Showing posts with label गाने. Show all posts
Showing posts with label गाने. Show all posts

Monday, September 8, 2025

सुनो...आ जाती हो अक्सर तुम मेरे सपनों में...

1.

सुनो 

आ जाती हो अक्सर तुम मेरे सपनों में

इसका क्या मतलब है?

मैं ज्यादा याद करता हूं तुम्हें 

या फिर 

तुम ज्यादा याद करती हो मुझे?


2.


सुनो 

जब सपने में आया करो 

कम से कम इनमें तो 

पल दो पल ही सही

बातें कर लिया करो 

सच बिना तुमसे बात किए  

ये सपने भी अच्छे नहीं लगते हैं.


3.


सुनो 

तमाम परेशानियों के बावजूद

‘कैसी हो तुम?’

पूछने पर

‘अच्छी हूं.’

क्या तुम आज भी कहती हो!


4.


सुनो 

रात सपने में 

मैंने तुमसे चाय मांगी थी

देखो ना तुम 

सपने में भी 

मैं तुम्हारे हाथों से बनी

फीकी चाय ना पी सका. 


5.


सुनो 

अच्छा एक बात तो बताओ 

क्या बारिशों में तुम आज भी 

अपना पसंदीदा गीत 

'मौसम है आशिकाना

ऐ दिल कहीं से उनको 

ऐसे में ढूंढ लाना....'

गुनगुनाती हो ?

Tuesday, March 2, 2010

आह...... होली पर बेटी, मेरा बचपन लौटा लाई।

नैना की होली।

हम अपना बचपन देख नहीं पाते बस अपने बड़े बुजुर्गो से सुन ही पाते हैं, या एक आध घटनाएं हमारी स्मृति में बची रह जाती है। अगर हमें अपना बचपन देखना है तो अपने बच्चों के बचपन के संग हो लेना चाहिए और उस छूटे हुए बचपन को फिर से जीने के लिए। कुछ ऐसा ही मैंने इस बार किया। अपने और बेटी की खातिर हम भी होली में रंगीले हो लिए। सुबह सुबह बेटी ने हमें रंगा, दोपहर में हमने बेटी को रंग दिया। और बेटी की माँ कहाँ पीछे रहने वाले थी सो उन्होंने तो सबको ऐसा रंगा की सब एक दूसरे को पहचान ही नहीं पाए। खैर आप हमारी बेटी की होली की फोटो देखिए। और हाँ बेटी की पसंद के 10 गाने भी जानिए जिनको सुनने के लिए वह अपने पापा से खूब जिद करती हैं। और पापा गानों के लिए ब्लोगर साथियों के पीछे पड़े रहते हैं।

















सैंया छेड़ देवें, ननद चुटकी लेवे
ससुराल गैंदा फूल ..............................

















दिल तो बच्चा है जी, थोड़ा कच्चा है जी
हाँ दिल तो बच्चा है जी ........................













आजा आजा दिल निचोड़े ,रात की मटकी तोड़े
कोई गुड़ लक निकाले, आज गुड लक तो फोड़ॆ ...........

















तू पैसा पैसा करती है क्यों पैसे पे इतना मरती है
मैं पैसों की लगा दूँ ढेरी री री री री...................













इब्न ए बतूता ता ता , बगल में जूता ता ता
पहने तो करता है चुर्र .............................













जब लाईफ हो आऊट आफ कंट्रोल
होंठो करके गोल, होठों को करके गोल
सीटी बजा के बोल ALL IS WELL













आजा आजा जिन्दे शामियाने के तले
जेरी वाले नीले आसमाने के तले
जय हो जय हो जय हो .......................................

















होले होले से हवा लगती है
होले होले से दवा लगती है
होले होले से दुआ लगती है
होले होले .......................
होले होले हो जाऐगा प्यार ....................













मसकली मसकली मसकली मसकली मसकली .........

















बेटा हो जा जवान तेरी शादी करुँगा
शादी करुँगा तेरी शादी करुँगा .......

कैसी लगी हमारी होली। और नैना बेटी के पसंद के गानों में से आपकी पसंद का गाना कौन सा है,  ये भी बताना जी।
 

Saturday, January 24, 2009

बचपन में मैं गाता था, आज बेटी गाती है "नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ बोलो बच्चों मेरे संग जय हिंद जय हिंद...." और गणतंत्र दिवस की ढेरों शुभकामनाएं।

