Wednesday, August 19, 2009

दो बीघा का किसान

किसान

मैं दो बीघा का किसान
पालता तीन मवेशी, पाँच इंसान
एक कच्चा मकान टूटा सा
जिसमें खड़ा एक पेड़ बुढ्ढा सा
रामजी हमारे रुठे है
खेत हमारे सूखे है
कुएँ सूखने लगे
चूल्हे बुझने लगे
चारा खत्म
दाना खत्म
पेट उधारी से भरता है
पंसारी रोज तगादा करता है
पत्नी यह देख रोती है
बच्चों की जबान सोती है
फटी धोती, टूटी जूती में मेरी टाँगे
सूखे खेत का रुख करती हैं
धोक लगाकर अपने देवताओं की
मैं बस यही पुकार करता हूँ
रामजी अगर तुम बरस जाओ
खेत हमारे जी जाऐगे
फसल हमारी खिल जाऐगी
कर्ज की गठरी उतर जाऐगी
सपनो की पतंग आसमान छू जाऐगी

अमिताभ जी रोज कहते कुछ लिखो यार तो जी हाजिर है आपके लिए।

27 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

Behtareen Abhivyakti..
Aaj jahan charo or pani ke liye maramari machi hai agar yahi daur chalata raha to..kisan ki halat kuch aisi hi rahegai..

sab dard sahata hua fir bhi muskurata hua..

sundar kavita aapki..badhayi..

ताऊ रामपुरिया said...

मैं दो बीघा का किसान
पालता तीन मवेशी, पाँच इंसान

आज तो बहुत सटीक लिखा जी. शुभकामनाएं.

रामराम.

vandana said...

kisan ke dard ko bakhubi abhivyakt kiya hai........barish bin yahi halat ban rahe hain..........bahut sundar likha hai.

अविनाश वाचस्पति said...

अपने खेत में दाल बोओ

दिन रात सब अरहरे हो जायेंगे
जमाना मुर्गी को भूला है

आप मुफलिसी को भूल जायेंगे

ओम आर्य said...

bahut hi sundar bhaaw wali rachana..............jisame sirf prakriti manwiya ehasas hai .......bahut bahut badhaaee

रंजना [रंजू भाटिया] said...

राम जी तो सोच सोच के बरस रहे हैं ..आपकी इस रचना में किसान की व्यथा बहुत अच्छे से दिख रही है .सपनो की पतंग आसमान छू जाऐगी ..यही दुआ करेंगे

अमिताभ श्रीवास्तव said...

moujuda sthiti ko vyakt kar rahi he aapki rachna/ rachna kyaa ise desh ka vah sach kahe jise sunane aour dekhane me takleef hoti he aour ham khud sochate he ki kyaa hamne apana bharat IS TARAH KA SOCHA THA?
krashi hi jeevan he/ aour sabse badi maar us par hi pad rahi he/yah sirf mousam ki nahi balki har star par kisaan maar khaa rahaa he..haalaat dayaniy he..
khoobsoorat tarike se ukera he aapne../ aapke dard ko me samajh saktaa hu/
aour dhnyavaad jo aapne meri baat maan kar apni kalam doudaai, kintu..yah doud jaldi jaldi dekhne ko milti rahe to mazaa aajaye..

मीत said...

इस समय... इससे बेहतरीन... रचना और कोई हो ही नहीं सकती... और अगर है तो हमें बताये कोई....
दिल भर आया यार....
मीत

जितेन्द़ भगत said...

एक कि‍सान का दर्द बहुत सरल शब्‍दों में बयॉं कर दि‍या आपने। सचमुच,
सूखे खेतों के सामने असहाय कि‍सान का चि‍त्र और उसका घर सबकुछ जीवंत हो उठा। आज का पढ़ा सबसे सार्थक पोस्‍ट।

Pakhi said...

Ab to bhagwan ji barish kar hi denge.

अनिल कान्त : said...

