Showing posts with label बेटी. Show all posts
Showing posts with label बेटी. Show all posts

Monday, August 10, 2009

बेटी की बातें

बिल्ली दौड़ चूहा आया

साथियों नैना बेटी ने मेरा नया नाम बिल्ली ही रख दिया है। जब भी मेरे साथ खेलती है बस बिल्ली ही पुकारती है। बिल्ली अब दूसरा गेम खेलते है। बिल्ली अब चीडिया उड़ी,भैंस उड़ी खेलते है। बिल्ली अब चूहा दोड़ बिल्ली आई खेलते है ..........। जैसे ही खेल कर खत्म फिर से वही पापा जी। अजी मेरा नाम ही नही उसने तो अपने चाचा का नाम भी मीना रख दिया है। एक दिन शाम को जब आया तो देखा नैना अपने चाचा को बुढढा( उनके बाल अभी से सफेद होने लगे है) कह रही थी मैंने कहा "बेटा ऐसे नही कहते वो आपके चाचा है।" कहने लगी "पापा जी जब वो मेरे को मोटी बोलेगे तो क्या मैं बुढ्ढा ना बोलूँ। अगर वो मुझे नैना जी कहेंगे तो मैं भी उन्हें चाचा जी बोलूँगी।" खैर उनकी ये लड़ाई ऐसे ही चलती रहती है। जिस बचपन को हम जिदंग़ी की गलियों में भूल जाते है उसे हम अपने बच्चों के बचपन में देखते है। कुछ ऐसा ही है हो रहा है आजकल। उसकी छोटी छोटी बातें, शरारतें, जिद सब देखता सुनता हूँ। कभी देखकर हँसता हूँ। कभी गुस्सा भी हो जाता हूँ। और कभी भावुक हो जाता हूँ। और फिर अपने बचपन को याद करने की कोशिश करता हूँ तो बस दो यादें ही आँखो के पर्दे पर चलती है नर्सरी क्लास की। एक हम बच्चों को खूब सारे बिस्कुट खाने को मिलते थे। दूसरी एक दिन मै पापा जी की घंडी बाँध कर चला गया। मैडम ने देख लिया और घड़ी उतार ली। फिर जो मार पड़ी मम्मी से बस पूछो नही। बस इन दो यादों के अलावा कुछ याद नहीं। पर मैं इसकी खूब सारी यादें संजोकर रख लेना चाहता हूँ। जिस दिन स्कूल गई सब खुश थे क्योंकि घर में और बच्चें नही है और नैना बच्चों के साथ खेलने के लिए कई बार रोती है। कोई बच्चा अगर हमारे घर किसी काम से आ जाए तो समझो उसे वह नही जाने देती है। हमको इस बात की तसल्ली है कि इस बहाने कम से कम बच्चों के संग खूब खेल सकेगी। उनसे खूब सारी बातें भी कर सकेगी। उसकी मासूम सी बातें मेरे दिल को छू जाती है। एक दिन तबीयत ठीक नही थी मैं लेटा हुआ था वो आई और कहने लगी "पापा जी ये लो चने खा लो" मैंने कहा "बेटी मैं बाद में खा लूँगा मेरी तबीयत ठीक है थोडी देर सोने दो" और चने रखकर मेरे पैरों के पास रखी चदर को मुझे उढ़ाने की कोशिश करने लगी। पर मैने कहा बेटी रहने दो मैं खुद ही ओढ लूँगा। यह देख आँखे भर आई। ऐसे ही काफी दिनों पहले मैं पी सी पर बैठा कुछ काम कर रहा था। उसे बेड पर रखा केला नजर आ गया वह उसे उठाकर छीलने लगी। अक्सर उससे केला छिलता नही था पर उस दिन उसने वह केला छील दिया तो मेरे पास आकर बहुत खुश होकर बोली "पापा जी मैंने केला छील दिया मैं बड़ी हो गई।" देखो जिदंगी कैसी है हम बच्चें होना चाहते है और बच्चें बड़े होना चाहते है। सच वो अब बड़ी हो गई है दादी माँ सी बातें करने लगी है। एक दिन इसका चाचा इसके लिए छोटा सा केक ले आया तो मैंने कहा "बेटी मुझे भी दे दो" तो कहने लगी "इसे बड़े नही खाते बच्चें खाते है" और जल्दी जल्दी सारा केक खा गई। जब से स्कूल जाने लगी है मैडम भी हो गई है। अपनी मम्मी से कहती है "मैं मैडम हूँ बताओ ऐ फोर क्या होता है। उसकी मम्मी बोलेगी ऐ फोर आलू होता है।" फिर नैना बोलेगी "अरे बुद्धु ये भी नही आता ऐ फोर एप्पल होता है।" ऐसे ही वो हम सबको पढ़ाती फिरती है। स्कूल जाने के दो तीन बाद उसे छोटे छोटे बाल गीत याद होने लगे। फिर क्या हर रोज एक नया बाल गीत सुनाती है हम सबको। पर सबसे पहले वह अपनी पसंद के दो बाल गीत सुनाती है फिर बाकी के बाद में। तो लीजिए आप भी पढ़िए उसकी पसंद के दो बाल गीत।












