Showing posts with label लेख. Show all posts
Showing posts with label लेख. Show all posts

Tuesday, September 14, 2010

यमुना, हम और मीडिया

हर सुबह की तरह आदत से मजबूर होकर जब न्यूज सुनने के लिए टीवी चलाया तो वहाँ नीचे एंकर में एक न्यूज दौड़ रही थी कि तीसरा पुस्ता (उस्मानपुर) पानी में डूब गया है। एक पल को तो डर ही गया था। फिर मैं सोचने लगा, पर हमारी गली सूखी, ये चमत्कार कैसे हो गया? क्योंकि हमारे घर से तीसरे पुस्ते की पैदल दूरी बस दस मिनट की ही होगी। खैर जब कई घंटो के बाद भी पानी नहीं आया तो शाम को हम खुद ही निकल गए, ये देखने कि आखिर देखे तो माजरा क्या। ( पिछली बार अगस्त में भी कई न्यूज चैनल वालों ने पुल के नीचे की पार्किग को बस अड्डा बना दिया था।) जब पुस्ता रोड़ पर गया तो देखा कि लोगों का इतना तांता लगा हुआ है। ( सब टीवी देखकर ही आ रहे है) कि हर पुस्ते पर पुलिस तैनात है। यमुना को ऐसे देख रहे हैं कि जैसे आज से पहले यमुना देखी ही नही हो। सच तो यही है कि दिल्ली के लोगों ने यमुना देखी ही कहाँ है वो तो सिमट कर रह गई है एक छोटे से दायरे में और कहीं तो बिल्कुल ही सूख गई। जहाँ-जहाँ थोड़ा बहुत पानी है, उसे मैला कर दिया दिल्ली वालों ने कूड़ा-करकट डालकर और रही-सही कसर दिल्ली सरकार पूरा कर देती है गंदे नालों का पानी डालकर। और साथ ही उसकी खाली पड़ी जमीन को बेकार समझकर सरकार ने उस पर कहीं मेट्रो का डिपो बना दिया, कहीं खेलगाँव बना दिया, कहीं अक्षरधाम मंदिर बनावा दिया.............। आखिर कब तक यमुना चुप रहेगी............... 

और जब ये अपना उग्र रुप धारण करेगी तब लोग कहेंगे हाय यमुना तुने ये क्या किया? फिर मुख्यमंत्री जी आकर कहेंगी भगवान से दुआ करो कि सब ठीक हो जाए। गलतियां इंसान करे और ठीक भगवान करें अजीब लोग हैं?  खैर आगे बढ़ा तो देखा कि पानी तो अभी भी पुस्ता रोड़ से लगभग आठ नौ फुट नीचे ही होगा, जो पहले के मुकाबले थोड़ा ज्यादा तो है पर इतना भी नही कि हाय-तोबा मचाई जाए । धीरे-धीरे पानी को देखता हुआ आगे बढ़ा जा रहा हूँ। मेरे आगे बच्चों की एक टोली चल रही है अपनी मस्ती में। आगे एक आदमी पेशाब कर रहा है यमुना की तरफ मुँह करके। तभी एक बच्चा अपने दोस्तों से कहता है ओए...... धक्का दे दूँ इसे.....? दूसरा बच्चा अबे सा............ ले................खैर बच गई जान इस आदमी की :) और बच्चे निकल गए साईड से। पर हम भी अभी बच्चे ही ठहरे इसलिए बोल पड़े अरे भाई पुस्ता टूट जाऐगा, ज्यादा पेशाब मत करना, वो मुस्कराया :) । ( वैसे हमने उन महाश्य का फोटो खींच मारा, मोबाइल कैमरा भी क्या कमाल की चीज है जी :) 

 पुस्ता रोड  के दोनों तरफ टेंट और तीरपाल लगे हुए हैं। उसके अंदर लोग अपना-अपना समान लेकर बैठे-लेटे हुए हैं। कोई बैठा बतिया रहा है, कोई चारपाई पर सोया हुआ है, दो बच्चे कबाड़ को छाँट रहे है, छोटी लड़कियाँ मेहंदी लगाने में मस्त हैं। एक बीमार स्त्री सड़क पर बोरी बिछाए लेटी हुई है, उसका पति सिरहाने पर बैठा उसे ही निहार रहा है। बैबसी उसके चेहरे पर साफ़ नजर आ रही है। आगे बढ़ता हूँ तो देखता कुछ सरकारी बाबू लिखा पढ़ी में लगे हुए है। दिल्ली जल बोर्ड का पानी का टेंकर खड़ा है और उसका पानी यूँ बह रहा है। उसका ड्राइवर कहाँ है कुछ पता नहीं। दो औरतें सड़क पर बैठी लूडो खेल रही है। पास ही एक लाली-पोप बेचने वाला खड़ा है, बच्चें खड़े होकर, लाली-पोप बिकने वाले का मुँह ताक रहे है ना जाने अंदर ही अंदर क्या सोच रहे हैं। इसके साथ लगे टेंट में एक बुजुर्ग चारपाई पर लेटा लम्बी-लम्बी साँसे ले रहा है, एक बच्चा हाथ के पंखे से उसकी हवा कर रहा है। कुछ लोग तीरपाल का आशियाना बना रहे है। उसके आगे दो बच्चे मछली पकड़ रहे हैं। शायद शाम के खाने में ये मछलियां ही पकेगी आज। आगे चलकर देखता हूँ सूअर अपनी मस्ती में मस्त हैं,  शायद टीवी नही देखते है। फिर सोचता हूँ कि आज से पहले कब देखे थे मैंने सूअर......पर आप ये मत सोचो, आप सोचो कि हम एक विकसित अर्थव्यवस्था या एक महाशक्ति बनने का सपना देख रहे है पर किसी आपदा के आने पर दिल्ली जैसे शहर में लोगो को सड़को पर रहना पड़ता है। कोई भी ऐसी जगह नही जहाँ प्रभावित लोगो को रखा जाए  , कोई मशीनरी नजर नही आती...... आपदा प्रबधन नाम की कोई चीज नहीं....... है तो बस कागजों में......... हाँ आफिस जरुर है सफदरजंग एनकलेव में......और इसी विकसित होने के गुमान में क़ॉमनवेल्थ खेल करा रहे हैं और कैसी फजीयत हो रही,  वो आप देख ही रहे हैं। 

