Monday, January 12, 2009

पत्नी की कमाई अच्छी या बेईमानी की ?

कल शाम को चाय की चुस्कीयों के साथ फिल्म "इज़ाज़त" देख रहा था। तभी किसी ने मेरा नाम लेकर मुझे पुकारा, आवाज जानी पहचानी थी। देखा तो मुँह से एकदम निकल गया "तू"। मैं बोला " सुना बहुत दिनों के बाद, क्या बात? सब ठीक तो हैं ना? " वह बोला "मौजा ही मौजा हैं यार, पहले तो चाय बोल दे और कुछ समोसे मंगा ले।"  फिल्म रोक दी गई। और दोस्तों वाली बातें शुरु हो गई। चाय आती रही बातें होती रही। तभी एक सवाल गूँजा " पत्नी की कमाई अच्छी या बेईमानी की ? " सवाल चौंकाने वाला था। मैं चौंका भी। इस सवाल ने चंद पल में ही कमरे का वातावरण ही बदल दिया। मैं सोचने लगा कि दोस्तों वाली बातों में ये जिदंगी की फू-फां क्यों आ जाती हैं?  मैं बोला "यार तू ये क्यों पूछ रहा हैं।" समझ तो आ रहा था पर ...।  वो बोला "पहले तू इसका जवाब तो दें।"  मैं बोला " यार तुझे तो पता ही होगा मेरा जवाब क्या होगा फिर क्यों पूछ रहा हैं? " वो बोला फिर "वो लोग" क्यों कहते हैं कि "बहू की कमाई खाने लगें हैं।" सारा मामला समझ आ गया था।  भाभी जी नौकरी करने लगी थी। कुछ दिनों पहले उसने फोन करके पूछा भी था कि "यार हम दोनों का ये प्लान हैं तू क्या कहता हैं।" मैं बोला "अगर भाभी जी राजी हो तो कोई हर्ज नही है।" वो बोला "यार उन्होंने ही तो कहा हैं जब ही तो तेरे से पूछ रहा हूँ। यार तुझे तो पता ही हम सभी का ऐसा कुछ खास खर्चा नही है, पर भविष्य में आगे खर्चे बढेंगे ही। बेईमानी से तो हमसे पैसा कमेगा नहीं, किसी ना किसी को तो कमाना ही पड़ेगा जब ही पैसा आऐगा। अगर पैसा पास हो तो दस लोग सहायता करने आ जाते है और अगर पैसा ना हो तो कोई नही पूछता।"  मैं बीच ही में बोल पड़ा "सा.. मैंने कब साथ नही दिया तेरा।" तो वो बोला "कि तू ठहरा आठँवा अजूबा।"  फिर उस दिन के फोन के बाद आज मुलाकात हुई। "वो लोग" और कोई नहीं बस उसके ताऊ, चाचा के परिवार के लोग और पड़ोसी होगें। मैं बोला "यार तू क्यूँ चिंता करता हैं ऐसे लोगो की।" वो गुस्सें में बोला " कौन सा..(गाली देते हुए) चिंता करता इन ..... (गाली) की।" मैं बोला "तो फिर किसकी चिंता है।" यार जब ये सब बातें माँ तक पहुँचती हैं तो वो नहीं सुन पाती ऐसी बातें और परेशान हो जाती है। आकर तेरी भाभी से बताती हैं। पुराने जमाने की औरत हैं समझती तो सब हैं पर यार माँ को वो बात कचोटती रहती हैं। कभी कह के अपने मन का गुबार निकाल देती है और कभी नही। पर साथ ही नौकरी भी तो नहीं छोड़ने देती। कहती है कि" उनके पीछे क्या हम खाना छोड़ देंगे।" पैसे की जरुरत को समझती है। उन्होने वो दिन भी देखे है जब एक एक पैसे जोड़ने के लिए क्या क्या जुगत करनी पड़ती थी। पर जब वो उन बातों से परेशान होती है, तो वो भी तो नहीं देखा जाता। जिदंगी की फू-फा की बातें करते करते कब रात के 12 बज गए पता ही नही चला। और आखिर में मैं बोला  "जिदंगी कोहलू है और हम बैल हैं जब तक जैसे भी मालिक चला रहा है,चलते रहो बस।"  और यही निर्णय लिया गया जैसा चल रहा है चलने दो और दोस्त को विदा किया। आप क्या सोचते हैं? क्या करना चाहिए?  आपके और मेरे आसपास भी बसते होंगे ये "वो लोग"। और साथ सोचिए "पत्नी की कमाई अच्छी या बेईमानी की"।

26 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

"जिदंगी कोहलू है और हम बैल हैं जब तक जैसे भी मालिक चला रहा है,चलते रहो बस।" और यही निर्णय लिया गया जैसा चल रहा है चलने दो और दोस्त को विदा किया। आप क्या सोचते हैं? क्या करना चाहिए?

