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Sunday, December 28, 2025

सुनो आखिर कब तक तुम सपनों में आती रहोगी...

13.


सुनो 

कभी-कभी 

यूं ही बैठे-बैठे 

सोचता हूं मैं 

तुम अपने मन की बातें 

अब किससे कहती होंगी?


14.


सुनो 

पता है तुम्हें 

तुम मुझे इतनी अच्छी क्यों लगती थीं 

दरअसल तुम मुझे समझती थीं 

इसलिए इतनी अच्छी लगती थीं.


15.


सुनो 

आखिर कब तक तुम 

मेरे सपनों में आती रहोगी 

कभी सपनों से निकलकर 

मुझसे मिलने आओ 

बहुत कुछ कहना है मुझे 

कुछ तुम्हें भी तो कहना होगा.


Friday, December 12, 2025

सुनो मुझे भूल तो नहीं जाओगी ना तुम?

12.

सुनो 

पता है तुम्हें 

बीती रात के अंतिम पहर में 

मैंने तुम्हारे सारे खतों के 

पुर्जे-पुर्जे कर दिए 

पुर्जे करने से पहले 

मैं उन्हें एक-एक कर पढ़ता रहा 

पढ़कर

कभी खुश होता  

कभी उदास  

और 

कभी तो ऐसा लगता 

जैसे तुम ही कमरे में बैठी 

एक-एक ख़त को पढ़कर सुना रही हो

'आज मैंने तुम्हारे लिए 

पूरे-पूरे दो पेज भर दिए हैं

है ना

क्या इनाम दोगे!' 

क्या इनाम दिया था मैंने 

याद आया कुछ तुम्हें?


कुछ देर बाद 

फिर तुम कहती हो 

'पढ़ लिया कि नहीं 

मैं आ जाऊं क्या

बुला ले ना

मैं पढ़कर सुना दूंगी 

आऊं मैं!'

और 

तुम आजतक ना आ सकीं

और अब 

ये ख़त भी नजर नहीं आएंगे 

बिल्कुल तुम्हारी तरह

वैसे कितने साल हो गए 

हम दोनों को मिले हुए? 

याद आया कुछ तुम्हें?

 

वैसे तुम्हें पता है 

इन खतों के टुकड़े मैंने क्यों किए 

दरअसल  

शरीर साथ नहीं देता अब 

एक दर्द को सुलाता हूं 

तो दूसरा जाग जाता है

दूसरे को बहलाता हूं 

तो तीसरा नाराज हो जाता है

आखिर किस-किस दर्द की दवा करूं मैं अब 

बस इन्हीं में उलझा कभी-कभी  

हाथ की रेखाओं को देखा करता हूं 

अब तो ये भी टूटने लगी हैं 

अपनी राह से भटकने लगी हैं 

बल्कि पता है तुम्हें 

जीवन रेखा तो कब की दो टुकड़े हो चुकी 

उस टूटी रेखा को देख 

डर-डर जाता हूं मैं अब

पहले तो डरा सहमा तुम्हारे लिखे ख़त 

पढ़ लिया करता था

थोड़ा बहुत अपने आपसे 

हंस बोल लिया करता था  

फिर एक दिन अपने डर से ही 

तुम्हारा डर याद आया

जो तुमने किसी रोज एक ख़त में लिखा था 

'ये ख़त कभी किसी के हाथ लग गए तब क्या होगा?' 

सच में तब क्या होगा

मैंने भी ये सोचा था 

इसलिए 

सारे ख़तों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए 

बीती रात मैंने 

क्या पता 

जीवन रेखा पर चल रहा मेरी सांसों का पहिया 

कब टूटी जीवन रेखा के पास आकर थम जाए 

कब मेरा जीवन खत्म हो जाए

लेकिन 

जिंदगी के इस अंतिम पहर में  

आखिरी ख्वाहिश की तरह 

दिल चाहता है एक बार फिर से 

तुमसे मिलना 

मुझसे मिलने तुम जरुर आना 

और फिर 

पहले की तरह 

चुपके से मेरे हाथ में 

एक छोटा-सा ख़त थमा जाना 

जिससे जान जाऊं मैं हाल तुम्हारा 

और फिर 

निकल जाऊं मैं अकेले ही 

यह दुनिया छोड़कर कहीं दूर 

बहुत दूर.


यूं भी तुम्हीं ने तो एक ख़त में लिखा था 

'सब अकेले ही इस दुनिया में आते हैं 

और अकेले ही जाते हैं

आज तक कितनों ने साथ मरने की कसम खाई होगी

किसी से भी पूछ के देख  

कौन किसके साथ जिया

और किसके साथ मरा 

ये तो किसी को पता नहीं

हम साथ-साथ मरेंगे नहीं 

केवल साथ-साथ जिएंगे

बस

और कुछ नहीं

तू मरने का नाम मत लिया कर 

क्योकिं मरने के बाद सब भूल जाते हैं

साथ मरने की नहीं 

बस साथ जीने की दुआ मंगाकर

समझा

अब खाएगा मरने की कसम.'

याद आया कुछ तुम्हें? 


मुझे यकीन है

तुम्हें सब याद होगा

मन के किसी एक कोने में

सब कुछ छुपाकर रखा होगा

लेकिन

एक बात तो बताओ  

मेरे मरने के बाद 

मुझे भूल तो नहीं जाओगी ना तुम?

सच-सच बताना 

तुम्हें मेरी कसम.

Thursday, December 11, 2025

आधे-अधूरे ख्याल-2

💭
आदमी सोचता है. चलो ये वाला काम किया जाएगा. बहुत दिन हो गए टालते-टालते. फिर आदमी उसे पूरा करने का प्लान भी बना लेता है. उसके हिसाब से चलने भी लगता है. लेकिन फिर कहीं से नीली छतरी वाला आता है. कहता ना बेटा ना. ये इतना जरुरी नहीं. ये वाला काम ज्यादा जरुरी है, पहले इस काम को पूरा कर. फिर आदमी पहले काम को छोड़कर दूसरे जरुरी काम को करने लगता है. वक्त जैसा कहता है वह वैसे ही करने भी लगता है. ये जिंदगी ऐसे ही उलझाए रखती है एक काम से दूसरे काम और दूसरे से फिर तीसरे. और आदमी इन्हीं में सुलझा रहता है बस...

💭
जैसे शब्दों की अंतिम व्याख्या तक पहुंचते-पहुंचते उनके अर्थ बदल जाते है. ठीक वैसे ही उम्र के आखिरी पड़ाव तक आते-आते जिंदगी के मायने बदल जाते हैं.

💭
आपकी तकलीफ में बगल से गूंगे की तरह निकल जाते हैं. वहीं अपनी जरूरत में यही गूंगे बोलने लग जाते हैं.
💭
जिंदगी तकलीफों का समंदर है. वो अलग बात है दिल बहलाने को कभी-कभी ठंडी हवाओं का झोंका भी आता है. 

💭
ख़त सिर्फ कागज पर उतरे अक्षर नहीं होते हैं. वे दो जिंदगियों के साझे दस्तावेज होते हैं.

💭
कभी-कभी वक्त बुढ़ापे में कहता है बेटा जवान हो जा. बिना जवान हुए तकलीफें दूर नहीं होगीं.

💭
अच्छा यार एक बात तो बता.
पूछ.
तुम पति-पत्नी में कभी झगड़ा नही होता?
हा हा!
मैं सवाल कर रहा हूं. और तू हंस रहा है. जैसे मैंने कोई चुटकला सुनाया हो.
ये चुटकला ही तो है. भला कौन मियां-बीबी हैं जो झगड़ते नही.
लेकिन तुम दोनों को झगड़ते तो कभी देखा नहीं.
भई किसी के सामने नहीं झगड़ते तो इसका मतलब ये नहीं कि हम लड़ते नहीं. हम भी झगड़ते हैं. बस यार सालों से एक सहमति-सी बन गई. वो भी बिना बात-वात किए कि जब भी कोई किसी बात पर ग़ुस्सा होगा या नाराज होगा. दूसरा उस वक्त ज्यादा अपनी बात नहीं रखेगा. बहस नहीं करेगा. बस जितना संभव हो सकेगा मामले को शांत करेगा. चाहे उसके लिए गलती ना होने के बाद भी माफी मांगनी पड़े. उस वक्त वो मामला ठंडा ही करेगा. बाद में जब मामला शांत होगा. उस विषय पर फिर से बातचीत होगी. या फिर गुस्सा करने वाले को गलती का अहसास हो जाए. सही में जो गलत होगा वो माफी मंगेगा. माफी के बीच ईगो नहीं आएगी. हम दोनों में एक बात ये भी है कि गलती का अहसास होते ही माफी मांग लेते हैं. चाहे वो हो या फिर मैं. पता है जब कोई दिल से माफी मांगता है तो उसका चेहरा मासूम-सा हो जाता है. उस वक्त उस मासूम से चेहरे को प्यार करने का मन करने लग जाता है. और फिर माथे का बोसा लेने में हम दोनों में से कोई पीछे नहीं रहता. वो अलग बात है कि कभी-कभी हम प्यार में इतना डूब जाते हैं कि एक दूसरे चेहरों को देखते हुए दोनों की आंखों में आंशू आ जाते है. फिर हम  बात या बहस नहीं करते बस प्यार करते हैं. ऐसे हमारा प्यार का संबंध और मजबूत हो जाता है !
ये तेरी बातें किताबों की बातों-सी लग रही हैं. असल जीवन मे ऐसा भला होता है क्या !
ऐसा जीवन में होना चाहिए कि नहीं??