क्या इतने जरुरी थे ये खेल? भाई आपके यहाँ लोग दो रोटी की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं, पता नही कितने लोग भूखे सोते? और कितने किसान खुदकुशी कर रहे है।..............मेरी मम्मी जी अक्सर कहती  है कि "भूखे पेट तो ढोल भी अच्छे नहीं लगते हैं"...........अब मैं तीसरा पुस्ता पहुँच गया हूँ। देखता हूँ कि जिस तीसरे पुस्ते की बात चैनल वाले कर रहे है वो तो खादर की तरफ है और जिसे सही में तीसरा पुस्ता कहते है वो उसके ठीक सामने। यानिकी जब भी यमुना में ज्यादा पानी आता है तो इधर आता ही। इसके साथ ही गुर्जरों का उस्मानपुर का पुराना गाँव है वैसे तो गाँव में काफी घर है पर जो भी वहाँ के रहने वाले थे वो इधर आ गए है तीसरे पुस्ते और पहले पुस्ते के बीच की क़ॉलोनी में इसको भी उस्मानपुर कहते हैं। पर इन लोगो ने वहाँ भी अपना आशियाने बना रखे हैं,  क्योंकि जब दिल्ली में भैंस रखने के लिए सरकार ने मना किया, ( क्योंकि दिल्ली को दिल्ली नहीं, लंदन बनाना चाहती है दिल्ली सरकार )  तो इन्होंने यहाँ अपना खरक ( जहाँ भैंस रहती है) बना लिया। इन्हीं गुर्जरों ने कुछ जगह कबाडियों को दे दी। कुछ खेत के मजदूरों को जो वहाँ सब्जी बगैरा उगाते हैं। और सड़क पर टेंट लगाकर ये ही लोग है। बाकी तो खाली जमीन है, देखना धीरे-धीरे इस पर कंक्रीट के जंगल बना दिए जाऐंगे। 

और बिल्कुल यही हाल आगे गढ़ी मेढू का है, वो भी गुर्जरों का गाँव है। पर जिस तीसरे पुस्ते को लोग जानते है और वो इधर है पुस्ता रोड़ से पूर्व की तरफ है ना कि पश्चिम में खादर की तरफ। और ये तीसरा पुस्ता आगे जाकर मिलता है ब्रहमपुरी में। और इस पुस्ता रोड़ पर कुल आठ पुस्ता है जीरो से लेकर पांच तक। अब सोचिए जिनके रिश्तेदार दूसरे शहरों में रहते है वो जब इस खबर को देखेंगे तो परेशान होंगे कि नहीं? और ऐसी ही एक स्टोरी को देखकर पिछले दिनों एक आदमी ने आफिस से घर फोन किया और बोला कि " वो स्कूल से बच्चों को ले आओ सुना है बस-अड्डे में पानी भर गया है टीवी में खबर आ रही है।"  हेल्लो यार सुना है तुम्हारे बगल के पुस्ते पर पानी आ गया है, तुम्हारे यहाँ का क्या हाल है? मेरे खुद के गाँव से रिश्तेदारों के फोन आ रहे हैं।  अब आप उन्हें समझाए और बताए कि ऐसा नहीं हैं। पर ये पत्रकार लोग परेशानी को कहाँ समझेंगे , इन्हें तो "बस स्टोरी बनानी है और सनसनी फैलानी है", जिसके कारण ज्यादा से ज्यादा दर्शक इनके चैनल को देखे, जिससे इनके चैनल की टीआरपी ज्यादा रहे, जब टीआरपी ज्यादा रहेगी तब विज्ञापन ज्यादा मिलेंगे और जब विज्ञापन ज्यादा मिलेंगे तो ज्यादा मुनाफा होगा और भाई जब मुनाफा ज्यादा होगा तो मालिक खुश होगा। सोच रहा हूँ आखिर ये मालिक लोग कितना खुश होना चाहते हैं?






































मीडिया का बस अड्डा































आज के पत्रकार




















Saturday, November 7, 2009

प्रभाष जी, क्या सचमुच आप इस रविवार "कागद कारे" लेकर नही आऐंगे?