आपने सोचने का कोई आप्शन ही नही छोडा. हमारे भी मन की बात कह दी आपने.

रामराम.

मीत said...

"जिदंगी कोहलू है और हम बैल हैं जब तक जैसे भी मालिक चला रहा है,चलते रहो बस।"
यह शब्द ही अपने आप में सभी सवालों का जवाब है...
आज जमाना है की महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलकर चल रही हैं...
सवाल है की पत्नी की कमाई अच्छी या बेईमानी की...?
तो इस सवाल के कई जवाब हो सकते हैं....
वैसे तो ये पत्नी की इच्छा पर निर्भर होना चाहिए, की वो कमाए या नहीं...अगर उसमे खूबी है तो उसे जरुर आगे बढ़ना चाहिए....
और हाँ पत्नी को अर्धांगिनी नाम ऐसे ही नही दिया गया...
बाकि ये सोच की बात है की हम पत्नी की कमी को किस तरह देखते हैं एक अर्धांग्नी यानि अपने हिस्से की कमी की तरह या फ़िर एक महिला की कमाई की तरह....
अगर किसी को मेरी बात ग़लत लगी ही तो मुआफी का हक़दार हूँ...
---मीत

रंजना [रंजू भाटिया] said...

आज कल दोनों का कमाना बहुत जरुरी है ...इस तरह की सोच से तो आगे बढ़ना मुश्किल होगा ..सोच सबको अपनी बदलनी होगी ..

संगीता पुरी said...

घर में कमाई तो जितनी हो और जिन स्रोंतो से हो , अच्‍छी ही होती है.....इसमें तो कोई गडबडी नहीं है्.... पर निर्णय सारी परिस्थितियों को देखकर लिया जाना चाहिए...अगर पति समर्थ हो और पत्‍नी के नौकरी करने से घर परिवार की शांति भंग हो रही हो तो महिलाओं का नौकरी करना आवश्‍यक भी नहीं....अपनी क्षमता का उपयोग वह कहीं दूसरी जगह भी कर सकती हैा

अविनाश वाचस्पति said...
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अविनाश वाचस्पति said...

किसी में हर्ज नहीं है
जिसको जो सुलभ हो जाए
पर बेईमानी भी किसी को
बेदुखी करे की जाए
यानी बेईमानी में भी
ईमानदारी का होना जरूरी है।

फिर कहता हूं
हर्ज किसी में नहीं है
पर मर्ज किसी का
नहीं बने तभी तक
ठीक है, अच्‍छा है।

प्रसन्‍न रहना
सन्‍न रहने से
सदा अच्‍छा है।

vandana said...

achcha prashna uthaya aapne aur iski aaj ke waqt mein bahut jarurat bhi thi.aaj zamana badal chuka hai magar logon ki soch ab bhi kafi had tak purani hi hai magar samajhdar har paristhiti ko samajhta hai aur usi ke anusar nirnay leta hai.
aaj pati aur patni dono ka aatm nirbhar hona bahut jaruri hai . ismein sochne wali bat hi nhi hai aur vaise bhi baimani se crore darza achcha hai ki patni kamaye.vaise bhi aaj ki nari bahut samajhdar hai aur use nirnay lene ki chut milni chahiye taki wo apna aur apne pariwar ka bhavishya ujjwal kar sake . bus ek pahal ki jarurat hai.
aapne logon ko ek soch di hai jiske bare mein sochna chahiye ki kya achcha hai aur kya bura.

डॉ .अनुराग said...

पैसा किस सोत्र से आ रहा है ये ज्यादा महतवपूर्ण है....बजाय इसके की उसे स्त्री ला रही है या पुरूष ..गाँवों मे भी स्त्रिया खेतो मे काम करती है...तो क्या वे कमाई के जरिए नही बनती ...वैसे अगर पुरूष बेईमानी के पैसे लाये तो वो हलाल के बन जाएगा ?ये मूल प्रश्न है

'Yuva' said...

