Friday, March 7, 2008

तरक्की करता मेरा देश

तरक्की करता मेरा देश


सुनो-सुनो हर खासो-आम सुनो
तरक्की करता मेरा देश, देखो तरक्की करता मेरा देश

शहरो, कस्बो में देखो खुलते बड़े बड़े माल
और वही छोटी छोटी जेबों वालो को मुहँ चिढ़ाते ये बड़े बड़े माल
तरक्की करता मेरा देश

देते सस्ती, फ्री का लालच ये बड़ी बड़ी कंपनी के स्टोर
और वही धीरे धीरे छोटी छोटी दुकानों को निगलते जाते ये बड़ी बड़ी कंपनी के स्टोर
तरक्की करता मेरा देश

बच्चा बोला पापा पापा पैसे दो मैं पीजा खाऊंगा
पापा बोला वो क्या होता है? खाना है तो साग और मक्के की रोटी खा
बच्चा बोला वो क्या होता है?
तरक्की करता मेरा देश

कहते है अब तो हर गली मोहल्ले स्कूल स्कूल ही खुलते जाते है
और वही भरी दोपहरी में चोराहो पर बचपन पानी बेचता फिरता है
तरक्की करता मेरा देश

देखो बैंको के कर्ज तले दबकर किसान मर जाता है
और वही देश का बड़े से बड़ा व्यापारी बैंको का लाखो करोडो डकार कर भी बड़ी शान से जीता जाता है
तरक्की करता मेरा देश

आम आदमी की पुरी उमर बीत जाती है एक अदद मकान बनने में
और वही नेताओं की कोठियाँ तैयार हो जाती है बस पाँच ही सालो में
तरक्की करता मेरा देश

सुना है अब तो इंटरनेट और मोबाइल का ज़माना है
और वही एक इन्सान अपना दुःख दर्द रोने को एक कन्धा तलाशता फिरता है
और देखो इस ज़माने को एक कन्धा तक नही मिलता है

सुनो-सुनो हर खासो-आम सुनो
तरक्की करता मेरा देश,
देखो तरक्की करता मेरा देश

2 comments:

राज भाटिय़ा said...

बहुत खुब , सच मे बहुत तरक्की कर ली ,आप की कविता सच मे लाजवाब हे.

rajivtaneja said...

महानगरीय विडंबना है ये...

आगे दौड़...पीछे छोड़
हम आगे..और आगे विनाश के हवन कुंड की तरफ बढते चले जा रहे हैँ...
पीछे सारे संस्कार...सारे आदर्श...स्वाहा करते चले जा रहे हैँ....

मेरा भारत महान...

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