रविवार की सुबह "कागद कारे" का ऐसे इंतजार होता था।  
रविवार की सुबह देर तक मैं चाहकर भी सो नही पाता। क्योंकि रविवार है। और किसी चीज का इंतजार है। आँख खुलते ही मुँह से आवाज निकलती है पेपर। नीचे से कोई पेपर लेकर आता। पाँच पेपरों में से जिस पेपर की तलाश है उसे सबसे पहले निकाल संपादकीय पेज खोलता हूँ। जिस रविवार यह पेपर नही मिलता तो सुबह बासी सी लगती है। फिर बस एक आवाज निकलती है "जीतू"(छोटा भाई) वो पेपर कहाँ है।" नीचे से ही आवाज आती है "आज नही आया, पेपर वाला कह रहा था कि आज ये पेपर नही आया।" (पेपर वाला अक्सर यह पेपर नही लाता) मैं बिस्तर से निकल पड़ता हूँ। ना बाथरुम जाने की जरुरत, ना ही टूथ ब्रश करने की जरुरत। और ना ही नाशता करने की इच्छा। बस एक ही काम कि ये पेपर कैसे लाया जाए। फिर से जीतू को आवाज लगती। और वो पैर पटकता हुआ आता है और पैसे लेकर पेपर लाने के लिए बाईक से निकल जाता है। अक्सर घर में चर्चा रहती है कि ऐसा क्या है इस पेपर में जो हमें धक्के खाने पड़ते है। जब तक पेपर नही आऐगा ये बैचेन क्यों रहता है? थोडी देर बाद मेरी आवाज फिर से गूँजती है "क्या हुआ अभी तक पेपर नही आया। कितनी देर हो गई। पेपर लेने गया है या अमेरिका गया है। कल से इस पेपर वाले को बदल दो, .... एक यही पेपर नही लाता बाकी सब ले आता है, नही चाहिए मुझे ऐसा पेपरवाला.....................। फिर घर का एक सदस्य कहेगा कि "तसल्ली भी रखा करो।" फिर दूसरा सदस्य कहेगा "पेपर पेपर पेपर..., पेपर हो गए या ......."पर माँ तो माँ होती है ना" आ गई अपने बड़े बेटे का पक्ष लेने। और बोलने लगेगी "एक पेपर नही ला सकते तुम, मैं तो अनपढ ठहरी, नही तो खुद जाकर ले लाती।" वो पेपर कोई और नही "जनसत्ता" है। और उस पेपर के जिस कालम को पढने के लिए मैं सुबह सुबह बैचेन रहता हूँ वो कालम है "कागद कारे" बाकी के सारे काम इसको पढने के बाद .................

आज का दिन

आज "जनसत्ता" आया हुआ है। पर प्रभाष जी के जाने की खबर सुबह किसी समाचार चैनल से मिली। एकदम से स्तम्भ रह गया। और एकटक टीवी को देखता रहा। पर फिर अपनी भावानाओं पर काबू पाया। ना जाने कैसा रिश्ता था मेरा और उनका। कभी कभी सोचता हूँ तो लगता है कि शब्दों और विचारों का एक रिश्ता है। एक भावनात्मक रिश्ता। पता नही कब कैसे "कागद कारे" से परिचय हुआ और एक रिशतें में बदल गया। उनके लिखे "कागद कारे" कभी होंसला दे जाते, कभी कुछ सीखा जाते, कभी अनदेखी तस्वीर को देखा जाते, कभी आँखो में आँशु ले आते और कभी जीने का जज़्बा दे जाते। उनके लिखे शब्दों से मिट्टी की खूशबू आती है। उनका "अपन" शब्द अपना सा लगता है। उनकी खरी खरी बातों ऊँचे ओहदों पर बैठे लोगो की जमीन को हिला जाती है। पता नही उनके लिखे कितने लेखों की कटिंग आज भी फाईल में लगी हुई है। आज जब उस फाईल को निकाला तो उनके शब्दों और विचारों की लहरों में बहता चला गया। कई बार प्रभाष जी से आमना सामना पर कभी बात नही हुई। सोच रहा हूँ कि परसो रविवार है। क्या सचमुच "कागद कारे" नही आऐगा? क्या अब भी मैं रविवार की सुबह का बेसर्बी से इंतजार करुँगा? उस बैचेनी का अब क्या होगा? प्रभाष जी अब कौन हर रविवार सुबह मेरे संग बैठकर चाय पीऐगा। इस रविवार सुबह जनसत्ता तो आऐगा, प्रभाष जी क्या आप सचमुच नही आऐंगे?...................................

प्रभाष जी की खरी खरी जिसके हम कायल थे।


कहते है आज अगर बालको उधोग खड़ा किया जाता तो उसमें कम से कम पाँच हजार करोड़ रुपय लगते। बालको के इक्यावन प्रतिशत शेयर यानी उसकों चलाने की मिलकियत और उस पर नियंत्रण साढे पाँच सौ करोड रुपयों में स्टारलाइट कंपनी को सौंप दिया गया। इस उधोग के पास अपने दो बिजली घर है जिनमें प्रत्येक पाँच सौ करोड़ का माना जाता है। विनिवेश मंत्री अरुण शौरी ने सब आंकड़े बताए लेकिन मानने वाले नहीं मानते कि यह सौदा साफ और पारदर्शी है। छतीशगढ के मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री निवास के एक असंवैधानिक सत्ता केंद्र ने सौ करोड़ रुपय इस सौदे में लिए है। लेकिन अरुण शौरी इसे बकवास बताते है। वीपी सिंह और बोफर्स वीर अरुण शौरी अब तक नहीं बता सके कि वे चौंसठ करोड़ किसने खाए? पंद्रह साल हो गए। लेकिन बालको के सौदे में कोई गडबड वे नही देखते। अरुण शौरी जब पत्रकार हुआ करते थे तो गाँधी के लंबे-लंबे उद्धरण दे-देकर राजनेताओं को कोड़े मारा करते थे। क्या बालको स्टरलाइट कंपनी को इसलिए सौंपा गया है कि उसके मालिक ने गाँधी के टृस्टीशिप सिद्धांत को मान लिया है? तब एक लेख में नेताओं को दुतकारते हुए अरुण शौरी ने लिखा था- काके ये थूक के चाट जाएंगे। उनके मुहावरे और मंतव्य को अब उन्हीं पर लागू किया जाए तो कहना पड़ॆगा- काके, ये विश्व बैंक के पले-पनपे एडम स्मिथ के सपूत है। ये गाँधी को थूक कर हेडगेवार को चाट जाएंगे। बालको, तुम देखना ये बड़ी ईमानदारी से देश को बेच खाएंगे।