''स्वामी विवेकानंद जयंती'' और ''युवा दिवस'' पर ''युवा'' की तरफ से आप सभी शुभचिंतकों को बधाई. बस यूँ ही लेखनी को धार देकर अपनी रचनाशीलता में अभिवृद्धि करते रहें.

उन्मुक्त said...

कमाई अच्छी या बेईमानी की - यह इस पर नहीं निर्भर करती कि कौन कमा रहा है पर इस पर निर्भर करती है कि कैसे कमाई जा रही है।

यह समय है जब हर महिला को आत्म निर्भर होना है।

उन्मुक्त said...

कमाई अच्छी या बेईमानी की - यह इस पर नहीं निर्भर करती कि कौन कमा रहा है पर इस पर निर्भर करती है कि कैसे कमाई जा रही है।

यह समय है जब हर महिला को आत्म निर्भर होना है।

Anonymous said...

kisi se karja laker, ya galt tarike s kama kar lane se kai guna behtar h ki dono kamaye.

अल्पना वर्मा said...

आज के समय में ऐसे प्रश्न का उठना थोड़ा अजीब सा लगा..लेकिन क्यूँ??
नहीं क्या अजीब है??...आम तौर पर भारतीय पुरूष [सभी नहीं]कृपया व्यक्तिगत न लें.]...आज भी अहम को अपने
पर ओढे रहते हैं..अगर पत्नी कमाए और उनसे कम तनखाह हो तो उन्हें उस की कमाई चुटकी भर लगती है.
और अगर ज्यादा है तो फिर कभी न कभी ताना जरुर देंगे..या कुंठित रहेंगे.
अमूमन पुरूष को अच्छा लगता है जब बीवी उनसे खर्चा मांगती है.उनके अहम् को संतुष्टि होती है...अपनी खुशी से उसे बिन मांगे नहीं देंगे..बहुतों को जानती हूँ जो नौकरी करती हैं मगर आज तक अपने ATM कार्ड का नम्बर भी नहीं जानती.salary स्लिप भी पति के पते पर आती है.
जबकि फिलिपिनो दंपत्ति में ऐसा नहीं होता..उनके अपनी कमाई का हिसाब अलग लगा रहता है.

इस तरह बीवी की कमाई सहर्ष स्वीकार करने वाले शायद बहुत ही कम पुरूष होंगे.
लेकिन जरुरत में ,बेईमानी से अच्छा है[ मन मार कर ही ]बीवी की कमाई स्वीकार कर लें.यही हित में होगा.

Dev said...

Mai Sangeeta puri , Dr.Anurag aur Rachana ji se puri tarah sahamat hoo....

Regards..

नीरज गोस्वामी said...

आजकल देखा गया है की पत्नियाँ पतियों से अच्छा कमा रही हैं...और अगर पत्नी पढ़ी लिखी है तो उसके ज्ञान का उपयोग होना चाहिए...घर से निकल कर स्त्री बहुत कुछ सीखती है...जो पूरे परिवार के लिए अच्छा होता है...पत्नी योग्य है तो उसके कमाने में एतराज क्यूँ होना चाहिए...एतराज वो करते हैं जिनके पास और कोई काम नहीं होता...
नीरज

राज भाटिय़ा said...

भाई सब से पहले तो बेईमानी की कमाई अपने साथ बहुत सी बुराईया ही लाती है, ओर फ़िर बीबी के काम की बात आती है, अगर मर्द इतना कमा लेता है कि घर के खर्च आराम से चल सके तो बीबी को काम करने की कोई जरुरत नही, अगर कोई लालच करे की चलो बीबी भी नोकरी कर ले पेसा जमा हो जायेगा, अपना बडा मकान होगा, वगेरा वगेरा... तो उन्हे यह जरुर सोचना चाहिये कि बच्चे बडे हो कर कभी भी आप को प्यार ओर समान नही देगे, हो सकता है वो आप की दोलत को ढुकरा कर भी चले जाये,
दुसरी बार जब बीबी काम करेगी तो वो भी जरुर थकेगी, फ़िर कोन देखे गा उस की थकावट को सब को खाना चाहिये यानि हर तरफ़ से गरीब बीबी को ही घुटना ओर मरना पडेगा, जिस से घर की शान्ति भी जाती रहती है, ओर बीबी ने अपने किसी कुलीग से हंस कर दो बाते कर ली तो फ़िर घर मै बबाल, तो भाई कम खा लो लेकिन शान्ति से खाओ, घर मे बीबी ही अच्छी लगती है बाहर मर्द. वेसे कभी मर्द किसी हादसे मै अपंग हो जाये तो मजबुरी मे फ़िर बीबी कॊ काम करना पडे तो अलग बात है.

अपनी तो यही राय है,अब चाहे इसे बिछडा पन कहो या कम विचारो वाला.ओर मेरा विचार किसी को दुख या छोटा दिखाना नही, क्योकि यह सब बाते हम ने अपनी जिन्द्गी मे भारत ओर विदेश दोनो जगह देखी है.
धन्यवाद

Rohit Tripathi said...

dekhiye abhi itna bada nahi hua hu ki in sab baton ke upar kuch kah saku.. lekin yeh sale padosi aur samaj ki to... sale har chiz mein tang adane chale aate hai. sab sahi hai kisi ke barein mein kuch mat sochiye

Amit said...

bahut sahi likha hai sushil jee..

दिगम्बर नासवा said...

सुशील जी
कमाई कैसी हो ये ज्यादा जरूरी है जाननाइसमे कोई बुराई नही है की पत्नी अगर कोई कमाई करे वैसे मिल कर एक दूसरे की मदद करना सबसे अच्छी बात है, रथ के पहिये अगर दोनों साथ चलें तो ठीक रहता है

जितेन्द़ भगत said...

पत्‍नी की भागीदारी से परि‍वार को आर्थिक बल मि‍लता है।
बेइमानी की कमाई ज्‍यादा दि‍न नहीं टि‍कती।

अविनाश वाचस्पति said...

भगत जी
इंसान भी ज्‍यादा दिन कहां टिका है
सौ साल बाद तो गया ही चला है।

Vijay Kumar Sappatti said...

susheel bhai , aapne khud hi to sawal ka jawaab de diya hai . hum sab kolhu ke bail hai aur jaisa chal raha hai ,waisa hi chale ...

patni ki kamaai honi chahiye ya nahi , ye bahut si paristithiyon par depend karti hai ..

well. aapne ek muddha to uthaaya hai .. badhai ..

aapka vijay

राजीव तनेजा said...

पहली बात कि पैसा जितना भी आ जाए...कम ही लगता है।ऊपर से मँहगाई का ज़माना है...खर्चे बढ रहे हैँ और फिर एक से भले भी तो दो ही होते हैँ।अगर बीवी अपनी खुशी से कमाने जाए तो मेरे ख्याल से इसमें कोई हर्ज़ नहीं है लेकिन हाँ!...अगर उस पर नौकरी करने के लिए दबाव डाला जाए तो वो गलत है

HARI SHARMA said...

पत्नी की कमाई और रिश्वत की कमाई में से कौन सी कमाई बेहतर है ? मुझे लगता है ये २ बहसों को एक कर दिया गया है. जब हम चर्चा कर रहे हैं तो दोस्तों रिश्वत की कमाई तो खराब खराब खराब है ही. पैसे का केवल भौतिक अर्थ नहीं होता, मानसिक और आध्यात्मिक अर्थ भी होता है. अतः किसे भी हालत मे रिश्वत की कमाई की तरफ तो मेरा मत नहीं जाता.
जहां तक पत्नी की कमाई के बात है ये २ व्यक्तियों का मिला जुला फैसला होना चाहिए. अच्छा हो शादी से पहले कैरियर सम्वन्धी बाते खुलकर हो जाए. अगर नौकरी नहीं करानी तो उसी लडकी से शादी करो जिसकी इच्छाए सीमित हो. पति के तनख्वाह में गुज़रा करने को सहमत हो. अगर ऐसा है तो कोई क्या कमा रहा है कोई क्या कह रहा है कोई क्या बकबास कर रहा है इसकी तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए. अगर दोनों ये चाहते है कि उनके सपने पूरे करने के लिए दोनों का कमाना जरूरी है तो फिर पति को घर के काम का वोझ उठाने को तय्यार होना चाहिए. लोग क्या कहते है ये कोई बड़ी बात नहीं है. आप अपनी जिन्दगी जी रहे हो अपने फैसले आप करो. आपकी जिन्दगी आपके हाथ मे है इसमे वो रंग भरो जो आपको अच्छे लगते है. बहुत साफगोई से कही बात किसी को बुरी लगी हो तो बिना शर्त क्षमा चाहता हूँ.
http://hariprasadsharma.blogspot.com/

HARI SHARMA said...
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