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Saturday, July 24, 2021

गुरु पूर्णिमा पर गुरु की यादें...

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि सिद्धू सर मुझे अक्सर क्यों याद आते हैं? जहां कहीं गुरु-टीचर, प्रोफेसर की बात हो, मैं उनको याद किए बिना क्यों नहीं रहता? दोस्तों में उनकी चर्चा किए बिना क्यों नहीं रहता? बेटी को उनके किस्से सुनाए बिना क्यों नहीं रहता? उनकी लिखी किताबों को पढ़ता क्यों रहता हूं? इंटरनेट की दुनिया में उनके बारे में लिखे-कहे को क्यों ढूढ़ता रहता हूं? किसी के मुंह से उनके किस्से-संस्मरण सुनने को मिल जाएं तो सुनकर बेहद खुश क्यों हो जाता हूं? शायद यह सब इसलिए होता है कि वे मेरे दिल के बेहद करीब हैं. दिल के करीब इसलिए हैं कि वे दिल के बहुत अच्छे इंसान थे. उनके लिए ना कोई छोटा था. ना कोई बड़ा था. ना कोई अपना था. ना कोई पराया था. जो उनसे मिला वो उनका अपना था. किसी की भी मदद करने से वे पीछे नहीं हटते थे. जो उनसे बन सकता था वो वे कर देते थे. खासकर हम जैसे छात्रों की तो वे खुलकर मदद करते थे.

मुझे याद है. तब तक मेरी और उनकी चंद मुलाकातें ही तो हुई थीं. एक दिन जब मैं हंसराज कॉलेज के उनके कमरे से निकलने लगा तो वे पूछ बैठे कि 'अब कहां जाएगा?'  मैंने कहा, 'सर अब मैं सीधे हरदयाल सिंह लाइब्रेरी जाऊंगा. जहां बैठकर मैं पढ़ाई करता हूं. कुछ एक फार्म भर हुए हैं सरकारी नौकरी के.  बस उन्हीं की तैयारी कर रहा हूं वहां जाकर.’ वे बोले, 'घर पर नहीं पढ़ते?' मैं बोला, ‘सर नहीं. उधर पढ़ाई हो नहीं पाती है. इसलिए उधर चला जाता हूं.'  फिर वे एक चाबी निकालते हुए बोले,' जा इसकी एक डुप्लीकेट चाबी बनवाकर ले आ.' चाबी वाले सरदारजी की दुकान का रास्ता बताकर उन्होंने मुझे भेज दिया. मैं गया. सरदारजी से चाबी बनवाकर मैंने उन्हें दे दी. वे फिर डुप्लीकेट चाबी मुझे देते हुए बोले,' ये चाबी तू रख. जब भी तेरा मन करे, यहां बैठकर पढ़ लिया कर. किसी भी वक्त तू आ सकता और किसी भी वक्त तू जा सकता. ये समझ ये तेरा ही कमरा है.’ (उन्हें यह क्वार्टर कॉलेज की तरफ से मिला हुआ था. लेकिन वे तब वसुंधरा में रहने लगे थे.) मैंने मना नहीं किया और वो चाबी रख ली. वो अलग बात है. मैंने उस चाबी का कभी प्रयोग नहीं किया. आज भी मैंने वो चाबी संभालकर रखी हुई है. मैं तब उस चाबी से उस घर और उस दिल को देख पाया था जो हम जैसे बच्चों के लिए सदा खुला रहता था. जैसे-जैसे समय बीतता रहा है. मेरे दिल में उनके लिए एक घर बनता रहा, जिसमें वे आज भी रहते हैं. बस वे अब पहले-सी लंबी-लंबी बातें नहीं करते. मेरा पहले जैसा हौसला नहीं बढ़ाते. मुझे पहली-सी शाबासी नहीं देते. बस उस घर में मौजूद रहते हैं.

