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Tuesday, September 27, 2011

बेटी और उसकी बातें














बेटी के नन्हें-नन्हें हाथ अब बड़े होने लगे हैं

खिलौनों के साथ किताबें-पेंसिल भी पकड़ने लगे हैं.

जुबां अब इसकी तुतलाती नहीं है

द,आ का डंडा,दा,द ऊ की मात्रा,दू,दादू पढ़ने लगी है.

फरमाईशें छोटी-छोटी करती है

सपने बड़े-बड़े देखती है.

कभी अकेले कमरे में बच्चों को पढ़ाती मिलती है

कभी हम सबको सुई लगाती फिरती है

स्कूल जाते वक्त कभी रोती नहीं

होम-वर्क किए बगैर कभी सोती नहीं.

कभी-कभी सहेलियों की देखा-देखी

बाइक से स्कूल जाने को कहती है.

समझाने पर पैदल ही मुस्कराती चली जाती है.

देख कर इसकी मासूमियत दिल भर आता है

फिर इसके बड़े-बड़े सपनो की खातिर

बहुत कुछ करने को जी चाहता है.

- नैना के पापा

 

Monday, December 15, 2008

पंजाब की प्रेम कविताएं का आखिरी भाग

प्यार और कविता

प्यार करने

और किताब पढ़ने में

कोई अंतर नहीं होता

कुछ किताबों का हम

मुख-पृष्ट देखते हैं

अदंर से बोर करती हैं

पन्ने पलट देते हैं

और रख देते हैं

कुछ किताबें हम रखते हैं

तकिए तले

अचानक जब नींद खुलती हैं

तो पढ़ने लगते हैं

कुछ किताबों का

शब्द-शब्द पढ़ते हैं

उनमें खो जाते हैं

बार-बार पढ़ते हैं

रुह तक घुल-मिल जाते हैं

कुछ किताबों पर

रंग-बिरंगे निशान लगाते हैं

और कुछ किताबों के

नाजुक पन्नो पर

निशान लगाने से भी

भय खाते हैं

प्यार करने और किताब पढ़ने में

कोई अतंर नही होता

   

                   सतिंदर सिंह

साभार- किताब का नाम - "ओ पंखुरी" ,चयन व अनुवाद राम सिहं चाहल, प्रकाशन - संवाद प्रकाशन मेरठ (जिन जिन के सहयोग से ये कविताएं हमारे तक पहुँची उन सभी को दिल से शुक्रिया)

Thursday, December 11, 2008

पंजाब की प्रेम कविताएं भाग-2

रोशनी की तलवार


पता नही वह किस-किस का जिस्म पहनकर आता हैं
और हर बार मुझसे
मेरा घर छीनकर चौराहे पर खड़ा होकर कहता हैं
देखो कितनी आवारा-गर्द है
कभी घर नही लौटती ......


मैं चौराहे पर खड़े हर ऐरे गैरे से
अपने घर का पता पूछती हूँ


भीड़ में से
एक निकलकर कहता हैं
मेरे जेहन में कई कमरे हैं


एक कमरे का दूसरे कमरे की तरफ
कोई दरवाजा नही खुलता
तू एक कमरे में रह सकती हैं
मैं उसकी चोर निगाह की ओर घूर कर देखती हूँ


इतने में दूसरा खड़ा होकर कहता हैं
किसी के साथ गुज़रे हुए कुछ खूबसूरत पल
क्या काफ़ी नही होते बची हुई उम्र के लिए
फिर घर के बारें में क्या सोचना हुआ


इतने में तीसरा खड़ा होकर कहता हैं
हर मर्द चोरी छिपे अपने घर से दूर भागता रहता हैं
उस शून्य घर का क्या करोगी
मैं उसकी ओर गौर से देखती हूँ


इतने में चौथा खड़ा होकर कहता हैं
घर तो झूठे रिश्तों पर सुनहरी लेबल हैं
मस्तक की लपट को 'झूठ' लेबल के साथ
कैसे रौशनाएगी? मैं घबरा जाती हूँ


इतने में पाचँवा खड़ा होकर कहता हैं
घर तो जेल का दूसरा नाम हैं
पंछी, पवन एंव पवित्र विचारों को
घर की मोहताजी की ज़रुरत नही होती
घर का साथ छोड़ो
और फिर तेरी रोशनी की तलवार
जो सच माँगती हैं
उस का वार भला कौन झेल सकता है


मैं चौराहे पर ही
चीख चीख कर कह रही हूँ
मुझे मेरा घर चाहिए


वह पता नही
किस किस का जिस्म पहनकर आता हैं
हर बार मुझसे मेरा घर छीनकर
चौराहे पर खड़ा होकर कहता हैं
देखो कितनी आवारा-गर्द हैं
कभी घर ही नही लौटती

                             मनजीत टिवाणा

साभार- किताब का नाम - "ओ पंखुरी" ,चयन व अनुवाद राम सिहं चाहल, प्रकाशन - संवाद प्रकाशन मेरठ (जिन जिन के सहयोग से ये कविताएं हमारे तक पहुँची उन सभी को दिल से शुक्रिया)

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