नोट- ऊपर बाक्स में लिखा हुआ अंश प्रभाष जी के एक लेख से लिया गया है जो जनसत्ता में छपा था। जिसकी कटिंग मेरे पास है और वहाँ से उतारा गया है। इसलिए "जनसत्ता" पेपर का शुक्रिया। और फोटो गूगल और रविवार डाट काम से लिया गया है। साथ ही ये पोस्ट कल लिखी गई थी पर किन्हीं कारणों से आज पोस्ट की जा रही है।

Wednesday, July 8, 2009

चंद मुलाकातों का साया

कुछ यादें, कुछ बातें गुरु की।

एक तगड़ा शरीर, एक कड़क आवाज़ और एक सांवला चेहरा जब कफ लगे हुए सफेद कुर्ता पाजाम पहनकर निकलता था तो छात्र ही क्या, टीचर भी अपनी अपनी क्लास में घुस जाया करते थे। जिस दिन नही आए तो समझो बच्चों और टीचरों की मौजा ही मौजा। कोई भी काम समय पर नही, ना ही समय पर घंटी बजेगी। ना ही समय पर टीचर  कक्षाओं में पहुँचेगे। और ना ही बच्चें पढ़ॆगे। जिसे देखो वही इन्हें कौसता मिलेगा। वो चाहे बच्चें हो, टीचर हो या फिर अभिवाहक। फिर भी हर अभिवाहक अपने बच्चों को इसी स्कूल में पढाना चाहता है। वो भी प्रिंसीपल सर श्री राजबीर सिंह बंसल जी के रहते हुए। वजहें बहुत है। पर सबसे बड़ी वजह है स्कूल में अच्छी पढ़ाई का होना। हर साल स्कूल का बहुत ही अच्छा रिजल्ट आना। और हर साल अपने जोन में शीर्ष पर रहना।


सुबह की प्रार्थना के लिए सभी छात्र और छात्राऐं निकल रहे हैं कक्षाओं से। हम भी निकल रहें हैं बाजुओं को नीचे करके और अपनी घड़ी को छिपाते हुए। स्कूल के स्टेज के उल्टे हाथ की तरफ लड़कियाँ और सीधे हाथ की तरफ लड़के। "तुम ही हो माता पिता भी तुम, तुम ही हो बंधु सखा भी तुम हो......" प्रार्थना के ये शब्द स्कूल में गूंज रहे हैं। प्रार्थना के बाद राष्ट्रगान होता हैं। जिस समय अवधि में ये होना चाहिए उस समय अवधि में ही होना चाहिए ये सर का आदेश है। खैर आज राष्ट्रगान एक ही बार हुआ। सर स्टेज पर आ चुके हैं। सर हमेशा की तरह बिना लिखा भाषण देना शुरु करते हैं। वो भाषण केवल भाषण नही होता है नेताओं के भाषण की तरह, उस पर अमल करना भी जरुरी होता है। इसी अमल के कारण सारे टीचर कुढ़ते रहते हैं इनसे। तभी सर की निगाह दो बच्चों पर पड़ती है जो मेरे पीछे बैठे हैं। भाषण अधूरा छोड़कर उन्हें स्टेज पर बुला लिया जाता है। तूफान से पहले की शाँति चारों फैल चुकी है। एक सवाल की गूँज शांति को भंग करती है। "किस बात पर हँसी आई तुम दोनों को?" जवाब ना मिलने पर एक लड़के को एक थप्पड़ रसीद कर किनारे कर दिया जाता है। फिर दूसरे लड़के से वही सवाल पूछा जाता है? जवाब ना मिलने पर फिर जो थप्पड़ो का सिलसिला चलता है वह कई मिनट तक नही रुकता। दोस्त को पीटता देख अच्छा नही लगता है। पर क्या करुँ वो मेरा दोस्त बाद में हैं, उससे पहले वो उनका लड़का है।

पता नहीं किस साल की बात है। पर इतना पता है कि मैंने सरकारी स्कूल से पाँचवी कक्षा पास की थी। पिताजी और अंकल जी मेरा नाम घर के पास के प्राइवेट स्कूल "ज्ञान सरोवर"  में कराने ले जाते है। वहाँ एक व्यक्ति मेरे से कई सवाल पूछता है। मैं सोचता हूँ ये तो टीचर नही हो सकते है फिर क्यों सवाल पूछ रहे हैं? और मैं उनको सही जवाब दे देता हूँ। वो खुश होते है पर मैं खुश नही हूँ क्योंकि मुझे इस स्कूल में दाखिला नही लेना है। मैं कह देता हूँ "मुझे तो "जन-कल्याण स्कूल" में ही दाख़िला लेना।", वो पूछते है "उसी स्कूल में ही क्यों लेना है बेटा?" मैंने तपाक से कहता हूँ  "मैंने सुना है कि उस स्कूल के प्रिंसीपल बहुत सख्त है और वहाँ पढाई भी बहुत अच्छी होती है।", उनका दूसरा सवाल "क्या यहाँ पढ़ाई अच्छी नही होती?", मैंने कहा "मुझे नही पता, पर वहाँ ज्यादा अच्छी होती है इतना पता है।" उन्होने फिर अंकल जी से कहा " भाई इसका दाख़िला वही कराओ जहाँ इसका मन है।" ये व्यक्ति और कोई नहीं प्रिंसीपल सर श्री राजबीर बंसल ही हैं। पर मुझे नही पता था कि ये ही उस स्कूल के प्रिंसीपल है और इस स्कूल के मालिक।

