एक दिन अस्पताल में अपनी बाईं गाल बार-बार दबा रहा था. उसने (गीता ने) पूछा: क्या हुआ? मैंने कहा : दांत दर्द. जो गीता तीन बार मेरे नरक-प्रवेश की कोशिश से नहीं डरी, जो गीता मेरे चालीस परसेंट जलने के कारण मुझे नहलाने से नहीं डरी, क्योंकि जले हुए शरीर से घिन आती है, दांत-दर्द की बात सुन उसके कंधे झुक गए. यह शायद उसकी अंतिम पराजय का एक अस्थायी क्षण था. मुझसे कहा: ओ दीपक, मैं क्या-क्या करूँ तुम्हारे लिए!
~'स्वदेश दीपक' के लिखे 'मैंने मांडू नहीं देखा' से
~'मनोहर श्याम जोशी' के लिखे उपन्यास 'कसप' से.
मैं धीरे-धीरे पत्र मोड़ रहा था कि पिछली ओर कुछ लिखे पर नजर पड़ी. लिखा था, ‘बुरा लगा! नहीं रे! शाल उसने रख लिया है, जिसके लिए था. थैंक्यू!
~'पंकज बिष्ट' के लिखे उपन्यास ‘लेकिन दरवाजा’ से.
'कहां जा रहा? किससे हो रहा नाराज?' नायिका पूछती है.
'अपने से. मुझे जाने दे. मैं कहीं अकेला बैठना चाहता हूं.'
'मैं भी बैठना चाहती हूं और वहीं जहां तू. मैं कुछ नहीं करूंगी, बस तुझे नाराज बैठा देखती रहूंगी.'
'अपने से. मुझे जाने दे. मैं कहीं अकेला बैठना चाहता हूं.'
'मैं भी बैठना चाहती हूं और वहीं जहां तू. मैं कुछ नहीं करूंगी, बस तुझे नाराज बैठा देखती रहूंगी.'
~'मनोहर श्याम जोशी' के लिखे उपन्यास 'कसप' से.