बन्दर मामा
देखो आये बन्दर मामा,
कुर्ता ढीला तंग पजामा।
ठुमक-ठुमक कर नाच दिखाते,
माँग-माँग कर पैसे लाते।

चन्दा के घर जाऐगी गुड़िया
चन्दा के घर जायेगी गुड़िया
दूध मलाई खायेगी गुड़िया,
ब्यूटीफुल बन जायेगी गुड़िया।
तारों के संग आयेगा दूल्हा,
चन्दा के घर जायेगी गुड़िया।

सच एक दिन नैना ऐसे ही हँसती खेलती हुई अपने चंदा के घर चली जाऐगी अपने बाबुल का घर छोड़कर। और हमारे पास बस उसकी यादें रह जाऐगी कभी खूब हँसाने के लिए, कभी उसकी याद दिलाने के लिए और कभी क्या अक्सर रुलाने के लिए। इससे पहले कि मेरी आँखे बोलने लगे जल्दी से उसकी एक पहेली का जवाब दीजिए जो वो मेरे से अक्सर पूछती रहती है और उसकी माँ उसे बताती रहती है।
"कटोरे में कटोरा बेटा बाप से भी गौरा" बताओ बताओ जल्दी से सोच कर बताओ। हम चले।

Saturday, April 11, 2009

कुछ बातें और शरारतें बेटी की।



बेटी
का बचपन

यूँ तो अभी बच्ची है
पर बातें दादी माँ सी करती है।
जब कभी कुछ नया देखती है
सवालों की झड़ी लगा देती है।
सूरज बाबा संग मुस्कराती जागती है
उठते ही बस दूध, पापे माँगती है।
जिद करे तो जिददी कहलाए
ना करे तो घर खाने को आए।
गानों की शौकीन
कभी "होले-होले" पर नाचे
कभी "तेरी शादी करुँगा" को गाए।
बच्चों संग खेलने को मचलती है
ना मिले जब कोई
"मेरे साथ खेलो" हमसे कहती है।
टाफ़ी हो, चाकलेट हो या हो फिर पेस्ट्री
याद आने पर दिन-भर माँगती रहती है।
किताबें डाल अपनी मम्मी के बैग में
स्कूल जाने की एक्टिंग करती है।
खुद मेरे साथ जाकर लाई अपनी किताबें नही पढ़ती है
जब तब देखो मेरी मैंगजीनों को देखती, फाड़ती रहती है।
देर रात तक ऊधम मचाए
जब नींद आए तो झट से सो जाए
सोती हुई प्यारी नजर आए
बस यूँ ही देखते रहने को जी चाहे
ऐ ख़ुदा रहम करना
कहीं मेरी ही नजर ना लग जाए।


आजकल बेटी अपनी नानी के यहाँ गई हुई है। घर खाने को दोड़ता है। चुपचाप बैठकर उसकी बातें और शरारतें याद करता हूँ। वही से ये तुकबंदी निकल गई। कोई तुकबंदी लिखूँ और आप साथियों से साझा ना करुँ ऐसा भला हो सकता है। और हाँ आजकल समय नही मिल रहा ब्लोग की दुनिया को देखने का , जब समय होता है तो नेट नही होता है। दस बारह दिन हो गए घर का नेट नही आ रहा। और आफिस में एक आदमी को तीन तीन आदमी का काम करना पड रहा है। खैर पोस्ट डाल रहा हूँ कैफे में बैठकर।

Sunday, February 15, 2009

ब्लोग की सालगिरह

आज इस ब्लोग ने एक साल पूरे कर लिए हैं। यह सब आप सब साथियों के सहयोग से संभव हो सका हैं इसलिए आप सभी का दिल से शुक्रिया। आज के दिन इस ब्लोग की पहली पोस्ट को थोड़ा रंग बिंरगा और थोडा बदलाव करके दुबारा पोस्ट करके ब्लोग की सालगिरह मनाने का मन किया।

नैना

कोई तेरे होने पर मनाये खुशी
और कोई अफ़सोस
कोई तेरे आने पर दे बधाई

और कोई दे दिलासा

ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?


कोई तुझे चुनमुन पुकारे
और कोई नैना

कोई तुझे दुर्गा बोले

और कोई सुनयना

ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?


कोई हँसे कि तू हँसे,
कोई रोये क्योंकि तू रोये

कोई खाये कि तू खाए

कोई सोये क्योंकि तू सोये

ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?


कोई कहे यह लड़कियों की सदी
कोई कहे फिर भी चाहत लड़को की

कोई बोले बेटे होते बुढापे की लाठी

कोई बोले मेरी बेटी मेरे बुढापे की नैना

ऐसा क्यूँ होता हैं नैना ?

Monday, February 2, 2009

बेटी की उम्र बढ़ने लगी है।

शुक्रवार को बैठे बैठे पत्नी की कही एक बात याद आ गई जो किसी दिन किसी बात पर कही गई थी कि " हे भगवान अगर बेटी दे तो धन भी दिया कर" इस बात में छिपा दर्द शब्द बनकर कलम से कागज पर उतर गया। पर भाव पूरी तरह से उभर नहीं पाए तो रंजू जी को याद किया गया और उन्हें वो तुकबंदी मेल कर दी गई। इस विनती के साथ कि अगर समय हो तो इसको अपने हाथों से तराश दें। फिर शाम को ईमेल चैक की तो वह तुकबंदी एक सुन्दर भावपूर्ण रचना में बदल चुकी थी। जो बात मैं कहना चाहता था वो बात यह रचना कह रही है इसलिए ज्यादा कुछ ना कहते हुए बस रंजू जी  को दिल से शुक्रिया।
     
बढ़ रही है बेटी की उम्र जैसे जैसे
ढ़लती उम्र के पिता की
कदमों की चाल तेज हो रही है
बढ़ती माँगो को देखकर
उतर रहे हैं माँ के तन से जेवर धीरे-धीरे
आँखो से बेबसी बयान हो रही है
तक रही है आसमान को
बेटी नि:शब्द होकर
भाई के हाथ
बहन को दे रहे हैं दिलासा
घर के कोने-कोने में
खामोशी जज्ब हो रही है
हँसता नही अब यहाँ
कोई खिलखिला कर
मुस्कान की भी जैसे
कीमत तय हो रही है
गूँजते है बस अब
कुछ ही लफ्ज़ घर में
"सो गए क्या?"
"नही तो"
यह ज़िंदगी बस अब यूँ
नाम की व्यतीत हो रही है

Saturday, January 24, 2009

बचपन में मैं गाता था, आज बेटी गाती है "नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ बोलो बच्चों मेरे संग जय हिंद जय हिंद...." और गणतंत्र दिवस की ढेरों शुभकामनाएं।

अभी परसों की ही तो बात है बेटी नैना "नन्हा मुन्ना राही हूँ" गा रही थी। मैंने पूछा "बेटा ये किसने बताया" वो बोली "दादू ने।" ये गाना कुछ दिन से इसकी छोटी सी जबान पर है। गाती बस इतना ही है कि "नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ।" फिर इसके लिए यह गाना यूटयूब से डाऊनलोड़ किया और इसे सुनाया तो यह खुश हो गई। और मैं अपने बचपन में चला गया। तब यह गाना अक्सर 26 जनवरी के आसपास टीवी और रेडियो पर बजता था। मैं बड़े चाव से इस गाने को सुना करता था। तब नही पता था कि जय हिंद क्या होता है?  देश क्या होता?  देशभक्ति क्या होती हैं? सोचता हूँ क्या अब पता चल गया है इन सबके बारें में? 25 जनवरी को स्कूलों में भी बड़े चाव से जाते थे, स्कूल के कार्यक्रम में  देश भक्ति गाने खूब सुनाए और बजाए जाते थे। और 26 जनवरी को सुबह जल्दी नहा धो तैयार होकर पड़ोसी के टीवी पर परेड देखा करते थे। कमरा लोगों से भर जाया करता था। बच्चे नीचे और बड़ॆ चारपाई पर बैठ जाते थे। और आज ...............................। और फिर बेटी को 26 जनवरी के बारे में बताया एक बच्चा बनकर। फिर बेटी से पूछा कि कल 23 जनवरी है क्या आप देखोगे परेड। घूमने के मामले में बाप पर गई बेटी भला कहाँ चूकती झट कह दिया पापा मैं भी जाऊँगी इंडिया गेट परेड देखने। फिर सोचा ये क्या कह दिया कल की तो छुट्टी भी नही हैं खैर..........। 8 बजे उठने वाली बेटी परेड का नाम लेते ही झट से 7 बजे उठ गई। और हम पहुँच गए राजपथ। पर चाव ही चाव में हम ये भूल गए कि परेड देखने के लिए पास की जरुरत होती है। मोबाईल भी नही की किसी को कहके पास मँगवाए जाए। और भला सुबह सुबह 9 बजे कौन पास देने आऐगा?  ये भी अजीब रुल है कि परेड देखने के लिए पास की जरुरत पड़े वो भी अपने ही देश में?  जी में तो आया कि अभी जाकर किसी पुलिस अफसर से भिड़ जाऊँ। फिर पता नही क्यों गुस्सा शांत हो गया?  वैसे कभी कभी सोचता हूँ कि जो आपकी ताकत होती वही कभी आपकी कमजोरी क्यों बन जाती है?  खैर फिर सोचा कि चलते हैं यार किसी अफसर से विनती करके देख लेगे। फिर वही हुआ जो अक्सर हम सभी के साथ हो जाता है। और हम उसे किस्मत कह कर उस ऊपर वाले को शुक्रिया कहते हुए उसे याद करते है जिसे हमने आजतक देखा नहीं। फिर हम रेल भवन से कृषि भवन की तरफ जाने के लिए रोड पार करने लगे गाडियों की आवाजाही के बीच। तभी किसी ने रुकने के लिए आवाज देकर हमें रोक लिया और हम रुक गए। आवाज देने वाला भी अपने परिवार के साथ परेड देखने जा रहा था पास आकर बोला कि "गाडियों को निकल जाने दो क्यों रिस्क लेते हो।" ऐसे इंसान को क्या कहते है जो आपको नही जानता पर आपकी परवाह कर जाता हैं?  आप सोचो, मैं आगे बढ़ता हूँ उसी इंसान के साथ। वह मेरे से पूछ बैठता है कि ये वी एन ब्लाक किधर पड़ेगा। मैं कहता हूँ कि वही जाकर पुलिस वालों से पता चलेगा। बात बात में वो कहता है कि उसके पास दो कार्ड है वी आई पी कैटिगरी के और हम तीन है इसलिए एक तो अडजैस्ट हो जाऐगा। और मैं कहता हूँ कि कोई बात नही, चलते है वहाँ बैठे अफसर से बात कर लेंगे। फिर शुरु के गेट से इसी पास से अदंर हो जाते है। तभी कुछ दूर चलकर उनकी जानकार एक लेडिज आती है जिसके पास एक पास ज्यादा है और वह हमें वो पास दिलावा देते है। पर वह पास किसी और ब्लोक का होता है। और हम पास लेके निकल पड़ते है धन्यवाद कहते हुए। और मैं उन्हें भी शुक्रिया कह देता हूँ जिसे सभी नीली छतरी वाला कहते हैं। और भावुक अपनी बेटी के माथे को चूम लेता हूँ। सेकड़ो खाली कुर्सियों पर बैठे चंद लोग। एक बेटा बुजुर्ग हो चुकी अपनी माँ को परेड दिखाने लाया हुआ है। यह माँ किस्मत वाली है। नहीं तो आजकल कौन परवाह करता है माँ बाप और उनकी इच्छाओं की?  वही इनसे चंद कुर्सियों दूर एक परिवार गर्व से बैठा है क्योंकि उनका बेटा परेड में शामिल है देश का सिपाही बनकर। और इधर मेरी बेटी बड़े चाव से परेड देख रही है। और बीच बीच में पूछती है कि पापा ये क्या है पापा ये क्या है। जब जब वह कुछ पूछती है मुझे ना जाने क्यों खुशी महसूस होती? कमाड़ो की पद चाप की आवाजें और दिल में जोश भरती उनकी आवाजें से लेकर आकाश में लड़ाकू विमान के रोमांच तक परेड में सब सुन्दर लगा। बेटी से पूछा क्या क्या अच्छा लगा आपको तो उसकी लिस्ट तो देखिए जरा, पी पी, जहाज, Horse,Camel,Helicopter, Balloon,.......................लिस्ट लम्बी है उसकी पसंद की। जाने क्यों एक संतुष्टि का भाव लिए हम घर की तरफ हो लिए?  बहुत दिनों के बाद संतुष्टि भरा दिन। और अब सुनो  सभी शहीदों को नमन करते हुए  हम बाप बेटी की पसंद का ये गाना। साभार-  YouTube ।


Monday, January 5, 2009

नए साल पर मिला नैना को एक उपहार

नैना
    
छोटी सी ये नैना मेरी
प्यारी सी ये नैना मेरी
मेरे दिल के बाग़ की ये मैना मेरी
प्यारी सी ये बिटिया नैना मेरी।
Zjg15ti
सुंदर सी इसकी आँखे
प्यारी सी इसकी नाक
छोटे छोटे इसके होंठ
और प्यारे से मीठे इसके बोल
आँखे ही ज्यादा बातें करें,
इसलिए नाम हैं इसका नैना।
Z7wm9d
दूध माखन खाए ये
घर भर में घूम आए ये
कभी मम्मी, तो कभी पापा को
जी भर के सताए ये
और पुकारते रहे रात दिन
बस नैना ओ नैना

नए साल में क्या पोस्ट करुँ यही सोच रहा था| विजय जी ने शनिवार को बताया कि वो अभी नैना पर कुछ लिख रहें हैं। और कुछ देर में आपको मेल भेज रहा हूँ।  यह नैना को मेरी तरफ से नए साल का उपहार। जब कुछ देर बाद उनका मेल आया। नैना पर लिखी उनकी रचना को पढ़कर भावुक हो गया।।  इंसानी रिश्तों की कहानी भी बड़ी निराली होती हैं। किसी का दिल कब किस से मिल जाए कुछ पता नहीं। फिर नैना को बताया कि चुनमुन बेटा विजय अकंल जी( बीच में ही बोल पड़ी कौन?)  ने आप पर एक कविता लिखी हैं। हल्की सी मुस्कराई,सरमाई और बोली दिखाओ दिखाओ। मैं पढ़कर उसे सुनाता रहा और वो मंद मंद मुस्कराती रही। और आखिर में मैंने पूछा कि चुनमुन कैसी लगी। अच्छी या खराब। तो बोली " अच्छी" और सरमा गई। फिर सोचा नए साल पर इससे अच्छी पोस्ट और क्या हो सकती है। अपने ब्लोग की शुरुआत भी मैंने अपनी बेटी पर लिखी एक तुकंबदी से की थी। और साल की शुरुआत भी इसी से की जाए तो क्या बुरा हैं। वैसे भी बेटियाँ बाप की लाडली होती हैं। साथ ही इस उम्मीद के साथ कि .......।

नया साल आऐगा
खुशियों के मोती लाऐगा
हर झोली में मोती चमकेंगे
फिर हम सब झूमेंगे
ऐसा नया साल आऐगा।
 

Tuesday, July 1, 2008

बड़ी होती हमारी नैना

हमारी नैना


हमारी नैना बड़ी होने लगी हैं
छोटे छोटे पैरों से दोड़ने लगी हैं |

सुबह जब उठती हैं फूल सी हसंती हैं
अम्मा, बाबा, मम्मा, पप्पा, चाचू, बुआ को मार आवाजें सारे घर में घूमती फिरती है |

जब नहाने की करों बात तो रोनी सी सूरत बना लेती हैं
नहा-धो कपड़े पहन जब वह आती हैं परी सी वह दिखती हैं |

शब्दों को सही सही बोल नही पाती हैं
पर इशारों में सब समझाती जाती हैं |

अपनी जानवरों की किताब में सब जानवरों को वह पहचानती हैं
पूछने पर उंगली रख वह हम सबको बतलाती हैं |

घूमने की शौकिन झट पी पी करती मोटरसाईकिल पर चढ़ जाती हैं
सबको बाय बाय बोल टाटा करती जाती हैं |

जब कभी कोई उसे हल्का सा भी डांट देता हैं
तब उसकी आँखो से छोटे छोटे मोती टपकने लगते हैं|

कभी कभी मुझे उठा कुर्सी से, खुद को बैठाने का इशारा वह करती हैं
एक हाथ से माऊस पकड़, दूसरे हाथ की उगंलियों कीबोर्ड पर वह चलाती हैं|

आलती पालती मार जब वह खाने बैठती हैं
अपने खाने में से हमें भी वह थोड़ा थोड़ा देती हैं |

जब वह थक जाती हैं तब इशारे से मम्मा को बताती हैं
रख कंधे पर सिर अपना झट से वह सो जाती हैं |




आप अगर मेरी पहली तुकबंदी पढ़ना चाहते जो मैने हमारी नैना के इस दुनिया में आने के बाद की थी तो नीचे दिये लिंक पर क्लीक कर सकते हैं। मैं चाहूंगा कि आप उसे भी पढ़े। पीछे खड़ी नैना की मम्मा कहती कि बताना हमारी बेटी कैसी हैं।

हमारी बेटी
http://meri-talash.blogspot.com/2008/02/blog-post.html#links

Thursday, April 24, 2008

हमारी डेढ साल की बेटी टीचर बन गई।

आज की पोस्ट मैं अपनी डेढ साल की बेटी की वजह से लिख रहा हूँ। जिसने हमें आज एक नया पाठ सिखाया।
कल ही की तो बात है मेरे को खाँसी आई तो मैं खाँसने लगा। तो झट से ही मेरी बेटी मुझे इशारों में समझाने लगी, एक हाथ मुँह पर रख खाँसने की एक्टींग कर बताने लगी कि ऐसे खाँसते है। यह बात कुछ दिनो पहले जब इसको खाँसी आई थी तो उसकी मम्मी ने समझाई थी। कि बेटा जब भी खाँसी आऐ तो मुँह पर हाथ रख कर खाँसते है। वो हमें बताती है चप्पल हमेशा पहनो, मैं अगर नंगे पैर हूँ तो मेरी चप्पल उठा लाऐगी और जब तक मैं उन्हें पहन ना लूँ तब तक इशारो से बताती रहेगी कि इन्हें पहनो। वो जो भी चीज जहाँ से उठाती है वहीं रख के आती है। ये सब हमने ही उसे बताया सिखाया है। पर हम दोनों ही उसको सिखाई हुई बातों पर अमल नही करते है।तब ही गाँधी जी याद आ गये। कहीं किताब मे पढा था कि एक बार एक परिवार गाँधी जी के पास आया और बोला कि हमारे बेटा ज्यादा ही गुड खाता है आप जरा इसे मना कर दे ये आपकी बात नही टालेगा। तो गाँधी जी बोले कि कल आना। तो वह परिवार अगले ही दिन फिर बेटे को लेकर पहुँचे, तो गाँधी जी ने उनके बेटे को कहा कि बेटा ज्यादा गुड नहीं खाना चाहिए। परिवार परेशान होकर बोला कि गाँधी जी ये तो आप कल भी कह सकते थे। तो फिर आपने हमें आज क्यों बुलाया। गाँधी जी बोले कि कल तक तो मैं भी ज्यादा गुड खाता था तो कैसे मना कर सकता था। पर आज से मैने गुड खाना छोड दिया है। यह एक बडी अजीब बात है। हम(चाहे वो नेता हो, पत्रकार हो, नोकरशाह हो, या फिर कोई अन्य) अपने चारों तरफ हर किसी को ये समझाते रहते है कि ये करो, ये सही है, ये ना करो ये गलत है। पर खुद उस पर कितना अमल करते यह हमने कभी नही सोचा। अगर हम अपने कहे पर ही अमल करने लगे तो यह दुनिया कितनी सुन्दर हो जाये। हमारी बेटी मोटी- बडी किताबों को बिना पढे ही हमारी टीचर बन गई है।

Saturday, February 16, 2008

नैना

नैना

कोई तेरे होने पर मनाये खुशी
और कोई अफ़सोस
कोई तेरे आने पर दे बधाई
और कोई दे तसल्ली
ऐसा क्यूं होता हैं नैना ?

कोई तुझे चुनमुन पुकारे
और कोई नैना
कोई तुझे दुर्गा बोले
और कोई सुनयना
ऐसा क्यूं होता हैं नैना ?

कोई हँसे कि तू हँसे,
कोई रोये क्योंकि तू रोये
कोई खाये कि तू खाए
कोई सोये क्योंकि तू सोये
ऐसा क्यूं होता हैं नैना ?

कोई कहे यह लड़कियों की सदी
कोई कहे फिर भी लड़किया क्यू मार दी जाती है होने से पहले
कोई बोले बेटे होते बुढापे की लाठी
कोई बोले मेरी बेटी मेरे बुढापे की आँखे
ऐसा क्यूं होता हैं नैना ?


मेरी पहली पोस्ट मेरी बेटी के नाम, जब यह हमारी दुनिया में आई थी. 

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails