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Thursday, October 2, 2008

दो अक्तूबर, दो इंसान, और दो बातें


दो अक्तूबर और दो महान इंसान











आज दो अक्तूबर हैं दो महान इंसानो का जन्मदिन । एक ने सत्य और अहिंसा का संदेश दिया। दूजे ने सरलता और नैतिकता का उदाहरण पेश किया। हमें वो तो याद रहे पर उनके संदेश और उदाहरण हम भूल गए। और आज के दिन हम बड़ी बड़ी बात ना करके बस उनके संदेशो को फिर से जाने, समझे और अपनाए तो इससे बड़ी कोई बात ना होगी। इसलिए पेश हैं दो बातें। पढे और अपनी बात भी रखे।

1. अधिकार या कर्तव्य ?

मैं आज उस बहुत बड़ी बुराई की चर्चा करना चाहता हूँ, जिसने समाज को मुसीबत में डाल रखा हैं। एक तरफ पूंजीपति और जमींदार अपने हकों की बात करते हैं, दूसरी तरफ मजदूर अपने हकों की। अगर सब लोग सिर्फ अपने हकों पर ही जोर दें और फर्जों को भूल जाए, तो चारों तरफ बडी गड़बड़ी और अंधाधुंधी मच जाए। अगर हर आदमी हकों पर जोर देने के बजाय अपना फर्ज अदा करे, तो मनुष्य जाति में जल्दी ही व्यवस्था और अमन का राज्य कायम हो जाए। इसलिए यह जरुरी हैं कि हम हकों और फर्जों का आपसी सम्बंध समझ लें। मैं यह कहने की हिम्मत करुंगा कि जो हक पूरी तरह अदा किये गये फर्ज से नहीं मिलते, वो प्राप्त करने और रखने लायक नहीं हैं। वे दूसरों से छीने गये हक होंगे। उन्हें जल्दी से जल्दी छोड़ देने में ही भला हैं। जो अभागे माँ-बाप बच्चों के प्रति अपना फर्ज अदा किये बिना उनसे अपना हुक्म मनवाने का दावा करते हैं, वो बच्चों की नफरत को ही भड़कायेंगे। जो बदचलन पति अपनी वफादार पत्नी से हर बात मनवाने की आशा करता हैं, वह धर्म के वचन को गलत समझता हैं; उसका एकतरफा अर्थ करता हैं। लेकिन जो बच्चे हमेशा फर्ज अदा करने के लिए तैयार रहने वाले माँ-बाप को जलील करते हैं, वो कृतघ्न समझे जायेंगे और माँ-बाप के मुकाबले खुद का ज्यादा नुकसान करेंगे। यही बात पति और पत्नी के बारे में भी कही जा सकती हैं। अगर यह सादा और सब पर लागू होनेवाला कायदा मालिकों और मजदूरों, जमींदारों और किसानों, राजाओं(सरकार) और हिन्दू, मुसलमानों, सिख, ईसाई पर लगाया जाय, तो हम देखेंगे कि जीवन के हर क्षेत्र में अच्छे से अच्छे सम्बंध कायम किये जा सकते हैं। और, ऐसा करने से न तो हिन्दुस्तान या दुनिया के दूसरे हिस्सों की तरह सामाजिक जीवन या व्यापार में किसी तरह की रुकावट आयेगी और न गड़बड़ी पैदा होगी।

एक हिन्दू का अपने मुसलमान पड़ोसी के प्रति क्या फर्ज होना चाहिऐ ? उसे चाहिऐ वह एक मनुष्य के नाते उससे दोस्ती करे और उसके सुख-दुख में हाथ बंटाकर मुसीबत में उसकी मदद करे। तब उसे अपने मुसलमान पड़ोसी से ऐसे हे बरताव की आशा रखने का हक प्राप्त होगा। और शायद मुसलमान भी उसके साथ वैसा ही बरताव करे जिसकी उसे उम्मीद हो। मान लीजिये कि किसी गाँव में हिन्दुओं की तादाद बहुत ज्यादा हैं। और मुसलमान वहाँ इने-गिने ही हैं, तो उस ज्यादा तादादवाली जाति की अपने थोडे से मुसलमान पड़ोसीयों की तरफ की जिम्मेदारी कई गुनी बढ जाती है। यहाँ तक कि उनहें मुसलमानों को यह महसूस करने का मौका भी न देना चाहिये कि उनके धर्म के भेद की वजह से हिन्दू उनके साथ अलग किस्म का बरताव करते हैं। तभी, इससे पहले नहीं, हिन्दू यह हक हासिल कर सकेंगे कि मुसलमान उनके सच्चे दोस्त बन जायें और खतरे के समय दोनों कौमें एक होकर काम करें। लेकिन मान लीजिये कि वे थोड़े से मुसलमान ज्यादा तादाद वाले हिन्दुओं के अच्छे बरताव के बावजूद उनसे अच्छा बरताव नहीं करते और हर बात में लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो यह उनकी कायरता होगी। तब उन ज्यादा तादादवाले हिन्दुओं का क्या फर्ज होगा ? बेशक, बहुमत की अपनी दानवी शक्ति से उन पर काबू पाना नहीं। यह तो बिना हासिल किये हुए हक को जबरदस्ती छीनना होगा। उनका फर्ज यह होगा कि वे मुसलमानों के अमानुषिक बरताव को उसी तरह रोकें, जिस तरह वे अपने सगे भाइयों के ऐसे बरताव को रोकेंगे। इस उदाहरण को और ज्यादा बढ़ाना मैं जरुरी नहीं समझता। इतना कहकर मैं अपनी बात पूरी करता हूँ कि जब हिन्दुओं की जगह मुसलमान बहुमत में हो और हिन्दु सिर्फ इने-गिने हों, तब भी बहुमत वालों को ठीक इसी तरह का बरताव करना चाहिये। जो कुछ मैंने कहा हैं उसका मौजूदा हालत में हर जगह उपयोग करके फायदा उठाया जा सकता हैं। मौजूदा हालत घबड़ाहट पैदा करने वाली बन गई हैं, क्योंकि लोग अपने बरताव में इस सिन्द्धात पर अमल नहीं करते कि कोई फर्ज पूरी तरह अदा करने के बाद ही हमें उससे सम्बंध रखनेवाला हक हासिल होता है।

2. गुड, बच्चा और गाँधी

एक बार एक औरत अपने बच्चे के साथ गाँधी जी से मिली । और उसने कहा कि गाँधी मेरा बच्चा गुड बहुत खाता है आप इसे मना कर देगे बहुत अच्छा होगा और ये आपका कहा नही टालेगा। गाँधी जी बोले कि आप कल आना अपने बच्चे के साथ। वह औरत अगले दिन पहुँच गई अपने बच्चे के साथ। और बोली कि गाँधी जी मै आ गई हूँ। गाँधी जी बच्चे को अपने पास बुलाया और कहा कि ज्यादा गुड खाना अच्छा नही होता है। पर वह औरत तुरंत बोली कि गाँधी जी ये तो आप कल भी बोल सकते थे हमें आज क्यों बुलाया। गाँधी जी बोले कल तक तो मैं भी बहुत गुड खाता था पर अब मैंने खाना छोड़ दिया हैं। जो काम मैं खुद नही करता उसी काम के लिए ही तो मैं किसी को मना कर सकता हूँ। और वह औरत अपने बच्चे के साथ खुशी खुशी अपने घर को चल दी।

जरा विचार भी करें।

नोट- फोटो गूगल से लिए गये हैं और विचार गाँधी साहित्य से।






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