जिंदगी रंग बिरंगी
ज़िन्दगी में रंग ही रंग भरे हुए हैं. अगर ये रंग ज़िन्दगी से निकाल दिए जाएँ, तो फिर जीवन का मतलब ही कुछ नहीं रह जायेगा. इन्हीं रंगों को हम दर्द, ख़ुशी, गम, आँसू, और संघर्ष जैसे नामों से पुकारते हैं..... हर इंसान की ज़िन्दगी में कभी ना कभी ऐसा मोड़ आता है जब वो अपने जीवन में हो रही घटनाओ के सामने मजबूर सा महसूस करने लगता है. उस पल उसे लगता है कि उसने यह जन्म लिया ही क्यों? लेकिन फिर उसी पल एक नयी तुलिका उसके जीवन में एक नया रंग भर देती है. और वह उसी रंग से अपनी जिदंगी की पेटिंग्स में खुशियों के रंग भरने लगता है. संघर्ष का रंग- कोशिश करने वालों का साथ भगवान भी देता है.
जब मैं रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा था. एक नौकरी की तलाश के लिए सुबह घर से निकल जाना और शाम को खाली हाथ लौट आना. रोज की यह दैनिकचर्या मुझे अंदर ही अदंर घुन की तरह खाए जा रही थी. मम्मी पापा के चेहरो पर उदासी का रंग देखा नही जाता था. शायद ज़िन्दगी के दुखों ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए थे. पता नही क्या क्या सोचते हुए पूरी रात यूँ ही बीत जाती थी. और फिर सुबह वही नौकरी की तलाश के लिए दिल्ली की गलियों में भटकना. पर कुछ दिनों के बाद दिल्ली पुलिस की भर्ती की सूचना का दीपक सूरज सा उजाला लेके आया. मैंने दिल्ली पुलिस भर्ती के लिए फार्म भर दिया. मन ही मन में खुद को हर पल पुलिस वर्दी में देखने लगा. रोज सुबह उठकर दौड़ने जाने लगा. पर एक दिन मुसीबत से भरी बिजली फिर से गिर पड़ी. मेरे फिजिकल टेस्ट से कुछ दिन पहले ही प्रेक्टिस के दौरान दौड़ते समय मेरे पांव में मोच आ गयी. मुझे लगा की जैसे भगवान मेरे साथ यह सब जानबूझकर कर रहे हैं. मैंने गुस्से में प्रेक्टिस बँद कर दी. टेस्ट में अब 5 दिन बाकि थे. एक दिन मैं घर से टहलने के लिए निकला. घर के सामने ही काफी बड़ा पार्क हैं, मैं पार्क में जाकर बैठ गया, वहाँ कुछ बच्चे खेल रहे थे, उन्हीं को देखने लगा. कुछ दी दूरी पर एक लड़की अपनी माँ के साथ बैठी थी. उस लड़की के पाँव में कुछ तकलीफ थी, क्योंकि वो ठीक से चल नहीं पा रही थी. शायद यह परेशानी उसे जन्म से थी. मैं भगवान को कोसता हुआ अपने टेस्ट के बारे में सोच रहा था. तभी कुछ २-३ उच्चकों (अफीमचीयों) ने उस लड़की की माँ का मंगलसूत्र खींचा और वहाँ से भागने लगे. मैं देख कर हैरान रह गया कि जो लड़की ठीक से चल भी नहीं सकती थी. वो मुश्किल से भागी और एक को पकड़ लिया. कुछ पल के लिए हाथापाई भी हुई। यह देखकर आसपास के लोग मदद के लिए आ गए. कुछ देर बाद पुलिस भी आ गई और चोर उच्चके को अपने साथ ले गई. शाम को मैं फिर से पार्क गया. वो लड़की और उसकी माँ अब भी टहलने आये थे. मैंने उस लड़की के पास जाकर उस से बात की. मैंने कहा की आपको डर नहीं लगा अगर वो चोर आपको नुकसान पहुँचा देता तो? वो बोली- नुक्सान पहुँचा देता तो पहुँचा देता. मैंने कहा "आप मदद के लिए शोर मचा सकती थी." वो बोली- भगवान भी उसी की मदद करता है, जो कोशिश करता है. मैंने कोशिश की और देखो भगवान ने मेरी मदद की. वो देखो मेरी माँ के गले में मंगलसूत्र .... उसके उन शब्दों ने मेरी सोच को ही बदल दिया. अब वही पार्क था, वही लड़की थी, वही उसकी माँ थी और उसकी माँ के गले में उस लड़की के संघर्ष द्बारा वापस दिलाया हुआ मंगलसूत्र चमक रहा था. साथ ही मैं भी वही था लेकिन अब मेरे मन में वो भावनाएं नहीं थी, जो सुबह तक थी. मैं मन ही मन निश्चय कर चुका था कि बेशक दौड़ में अंतिम ही क्यों ना आँऊ, पर दौडूंगा जरुर. मैं दोड़ा और छ्ठे स्थान पर भी आया। मुझे दौड़ते वक्त पाँव में बेहद दर्द हुआ, लेकिन दौड़ में छठा स्थान प्राप्त करने के बाद भी जो अनुभूति, जो एहसास, जो ख़ुशी आज तक मेरे दिल में बसी है वो शायद मरते दम तक यूँ ही रहेगी और साथ में उस लड़की द्वारा कही गयी बात भी कि - भगवान भी उसी की मदद करता है, जो कोशिश करता है. मैंने कोशिश की और देखो भगवान ने मेरी मदद की. और ज़िन्दगी का एक रंग और देखिए कि आज में एक पुलिसवाला ना होकर एक डिजाइनर हूँ.
शब्दों का रंग-सूरज का टुकड़ा
"तोड़ के सूरज का टुकड़ा, ओप में ले आऊं मैं! हो जलन हांथों में, तो क्या! कुछ अँधेरा कम तो हो.. मीत |
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हँसी का रंग- एक युवराज इधर भी
मीत जी के ब्लोग का डाक पता तुम्हारा मीत