मुझे याद है. पहले जब भी कोई किताब या अन्य चीज मुझे डाक से भेजते थे तो मेरा नाम उस पर होता था. जब मेरी शादी हो गई तो मेरी पत्नी का नाम भी उसमें आने लगा. वो भी मेरे नाम से ऊपर. फिर बेटी हुई तो उसका नाम हम दोनों के नाम से ऊपर. एक दिन क्या देखता हूं. उनकी एक नई किताब ‘ड्रामेबाजियां’ डाक से आई. किताब खोली तो अंदर लिखा था. 'सुनयना के लिए, प्यार से नानी सिद्धू, नाना सिद्धू.' (मेरी बेटी का नाम ‘नैना’ से ‘सुनयना’ उन्होंने ही रखा था.) ऐसा था उनका प्यार. जिस प्यार में मैं भाव-विभोर हो जाता था. उस प्यार में बह जाता था. जैसा वे प्यार करते थे. वैसे ही हम बच्चों का हौसला भी बढ़ाते थे. मुझे याद नहीं कभी उन्होंने किसी छात्र को हतोत्साहित किया हो. आप चाहे कितनी ही बड़ी गलती कर दें. या आपसे हो जाए. मैंने उन्हें कभी गुस्सा करते नहीं देखा. इवन एक बार की बात है. एक नाटक में एक किरदार निभाते हुए मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई थी. फिर भी उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा. मुझ पर गुस्सा नहीं हुए. बस यही कहा ‘बहुत अच्छे’. मेरा वो रोल पहला और आख़िरी था. ये अलग बात वे ये जरुर कहते थे कि ऐसा करोगे तो और अच्छा हो जाएगा. जब नाटक की रिहर्सल होती थी तो वे ऐसे ही हौसला बढ़ाते थे. और अगर किसी छात्र की एक्टिंग उन्हें बहुत ज्यादा पसंद आ जाती थी तो वे इनाम के रूप में अपनी जेब से एक रुपया निकालकर छात्र को दे देते थे. फिर 11 रुपए देने लगे. बल्कि एक बार तो एक लड़के की एक्टिंग देखकर इतने खुश हुए कि उसे शायद 101 रुपया दे दिए. ऐसा था उनका हौसला बढ़ाने का तरीका. बाद में वो 101 रुपए पाने वाला लड़का बम्बई भी गया था. फिल्मों में काम करने. अजय देवगन की एक फिल्म में एक किरदार निभाते नजर भी आया था. मैंने तो बच्चों को उस एक इनाम के लिए बहुत मेहनत करते भी देखा है. वो बात अलग है कि मुझे वो इनाम कभी नहीं मिला! मिलता कैसे एक रोल मिला था वो भी सही से नहीं कर सका! सच में बहुत निराशा हुई थी तब मुझे!

मैंने उनकी सीधी-सपाट जुबान में खूब कहानी-किस्से सुने हैं. अपनी घुमक्कड़ी की बातें जमकर सुनाते थे. कैसे वे एक बार हाथ देखने वाले पंडित बन गए. कैसे एक रात उन्होंने भिखारियों के साथ गुजारी थी आदि-आदि. दरअसल वे अक्सर कॉलेज की छुट्टियों में घूमने निकल जाते थे. कभी-कभी रूप बदलकर भी. ये उनका तरीका था. लोगों की कहानियां सुनने का. उनकी तकलीफ को जानने-समझने का. जिस रस के साथ वे किस्से कहते थे सच में उन्हें सुनने में बहुत आनंद आता था. बीच-बीच में गालियाँ का तड़का भी होता था. लेकिन कभी उनके मुंह से कड़वापन सुनने को नहीं मिला. ‘उल्लू के पट्ठे कागज तो बाद में बचाना. पहले तू अपनी आँख तो बचा. कागज तो बन जाएगा आँख ना बनेगी दूसरी तेरी.’ (कागज बचाने के चक्कर में मेरे छोटे-छोटे अक्षर में लिखने पर.) हरामजादा मुशर्रफ गोल-गोल घूमा रहा है. (तब अटल जी की सरकार थी और मुशर्रफ दिल्ली और आगरा के बीच घूम रहे थे.) उनकी गालियों के कुछ किस्से किताबों में दर्ज हैं. कुछ समकालीन लोगों को याद भी हैं. याद से याद आया एक बार जब मैं उनसे मिलने गया तो उनके कमरे का मैदान की तरफ वाला गेट खुला हुआ था. मेज पर टेबल लैंप जल रहा था. सर अपने हाथ में मैग्नीफाई गिलास से अपनी किसी आने वाली किताब की प्रूफ रीडिंग कर रहे थे. मैदान से खेलते बच्चों का शोर आ रहा था. मैं यूं ही पूछ बैठा कि ‘सर आप डिस्टर्ब नहीं होते इस शोर से’. वे बोले, ‘उल्लू के पट्ठे इधर से मुझे नई-नई गालियां सीखने को मिलती हैं. और तू कहता है कि सर डिस्टर्ब नहीं होते इस शोर से.’ और फिर वे जोर से खिलखिलाकर हंस पड़े.

