Sunday, August 31, 2008

अमृता प्रीतम जी का जन्मदिन और उनकी कविताएं

आज 31 अगस्त हैं अमृता जी का जन्म का दिन।
मेरे लिए यह दिन अब बहुत ही ज़ज्बाती होता है। आज है उनकी बातों का दिन, उनकी यादों का दिन। इनका लेखन ही था जिसने मुझे किताबों का रसिक बनाया। पहले एक किताब पढ़ी फिर दूसरी, फिर तीसरी, और फिर किसी ओर लेखक की एक किताब पढ़ी और ये सिलसिला यू ही चल पड़ा। या यू ही भी कह सकते है ये ही थी जिन्होने मुझे बिगाड़ा और किताबों से दोस्ती करा दी। और मन चाहने लगा कि एक बार इनसे मिला जाए। जो इंसान इतना प्यारा लेखन करता है वो कैसा है। बस कही से पता लिया उनके घर का। और निकल पड़े 31 अगस्त को उनकी जन्मदिन की बधाई देने के लिए। एक हाथ में एक ग्रीटींग और एक किताब " चुने हुए उपन्यास- अमृता प्रीतम" लिए निकल पड़े उनके होजखास घर के लिए। होजकास पहुँच कर एक गुलदस्ता लिया फूलों का।( कभी किसी लड़की को फूल तो क्या एक छोटा सा ग्रीटींग भी नही दिया। और जो एक आध लड़की अच्छी लगी कभी उनका नाम भी नही पूछ सका और आज फूल भी, ग्रीटिंग भी, वाह क्या बात है ) पता ढूढ कर घर के बाहर लगी घंटी बजाई। एक आदमी आया कुर्ता पजामा पहने। लगता था जाना पहचाना दिमाग पर जोर दिया तो पता लगा अरे ये तो इमरोज जी है। वो मुझे ऊपर ले गए। और एक जगह बैठा कर बोले कि आज उनकी तबीयत जरा ठीक नही है फिर भी बता कर आता हूँ कि कोई चाहने वाला आपको जन्मदिन की बधाई देने आया है। वो आई इमरोज जी को पकड़ते हुए मुझे लगा जैसे मैने गलती कर दी हो आकर। पर वो आई तो मैने उनके चरणस्पर्श किए। एक आर्शीवाद का हाथ सिर पर प्यार से फिर गया। फूलों का गुलदस्ता दिया गया जन्मदिन की मुबारकबाद के साथ साथ। नाम पूछा, काम पूछा। लगभग 10या 15 मिनट बात हुई। बात करते हुए लगा जैसे मै इन्हें बरसो से जानता हूँ। मैंने ही कहा कि आपकी तबीयत ठीक नही आप आराम करे। ठीक है मै जाती हूँ। एकदम ही मै फिर से बोल उठा कि मुझे आपके आटोग्राफ चाहिए और मैने वो किताब आगे बढ़ा दी। वे आटोग्राफ दे कर चली गई इमरोज जी के साथ। मैं खुश था कि मैंने इनसे मुलाकात कर ली। इमरोज जी आए और मैने दूसरे कमरे में जाने की इजाजत माँगी जहाँ खूब सारी पेटिंग्स रखी हुई थी जिन्हें देखने की इच्छा दूर से ही देखने के बाद हो गई थी। इमरोज जी ने कहा क्यों नही आप देखिए। जैसे ही मैं उस कमरे में घुसा तो देखा चारों तरफ पेटिंग्स ही पेटिंग्स थी दिवारों। और फर्श पर दीये रखे थे बुझे हुए ऐसा लगा कि जैसे रात को जले हो। उस कमरे में आकर लगा कि पता नही मै कौन सी दुनिया में आ गया हूँ। वो दिन है और आज का दिन है इमरोज जी की पेटिंग्स मैं दूर से पहचान जाता हूँ और अमृता जी की किताबों को भी। बहुत देर तक उस दुनिया में रहकर मैं विदा लेकर आ गया। फिर उसके बाद भी वहाँ जाना हुआ। एक दो बार। ये मेरी पहली मुलाकात थी उनके साथ। उनके जन्मदिन पर आप सभी से बाँट डाली। एक इमेज भी है जिस अमृता जी के आटोग्राफ है। साथ कुछ अमृता प्रीतम जी की कविताएँ भी पेश कर रहा हूँ आशा है आप लोगों को मेरी पसंद अच्छी लगेगी। जोकि " चुनी हुई कविताएँ- अमृता प्रीतम" की किताब से ली गई है। जिनके प्रकाशक है "भारतीय ज्ञानपीठ" । भारतीय ज्ञानपीठ की बहुत मेहरबानी।


आदि रचना

मैं- एक निराकार मैं थी
यह मैं का संकल्प था, जो पानी का रुह बना
और तू का संकल्प था, जो आग की तरह नुमायां हुआ
और आग का जलवा पानी पर चलने लगा
पर वह पुरा-ऐतिहासिक समय की बात है .....

