इस शहर को ना जाने क्या होने लगा हैं
छोटी-छोटी बात पर अपना आपा खोने लगा हैं ।
जिधर देखो आदमी के चेहरे ही चेहरे
फिर ना जाने क्यों आदमी अकेला होने लगा हैं।
जिसे देखो वही आईना दिखा रहा
फिर ना जाने क्यों अपना चेहरा छुपा रहा।
हर मोड़ पर आँशू पोछंने वाले मिल जाऐंगे
फिर ना जाने क्यों इसका भी दाम वसूला जा रहा।
चारों तरफ बाबाओं के प्रवचन ही प्रवचन गूंज रहे
फिर ना जाने क्यों ताकतवर कमजोर को मसल रहा।