हमारी दसवी क्लास का विदाई समारोह था, समारोह लगभग खत्म हो चुका था। ग्रुप फोटो भी हो चुका। बस सब एक दूसरे से बातें कर रहे है। मैं चाहता था कि एक फोटो याद के लिए प्रिंसीपल सर के साथ हो जाए। पर कहने से हिचक रहा था और एक कोने में खड़ा था। पर तभी एक लड़का आया और बोला कि तेरे को प्रिंसीपल सर बुला रहे है। मैं चौंका कि उन्हें कैसे पता चला कि मैं उनके साथ फोटो खींचवाना चाहता हूँ। खैर मैं उनके पास गया और बोला "जी सर", वो बोले "तुम्हारे को मेरे साथ फोटो खिचानी है।" मैं भला क्यों मना करता जब मन की मुराद पूरी हो रही थी। फोटो खींच लिया गया। पर मैं आज तक ये बात नही जान पाया कि ऐ कैसे हो गया। क्या ये इत्तेफ़ाक था? या फिर कुछ और? मैं आज तक नही समझ सका। साथ ही एक बात और कहना चाहूँगा कि जब से वो स्कूल छूटा है तब से लेकर आज तक मुझे साल में पता नही कितनी बार सपनों में प्रिंसीपल सर नजर आते है। स्कूल बदल जाता है, क्लास बदल जाती है, दीवारे बदल जाती है, घटना का रुप बदल जाता है पर एक चीज नही बदलती है वो है प्रिंसीपल सर। ये क्या है? सर सपने में क्यों आते है? मैं आज तक नही समझ सका।

सामने कुर्सी पर एक सांवले रंग का व्यक्ति बैठा है बनियान पहने। पतला सा चेहरा है। चेहरे की झुर्रीयाँ बुढ़ापे की कहानी कह रही है। हाथ कांप रहे है। दो सहायक खड़े है। मैं चरण स्पर्श करता हूँ। पर एक हाथ जो प्यार से सिर पर या पीठ पर आ जाता था आज वो ना पीठ पर आया ना सिर पर। बस कांपता  रहा हैं। दोस्त(उनका बेटा)   उनसे पूछता है क्या आपने इसे पहचान लिया। मैं उसी आवाज में उत्तर की प्रतीक्षा करता हूँ जो पहले स्कूल में गूंजा करती थी। जिसकी दहाड़ सुनकर टीचरों और बच्चों की घिघी बँध जाया करती थी। पर आज जो आवाज निकली वो बहुत ही धीमी थी। आवाज सुनने के लिए उनके नज़दीक जाना पड़ा और वो बोले "हाँ पहचान लिया, पर ये क्या दाढ़ी बढ़ा रखी है।" वो मुझे छोटी छोटी निगाहों से निहारते रहे और मैं भावुक होते हुए सोचता रहा , जिंदगी तू ऐसी क्यूँ होती है? मैं चला आया। पता चला कि ये आज भी अपने सहायकों के साथ अपने इस स्कूल को चला रहें इस हालत और इस उम्र में भी। उनके होंसले को सलाम करते हुए बस यही कहूँगा।

उठता है, चलता है, रुकता है, फिर से चलता है
कांपते हाथों से वो आज भी बच्चों को पढ़ाया करता हैं।

Tuesday, March 24, 2009

इस अंधेरी रात के बाद उजली सुबह कब होगी?


रात के एक बजे, एक आदमी कार से उतर कर, पार्किंग के 10 रुपये के लिए, पार्किंग वाले से पुलिस वाला होने का रोब देखाकर तू तू मैं मैं करता हुआ बिना पैसे दिए शान से चला जाता हैं।.............. रात के डेढ़ बजे, उस जगह से चंद कदम दूर एक आदमी आमलेट दो रुपये महँगा होने की वजह से भूख का गला दबा कर चुपचाप चला गया ........... लगभग पौने दो बजे, फिर वही आदमी सिगरेट के लिए यही आता है और सिगरेट लेकर आमलेट वाले के हाथ पर सिक्के रख देता है, आमलेट वाला एक रुपये और माँगता है वह आदमी एक रुपये की जगह सिगरेट ही उसके हाथ पर रख देता है और अपनी तलब को दफनाकर अपने मरीज के पास लौट जाता है.............आज पहली बार लगा कि सिगरेट पीनी ........  ढाई बजे कुछ आदमी बहस करते हुए, धर्मो की लड़ाई में उलझे हैं। पुराने जख़्मों को कुरेद कर अपनी अपनी बातों को सही ठहरा रहे हैं और चीजों का बँटवारा करते हुए ये..... तुम्हारी, ये..... उनकी, ये..... हमारी ............ रात को काट रहे है .........  चार बजे, एक आदमी मृत भाई की लाश के पास पत्थर की मूर्ति सा खड़ा है। पैसे नही है घर ले जाने को ...... पास से गुजरता एक आदमी वजह पूछता है और फिर सारा इंतजाम कर अपनी दिल की मरीज माँ के पास चला जाता है।.......... कभी कभी रातें इतनी लम्बी क्यों हो जाती है?...................पाँच बजे एक परिवार रो रहा है पास खड़े आदमी का मोबाईल बज उठता है 'हट जा ताऊ पाछे ने' ....... दौलत से मोबाईल खरीद लिया पर उसके रखने का शिष्टाचार नही खरीद सका।..................... ( निंदा जी से माफी माँगते हुए) "आओ दोस्तों एक ऐसा भी धर्म लाया जाए जिसमें जिदंगी की लड़ाई में हाँफते इंसानो का होंसला बढ़ाया जाए।"....................

