शुक्रवार को बैठे बैठे पत्नी की कही एक बात याद आ गई जो किसी दिन किसी बात पर कही गई थी कि " हे भगवान अगर बेटी दे तो धन भी दिया कर" इस बात में छिपा दर्द शब्द बनकर कलम से कागज पर उतर गया। पर भाव पूरी तरह से उभर नहीं पाए तो रंजू जी को याद किया गया और उन्हें वो तुकबंदी मेल कर दी गई। इस विनती के साथ कि अगर समय हो तो इसको अपने हाथों से तराश दें। फिर शाम को ईमेल चैक की तो वह तुकबंदी एक सुन्दर भावपूर्ण रचना में बदल चुकी थी। जो बात मैं कहना चाहता था वो बात यह रचना कह रही है इसलिए ज्यादा कुछ ना कहते हुए बस रंजू जी को दिल से शुक्रिया।
बढ़ रही है बेटी की उम्र जैसे जैसे
ढ़लती उम्र के पिता की
कदमों की चाल तेज हो रही है
बढ़ती माँगो को देखकर
उतर रहे हैं माँ के तन से जेवर धीरे-धीरे
आँखो से बेबसी बयान हो रही है
तक रही है आसमान को
बेटी नि:शब्द होकर
भाई के हाथ
बहन को दे रहे हैं दिलासा
घर के कोने-कोने में
खामोशी जज्ब हो रही है
हँसता नही अब यहाँ
कोई खिलखिला कर
मुस्कान की भी जैसे
कीमत तय हो रही है
गूँजते है बस अब
कुछ ही लफ्ज़ घर में
"सो गए क्या?"
"नही तो"
यह ज़िंदगी बस अब यूँ
नाम की व्यतीत हो रही है