रिटायर्ड होने के बाद भी वे खूब काम किया करते थे. कई नाटक तो उन्होंने रिटायर्ड होने के बाद ही लिखे. वो अलग बात है वे नाटक उनके दिमाग में सालों से पक रहे होंगे. सच में वे काम को बहुत महत्व देते थे. उनका मानना था कि काम से बड़ा कुछ नहीं. जब तक साँसे हैं काम करते रहो. वे अपने आखिर समय तक नाटक लिखते रहे. वो कहते थे आखिर वक्त में जब तुम पीछे मुड़कर देखो तो लगना चाहिए कि तुमने कुछ किया है. चाहे तुमने लालकिले पर झंड़ा ना फ़हराया हो. लेकिन तुमने अपने काम का झंड़ा तो गाड दिया ना बस. मैं जब भी उनसे कहता था कि सर ये परेशानी है या ये तकलीफ है तो हमेशा हल तो देते ही थे साथ ही साथ में ये भी कहते थे कि कुछ ना कुछ काम करता रह. अपने मन का काम करता रह. अपने मन का काम करता रहेगा तो ध्यान हटेगा. जब ध्यान हटेगा तो तकलीफ-परेशानी भी कम महसूस होगी. और कोई नया काम भी बनेगा. उनका हमेशा ही ये मानना था ‘ WORK is a great HEALER.’  ये पंक्ति उन्होंने अपने बेड के सामने रखी किताबों की अलमारी पर लगा रखी थी. पिछले साल एक विडियो देख रहा था, जिसमें उनकी बेटी प्रमिला जी उनके बारे बात कर रही थीं. जिसमें उन्होंने बताया कि वे अपने आखिर समय में अस्पताल के बिस्तर पर थे. ना चल सकते थे. ना उठ सकते थे. एक दिन उन्होंने मिलने आई अपनी बेटी से कहा कि ‘एक काम करना, वीणा (उनकी बड़ी बेटी) को बोलना कि वो एक गीत है ना जो मैंने चौथी क्लास में लिखा था उसमें एक जगह ‘प्रीतम’ आया हुआ है. उसकी जगह ‘सिरजनहार’ कर दें.’ मतलब कि वे अपने आखिर समय, तकलीफ में भी काम कर रहे थे. पुराना उधेड़ रहे थे. नया गढ़ रहे थे. फिर आप ही बताओ ऐसे इंसान को कोई क्यों ना याद करे, क्यों ना प्यार करे!