दिल हो तो धरती माँ जैसा, प्यार दे सबको एक बराबर
भले बुरे सब माँ के जाये, फूल और काँटा एक बराबर 
मिट्टी में जो बीज पनपता, धरती के लिए एक बराबर 
कोख न हिंदू, कोख न मुसलिम, जीवन बख़्शे एक बराबर।   

और हाँ कल भगत सिंह की शहादत का दिन था उनकी कुर्बानी को सलाम करते हुए उनकी याद में उन्हीं का शेर।  

हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली, 
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे न रहे। 
                           भगत सिंह 

नोट- यह पोस्ट अपने अनदेखे अनजाने( वैसे थोड़ा देखा, थोड़ा जाना भी है पर थोड़ा ही, पर मुलाकात नही हुई आजतक) दोस्त के लिए। ताऊ की पहेली तो रोज शनिवार को आती है पर यह छौक्कर की पहेली आज के लिए है बस, आपका बताना है वो दोस्त कौन है? सही जवाब देने वाले को ईनाम दिया जाएगा " प्यार भरा शुक्रिया" और हाँ ऊपर दी गई रचना मेरे गुरु श्री चरणदास सिंधू जी के नाटक " किस्सा पंडित कालू कुम्हार" से हैं जोकि "वाणी प्रकाशन" से छपा है।

Saturday, March 14, 2009

मुझे किस किस ने बिगाड़ा और जीवन संवारा।



मैं तो प्रतिदिन यही अनुभव करता हूँ कि मेरे भीतरी और बाहरी जीवन के निर्माण में कितने अगणित व्यक्तियों के श्रम और कृपा का हाथ रहा हैं और इस अनूभूति से उददीत मेरा अंतक:करण कितना छटपटाता है कि मैं कम से कम इतना तो दुनिया को दे संकू जितना मैंने उससे अभी तक लिया है।  - आंइस्टीन 
अभी 8 मार्च को कंचन जी ने एक पोस्ट की थी। जिसे पढ़कर आंइस्टीन जी का यह कथन याद आ गया। कंचन जी ने उस पोस्ट में पूछा था कि " उन तीन पुरुष और तीन महिलाओं का नाम बताईए जिनका आपके व्यक्तित्व निर्माण में बहुत बड़ा हाथ है।" वैसे ये सच में ही बड़ा मुश्किल काम हैं। पर ज्यादा गहराई में ना जाकर बस चंद पल सोचकर जो दिमाग में आया वही लिख रहा हूँ।  

सबसे पहले बेझिक पहला नाम ले सकता हूँ, वो हैं मेरे गुरु चरण दास सिधू जी । जिनसे मैं बहुत प्रभावित रहा हूँ। जिनके बारें में जितना लिखा जाए उतना कम है। पर यहाँ एक चीज का जिक्र करुँग़ा। उन्होंने अपनी एक किताब में कहीं कहा था कि " अगर सैल्फ ऐक्सप्रेशन न मिले, घुटन अंदर से न निकले, दिल की गांठे न खुलें, तो लड़के लड़कियाँ नशे पीने लग जाते हैं। क़ातिल बन जाते हैं। पगला जाते हैं। कट्टरपंथी मौत के फरिशते बन जाते हैं। इसका एक ही इलाज है: आत्म अभिव्यक्ति।" इसी आत्म अभिव्यक्ति की लौ इन्होंने ही जगाई थी मेरे अंदर। दिल में बहुत गुबार होते थे जिन्हें मैं नही निकाल पाता था। लोगों ने मजाक बनाया मेरा। एक यही थे जिन्होंने लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। शायद अवसाद में जाने से बचा लिया। उनका सीधा, सादा, नम्र जीवन जीना मुझे हमेशा आकर्षित करता रहा है। आज इनका जन्मदिन भी हैं। और आज के ही दिन मैं इनसे मिला भी था। आज के दिन इस पोस्ट को करने का कारण भी। दूसरा नाम मैं अपने पिता जी का लूँगा। जिन्होंने जिदंगी में लड़ना सिखाया। मुसीबत में भी जीने का ज़ज़्बा बनाए रखना सिखाया। जब भी कभी हमारे घर में कोई मुसीबत आई हमेशा पिता जी ने कहा कि " हाथ नहीं गड़े जमीन में अभी मेरे।" तीसरा नाम मैं एक लड़के का लूँगा जिसका मुझे नाम भी नही पता। पर कुछ पल के लिए आया था मेरी जिदंगी में। वह मुझे एक दिन लाईब्रेरी के बाहर मिला। एक फटी सी कमीज पहने। मेरे पास आकर एक रुपया माँगने लगा शायद उसे बहुत भूख लगी थी और मैंने उसे दो रुपये का सिक्का दे दिया। वह भागकर ब्रेडपीस ले आया और एक रुपया मेरी हथेली पर रखकर, मुझे ईमानदारी का पाठ पढ़ा गया।  वह मुझे बता गया कि भुखमरी और गरीबी में भी ईमानदारी नही मरती। और हम हैं कि ईमानदारी का बस ढोल ही पीटते रहते हैं। उस लड़के पर एक पोस्ट की थी एक सात आठ साल का लड़का और भूख   के नाम से। 