अभी परसों की ही तो बात है बेटी नैना "नन्हा मुन्ना राही हूँ" गा रही थी। मैंने पूछा "बेटा ये किसने बताया" वो बोली "दादू ने।" ये गाना कुछ दिन से इसकी छोटी सी जबान पर है। गाती बस इतना ही है कि "नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ।" फिर इसके लिए यह गाना यूटयूब से डाऊनलोड़ किया और इसे सुनाया तो यह खुश हो गई। और मैं अपने बचपन में चला गया। तब यह गाना अक्सर 26 जनवरी के आसपास टीवी और रेडियो पर बजता था। मैं बड़े चाव से इस गाने को सुना करता था। तब नही पता था कि जय हिंद क्या होता है?  देश क्या होता?  देशभक्ति क्या होती हैं? सोचता हूँ क्या अब पता चल गया है इन सबके बारें में? 25 जनवरी को स्कूलों में भी बड़े चाव से जाते थे, स्कूल के कार्यक्रम में  देश भक्ति गाने खूब सुनाए और बजाए जाते थे। और 26 जनवरी को सुबह जल्दी नहा धो तैयार होकर पड़ोसी के टीवी पर परेड देखा करते थे। कमरा लोगों से भर जाया करता था। बच्चे नीचे और बड़ॆ चारपाई पर बैठ जाते थे। और आज ...............................। और फिर बेटी को 26 जनवरी के बारे में बताया एक बच्चा बनकर। फिर बेटी से पूछा कि कल 23 जनवरी है क्या आप देखोगे परेड। घूमने के मामले में बाप पर गई बेटी भला कहाँ चूकती झट कह दिया पापा मैं भी जाऊँगी इंडिया गेट परेड देखने। फिर सोचा ये क्या कह दिया कल की तो छुट्टी भी नही हैं खैर..........। 8 बजे उठने वाली बेटी परेड का नाम लेते ही झट से 7 बजे उठ गई। और हम पहुँच गए राजपथ। पर चाव ही चाव में हम ये भूल गए कि परेड देखने के लिए पास की जरुरत होती है। मोबाईल भी नही की किसी को कहके पास मँगवाए जाए। और भला सुबह सुबह 9 बजे कौन पास देने आऐगा?  ये भी अजीब रुल है कि परेड देखने के लिए पास की जरुरत पड़े वो भी अपने ही देश में?  जी में तो आया कि अभी जाकर किसी पुलिस अफसर से भिड़ जाऊँ। फिर पता नही क्यों गुस्सा शांत हो गया?  वैसे कभी कभी सोचता हूँ कि जो आपकी ताकत होती वही कभी आपकी कमजोरी क्यों बन जाती है?  खैर फिर सोचा कि चलते हैं यार किसी अफसर से विनती करके देख लेगे। फिर वही हुआ जो अक्सर हम सभी के साथ हो जाता है। और हम उसे किस्मत कह कर उस ऊपर वाले को शुक्रिया कहते हुए उसे याद करते है जिसे हमने आजतक देखा नहीं। फिर हम रेल भवन से कृषि भवन की तरफ जाने के लिए रोड पार करने लगे गाडियों की आवाजाही के बीच। तभी किसी ने रुकने के लिए आवाज देकर हमें रोक लिया और हम रुक गए। आवाज देने वाला भी अपने परिवार के साथ परेड देखने जा रहा था पास आकर बोला कि "गाडियों को निकल जाने दो क्यों रिस्क लेते हो।" ऐसे इंसान को क्या कहते है जो आपको नही जानता पर आपकी परवाह कर जाता हैं?  आप सोचो, मैं आगे बढ़ता हूँ उसी इंसान के साथ। वह मेरे से पूछ बैठता है कि ये वी एन ब्लाक किधर पड़ेगा। मैं कहता हूँ कि वही जाकर पुलिस वालों से पता चलेगा। बात बात में वो कहता है कि उसके पास दो कार्ड है वी आई पी कैटिगरी के और हम तीन है इसलिए एक तो अडजैस्ट हो जाऐगा। और मैं कहता हूँ कि कोई बात नही, चलते है वहाँ बैठे अफसर से बात कर लेंगे। फिर शुरु के गेट से इसी पास से अदंर हो जाते है। तभी कुछ दूर चलकर उनकी जानकार एक लेडिज आती है जिसके पास एक पास ज्यादा है और वह हमें वो पास दिलावा देते है। पर वह पास किसी और ब्लोक का होता है। और हम पास लेके निकल पड़ते है धन्यवाद कहते हुए। और मैं उन्हें भी शुक्रिया कह देता हूँ जिसे सभी नीली छतरी वाला कहते हैं। और भावुक अपनी बेटी के माथे को चूम लेता हूँ। सेकड़ो खाली कुर्सियों पर बैठे चंद लोग। एक बेटा बुजुर्ग हो चुकी अपनी माँ को परेड दिखाने लाया हुआ है। यह माँ किस्मत वाली है। नहीं तो आजकल कौन परवाह करता है माँ बाप और उनकी इच्छाओं की?  वही इनसे चंद कुर्सियों दूर एक परिवार गर्व से बैठा है क्योंकि उनका बेटा परेड में शामिल है देश का सिपाही बनकर। और इधर मेरी बेटी बड़े चाव से परेड देख रही है। और बीच बीच में पूछती है कि पापा ये क्या है पापा ये क्या है। जब जब वह कुछ पूछती है मुझे ना जाने क्यों खुशी महसूस होती? कमाड़ो की पद चाप की आवाजें और दिल में जोश भरती उनकी आवाजें से लेकर आकाश में लड़ाकू विमान के रोमांच तक परेड में सब सुन्दर लगा। बेटी से पूछा क्या क्या अच्छा लगा आपको तो उसकी लिस्ट तो देखिए जरा, पी पी, जहाज, Horse,Camel,Helicopter, Balloon,.......................लिस्ट लम्बी है उसकी पसंद की। जाने क्यों एक संतुष्टि का भाव लिए हम घर की तरफ हो लिए?  बहुत दिनों के बाद संतुष्टि भरा दिन। और अब सुनो  सभी शहीदों को नमन करते हुए  हम बाप बेटी की पसंद का ये गाना। साभार-  YouTube ।