आपने एक दर्द और एक वर्ग की पीडा को बेहतरीन ढंग से लिखा है

डॉ .अनुराग said...

तुम्हारे बेहतरीन लेखो में से एक........सचमुच शानदार लिखा है....इन दिनों मूड अजीब सा है....लिखना पढना थोडा कम था पिछले दिनों....पर तुम्हारी कविता अच्छी लगी....ईमानदारी भरी...आजकल कोई सोचता नहीं इस बारे में ...

नीरज जाट जी said...

sushil ji,
pahle to ye batao ki aap mere bare me kawitayen kyon likhte hain.
mere papa ke pas char bigha jamin hai or ham do bhaai hain, to mere pas do bigha jamin aayi. is tarah main bhi do bigha jamin ka kisan hoon.
sahab ji, majaak kar raha tha.
achhi lagi ye kavita.

राजीव तनेजा said...

हमारे किसानों की दुर्दशा को ब्याँ करती सच्ची रचना...


मेरे ख्याल से ये आपकी अब तक की सबसे असरदार रचना है

अल्पना वर्मा said...

सूखे की स्थिति में आज यही पुकार है हर किसान की.
आप ने एक किसान की व्यथा को इतनी कुशलता से व्यक्त किया है की कविता पढ़ते ही मन भर आया.
हम किसान की महत्ता को अनदेखा कर रहे हैं.जब की वास्तविकता यह है की अगर किसान फसल न उगाए तो शहर में लोग क्या खायेंगे?आप की यह प्रस्तुति सामायिक और बेहतरीन लगी.
काश अमीर लोग मंदिरों में करोडों दान करने की बजाय गरीब किसानो के क़र्ज़ भर दें कम से कम किसान तो आत्महत्या से बचे.

दर्पण साह "दर्शन" said...

priya mitr amitaabh ji ka shukriya jo unhone aapse kuch likhne ko kaha...

...apna dard na hone ke bavzood. aankhein nam karne main safal hoti kavita.

रंजीत said...

uff ! kahan ho bhagwaan, mere desh ke kisan ...

क्रिएटिव मंच said...

बहुत त्रासदी भरी बात कही है आपने कविता में
बहुत भावुक पोस्ट
शुभकामनाएं



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क्रियेटिव मंच

रामकुमार अंकुश said...

संवेदनाएं लाजवाब हैं आपकी.
http://unmuktakash.blogspot.com/

भूतनाथ said...

kya baat hai.....kyaa baat hai....kya baat hai....!!

Science Bloggers Association said...

Zindagi ka aaina dikha diya.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

संवेदनशील व बेहद प्रभावी रचना.. हैपी ब्लॉगिंग

Harkirat Haqeer said...

कुएँ सूखने लगे
चूल्हे बुझने लगे
चारा खत्म
दाना खत्म
पेट उधारी से भरता है
पंसारी रोज तगादा करता है
पत्नी यह देख रोती है
बच्चों की जबान सोती है

एक किसान की वेदना को बखूबी दर्शाया है आपने ....शब्दों का सामंजस्य भी अच्छा बैठाया है आपने ...बहुत खूब ....!!

नीरज गोस्वामी said...

क्षमा करें इतनी सुन्दर रचना पढने के लिए देर से पहुंचा...लेकिन पहुँच तो गया...नैना बिटिया बहुत सुन्दर है...इश्वर उसे हमेशा सुखी रखे...
नीरज

क्रिएटिव मंच said...

किसान की वेदना को अभिव्यक्त करती भावुक रचना
बेहतरीन रचना



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क्रियेटिव मंच

kshama said...

Isebhee anubhav kiya hai..ek kisaan kee aulad hun...

RAJ SAGAR said...

BAHUT BAHUT BADIYA LIHA HAI
DIL KHUSH HO GAYA HAI
LIKHNE KA SALIKA BAHUT ACHHA HAI
LAGATA HAI DIL HUMARA BHI AUR
TUMHARA BHI SACHHA HAI

RAJ SAGAR

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