Thursday, October 16, 2008

प्रेम करने वाली लड़की

प्रेम करने वाली लड़की


प्रेम करने वाली लड़की अक्सर हो जाती है खुद से गाफ़िल और दुनिया को अपने ही ढ़ग से बनाने-सँवारने की करती है कोशिश।

प्रेम करने वाली लड़की हवा में खूशबू की तरह बिखर जाना चाहती है उड़ना चाहती है स्वच्छंद पंछियों की तरह धूप सी हँसी ओढ़े।

वह लड़की भर देना चाहती है उजास चँहु ओर।

प्रेम करने वाली लड़की सोना नही, चाँदी नही,गाड़ी नही, बँगला नही।
चाहती है बस किसी ऐसे का साथ जो समझ सके उसकी हर बात और अपने प्रेम की तपिश से उसे बना दे कुंदन सा सच्चा व पवित्र।

अब वह आईना भी देखती है तो किसी दूसरे की नजर से परखती है स्वंय को और अपने स्व को दे देती है तिलांजलि।

प्रेम करने वाली लड़की के पाँव किसी नाप की जूती में नही अटते, समाज के चलन से अलग होती है उसकी चाल।

माँ की आँख में अखरता है उसका रंग-ढ़ग, पिता का संदेह बढ़ता जाता है दिनों दिन और भाई की जासूस निगाहें करती रहती है पीछां ।

गाँव-घर के लोग देने लगते है नसीहतें समझाने लगते है ऊँच-नीच अच्छे-बुरे के भेद मगर प्रेम करने वाली लड़की जानना समझना चाहती है दुनिया को

और एक माँ की तरह उसे और सुंदर बनाना चाहती है ।


रचनाकार- रमण सिहँ

(यह कविता सामयिक वार्ता में छपी थी )
महेश सिँह जी( प्रबधंक संपादक सामयिक वार्ता) की अनुमति से इस प्यारी रचना की पोस्ट डाली जा रही हैं।
आजकल समय अभाव के कारण कुछ लिख नहीं पा रहा हूँ इसलिए अपनी पसंद की कुछ रचनाएं डाल रहा हूँ जो पहले ही फाईल में सेव हैं।

17 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही सुंदर रचना आपने पढ़वाई ! इसके लिए आभार आपका !

रंजना [रंजू भाटिया] said...

प्रेम करने वाली लड़की हवा में खूशबू की तरह बिखर जाना चाहती है उड़ना चाहती है स्वच्छंद पंछियों की तरह धूप सी हँसी ओढ़े।

बहुत बढ़िया .सही कहा .प्रेम करने वाली लड़की ऐसी ही तो होती है ....शुक्रिया इन प्यारी बातों को यहाँ देने का ...

जितेन्द़ भगत said...

सुशील जी, बहुत ही सुंदर रचना पढ़वाई- ये पंक्‍ति‍यॉं तो लाजवाब हैं-
प्रेम करने वाली लड़की के पाँव किसी नाप की जूती में नही अटते, समाज के चलन से अलग होती है उसकी चाल।

फ़िरदौस ख़ान said...

सुब्हान अल्लाह...बहुत ख़ूब...

मोहिन्दर कुमार said...

सुशील जी,

भाव पक्ष तो मजबूत है इस रचना का मगर..कविता, गजल, गद्य, पद्य किस लेब्ल में रखूं समझ नहीं पाया..

वैसे ऐसी लडकियां मिलती कहां हैं ? मुझे एक बहु की तलाश है :)

नीरज गोस्वामी said...

बहुत बेहतरीन और प्यारी रचना है ये महेश जी की..हम सब के साथ बाँट ने के लिए शुक्रिया...
नीरज

रंजना said...

अब वह आईना भी देखती है तो किसी दूसरे की नजर से परखती है स्वंय को और अपने स्व को दे देती है तिलांजलि।

सत्य कहा.पर सच्चे प्रेम में निमग्न स्त्री हो या पुरूष दोनों की यही मनोवास्था होती है.प्रेम और समर्पण का सुंदर निरूपण किया है आपने.

Radhika Budhkar said...

bahut hi sundar bhav purn rachana

Vivek Gupta said...

सुंदर अभिव्यक्ति, सुन्दर कविता, सुन्दर भाव

pallavi trivedi said...

bahut sundar rachna padhwai aapne...shukriya.

राज भाटिय़ा said...

भाई बहुत ही सुन्दर ढंग से आप ने यह रचना शव्दो मै पिरओ दी .
बहुत अच्छी लगी धन्यवाद

विवेक सिंह said...

अति सुन्दर !

डॉ .अनुराग said...

भाई वाह ....अपने तरह की ख़ास कविता है....कही कही रूमानी ...कही कही मध्यम वर्गीय हो जाती है....यहाँ बांटने के लिए शुक्रिया

भूतनाथ said...

सुशील भाई इतनी सुंदर रचना पढ़वाने के लिए आपको अनेको बधाइयां !

मीत said...

sunder likha hai

sab kuch hanny- hanny said...

rachna wakai bahut pyari hai.

राजीव तनेजा said...

ऐसी सुन्दर रचना पढवाने के लिए रमण सिंह जी के साथ-साथ सुशील जी...आपको भी नमन

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