यह मैं की मिट्टी की प्यास थी
कि उस ने तू का दरिया पी लिया
यह मैं की मिट्टी का हरा सपना
कि तू का जंगल उसने खोज लिया
यह मैं की माटी की गन्ध थी
और तू के अम्बर का इश्क़ था
कि तू का नीला-सा सपना
मिट्टी की सेज पर सोया ।
यह तेरे और मेरे मांस की सुगन्ध थी -
और यही हक़ीक़त की आदि रचना थी ।

संसार की रचना तो बहुत बाद की बात है ......

अमृता प्रीतम

एक दर्द था-
जो सिगरेट की तरह मैंने चुपचाप पिया
सिर्फ़ कुछ नज़्में हैं -
जो सिगरेट से मैं ने राख की तरह झाड़ी.....


इमरोज़ चित्रकार

मेरे सामने- ईज़ल पर एक कैनवस पड़ा है
कुछ इस तरह लगता है -
कि कैनवस पर लगा रंग का टुकड़ा
एक लाल कपड़ा बन कर हिलता है
और हर इंसान के अन्दर का पशु
एक सींग उठाता है ।
सींग तनता है -
और हर कूचा-गली-बाज़ार एक ' रिंग ' बनता है
मेरी पंजाबी रगों में एक स्पेनी परम्परा खौलती
गोया कि मिथ- बुल फाइटिंग- टिल डैथ -

मेरा पता

आज मैंने अपने घर का नम्बर मिटाया है
और गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की दिशा का नाम पोंछ दिया है
पर अगर आपको मुझे ज़रुर पाना है
तो हर देश के, हर शहर की, हर गली का द्वार खटखटाओ
यह एक शाप है, एक वर है
और जहाँ भी आज़ाद रुह की झलक पड़े
समझना वह मेरा घर है ।

18 comments:

नीरज गोस्वामी said...

सुशील जी आभार आपका इस दिलचस्प मुलाकात के बारे में बताने के लिए...अमृता जी जैसे शक्शियत कभी मरती नहीं सिर्फ़ अपना चोला बदल कर अपने लाखों करोड़ों चाहने वालों के दिल में जा बसती है...
नीरज

रंजना [रंजू भाटिया] said...

अमृता जी की लिखी किताबे वो हैं जो एक आग भर देती है दिल में ..मुझे भी बिगाड़ने में उनकी लिखी किताबों का बहुत हाथ रहा :) और यही पागलपन मैंने आगे अपनी बेटी को विरासत में सौंप दिया ..:) जब मेरी छोटी बेटी ने एक दिन मुझसे पूछा कि आप यह देर रात तक कौन सी किताबे पढ़ती है जो एक दम से बात भी नही सुनती मेरी ..मैंने उसको अपने हाथ में ली हुई ३६ चक पकड़ा दी ..कहा पढो और फ़िर बताना ..उस वक्त वह १२ वी की परीक्षा दे के खाली थी .बस उसके बाद वही हुआ जो होना चाहिए था:) .. अमृता का लिखा और उनसे इमरोज़ से मिलना दोनों हो बहुत सुंदर अनुभव रहे हैं मेरे लिए ..अच्छा लगा आपके लिखे की यादो से जुड़ना आज के दिन ..शुक्रिया

अविनाश वाचस्पति said...

पढ़कर ऐसा लगा जैसे आपकी जगह पर मैं हूं
इतना सजीव वर्णन
दिल को भीतर तक सुकून दे गया
ऐसी यादें बांटते रहिए
मानस को बहुत आनंद मिलता है

महेंद्र मिश्रा said...

एक दर्द था-
जो सिगरेट की तरह मैंने चुपचाप पिया
सिर्फ़ कुछ नज़्में हैं -
जो सिगरेट से मैं ने राख की तरह झाड़ी.
bahut badhiya rachana padhakar bahut achchalaga. thanks.

