बिटिया को ढेर सारा प्यार .. और बहुत जल्दी रोटी खाने आयेंगे आपके घर जी ...

आपका

विजय

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