Tuesday, June 17, 2008

मेरी प्रेमिका का नाम बरखा है


बरखा


रिम झिम बरसती बूंदे आँखो से इशारा करती है
अपने पास आने को बार बार ये कहती है
अपने आस पास से डरी सहमी मेरी आँखें किसी दूजे को देखने का बहाना करती है
फिर वह झम झमाझम बरस हाथ से इशारा करती है
पास आता है या मचा दूँ शोर बिजली सी कड़क कर वह बोलती है
आस पास ताकता डरता मैं पहुँचा उसके पास
उससे मिलते ही शरीर में एक फुरहरी सी उठती हैं
जैसे जब कोई प्रेमिका अपने प्रेमी के होठों पर अपने होठ धर देती हैं
वह झट अपने मुँह के पट खोल प्यार से बोलती हैं
चल फिर से बचपन को ताज़ा करते है
अपनी अपनी उम्र को आधा करते है
तू साईकिल के टायर के गाड़ी बना, मुझे इंडिया गेट घुमा कर ला
मैं कागज़ की कश्ती बना, तुझे यमुना की सैर कराऊँ
तू मेढ़क की टर टर सुनता जा
मैं साँप की छतरी ढूढ़ती जाऊँ
तू जामुन के पेड़ पर चढ़ टहनियाँ हिलाता जा
मैं नीचे खड़ी अपनी चुनरी में जामुन इकट्ठे करती जाऊँ

छोड़ अब ये दुनिया दारी चल यार ऐसा करते है

तू धरती बन जा

मैं उस पर गिरती जाँऊ


नोट-यह फोटो www.earthalbum.com से है उनका शुक्रिया।

16 comments:

Rashmi saurana said...

bhut hi sundar rachana. likhate rhe.

अभिषेक ओझा said...

"तू साईकिल के टायर के गाड़ी बना मुझे इंडिया गेट घुमा कर ला
मैं कागज़ की कश्ती बना तुझे यमुना की सैर कराऊँ
मैं साँप की छतरी ढूढ़ती जाऊँ ओर तू मेढ़क की टर टर सुनता जा
मैं तेरे लिए गोल गोल रोटी बनाती जाऊँ और तू मुझे खिलाता जा"


अपनी उम्र आधा करने का मन तो मेरा भी हो चला !

Keerti Vaidya said...

amazing.....

नीरज गोस्वामी said...

सुशील जी
बेहतरीन रचना...बेहद सुंदर शब्द और भाव...बधाई.
नीरज

अरुण said...

छोकर साहब ख्याल रखना ये मौसम बारिशो का है, कही किसी और के घर मे ना बरस जाये , ये बरखा की झडी :)

रंजू ranju said...

बहुत खूब लिखा है आपने :) नया सा लगा या प्रयोग

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

इस बारिश ने तो आज भिगो डाला... वाकई बहुत उम्दा लेखन है आपका..

DR.ANURAG said...

खुदा कसम बड़े जोर की बारिश है हमारे यहाँ......अभी अभी यही बात मनीष जी कही है....जिधर देखो.....मूड अलग है....

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन भाव हैं. बरसात तेरे कितने रंग..वाह!!!

mehek said...

simply awesome har lafz baarish ki yaad dilata,aur kisi aur ki bhi,bahut sundar badhai

rajivtaneja said...

काश ये समय चक्र वापिस मुड़ चले और कोई अपना सा आ के कहे कि ....

आ...अब लौट चलें...
वो बचपन का चिंतामुक्त जीवन...

वो खेलते हुए मिट्टी से लथपथ होना...
वो हँसना..वो रोना...
वो खिलखिलाना...
वो माँ की ममताभरी डाँट...
वो उसका प्यार...उसका दुलार
वो बेफिक्र हो चहचाना...
आज भी सब याद है...

मीत said...

very good sushil bro.
apka comments mene apne blog par padha tha.
aap bhi bahut achcha likhte hain, apne kaha hai ki chithijagat se jud jaun par kaise yah nahin bataya

khair aap bhi u hi likhte rahiye
dhnyawad

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

आपकी कलम मे जादू है, आनद आ गया

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

आपकी कलम मे जादू है, आनद आ गया

DR.ANURAG said...

चल फिर से बचपन को ताज़ा करते है

अपनी अपनी उम्र को आधा करते है

चल दोनो मिलकर झप झपाझप का खेल खेलते है

तू साईकिल के टायर के गाड़ी बना मुझे इंडिया गेट घुमा कर ला

मैं कागज़ की कश्ती बना तुझे यमुना की सैर कराऊँ

मैं साँप की छतरी ढूढ़ती जाऊँ

ओर तू मेढ़क की टर टर सुनता जा

तू जामुन के पेड़ पर चढ़ टहनियाँ हिलाता जा
मैं नीचे खड़ी जामुन बिनति जाऊँ


छोड ये दुनिया दारी चल यार ऐसा करते है


aaj dubara padhne chala aaya....ye panktiya man me bas gayi hai....behtareen...

Vijay Kumar Sappatti said...

susheel ji , this is awesome yaar... ek naya prayog... ek naya outlook .... maine baareesh par bahut si baaten padhi hai , par this is ultimate yaar... main teen baar padha to ,bachapan ki baareesh mein pahunch gaya ...
aap to ustaad nikhle bhaiyya . gazab likha hai ..
maan gaye yaar..

vijay

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