Wednesday, July 8, 2009

चंद मुलाकातों का साया

कुछ यादें, कुछ बातें गुरु की।

एक तगड़ा शरीर, एक कड़क आवाज़ और एक सांवला चेहरा जब कफ लगे हुए सफेद कुर्ता पाजाम पहनकर निकलता था तो छात्र ही क्या, टीचर भी अपनी अपनी क्लास में घुस जाया करते थे। जिस दिन नही आए तो समझो बच्चों और टीचरों की मौजा ही मौजा। कोई भी काम समय पर नही, ना ही समय पर घंटी बजेगी। ना ही समय पर टीचर  कक्षाओं में पहुँचेगे। और ना ही बच्चें पढ़ॆगे। जिसे देखो वही इन्हें कौसता मिलेगा। वो चाहे बच्चें हो, टीचर हो या फिर अभिवाहक। फिर भी हर अभिवाहक अपने बच्चों को इसी स्कूल में पढाना चाहता है। वो भी प्रिंसीपल सर श्री राजबीर सिंह बंसल जी के रहते हुए। वजहें बहुत है। पर सबसे बड़ी वजह है स्कूल में अच्छी पढ़ाई का होना। हर साल स्कूल का बहुत ही अच्छा रिजल्ट आना। और हर साल अपने जोन में शीर्ष पर रहना।


सुबह की प्रार्थना के लिए सभी छात्र और छात्राऐं निकल रहे हैं कक्षाओं से। हम भी निकल रहें हैं बाजुओं को नीचे करके और अपनी घड़ी को छिपाते हुए। स्कूल के स्टेज के उल्टे हाथ की तरफ लड़कियाँ और सीधे हाथ की तरफ लड़के। "तुम ही हो माता पिता भी तुम, तुम ही हो बंधु सखा भी तुम हो......" प्रार्थना के ये शब्द स्कूल में गूंज रहे हैं। प्रार्थना के बाद राष्ट्रगान होता हैं। जिस समय अवधि में ये होना चाहिए उस समय अवधि में ही होना चाहिए ये सर का आदेश है। खैर आज राष्ट्रगान एक ही बार हुआ। सर स्टेज पर आ चुके हैं। सर हमेशा की तरह बिना लिखा भाषण देना शुरु करते हैं। वो भाषण केवल भाषण नही होता है नेताओं के भाषण की तरह, उस पर अमल करना भी जरुरी होता है। इसी अमल के कारण सारे टीचर कुढ़ते रहते हैं इनसे। तभी सर की निगाह दो बच्चों पर पड़ती है जो मेरे पीछे बैठे हैं। भाषण अधूरा छोड़कर उन्हें स्टेज पर बुला लिया जाता है। तूफान से पहले की शाँति चारों फैल चुकी है। एक सवाल की गूँज शांति को भंग करती है। "किस बात पर हँसी आई तुम दोनों को?" जवाब ना मिलने पर एक लड़के को एक थप्पड़ रसीद कर किनारे कर दिया जाता है। फिर दूसरे लड़के से वही सवाल पूछा जाता है? जवाब ना मिलने पर फिर जो थप्पड़ो का सिलसिला चलता है वह कई मिनट तक नही रुकता। दोस्त को पीटता देख अच्छा नही लगता है। पर क्या करुँ वो मेरा दोस्त बाद में हैं, उससे पहले वो उनका लड़का है।

पता नहीं किस साल की बात है। पर इतना पता है कि मैंने सरकारी स्कूल से पाँचवी कक्षा पास की थी। पिताजी और अंकल जी मेरा नाम घर के पास के प्राइवेट स्कूल "ज्ञान सरोवर"  में कराने ले जाते है। वहाँ एक व्यक्ति मेरे से कई सवाल पूछता है। मैं सोचता हूँ ये तो टीचर नही हो सकते है फिर क्यों सवाल पूछ रहे हैं? और मैं उनको सही जवाब दे देता हूँ। वो खुश होते है पर मैं खुश नही हूँ क्योंकि मुझे इस स्कूल में दाखिला नही लेना है। मैं कह देता हूँ "मुझे तो "जन-कल्याण स्कूल" में ही दाख़िला लेना।", वो पूछते है "उसी स्कूल में ही क्यों लेना है बेटा?" मैंने तपाक से कहता हूँ  "मैंने सुना है कि उस स्कूल के प्रिंसीपल बहुत सख्त है और वहाँ पढाई भी बहुत अच्छी होती है।", उनका दूसरा सवाल "क्या यहाँ पढ़ाई अच्छी नही होती?", मैंने कहा "मुझे नही पता, पर वहाँ ज्यादा अच्छी होती है इतना पता है।" उन्होने फिर अंकल जी से कहा " भाई इसका दाख़िला वही कराओ जहाँ इसका मन है।" ये व्यक्ति और कोई नहीं प्रिंसीपल सर श्री राजबीर बंसल ही हैं। पर मुझे नही पता था कि ये ही उस स्कूल के प्रिंसीपल है और इस स्कूल के मालिक।

हमारी दसवी क्लास का विदाई समारोह था, समारोह लगभग खत्म हो चुका था। ग्रुप फोटो भी हो चुका। बस सब एक दूसरे से बातें कर रहे है। मैं चाहता था कि एक फोटो याद के लिए प्रिंसीपल सर के साथ हो जाए। पर कहने से हिचक रहा था और एक कोने में खड़ा था। पर तभी एक लड़का आया और बोला कि तेरे को प्रिंसीपल सर बुला रहे है। मैं चौंका कि उन्हें कैसे पता चला कि मैं उनके साथ फोटो खींचवाना चाहता हूँ। खैर मैं उनके पास गया और बोला "जी सर", वो बोले "तुम्हारे को मेरे साथ फोटो खिचानी है।" मैं भला क्यों मना करता जब मन की मुराद पूरी हो रही थी। फोटो खींच लिया गया। पर मैं आज तक ये बात नही जान पाया कि ऐ कैसे हो गया। क्या ये इत्तेफ़ाक था? या फिर कुछ और? मैं आज तक नही समझ सका। साथ ही एक बात और कहना चाहूँगा कि जब से वो स्कूल छूटा है तब से लेकर आज तक मुझे साल में पता नही कितनी बार सपनों में प्रिंसीपल सर नजर आते है। स्कूल बदल जाता है, क्लास बदल जाती है, दीवारे बदल जाती है, घटना का रुप बदल जाता है पर एक चीज नही बदलती है वो है प्रिंसीपल सर। ये क्या है? सर सपने में क्यों आते है? मैं आज तक नही समझ सका।

सामने कुर्सी पर एक सांवले रंग का व्यक्ति बैठा है बनियान पहने। पतला सा चेहरा है। चेहरे की झुर्रीयाँ बुढ़ापे की कहानी कह रही है। हाथ कांप रहे है। दो सहायक खड़े है। मैं चरण स्पर्श करता हूँ। पर एक हाथ जो प्यार से सिर पर या पीठ पर आ जाता था आज वो ना पीठ पर आया ना सिर पर। बस कांपता  रहा हैं। दोस्त(उनका बेटा)   उनसे पूछता है क्या आपने इसे पहचान लिया। मैं उसी आवाज में उत्तर की प्रतीक्षा करता हूँ जो पहले स्कूल में गूंजा करती थी। जिसकी दहाड़ सुनकर टीचरों और बच्चों की घिघी बँध जाया करती थी। पर आज जो आवाज निकली वो बहुत ही धीमी थी। आवाज सुनने के लिए उनके नज़दीक जाना पड़ा और वो बोले "हाँ पहचान लिया, पर ये क्या दाढ़ी बढ़ा रखी है।" वो मुझे छोटी छोटी निगाहों से निहारते रहे और मैं भावुक होते हुए सोचता रहा , जिंदगी तू ऐसी क्यूँ होती है? मैं चला आया। पता चला कि ये आज भी अपने सहायकों के साथ अपने इस स्कूल को चला रहें इस हालत और इस उम्र में भी। उनके होंसले को सलाम करते हुए बस यही कहूँगा।

उठता है, चलता है, रुकता है, फिर से चलता है
कांपते हाथों से वो आज भी बच्चों को पढ़ाया करता हैं।

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