Manish Kumar said...

और जहाँ भी आज़ाद रुह की झलक पड़े
समझना वह मेरा घर है ।

sach mein wo ek azad ruh ki tarah thi jiske lekhan ki chaya jahan padi wahi ujale phail gaye...

shukriya unke janmdin par is pyare sansmaran ko humse baantne ke liye.

mamta said...

अमृता जी के जन्मदिन पर आपकी यादें पढ़कर बहुत अच्छा लगा। शुक्रिया।

और सभी कवितायें एक से बढ़कर एक है।

Manvinder said...

ek mulakat ko aapne badi kobsurati se piro diya hai apni post mai... esse log kabh abhar hi janam lete hai....
aap meri post bi pade jo maine apni or unki mulakaat ke baare mai likhi hai...

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुन्दर लगा,

मीत said...

bahut achi rachna se parichaya karvaya hai...
bahut hi achi nzm use ki hain...
padhkar bahut sakoon sa mila..
jari rahe

अनुराग said...

अक्सर ऐसा होता है रचनाकार से मिलकर कई बार हम सोचते है अरे ये भी साधारहण इंसान है हाड मांस का.....एक नोबेल पुरूस्कार प्राप्त कवि ने भी कभी कहा था की कवि से मत मिलो वरना उसकी कविता से शायद इतना प्यार ना कर पायोगे.....अमृता जी इसका अपवाद है...आप खुशनसीब है उनसे मिले ..बहुत लोगो ने ढेरो बार उन पर लिखा है ..ओर लगातार लिख रहे है...पर एक बात मै कहना चाहूँगा की...इमरोज का सादा होना ही अमृता को खास बना देता है.......

ताऊ रामपुरिया said...

कौन वो अभागा होगा जिसे लिखने पढ़ने का शौक हो और अमृता प्रीतम का मुरीद ना हो ? आप अमृता जी के पाँव छूकर आए हो तो मुझे ऎसी
इच्छा हो रही है की मैं आपके पाँव छू लू ! मुझे भी आशीर्वाद मिल जायेगा ! बहुत खुशनसीब हैं आप ! आपको भी शुभकामनाएं ! और इस लेख के लिए धन्यवाद !

श्रद्धा जैन said...

main amruta ji ko sirf suna tha magar Ranjana bhatia ji ke zariye unhe nazdeek se jana
fir unhe padhne ki utsukta jaagi aur pata hi nahi chala kab wo meri aadrsh si ban gayi kab unke naam par mera sir jhukne laga

aap amruta ji se mile hai ye bhaut naseeb ki baat hai

bhaut achha laga

PREETI BARTHWAL said...

सुशील जी बहुत बहुत आभार कि आपने अपनी वो कीमती यादों भरी मुलाकात हम सब के साथ बांटी। धन्यवाद

महामंत्री-तस्लीम said...

अमृता तो साहित्य में अमर है।
यह उनके नाम का ही स्वर है।

pallavi trivedi said...

main samajh sakti hoon jinhe ham chaahte hain, unse milna kitna achcha lagta hai....bahut achcha laga aapka ye sansmaran...

राजीव तनेजा said...

मैँने अमृता जी को लगभग 25-26 साल पहले पढने की कोशिश की थी...तब शायद मेरी उम्र कम थी...जिस वजह से उनका लेखन मुझे बहुत कठिन प्रतीत हुआ...उसके बाद एक डर सा बैठ गया कि उनका लिखा मेरे दिमाग की पहुँच से कहीं ऊपर है ...लेकिन उनके जन्मदिन के दिन रंजना जी के ब्लॉग पर और आज आपके ब्लॉग पर उनका लिखे का एक छोटा सा नमूना पढने को मिला तो जान पाया कि वो कितने ऊँचे दर्जे की लेखिका थी..मेरा ऐसी महान हस्ती को सौ-सौ बार नमन....

सुशील जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद...

भुवनेश शर्मा said...

अमृताजी का लेखन अपने-आप में एक इतिहास है....जिसे बार-बार जीने का मन करता है

vandana said...

sushil ji
amrita ji se huyi mulaqat aur unki nazm padhkar dil khush ho gaya
ek dard tha-----------kitne thode shabdon mein kitni gahri baat kah di unhone.
yahi to khoobi hoti hai mahan logon mein.

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