Thursday, February 12, 2009

जिदंगी क्या इसी ही को कहते हैं ?


वही सुबह का अलार्म सुनकर
वही जनसत्ता पेपर पढ़कर
वही सुबह एक सा नाश्ता खाकर
वही बदलती इंसानी फ़िदरत को देखकर
वही आफिस में उंगलियाँ तोड़कर
वही भिन्नाते सिर के साथ बिस्तर पर गिरकर
मन उचट गया है
पर जिदंग़ी है कि बस कटे जा रही है 
कभी माँ-बाप के बुढ़ापे की आहट में
कभी बेटी की शरारत में
कभी पत्नी की मुस्कराहट में 
कभी चिड़ियों की चहचहाट में
कभी हवाओं की सरसराहट में
 
बहुत दिनों से मन में उथल पुथल थी। क्योंकि कई यार दोस्त और खुद मैं भी कहता रहता हूँ कि यार जिदंगी में मजा नही आ रहा। पर जीऐ जा रहे है। और कल यह सुनते ही झट से हमारा चाय वाला बोला " मजा कोई किसी के बाप का नौकर है जो किसी के कहने से आ जाएगा।" और फिर मुस्कराता हुआ पीछे से कान के पास आकर बोला कि "मेरे जैसे बन जाओ फिर देखना मजा भी आ जाऐगा।" पर मेरी समझ में नही आता कि जिसे देखो वही मुझे बदलने को कहता है, चाहे वो घरवाले हो या बाहर वाले? साथियों अब आप ही बताईए कि क्या मुझे बदलना चाहिए?  वैसे मैं जल्द ही अपनी अलमारी पर भगत सिंह जी की लिखी दो लाईनें लगाने वाला हूँ। जब से ये लाईने पढ़ी है तब से दिल को बहुत भा गई हैं। आप भी पढ़िए। नोट- हर पोस्ट के बोनस के रुप में सीधे हाथ की तरफ से सबसे ऊपर भी मेरी पसंद का कुछ लिखा होता है उसे भी पढ़ा करें। शुक्रिया।
इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।

19 comments:

seema gupta said...

इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।
" ये दो लाइने सच मे कमाल की हैं हमे भी भा गयी हैं"
पतवार पास न दिखे रौशनी
जिधर हवा ले जाये, जाऊँगा।
फिर भी मैं चाँद के चढ़ने तक
मानस आसमान सजाऊँगा॥
" जज्बा-ऐ-जूनून शायद इसी को कहते हैं......"

"रही जिन्दगी की बात तो जिन्दगी इसी को कहते हैं.....ये नही बदलती हम और आप ही बदल जाते हैं....कभी फ़िक्र कभी बेफिक्री मे कटी जाती है ......ये जिन्दगी रोज सताने यूँ ही बेपरवाह चली आती है"

Regards

दिगम्बर नासवा said...

बहुत सुंदर कविता..........जीवन की उथल पुथल को शब्दों में बाँधने की ललक भी तो कविता ही है. इन दो लाइनों में जिंदगी का सार सिमटा है

इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।

अल्पना वर्मा said...

मन की हलचल को बताती कविता...अच्छी है..भाव अभिव्यक्ति सफल है.
जीवन को जैसे देखेंगे दिखेगा..आप ख़ुद को कैसे बदल पायेंगे??नहीं बदल सकते..आप ने ख़ुद ही तो भगत सिंह जी की ये पंक्तियाँ कह दी हैं यहाँ...
इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।
'थोड़ा हेरफेर अपनी दिनचर्या में कर सकते हैं..बाकि जिंदगी की खुशियाँ उसी में खोजनी पड़ती हैं जो आप के आस पास है. और जो ख़ुद अपने आप में है.

अनिल कान्त : said...

सुशील जी आपकी कविता बड़ी लाजवाब थी ....फिर भी मैं जिए जा रहा हूँ .....और आपकी पसंद की ऊपर दाए तरफ़ की पंक्तियाँ भी

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

मीत said...

इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।
बस और कुछ याद रखने की जरुरत नहीं... इसे ही याद रखो आज इन पंक्तियों ने पुरानी याद ताजा कर दी...
भाई को बहुत पसंद थी ये पंक्तियाँ...
मीत

vandana said...

ji han isi ka naam zindagi hai..........subah se shaam tak ek si dincharya mein uljhi . sachchyi to yahi hai baki khwab hum jo chahe dekh sakte hain.

jo jaisa hai vaisa hi rehta hai.........bahut khoob kaha hai bhagat sngh ji ne.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

ज़िन्दगी की खुशी तो ख़ुद में ही है ..बदलेंगे उसको अपने मनचाहे रंग में तो यह वैसी ही दिखेगी ..बाकी कभी कभी मन यूँ ही बावरा सा हो जाता है ..उस के लिए यह पंक्तियाँ आपने पढ़वा ही दी है ...

इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।

यही सबसे अच्छा है ...साइड में लिखी पंक्तियाँ अच्छी हैं

विनय said...

बहौत ख़ूब साहब! सुन्दर प्रस्तुति

---
गुलाबी कोंपलें

ताऊ रामपुरिया said...

इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,

हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।


लाजवाब. इससे आगे और कुछ कहने की या करने की आश्यकता ही कहां हैं?

डॉ .अनुराग said...

सच कहा भाई....सुबह से कुछ ब्लॉग पढ़ लिए तो मूड उस ओर चल दिया ....शाम को सोचा जिंदगी का फलसफा देख लेते है ..आज दो फलसफे मिल ही गए ....
मजा कोई किसी के बाप का नौकर है जो किसी के कहने से आ जाएगा।"
ओर दूसरा
इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।
तुसी जियो यार .....

Science Bloggers Association of India said...

इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,

हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।

Laajawab sher.

मुसाफिर जाट said...

कभी चिड़ियों की चहचहाट में
कभी हवाओं की सरसराहट में
...
यही जिंदगी है. मशीनी जिंदगी. सब कुछ स्वचालित.

रंजना said...

यह सही कहा....."हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।"
यह बड़ा ही सहज और सामान्य अवस्था है,सर्वसामान्य को ग्रस्त करने वाली.लेकिन प्रयास करके इससे निकला जा सकता है.जब कभी जीवन एकरस लगने लगे तो कुछ समय के लिए दिनचर्या को सायास बदल लेना चाहिए.....सकारात्मक, रचनात्मक सार्थक करने में जुट जाना चाहिए. नया कार्य नई उर्जा प्रदान करती है और एकरसता दूर करती है.

Harkirat Haqeer said...

ji Gandhi ji kavi hote hi pagal hain...tabhi to unke dimag me uthal puthal chlti rehti hai....waise aapka chay wala kafi badbola lagta hai....?

राज भाटिय़ा said...

कभी माँ-बाप के बुढ़ापे की आहट में

कभी बेटी की शरारत में

कभी पत्नी की मुस्कराहट में

कभी चिड़ियों की चहचहाट में

कभी हवाओं की सरसराहट में

जी यही तो है असली जिन्दगी.
बहुत सुंदर रचना लगी आप की बहुत ही सुंदर भाव .
धन्यवाद

राजीव तनेजा said...

इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।

बहुत ही बढिया....


ज़िन्दगी जिओ अपने अन्दाज़...अपने तरीके से जिओ...

दूसरों के कहे से जीना....जीना नहीं बल्कि खुद को...अपनी अंतरात्मा को मारना है..

अच्छी सोच....बढिया कविता..तालियाँ

Vijay Kumar Sappatti said...

susheel ji ,

mujhe to kavita usi din bahut pasand aa gayi thi. dil ko chooti hui poem hai .. is baar bahut behatreen lekhan hai ..

kaivita men apne man ki jhalak to hai hi , ek aam insaan ki zindagi ka khaakha kheencha hai ,aapne .
poem bahut sashakt ban padhi hai .

dono ,side post aur bhagat singh ji ke vavhan , bhi bahut jame hue hai ..

Dil se bahdhai.

विनीता यशस्वी said...

इन दीवाने दिमागों में ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,

हमें पागल रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।


in lines ne sub kuchh baya kar diya...

Prateek said...

हलाँकि उम्र हमारी आपसे काफ़ी कम है.......आधी होगी शायद...
पर ज़िन्दगी में मज़ा तो है बॉस....no doubt.(हो सकता है यह कम उमरी की एक और खुशफहमी हो.)

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