पहला नाम मैं यहाँ अपनी मम्मी जी का लूँगा। जिन्होंने सबसे प्यार करना सिखाया। गिले शिकवे चंद पल के लिए होने चाहिए। आखिर एक इंसान ही तो एक इंसान के काम आता है। "कोई तुम्हारें लिए क्या करता है यह मह्त्वपूर्ण नही हैं बल्कि तुम क्या करते किसी के लिए यह महत्वपूर्ण।" दूसरा नाम एक लड़की का। इस लड़की से भी एक ही बार मिला। उन्होंने बात ही बात में एक बात कही थी कि " अगर भगवान या इंसान तुम्हें दुख देकर अंचभित करें तो तुम भी उस दुख में खुश रह कर उसे अंचभित कर दो। मतलब हमेशा खुश रहो बस।" तीसरा नाम मैं अपनी बेटी का लूँगा। सुनयना ( यह नाम सिधू सर जी ने रखा था हमारी नैना के लिए) जो मुझे यह सिखाती है कि जो चीज जहाँ से उठाओ उसको वही रखों। यह आदत उसे किसने सीखाई मुझे पता नही पर वह मुझे जरुर सिखाती हैं।  

और जाते जाते सिधू सर जी को जन्मदिन की ढेरों मुबारकबाद और शुभकामनाएं देते हुए उनकी एक रचना जो उन्होंने नौवीं या दसवीं जमात में पढते हुए लिखी थी, आप साथियों के लिए प्रस्तुत करना चाहूँगा।  

उठ जाग अंधेरे में से तू, 
तेरा प्रीतम तेरे दिल बसता। 
नहीं स्वर्ग कोई आसमानों में, 
धरती को स्वर्ग बना, बंदे। 
कर ख़त्म ग़ुलामी, बंदर-बाँट, 
बंदे को रब्ब बना,बंदे। 
तू कामगार ही सिर्जनहार, 
क्यों पत्थरों पंडों में फंसता? 

उठ जाग अंधेरे में से तू, 
तेरा प्रीतम तेरे दिल बसता। 
सब भरम भुलावे छोड़ दे अब, 
तू सीधे रस्ते चल, बंदे। 
रब्ब ढूंढने के ढंग बदल गए, 
रब्ब इक दूजे को कह, बंदे। 
क़ादर क़ुदरत क़ुदरत क़ादर,
हर पीर पैग़ंबर है कहता। 


नोट- ऊपर की गई पोस्ट में पाँच लिंक है हरे रंग में, अगर समय हो तो उस लिंक पर क्लिक करके उस पोस्ट को भी पढ सकते हैं। और अपना अमूल्य कमेंट दे सकते है। शुक्रिया। 









Sunday, September 7, 2008

चाय की दुकान और एक लेखक


एक जिदंगी यह भी 

अगर आप आई.टी.ओ. के आसपास हैं और थकान से चूर-चूर हो रहे है। चाहते है कि थकान पल भर में दूर हो जाए और शरीर में थोड़ी फुर्ती भी आ जाए तो आप विष्णु दिगम्बर मार्ग की तरफ हो लीजिए। जब आप इस मार्ग पर आऐंगे तो आपको पंजाबी भवन और हिंदी भवन दिखेगा। आप रुकिए और पंजाबी भवन के गेट के पास से हिंदी भवन की तरफ बीच में एक सांवला सा आदमी कमीज़ पेंट पहने एक चाय की छोटी सी दुकान लगा कर बैठा होगा। दो स्टोव, कुछ प्लास्टिक के कप, दो कपड़े के थैले समान से भरे हुए, ग्राहकों को बैठने के लिए दो बडे सपाट पत्थर और खुद के बैठने के लिए एक सपाट पत्थर जिस पर एक दरी बिछी होगी और वह आदमी नंगे पैरों को मोड़ कर बैठा चाय बना रहा होगा। आप उन्हें एक चाय का आर्डर दीजिए। चंद ही मिनटों में एक कड़क चाय आपके सामने पेश हो जाऐगी। और चाय का एक घूंट पीते ही आपको नई ताज़गी का अहसास होगा। अब आप कहेगे कि चाय की दुकान तो देख ली पर लेखक जी से तो मिलाईए। अजी मिला तो दिया। यही लेखक भी है और चाय वाले भी। आप चौकिएं मत। इनका नाम श्री लक्ष्मण राव जी है। जिनकी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये आपको चाय के साथ साथ साहित्य का रस भी पिलाऐंगे। जब आप पूछेंगे कि क्या आप अपनी लाईफ से संतुष्ट हैं। तो कहेंगे कि जनाब संतुष्ट हो या ना हो संतुष्ट होना पड़ता हैं। चाय बेचकर ठीक ठाक  कमा लेता हूँ और अच्छी खासी  रायल्टी मिल जाती है किताबों से, फिर क्यों छोडू इस चाय के पेशे को। खुद ही छपवाता हूँ और फिर खुद ही बेचता हूँ अपनी साईकिल पर किताबों के थैले टांग कर किताबों की दुकानों को , लाईब्रेरीयों को, और लोगों को। मैं लेखकों की तरह  एक सफेद कुर्ता पाजामा पहन और एक थैला टांग कर नही रह सकता। मेरी पहली किताब रामदास पर थी जो हमारे गाँव का एक लड़का था एक दिन वह छुट्टियों में अपने मामा के गाँव गया । जब वह लोटने लगा तो रास्ते में एक नदी पड़ी और उसके चमकते हुए पानी में उसने छलांग लगा दी। वह फिर कभी लौट कर नहीं आया। मैं इस घटना पर लिखना चाहता था इसलिए रामदास पर मैंने पहली किताब लिखी एक उपन्यास के रुप में। बस वही से शुरुआत हो गई। आज  सन 2008 में मेरी नई रचना आई है "रेणु" के नाम से। यह है मेरा सफर।  नीचे दिया इनका जीवन परिचय उसी किताब से लिया गया है। जिसका प्रकाशन "भारतीय साहित्य कला प्रकाशन ने किया हैं। जीवन परिचय देने के लिए राव जी का दिल से शुक्रिया ।    