Tuesday, August 19, 2008

बचपन के दिन (पान वाले की दुकान और सुरीले गाने)

दो एक दिन पहले महेन जी ने अपने ब्लोग पर एक गाना सुनवाया था। गीत के बोल थे " चल उड़ा जा रे पंछी" । गीत के बोल मुझे मेरे बचपन में ले गए जब मैं पढ़ा करता था। तब गानों की इतनी समझ नही थी वैसे आज भी समझ नही आई हैं। जो गाने तब अच्छे नही लगते थे अब वो गाने अच्छे लगते हैं। बस इतना फर्क आ गया हैं। खैर बात बचपन की हो रही थी। जब हमारी आधी छुट्टी होती थी तो मै और मेरा एक दोस्त बाहर पेट पूजा करने आते थे। चार डबलरोटी लेकर उसके बीच में छोले रख कर और ऊपर से खट्टी चटनी डाल कर हम दोनो खाते थे। और स्कूल के पास ही एक पनवारी की दुकान थी जहाँ हम खड़े हो जाते थे। क्योंकि उसके पास टेप रिकार्डर था और हर समय चलता रहता था। बस हम दोनों एक साईड में खड़ॆ होकर गाने सुनते थे। 10 या 15 मिनट तक। उसके पास गानों की कैसेटों की भरमार थी। वह हमें अपनी दुकान से भगा ना दें इसलिए उससे हम संतरे की छोटी छोटी मीठी गोलियाँ ले लिया करते थे। वहाँ एक गाना अक्सर बजता था जो मुझे बहुत ही अच्छा लगता था। पर कल ही पता चला कि वह गाना नही कव्वाली हैं। जब मैं उसको यूटयूब पर सर्च कर रहा था। उसके बोल हैं " चढ़ता सूरज धीरे धीरे ढलता हैं ढल जाऐगा" । कल से कई बार सुन चुका हूँ फिर एकदम ख्याल आया आप सभी साथी दोस्तों को भी ये सुनवाया जाए। अच्छा लगे तो दो शब्द, खराब लगे तो चार शब्द कहना।






साभार: www.youtube.com . youtube वालों की बहुत मेहरबानी जिनकी बदौलत ये कव्वाली मैं फिर से सुन पाया और सुनवाया पाया ।

Friday, August 15, 2008

आज़ादी के पर्व पर मेरे दिल के करीब दो देशभकित गाने

आज़ादी के इस पर्व की सबको बधाई।


आज 15 अगस्त हैं। हमारी आज़ादी का दिन। बाहर क्या बच्चें, क्या जवान, क्या वृद सभी छतों पर पतंगे उड़ा रहे हैं। आसमान पर पंतग ही पंतग हैं। और नीचे आवाज आ रही है कि आई बो के( पंतग कट गई) । बचपन के दिन याद आ रहे जब 14 अगस्त को स्कूल में देशभकित के गानों का कार्यक्रम होता था । झंडा फहराया जाता था। तब से लेकर आज तक एक गाना मेरे दिल के नजदीक हैं। पहले भी सुनकर आँखे नम हो जाती थी और आज भी । मेरे दोस्त पूछते थे तुझे क्या हुआ। पर पता नही मुझे क्या हो जाता था। खैर गाने के बोल हैं। "ऐ मेरे प्यारे वतन"। फिल्म "काबुली वाला"। साथ ही इसके अलावा एक गाना और हैं जो मेरे गाँवो की याद दिलाता हैं। आप सभी को फिर आज़ादी की ढेरो शुभकामनाएं।












साभार : www.youtube.com.मेहरबानी youtube  की।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails