Tuesday, February 23, 2010

गुरुवर के पन्नों में मैं

इनाम की आस यूँ पूरी होगी सोचा ना था। 

" जब मैं पांचवी जमात में था, हमारे गाँव में संत रविदास का जन्म समागम किया गया। मैंने गीत लिखा और संगत को सुनाया। चाचा बेला सिंह ने एक रुपया निकाला। लाला जी ने रोक दिया। बटुए से पाँच का नोट निकाला और कहा: " अगर इनाम देना ही है तो ये पाँच रुपए पकड़ा।" ( साभार-नाट्य कला और मेरा तजुरबा-चरणदास सिंद्धू)

ठीक इससे मिलता जुलता दृश्य फिर हँसराज कालेज में घटा। फर्क इतना था कि इनाम स्वरुप पाँच रुपये लेने वाला वो लड़का आज प्रोफेसर एंव नाटककार बन अपने शिष्य की जानदार एक्टिंग देखकर इनाम के तौर पर पाँच सौ रुपए दे रहा था और शिष्य याद के लिए बस छोटा नोट माँग रहा था। मैं पहले वाले दृश्य को किताब में कई बार पढ़ चुका था और दूसरे दृश्य को अपने सामने घटते हुए देख रहा था। साथ ही मन ही मन में सोच रहा था वो दिन कब आऐगा जब सिंद्धू सर मुझे मेरे किसी काम पर खुश होकर इनाम स्वरुप कुछ देंगे? उसके बाद जब मैंने लिखना शुरु किया तो लगा अब मेरी मुराद पूरी हो जाऐगी। मैं अपनी तरफ से अच्छा खराब लिखता रहा, डाक से उन्हें भेजता रहा और कभी-कभी सुनाता भी रहा। इसकी एवज में मुझे शाबासी जरुर मिलती किंतु इनाम  नही मिलता। जिसकी मुझे चाह थी। लेकिन पिछले दिनों जब सिंधू सर के घर जाना हुआ तो सर ने बताया कि तेरी एक रचना जो तूने मुझ पर लिखी हैं, मैंने अपनी आने वाली किताब- "नाटककार चरणदास सिद्धू : शब्द चित्र" में शामिल कर ली हैं। सुनकर बहुत खुशी हुई।  मन ही मन में सोचने लगा कि, जिस इनाम की बरसों से आस थी वो दूसरे रुप में मुझे आज मिल गया हैं। अगर यूँ कहूँ कि यह तो किसी प्रकार के इनाम से कई गुना ज्यादा बड़ा इनाम हैं तो अनुचित नहीं होगा। और यदि इनाम सरप्राइज जैसा हो तो आश्रर्यमिश्रित खुशी चौगुनी हो उठती है। जब उनकी यह किताब मेरे हाथ में आई तो एक अलग ही सुखद अहसास हुआ। लगता है आपका होना, आपका लिखना सबकुछ साकार हो गया। सार्थक हो गया। मैं किस लायक हूँ यह तो आज भी मुझे नही पता किंतु अपने गुरु के पन्नों पर जब अपना नाम देखता हूँ तो लगता है, हाँ मेरा एक अस्तित्व है जिसे मेरे गुरु ने आशीर्वाद देकर फला है। वैसे ऐसे कुछ विशेष पल होते हैं जिन्हें शब्दों में बयान करना मुश्किल होता है, इसलिए ज्यादा कुछ न कहते हुए बस उस रचना को लिख रहा हूँ जिसे मेरे गुरु ने अपनी पुस्तक में स्थान देकर मुझे अनुग्रहित किया है।  










                                                                          
बूझो तो उसका नाम 

देखो वह सांवला जोशीला
पहने सादी पेंट और जिस पर सफेद कमीज़
आंखो पर पहने मोटा चश्मा
और पैरों में कपड़ॆ के जूते
कंधे पर डाले झोला
वह कौन?
मस्त, मनमोहक चाल से चला जाता
बूझो तो उसका नाम।

लोग, कहते कि,
वह कालेज में बच्चों को इंग्लिश पढ़ाता
पर बच्चे कहते कि,
वह हमें जीवन जीना सिखाता
बुद्धिजीवी कहते कि,
वह चार चार भाषाएं जानता।
पर कामगार कहते कि,
वह हमारी बोलियाँ बोलता।
वह कौन?
मस्त, मनमोहक चाल से चला जाता
बूझो तो उसका नाम।

कहते हैं कि,
वह रुप बदल बदल, गाँव-गाँव
इंसानी कहानी की तलाश में घूमता फिरता।
पर किसान कहते कि,
वह गौतम बुद्ध, जीवन के रहस्य की खोज में।
कहानीकार कहते हैं कि,
वह कहानियों को स्टेज पर जीवित करता।
पर दर्शक कहते कि,
शहीद भगत, बाबा बंतू, भजनो, किरपा, सत्यदेव, चन्नो, शंकर,
कमला और लेखू को देख रोया करता।
वह कौन?
मस्त, मनमोहक चाल से चला जात
बूझो तो उसका नाम।

उसके दोस्त बोले,
घर उसका सादा -सा, कमरा उसका आधा-सा,
पर पड़ोसी बोले,
घर के बाहर लगी लकड़ी की एक प्लेट, जो बोले:
"नेता, भिखारी, हाकिमों का, यहाँ न कोई गेट।"
धर्मानुयाई कहते फिरते कि,
वह किसी धर्म को नहीं मानता।
पर कोई चुपके से कहता कि,
वह नफरत को नहीं मानता।
आलोचक कहते: इसमें भी हैं दोष।
पर दूर कहीं से आई एक आवाज़
मैं नहीं हूँ कोई भगवान,
मैं तो हूँ बस, एक इंसान!
वह कौन ?
मस्त, मनमोहक चाल से चला जाता
बूझो तो उसका नाम।
 

15 comments:

नीरज मुसाफिर जाट said...

मेरा कोई ना सहारा बिन तेरे,
गुरूदेव सांवरिया मेरे

अल्पना वर्मा said...

गुरु जी की पुस्तक में आप ने [आप की कविता ने]स्थान पाया यह बड़े ही गर्व की बात है.
बहुत बहुत बधाईयाँ.
यह इनाम अमूल्य और अविस्मरणीय है.
यह खुशी हमसे बाँटी उसके लिए आभार.
कविता तो बहुत ही अच्छी लगी.
शुभकामनाएँ.

अल्पना वर्मा said...

@@@नैना आप ने खुद को शाल में ढक रखा है....अच्छी है यह फोटो भी.
मुझे 'मिन्नी माउस की याद आ गयी..
:) देखा है ना मिकी -मिन्नी माउस ??बहुत क्यूट लग रही हो..
[नहाने से डरती हो??ही ही ही !कोई बात नहीं..mostly bachche aise hi hote hain :)]

अनिल कान्त : said...

आपने कविता में उनका पूरा व्यक्तित्व बयाँ कर दिया....एक बेहतरीन कविता
आप बहुत लम्बे समयांतराल बाद आते हैं

नैना बहुत क्यूट लग रही है

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बधाई जी आपको, आज तो वाकई खुशियां मनाने का दिन है. बहुत शुभकामनाएं आपको.

रामराम.

kshama said...

Alpanaji se sahmat hun!

psingh said...

sundar rchna
abhar

वन्दना said...

guru govind dou khade
kake lagoon paaon
balihari guru aapne
govind diyo milay

guru aise hi hote hain .......bahut badhiya chitran kiya.

naina beta ..........thandi mein koi bhi bachcha nhi nahata.......papa ko kehna aunty ne mana kar diya hai isliye nahana cancel..........hahahaha

अमिताभ श्रीवास्तव said...

guru ke yahi aashirvaad hote he ji..aap safal hue. badhaai aour shubhkamnaye bhi ki nit nayaa kuchh esa likhe jo prernaa ban kar paathko tak pahunche..,
naina bitiya idhar bhi..ghus aai aap. are ye papa bade jiddi hote he, apne man ki karte rahte he.., aap to khoob rona aur fir apne man ki koi jid bhi puri karaa lenaa..kyoki bitiya ke aansu papa kabhi nahi dekh paate../ samjhi na/

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आपको बहुत बहुत बधाई. क्या ये सिद्धू साहब 'Collegiate Drama Society' वाले हैं !...

और... विटिया को रोज़-रोज़ न नहलाया करें.
लो बेटा मैंने पापा को डांट लगा दी :)

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर ईनाम आप को बधाई ओर शुभकामनाये

सुशील कुमार छौक्कर said...

काजल जी आपने सही पहचाना जी सिंद्धू सर 'Collegiate Drama Society'वाले ही है। आप कैसे जानते है जरा बताए तो।

मीत said...

दिल खुद हो गया आपकी यह रचना पढ़कर... मनमोहक पोस्ट हैं...
@ नैना
नैना बिटिया अब तो होली आने वाली है आप भी पापा को नहला देना वो भी रंग से...
मीत

शरद कोकास said...

बहुत आत्मीय संस्मरण है यह ।

Vijay Kumar Sappatti said...

susheel ji ,

jisko guru ka aashirwad aur pyaar miul gaya ,wahi is jeevan ke liye kaafi hai ..aur phir is tarah ka inaam ..waah waah kya baat hai ji ......dil se badhayi ...

vijay

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