Thursday, December 4, 2025

सुनो पता है तुम्हें, आजकल परमात्मा मुझसे खफा-खफा रहते हैं...

11.

सुनो 
पता है तुम्हें 
आजकल परमात्मा मुझसे 
खफा-खफा रहते हैं  
और 
मैं डरा-डरा रहता हूं.

फिर कभी कुछ ऐसा घटता है 
लगता है बेशक वे खफा हैं पर 
राह भी तो दिखाते हैं 
काम भी तो बनाते हैं.
 
फिर कभी पता नहीं 
उन्हें क्या हो जाता है 
बिल्कुल दूसरी ही राह ले जाते हैं 
मैं परेशां 
कर भी क्या सकता हूं 
उन्हीं की राह पर चलने लग जाता हूं. 

अकेले चलते-चलते 
अब थक जाता हूं
थक-हारकर
बैठ जाता हूं
बैठकर 
उनसे गिले-शिकवे करता हूं 
तुम्हें याद करता हूं 
ना जाने और
क्या-क्या सोचता रहता हूं.
 
फिर उठकर 
चल पड़ता हूं 
इस उम्मीद में  
कभी तो इनकी नाराजगी दूर होगी 
कभी तो दर्द-तकलीफों से राहत होगी
क्या पता कभी 
किसी राह चलते-चलते 
तुमसे भी मुलाकात होगी.

Friday, October 3, 2025

सुनो. हां आई...

 6.

सुनो

आज फिर आई थीं तुम 

सपने में 

जैसे हर बार आती हो.


लेकिन आज 

तुम हिम्मत का दुपट्टा ओढ़े थीं 

मैं डर का कुर्ता पहने था.


तुम मेरे नजदीक आ-आकर
बातें किए जा रही थीं 

बार-बार 

मेरा हाथ पकड़े जा रही थीं 

मैं दुनिया से डरा-सहमा 

बार-बार ही 

अपना हाथ छुड़ाए जा रहा था 

तुमसे फासले बनाए जा रहा था.

 

ठीक वैसे ही फासले 

जैसे पहले तुम बनाया करती थीं 

लेकिन आज मैं बेहद खुश था 

क्योंकि 

तुमने अब लोगों की परवाह करना छोड़ दिया था

अपने ख़्वाबों को प्यार करना शुरू कर दिया था.


7.


सुनो 

कभी-कभी सुबह 

सपने में सिर्फ तुम्हारा आना ही याद रहता है 

बाकी कुछ भी नहीं. 


याद करने पर भी

कुछ याद नहीं आता.


बस तुम्हारे आने का अहसास होता है 

अहसास भी ऐसा 

जैसे अभी-अभी तुम 

मुझसे मिलकर चली तो गई हो 

लेकिन 

अपनी खुशबू यहीं छोड़ गई हो

मेरे पास.


8.


सुनो 

पता है 

आज मेरे सपने में 

कौन आया?


अरे बाबा तुम नहीं

'भोले बाबा'.


वे कह रहे थे 

मेरे से पहले तुम 

'राम' का नाम लिया करो

बस ये कहकर वे चले.

 

क्यूं आया ऐसा सपना 

मुझे कुछ पता नहीं 

तुम्हें कुछ पता हो 

तो बताना.


9.


सुनो 

आज सपने में 

मैं कहीं अकेला 

उदास-सा बैठा था.


तुम मेरे पीछे से आईं 

और पूछने लगीं 

यूं अकेले क्यों बैठे हो?


तुम्हारी आवाज सुनकर 

मैं चौंका 

पीछे मुड़कर मैंने तुम्हें देखा 

बस एकटक देखता रहा 

और फिर 

रो पड़ा. 


ऐसे-जैसे कोई बच्चा 

जब तकलीफ में होता है तो 

मां को देखकर रो पड़ता है.


10.


'सुनो.'

'हां, आई.' 

आखिर बार 

कब कहे गए थे 

ये तीन शब्द 

हम दोनों के बीच 

कुछ याद है तुम्हें!


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