जिदंगी के पन्नों पर कुछ ऐसा लिखा जाए, जो पवित्र पुस्तक की तरह सुबह शाम पढा जाए - स्वेट मार्डेन  

श्री लक्ष्मण राव का जन्म 22 जुलाई, 1954 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले में एक छोटे से गाँव तडेगांव दशासर में हुआ। उन्होंने मराठी भाषा में माध्यमिक कक्षाएं, दिल्ली तिमारपुर पत्राचार विधालय से उच्चतर माध्यमिक व दिल्ली विश्वविधालय से बी.ए. उर्तीण किया। जब लक्ष्मण राव जी ने दसवीं कक्षा पास करके महाराष्ट के अमरावती शहर में, सूत मिल में टेक्सटाइल मज़दूर के रुप में काम किया तो कुछ दिनों के बाद वह मिल बिजली कटौती के कारण बंद हो गई। राव जी अमरावती से अपना सामान उठाकर गांव चले गए। वहाँ वे खेती का काम करने लगे। वे हमेशा मानसिक तनाव से ग्रस्त रहने लगे। एक महीने के बाद मई महीने में पिताजी से झूठ बोलकर 40 रुपये लिये और गांव से भोपाल आ गए। यहां तक 40 रुपये समाप्त हो गये। लक्ष्मण राव भोपाल में ही एक भवन पर पांच रुपये रोज़ से बेलदार का काम करने लगे। तीन महीने भोपाल में रहकर 30 जुलाई 1975 को जी.टी. एक्सप्रेस से दिल्ली आये। दिल्ली में दो तीन बिरला मंदिर की धर्मशाला में ठहरे। काम ढूंढ रहे थे पर मिल नहीं रहा था। जीवन के कठिनतम समय पर राव जी ने ढाबों पर बर्तन साफ करने का काम स्वीकार किया। दो वर्ष लगातार यही चलता रहा, कभी ढाबों पर बर्तन साफ करना, कभी भवनों पर मज़दूरी करना आदि। 1977 में दिल्ली जैसे भीड़ भरे शहर में आई. टी.ओ. के विष्णु दिगम्बर मार्ग पर राव जी पेड़ के नीचे बैठकर पान-बिड़ी, सिगरेट बेचने लगे। वस्तुत: उनकी छोटी सी दुकान दिल्ली नगर निगम व दिल्ली पुलिस अनेक बार उजाड़्ती रही पर उन्होंने एक सफल साहित्यकार बनने का सपना अधूरा नहीं छोड़ा। राव जी दरियागंज के रविवारीय पुस्तक बाज़ार में जाकर अध्ययन करने हेतु पूरे सप्ताह भर के लिए साहित्य खरीदकर लाते थे। उन्ही दिनों उन्हें साहित्य सम्राट शेक्सपीयर, यूनानी नाटककार सोफोक्लीज का पता चला। इसी तरह मुन्शी प्रेमचंद, शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय आदि साहित्यकारों की पुस्तकों का अध्ययन करने लगे। लक्ष्मण राव जी का पहला उपन्यास ' नई दुनिया की नई कहानी' 1979 में प्रकाशित हुआ। उस समय वे चर्चा का विषय बन गए। एक पानवाला उपन्यासकार, लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था। परंतु टाइम्स आफ इंडिया के संडे रिव्यू में उनका परिचय प्रकाशित हुआ। यह बात एक फरवरी 1981 की है। तब उनके कार्य पर लोगों को विश्वास होने लगा। साहित्यकार लक्ष्मण राव जी को अग्रेंजी भाषा का भी ज्ञान हैं। अग्रेंजी समाचार पत्र व पुस्तकें पढना उनका प्रतिदिन का नियम है। अमेरिका से प्रकाशित साप्ताहिक टाइम पत्रिका पढ़ना उनका शौक बन गया है। 
सम्मान 
भारतीय अनुवाद परिषद सहित लगभग 11 संस्थाओं से सम्मान। 

अबतक का लेखन 
साहित्य की रचनाएं 
1. नई दुनिया की नई कहानी  2. रामदास  3. शिवअरुणा  4. सर्पदंश  5. साहिल 6. पत्तियों की सरसराहट 7. प्रात: काल 8. नर्मदा 9. रेणु 
सामाजिक हिनी नाटक 
1. राष्ट्पति 2. प्रधानमंत्री 3. प्रशासन 
वैचारिक हिन्दी साहित्य 
1. द्रषिटकोण 2. अंहकार 3. परम्परा से जुड़ी भारतीय राजनीति 4. समकालीन संविधान 5. अभिव्यक्ति 6. मौलिक पत्रकारिता 
आत्मकथा एंव जीवनी 
1. साहित्य व्यासपीठ ( आत्मकथा) 2. संयम ( राजीव गाँधी की जीवनी) 

चर्चा 
बहुत सारी देश-विदेश की प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में चर्चा  
नोट: राव जी का फोटो www.tribuneindia.com से लिया गया है। इसके लिए उनका शुक्रिया।
आप इस लिंक से भी इनके बारें में पढ सकते हैं। 

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails