Showing posts with label प्रेम कविताएं. Show all posts
Showing posts with label प्रेम कविताएं. Show all posts

Monday, December 15, 2008

पंजाब की प्रेम कविताएं का आखिरी भाग

प्यार और कविता

प्यार करने

और किताब पढ़ने में

कोई अंतर नहीं होता

कुछ किताबों का हम

मुख-पृष्ट देखते हैं

अदंर से बोर करती हैं

पन्ने पलट देते हैं

और रख देते हैं

कुछ किताबें हम रखते हैं

तकिए तले

अचानक जब नींद खुलती हैं

तो पढ़ने लगते हैं

कुछ किताबों का

शब्द-शब्द पढ़ते हैं

उनमें खो जाते हैं

बार-बार पढ़ते हैं

रुह तक घुल-मिल जाते हैं

कुछ किताबों पर

रंग-बिरंगे निशान लगाते हैं

और कुछ किताबों के

नाजुक पन्नो पर

निशान लगाने से भी

भय खाते हैं

प्यार करने और किताब पढ़ने में

कोई अतंर नही होता

   

                   सतिंदर सिंह

साभार- किताब का नाम - "ओ पंखुरी" ,चयन व अनुवाद राम सिहं चाहल, प्रकाशन - संवाद प्रकाशन मेरठ (जिन जिन के सहयोग से ये कविताएं हमारे तक पहुँची उन सभी को दिल से शुक्रिया)

Thursday, December 11, 2008

पंजाब की प्रेम कविताएं भाग-2

रोशनी की तलवार


पता नही वह किस-किस का जिस्म पहनकर आता हैं
और हर बार मुझसे
मेरा घर छीनकर चौराहे पर खड़ा होकर कहता हैं
देखो कितनी आवारा-गर्द है
कभी घर नही लौटती ......


मैं चौराहे पर खड़े हर ऐरे गैरे से
अपने घर का पता पूछती हूँ


भीड़ में से
एक निकलकर कहता हैं
मेरे जेहन में कई कमरे हैं


एक कमरे का दूसरे कमरे की तरफ
कोई दरवाजा नही खुलता
तू एक कमरे में रह सकती हैं
मैं उसकी चोर निगाह की ओर घूर कर देखती हूँ


इतने में दूसरा खड़ा होकर कहता हैं
किसी के साथ गुज़रे हुए कुछ खूबसूरत पल
क्या काफ़ी नही होते बची हुई उम्र के लिए
फिर घर के बारें में क्या सोचना हुआ


इतने में तीसरा खड़ा होकर कहता हैं
हर मर्द चोरी छिपे अपने घर से दूर भागता रहता हैं
उस शून्य घर का क्या करोगी
मैं उसकी ओर गौर से देखती हूँ


इतने में चौथा खड़ा होकर कहता हैं
घर तो झूठे रिश्तों पर सुनहरी लेबल हैं
मस्तक की लपट को 'झूठ' लेबल के साथ
कैसे रौशनाएगी? मैं घबरा जाती हूँ


इतने में पाचँवा खड़ा होकर कहता हैं
घर तो जेल का दूसरा नाम हैं
पंछी, पवन एंव पवित्र विचारों को
घर की मोहताजी की ज़रुरत नही होती
घर का साथ छोड़ो
और फिर तेरी रोशनी की तलवार
जो सच माँगती हैं
उस का वार भला कौन झेल सकता है


मैं चौराहे पर ही
चीख चीख कर कह रही हूँ
मुझे मेरा घर चाहिए


वह पता नही
किस किस का जिस्म पहनकर आता हैं
हर बार मुझसे मेरा घर छीनकर
चौराहे पर खड़ा होकर कहता हैं
देखो कितनी आवारा-गर्द हैं
कभी घर ही नही लौटती

                             मनजीत टिवाणा

साभार- किताब का नाम - "ओ पंखुरी" ,चयन व अनुवाद राम सिहं चाहल, प्रकाशन - संवाद प्रकाशन मेरठ (जिन जिन के सहयोग से ये कविताएं हमारे तक पहुँची उन सभी को दिल से शुक्रिया)

Wednesday, November 26, 2008

पंजाब की प्रेम कविताएं

पिछले महीने एक किताब पढ़ी थी "ओ पखुंरी" जिसमें दी हुई कविताएं बहुत ही खूबसूरत थी पर तीन कविताएं दिल को छू गई और मैंने अपनी डायरी में उतार ली आज सोचा कि बारी बारी से एक एक कविता आप सभी के लिए पेश कर दूँ।

मेरी कविता

मेरी माँ को मेरी कविता समझ न आई
बेशक मेरी मातृभाषा में लिखी हुई थी
वह तो केवल इतना समझी
पुत्र की रुह को दुख हैं कोई

मगर उसका दुख
मेरे होते हुए
आया कहाँ से

ध्यान लगाकर देखा
मेरी अनपढ़ माँ ने मेरी कविता
"देखो लोगों,
अपने कोख से जन्में
माँ को छोड़
अपने दुख काग़ज़ों को कहते हैं

मेरी माँ ने काग़ज़ों को उठाकर
सीने से लगाया
क्या पता इस तरह ही
कुछ मेरे नज़दीक हो जाए
मेरा बेटा
सुरजीत पातर

साभार- किताब का नाम - "ओ पंखुरी" ,चयन व अनुवाद राम सिहं चाहल, प्रकाशन - संवाद प्रकाशन मेरठ (जिन जिन के सहयोग से ये कविताएं हमारे तक पहुँची उन सभी को दिल से शुक्रिया)




LinkWithin

Related Posts with Thumbnails